यूकेडी पार्ट 1: पौड़ी का वो लाठीचार्ज जिसने जगाई अलग उत्तराखंड राज्य की अलख
पौड़ी में प्रदर्शन (एआई इमेज)
अगस्त, 1994। पौड़ी गढ़वाल प्रशासन किसी खामोश डर की आड़ में दुबका बैठा हुआ था। उसने पहले ही 10 अगस्त तक स्कूल बंद रखने की घोषणा कर दी थी और पूरे पौड़ी गढ़वाल में दो महीने के लिए धारा 144 लागू कर दी गई थी। यानि कि किसी भी तरह की जनसभा या जमावड़ा करने की अनुमति नहीं थी। लेकिन इसके बावजूद नियमों का उल्लंघन कर सात अगस्त को पौड़ी ऑडिटोरियम पर एक जनसभा का आयोजन किया गया। ये वही जगह थी जहां पर तीन अगस्त से इंद्रमणि बडोनी, रतनमणि भट्ट, डॉ. वासुवानंद नौटियाल समेत कई दिग्गज आंदोलनकारी आमरण अनशन पर बैठे हुए थे। ये लोग 27% ओबीसी आरक्षण, पंचायतों का परिसीमन और हिल कैडर सख्ती से लागू करने के मुद्दे पर अनशन कर रहे थे। जनसभा में सैकड़ों की भीड़ उमड़ी तो पुलिस प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए।
पुलिस ने अनशन पर बैठे आंदोलनकारियों को उठाने की योजना बनाई। इस योजना के तहत पहले पुलिस ने अनशन पर बैठे कुछ नेताओं से वार्ता की और कहा कि वह किसी भी रूप से बल प्रयोग नहीं करेंगे लेकिन ये उनकी साजिश का पहला मोहरा था। पुलिस प्रशासन का प्लान था कि जब ज्यादातर लोग आमरण अनशन स्थल से घर चले जाएं या सो जाएंगे तब धावा बोला जाएगा और अनशन पर बैठे आठों नेताओं को उठा दिया जाएगा। पुलिस ने पहली कोशिश सात अगस्त की रात 10 बजे की लेकिन वह सफल ना हो सकी। और फिर अगली कोशिश होती है मध्यरात्रि की साढ़े बारह बजे। रात को जब पूरन सिंह डंगवाल और पी सी भट्ट आराम करने सर्किट हाउस जा रहे थे तो उन्होंने पुलिस के भारी बल को अनशन स्थल की तरफ आते देखा। दोनों ही नेता उल्टे पांव दौड़ पड़े और उनका शक सही साबित हुआ। अनशन स्थल छावनी में तब्दील हो चुका था।

एक तरफ पुलिसकर्मी तैनात थे तो दूसरी तरफ, आंदोलनकारी एक घेरा बनाकर अनशन कर रहे नेताओं की ढाल बने हुए थे। पूरन सिंह डंगवाल जैसे ही स्थल पर पहुंचे तो उन्होंने माइक से अन्य आंदोलनकारियों को अनशन स्थल पर जमा होने की अपील करनी शुरू कर दी। उन्होंने पुलिस से भी अपील की कि वह बल प्रयोग ना करें। लेकिन पुलिस ने बिना किसी उकसावे के लाठीचार्ज शुरू कर दिया। पुलिस ने अनशन पर बैठे आंदोलनकारियों को वैन में डालने की कोशिश में उन्हें खींचना शुरू कर दिया। ये देखते हुए युवा आंदोलनकारी नेताओं को बचाने के लिए उनके ऊपर लेट गए। लेकिन पुलिस ने बर्बरतापूर्ण ढंग से इन नेताओं को वैन में घसीटकर डालना शुरू कर दिया।
पुलिस के इस लाठीचार्ज में 30 से ज्यादा युवा घायल हुए और आमरण अनशन पर बैठे नेताओं को अस्पताल भेजा गया। इंद्रमणि बडोनी को रात के 3 बजे मेरठ अस्पताल भेज दिया गया तो कई नेताओं को गिरफ्तार किया गया। आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज की खबर रातोंरात पूरे पौड़ी में फैल गई थी। लाठीचार्ज में घायल हुए कई युवाओं ने जब पुलिस की बर्बरता की कहानी सुनाई तो ये चिंगारी तूफान बन गई। और सुबह हुई भी नहीं थी कि पूरा पौड़ी गढ़वाल प्रशासन के इस रवैए के खिलाफ सड़कों पर उतर चुका था। अभी तक जो महिलाएं खेती-बाड़ी, चूल्हे-चौके सीमित थीं, वह भी घर की चौखट पार कर इस आंदोलन में कूद पड़ीं।

पौड़ी से शुरू हुआ ये उग्र आंदोलन अब पूरे पहाड़ में फैल चुका था और इस तरह आरक्षण और परिसीमन विरोधी ये आंदोलन अलग उत्तराखंड राज्य लेने का आंदोलन बन गया। और इसे अलग उत्तराखंड राज्य का आंदोलन बनाने का श्रेय जाता है- उत्तराखंड क्रांति दल को। वो राजनीतिक दल जिसका जन्म ही अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर हुआ था। 1994 का वो वक्त था जब उक्रांद का नाम हर किसी की जुबान पर था। आज का वक्त है कि उत्तराखंड क्रांति दल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। जिस दल ने अलग उत्तराखंड राज्य दिलाने में सबसे प्रमुख भूमिका निभाई उसी दल को एक राष्ट्रीय दल का नेता धमकाता है कि घुसने भी नहीं देंगे।
अगली कड़ी में आप पढ़ेंगे – उत्तराखंड क्रांति दल कैसे बनाया गया? उसके बाद की कड़ियों में जानेंगे कि कैसे उत्तराखंड के सबसे प्रमुख दल की ये हालत हो गई कि उसे कोई भी धमका कर चला जाता है। आखिर क्या कारण रहे कि जिन वजहों से उत्तराखंड क्रांति दल अपने उसी राज्य में मूर्छित हो गया जिसे लेने के लिए उसने लाठी-डंडे खाए। आर्टिकल की इस सीरीज़ में उत्तराखंड क्रांति दल की शुरुआत से लेकर अब तक की बात।
