गैरसैंण राजधानी नहीं, ‘इमोशनल ब्लैकमेल’ का माध्यम है !
गैरसैंण विधानभा भवन
उत्तराखंड में सिर्फ गैरसैंण का मुद्दा छाया रहता है। खासकर हर बजट सत्र से पहले। जब उत्तराखंड बना भी नहीं था, तब से ही यहां के लोग गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग उठा रहे हैं। मांग ही क्या, मोहन सिंह उत्तराखंडी नाम के शख्स ने तो इसके लिए जान तक दे दी। अब आंदोलन करने वाले गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग तो उठा लेते हैं लेकिन वह लोग कभी इसके राजधानी बनने के बाद के नुकसान को नहीं देखते। अरे भई… अलग राज्य उत्तराखंड बनने से पहले से भी गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग उठाई जाती है लेकिन उसके बावजूद हमारे नेताओं ने इसे परमानेंट कैपिटल नहीं बनाया। क्यों? अब आंदोलनकारी कहेंगे कि नेताओं में राजनीतिक महत्वाकांक्षा की कमी है लेकिन नहीं। महत्वाकांक्षा की कमी से नहीं बल्कि इसके राजधानी बनने से होने वाले नुकसान को हमारे नेता जानते हैं। इसलिए वह 25 साल बाद भी गैरसैंण को राजधानी बनाने का फैसला नहीं ले सके। लेते भी कैसे क्योंकि नुकसान का सौदा थोडे़ ही करना है। गैरसैंण में विधानसभा सत्र करने की बात पर हमारे नेताओं को ठंड लगने लग जाती है। अब तो बल वहां पर ऑक्सीजन की कमी भी हो गई है। लेकिन ऐसा होने की वजह है। देखिए, गैरसैंण को राजधानी बनाने में कई नुकसान हैं। भले ही आपको ना दिखे लेकिन हमारे नेताओं को ये नुकसान साफ–साफ नजर आते हैं।
मैं देहरादून वाला हूं
सबसे बड़ा और पहला नुकसान तो ये है कि देहरादून में जड़ें जमा चुके हमारे नेता और अधिकारी अब पहाड़ नहीं चढ़ सकते। भई कैसे चढ़ेंगे? ना बेहतर रोड है। ना रहने की सुविधाएं हैं और उस पर हाड़ कंपा देने वाली ठंड अलग। दिलीप सिंह रावत, त्रिवेंद्र सिंह रावत समेत उत्तराखंड के कई नेता हैं जो कहते हैं कि बिना जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर के गैरसैंण को स्थायी राजधानी कैसे बनाया जा सकता है। बात तो सही है। लेकिन फिर सवाल उठता है कि इस इंफ्रास्ट्रक्चर को तैयार करने की जिम्मेदारी किसकी है? जवाब है- इन्हीं सरकारों की जिनके नेता सुविधाओं की कमी का रोना रोते हैं। अगर बेहतर रोड नहीं हैं तो क्यों सरकार अच्छी सड़कें नहीं बना लेती। अगर रहने की सुविधा नहीं है तो क्यों सरकार यहां पर जरूरी इंतजामात नहीं कर लेती। आप ये भी कहेंगे कि राजधानी संसाधन देखने के लिए नहीं बल्कि संसाधन बनाने के लिए बनाई जाती है। अरे भई… आप कितने भी तर्क दे दो… हमारी सरकारें क्यों इंतजामात करेंगी? हमारे नेताओं और अधिकारियों की मंशा देहरादून को छोड़ने की कभी रही ही नहीं है। अव्वल तो गैरसैंण राजधानी के तौर पर नेताओं की पसंद कभी थी ही नहीं।
जब अलग उत्तराखंड राज्य बन रहा था तो सभी गैरसैंण-गैरसैंण चिल्ला रहे थे लेकिन बड़े सुविधाजनक ढंग से इन आवाजों को दरकिनार कर देहरादून को राजधानी बना दिया गया। यूपी राज में जो बहुत सारे सरकारी महकमे पहाड़ी जिला मुख्यालयों में थे, उन्हें देहरादून ला दिया गया। यह जानते हुए भी कि यह एक अस्थाई राजधानी है, यहां पर भारी-भरकम निर्माण शुरू कर दिए गए। दरअसल नेताओं को पता था कि अब यही उनका घर होगा। देहरादून के पॉश इलाकों में बसे अफसर अगर गैरसैंण की चढ़ाई चढ़ेंगे तो उन्हें पहाड़ियों की तकलीफ का अंदाजा लग जाएगा और उन्हें काम करना पड़ेगा। आप ही बताइए कि जिन साहब लोगों को रिवर फ्रंट और मॉल रोड की आदत पड़ चुकी है, वो उस वीरान और इंफ्रास्ट्रक्चर लेस पहाड़ में कैसे रह पाएंगे?
मैदान तेरे प्यार में…
अरे ये नुकसान तो फिर भी छोटा है। इससे बड़ा नुकसान तो मैदान से दूरी बढ़ने का डर है। भले ही अलग उत्तराखंड राज्य पहाड़ में पनप रही दिक्कतों को सॉल्व करने के लिए मांगा गया लेकिन यहां की राजनीति में मैदान का रोल ज्यादा महत्वपूर्ण है। दरअसल राज्य के मैदानी जिलों में 30 से ज्यादा विधानसभा सीटें हैं। अब हमारे माननीयों को डर है कि अगर गैरसैंण को राजधानी बना दिया गया तो मैदानी वोट बैंक उनसे नाराज हो सकता है। इनका डर गलत भी नहीं है। पहाड़ वैसे भी पलायन की वजह से खाली हो चुका है। यहां उनको वैसे भी वोटर नहीं मिलेंगे। हमारे नेताजी जितनी मेहनत पहाड़ की सीटों को जीतने के लिए करेंगे, उसकी आधी ही मेहनत में ये लोग मैदानी सीटों को जीत सकते हैं। फिर भी पहाड़ की जो सीटें इनके हाथ लग जाती हैं, वो जीतने के बाद ही वहां के विधायक साहब देहरादून और हल्द्वानी में घर बना लेते हैं। तो भई… रहना भी मैदान में है। वोट भी मैदान में है तो राजधानी पहाड़ में कैसे हो सकती है?
गैरसैंण की मांग करने वाले भूल जाते हैं कि जिस पहाड़ी राज्य में एक आम सा दूध का पैकेट भी मैदान के मुकाबले पहाड़ में महंगा बेचा जाता है, वहां पर पहाड़ी राजधानी की मांग करना बेमानी नहीं तो क्या है? ये गैरसैंण चिल्लाने वाले सोचते हैं कि पहाड़ में राजधानी होने से पहाड़ का विकास होगा लेकिन ये हमारे नेताओं को मैदानी वोट बैंक के होने वाले नुकसान को नहीं देखते। यही नुकसान है जिसकी वजह से चुनाव आते ही हमारे नेताओं के लिए गैरसैंण भावना बन जाता है और चुनाव खत्म होते ही सिर्फ भूगोल।
ग्रीष्मकालीन राजधानी
अब आप में से कुछ लोग कह सकते हैं कि हमारी सरकारों ने गैरसैंण को राजधानी बना तो दिया है। आज गैरसैंण उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी है। जिस तरह जम्मू-कश्मीर और हिमाचल में दो-दो राजधानियां हैं, उस तरह हमारे यहां भी दो-दो राजधानी हो गई हैं तो फिर गैरसैंण को परमानेंट बनाने का हल्ला क्यों? सवाल तो एकदम वाजिब है लेकिन ये गैरसैंण को परमानेंट करने की चाहत रखने वाले ‘ग्रीष्मकालीन राजधानी’ के दर्जे को एक सुरक्षित राजनीतिक समझौता बताते हैं।
इनका कहना है कि ये दांव इसलिए खेला गया ताकि पहाड़ की भावनाओं को भी शांत रखा जा सके और देहरादून की सुख-सुविधाओं को भी न छोड़ना पड़े। लेकिन ये लोग नहीं जानते कि ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाना एक मास्टरस्ट्रोक है। भई देहरादून में लगातार गर्मी बढ़ रही है। अब जब एयरकंडीशनर की हवा भी काम नहीं आएगी तो गैरसैंण में ठंडी हवा खाने तो जाया जा सकता है। आप भले ही इसे ग्रीष्मकालीन राजधानी कहें लेकिन ये एक तरह से हॉलिडे होम है। जहां जब मन करे तब सत्र रख लो और जब लगे कि देहरादून में एसी से काम चल जा रहा है, तब ठंडी और ऑक्सीजन की कमी का बहाना तो है ही। साल में मुश्किल से 10 दिन का सत्र और फिर 355 दिन का सुन्न सन्नाटा। यही तो है गैरसैंण का असली ‘विकास’।
साफ है कि जब तक हमारे माननीय विधायकों को पहाड़ की चढ़ाई में घुटनों का दर्द महसूस होगा। जब तक अफसरों को देहरादून के मॉल की याद सताएगी, तब तक गैरसैंण सिर्फ बजट सत्र के 5-6 दिनों के लिए ही गुलजार रहेगा। बाकी दिन यहां पर सिर्फ सन्नाटा होगा, पलायन होगा और टूटे हुए खंडहर होंगे। सच्चाई तो यह है कि गैरसैंण अब राजधानी नहीं बल्कि एक इमोशनल ब्लैकमेल करने का जरिया बन चुका है। नेताओं के लिए ये ‘वोट’ है, और पहाड़ के लोगों के लिए एक ‘अधूरी हसरत’।
अब ये अधूरी हसरत कभी पूरी होगी भी या नहीं?, इस सवाल का जवाब मिलने में ना जाने कितने और साल लगेंगे। तब तक नेता लोग गैरसैंण को फुटबॉल बनाकर जनता के पाले में डालने की कोशिश करते रहेंगे।
वीडियो देखें – https://youtu.be/_RaqkjRb5TU
