पहाड़ की रीढ़ (महिला) टूट रही है !
ये उस वक्त की बात है जब पहाड़ों में सिर्फ जमीन से भरण-पोषण होता था। साबुन की जगह बिमल के पेड़ के छिलकों का इस्तेमाल होता। कपड़े धोने के लिए चूल्हे का खारा काम आता। और जब देहतोड़ मेहनत करने के बाद भी भरपेट अन्न मिलना एक लग्जरी थी। तब की बात है। एक सास और बहू थी। असूज के महीने में बहू ने हाड़तोड़ काम किया। असूज में पहाड़ों में 22 नाज होते हैं। बहू को उम्मीद थी कि कम से कम अब तो उसे भरपेट खाना मिलेगा लेकिन आदत से मजबूर सास ने सबके खाने के बाद जो बचा-खुचा था, वही बहू को थमा दिया।
जैसे-तैसे बहू ने वक्त काटा और फिर जेठ का महीना आया। बहू ने तपती गर्मी में गेहूं के भारे यानी बोझ पीठ पर लादकर लाए। कड़ी मेहनत कर जब वह घर पहुंची तो उसे लगा अब तो गेहूं की रोटी खाने को मिलेगी, उसने इतनी मेहनत जो की है। बहू ने सास से कहा- जी, अब ऐगे ज्याठ। मैं भी द्यावा खाणु भरप्याट (सासु जी, जेठ आ गया है। मुझे भी भरपेट खाना दे दो)। जवाब में सास ने कहा – ऐ ब्वारी, जथगी मेरी मुठ, तथगा तेरु प्याट। और ये सुनते ही उस महिला के प्राण चले गए। गढ़वाली में एक कहावत कही जाती है – बल्द मारण आख-काख, सैंणि मारण म्हैंण-पाख यानि कि बैल को संकरी जगह पर ले जाकर मारना चाहिए और पत्नी को महीने-पंद्रह दिन में एक बार जरूर मारना-पीटना चाहिए।
ये उत्तराखंड के पहाड़ों में महिलाओं के दर्द को उकेरती एकमात्र कहानी नहीं है। ऐसी कई कहानियां इस परिवेश में पसरी हुई हैं। ये कहानी पहाड़ की महिला के उस संघर्ष की कहानी बताती है जिसे वो अपना भाग्य मानकर सहज ही स्वीकार कर लेती थी और आज भी काफी हद तक करती है। इन लोकोक्तियों और इस कहानी से ये तो पता चल जाता है कि देश हो या दुनिया, आधी आबादी को हमेशा उपभोग की नजर से ही देखा गया। लेकिन सवाल उठता है कि खुद के अस्तित्व के लिए संघर्ष करती ये आधी आबादी महिलाएं पहाड़ की रीढ़ कैसे बन गई? रीढ़ बनने के बाद भी मूल हक क्यों नहीं मिले?
पहाड़ में सदियों से घर संभालने से खेती-बाड़ी तक के सभी काम महिलाओं के सिर थे। पुरुष की जिम्मेदारी परिवार का पालन-पोषण करना था। इस जिम्मेदारी की आड़ में पुरुषों के कंधे तो हल्के होते गए लेकिन महिलाओं के सिर पर बोझ बढ़ता गया। डॉ. राजकुमारी चौहान अपनी किताब उत्तराखंड: महिला भूमिका का इतिहास में बताती हैं कि उत्तराखंडियों की आजीविका का मुख्य आधार कृषि थी। अंग्रेजों ने जहां भूमि बंदोबस्त कर किसानों को ही जमीन का हक दे दिया, वहीं टिहरी रियासत में जमीनों पर राजा का अधिकार था।
गढ़वाल के राजाओं ने कृषि विकास पर कोई ध्यान नहीं दिया। और इस वजह से यहां की स्थिति बिगड़ती चली गई। 1815-1847 के बीच जब जनसंख्या वृद्धि होने लगी तो गढ़वाल के लोगों के लिए कृषि पर आश्रित रहकर जीवनयापन करना कठिन हो गया। इसका परिणाम ये हुआ कि अब तक खेती-किसानी में महिलाओं का हाथ बंटा रहे पुरुष शहरों की तरफ पलायन करने लगे। ब्रिटिश काल में पहाड़ी या तो सेना में भर्ती होते या फिर शहरों में दिहाड़ी-मजदूरी करने के लिए निकल जाते। और इस तरह पहाड़ में घर संभालने की पूरी जिम्मेदारी महिलाओं पर आ गई।
सिर्फ जिम्मेदारी नहीं बल्कि सीढ़ीनुमा खेत, सिंचाई का बेहतर प्रबंधन ना होना और मानसून पर निर्भरता से उपजी चुनौतियां भी उनके ही हिस्से आईं। वह ना सिर्फ बच्चों को संभालती बल्कि पशुओं की देखभाल, किसानी, जंगलों से बांझ, घास और लकड़ी लाती। ब्रिटिशकाल से शुरू हुआ ये पलायन आज भी अनवरत जारी है। आज भी ना पलायन रुका और ना ही महिलाओं के उस चुनौतियों से भरे जीवन में कोई बदलाव आया है। कम से कम ग्रामीण भाग में तो यही सूरत है।
महिलाएं उत्तराखंड की इकोनॉमी की रीढ़ कैसे बनीं? इसका जवाब 2011 की जनगणना से मिलता है।2011 की जनगणना के मुताबिक उत्तराखंड में 64% उत्तराखंडी महिलाएं किसान हैं। 84.4% महिलाएं कृषि श्रमिक हैं। इकोनॉमी में उत्तराखंडी महिलाओं की भागीदारी देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले काफी ज्यादा है लेकिन इसके बावजूद भी इन्हें क्रूसियल लेबर का दर्जा नहीं मिला है। इंडियन जर्नल ऑफ हिल फार्मिंग के एक लेख के मुताबिक उत्तराखंडी महिलाएं हर दिन औसतन 16.49 घंटे काम करती हैं। महिलाओं के कुल समय का 29.35% सिर्फ कृषि में लगता है
हिमालयन रिसर्च सेंटर के एक सर्वेक्षण के मुताबिक एक एकड़ खेत में एक साल में बैल की एक जोड़ी एक साल में 1064 घंटे, एक पुरुष 1212 घंटे और एक महिला 3485 घंटे काम करती है।v यानि कि पहाड़ की महिलाएं जानवरों से भी ज्यादा काम करती हैं लेकिन इसके बावजूद भी जब कृषि नीतियां बनती हैं तो महिला किसानों की आवश्यकताओं को दरकिनार कर दिया जाता है।
आज भी वित्तीय मामलों में उनकी राय कम ही मायने रखती है। उनके पास अभी भी घर के अहम फैसलों में दखल रखने की पूरी स्वतंत्रता नहीं है। लेकिन अगर उन्हें पुरुष जितनी स्वतंत्रता मिल जाए तो वो क्रांति लाने का दमखम रखती हैं। ये हम नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय खाद्य संगठन फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन कह रहा है। जितने संसाधन एक पुरुष को दिए जाते हैं, उतने ही संसाधन अगर महिलाओं को दिए जाएं तो विकासशील देशों में एग्रीकल्चर ग्रोथ 2.5 से 4 फीसदी तक बढ़ जाएगा। सिर्फ यही नहीं, दुनियाभर में कुपोषितों की संख्या में 12 से 17 फीसदी की कमी आ जाएगी।
पुरुषों के लिए खड़ी रहीं, खुद अकेली हो गईं।
उत्तराखंड आंदोलनों की धरती रही है। और इन आंदोलनों की मजबूत कड़ी भी महिलाएं ही साबित हुईं।आजादी के संग्राम से लेकर उत्तराखंड राज्य के आंदोलन तक, महिलाओं ने जैसे हुआ-वैसे अपना सहयोग पुरुषों को दिया।शेखर पाठक अपनी किताब हरी भरी उम्मीद में लिखते हैं, “स्वतंत्रता संग्राम में चंद महिलाओं ने प्रत्यक्ष तो लाखों महिलाओं ने अप्रत्यक्ष रूप से अहम भूमिका निभाई। पहाड़ की महिलाओं ने अपने घर के पुरुषों को लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाने की आजादी दी। इसके बदले उन्होंने पुरुषों को घर की जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुक्त कर दिया और पूरा भार अपने ऊपर ले लिया।”
शेखर पाठक लिखते हैं कि महिलाओं ने तब घर संभालने, खेती-किसानी करने जैसे कई कामों में जो तकलीफें उठाईं, आज उनका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। तब महिलाएं शिक्षा से वंचित थीं। वे ना सिर्फ अपने घर के पुरुषों की नजर में बल्कि खुद की नजर में भी दोयम दर्जे की नागरिक थीं। शेखर पाठक लिखते हैं कि 100 साल पहले स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में भी महिलाओं के हकों की नहीं सोची गई। पहाड़ की महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार संबंधी चिंता किसी को नहीं हुई।
1980 के दशक में नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन से महिलाएं सड़कों पर उतरीं। ताकि वो अपने घर-बार और उन पुरुषों को बचा सके जो नशे के आदि हो चुके हैं। उत्तराखंड राज्य आंदोलन में महिलाएं एक बार फिर पुरुषों की ढाल बनीं। डॉ. राजकुमारी चौहान अपनी किताब उत्तराखंड: महिला भूमि का इतिहास में बताती हैं कि जब 1994 में तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार ने युवाओं और आंदोलनरत पुरुषों पर गोलियां और लाठीचार्ज करना शुरू किया तो एक बार फिर महिलाएं पुरुषों की ढाल बनीं। किताब में चौहान जानकारी देती हैं कि 89.37% महिलाओं ने माना कि वे इसलिए मैदान में उतरीं क्योंकि पुरुषों पर पुलिस ज्यादती कर रही थी। 09.38% महिलाओं ने कहा कि सबसे ज्यादा उत्तराखंड की महिलाएं प्रभावित हो रही थीं और महिलाएं राजनैतिक-सामाजिक परिवर्तन चाहती थीं। वहीं, 01.25% महिलाओं ने कहा कि इसकी वजह से उन्हें बाहर जाने का मौका मिला।
तीनों वजहें काफी हद तक सही थीं लेकिन क्या अलग राज्य बनने के बाद महिलाओं की स्थिति में सुधार हुआ है तो इसका जवाब भी खुद महिलाओं ने दिया है। चौहान ने इस संबंध में किए सर्वे के आंकड़े पेश करते हुए वो बताती हैं कि सर्वे में शामिल 800 महिलाओं में से करीब 19% ने कहा कि राज्य बनने के बाद उनकी सामाजिक स्थिति में सुधार हुआ है। 22.13% ने कहा कि राज्य बनने के बाद उनकी स्थिति बद्तर हुई है। वहीं, 59.12% महिलाओं ने कहा कि उनकी सामाजिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है।
सड़क, स्कूल, अस्पताल ना होने का सबसे ज्यादा खामियाजा उसे ही भुगतना पड़ा है। वो जंगल गई तो बाघ के हमलों से बचने की चुनौती रही। अस्पताल ना होने की वजह गर्भवती होना, उसके लिए काल बन गया। उसकी तकलीफें कम नहीं होतीं। पहाड़ से लड़कियों और महिलाओं के गायब होने का सिलसिला भी नहीं थमता। कई महिलाएं और लड़कियां ऐसी हैं जो गायब तो हुईं लेकिन उनके गायब होने की रिपोर्ट नहीं हुई। कई गांवों में आज भी ऐसी लड़कियों को ये कहकर भुला दिया जाता है कि उसने आत्महत्या कर ली होगी या फिर किसी के साथ भाग गई होगी। उस गायब हुई लड़की के नाम पर जांच-पड़ताल भी कम ही होती है। पहाड़ की 90% कृषि का जिम्मा संभाल रही महिलाएं लेकिन सिर्फ 2 फीसदी को ही जमीन पर अधिकार है। उत्तराखंड बदल रहा है लेकिन नहीं बदल रहा है तो यहां की ग्रामीण स्त्रियों का जीवन।
आज आधुनिक होते परिवेश में भी महिलाओं का जीवन उन्हीं कठिनाइयों से जकड़ा पड़ा है जो सदियों पहले उसके हिस्से आई थीं। लेकिन उसे भी पता है कि उसके दुख को सुनाने वाले गीत ना ये सत्ता में बैठे हुक्मरान समझ पाएंगे औरना ही वो समाज जिसने उसे सिर्फ प्रथाओं, परंपराओं और जिम्मेदारियों के बोझ तले बांधे रखा है। पहाड़ की नारी पहाड़ की रीढ़ हैं और ये रीढ़ तब ही मजबूत हो पाएगी जब पुरुष इनके श्रम का महत्व समझ पाएँगे और उन्हें भी अपनी तरह की आजादी मुहैया करना शुरू करेंगे।
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