भरत से भारतवर्ष की यात्रा कराती वरिष्ठ पत्रकार मनोज इष्टवाल की ‘कण्वाश्रम’

वरिष्ठ पत्रकार मनोज इष्टवाल की किताब कण्वाश्रम का विमोचन

वरिष्ठ पत्रकार मनोज इष्टवाल की किताब कण्वाश्रम का विमोचन


यह हम सभी जानते हैं कि भरत के नाम से ही हमारे देश का नाम भारत पड़ा लेकिन क्या आप जानते हैं कि भरत का जन्म स्थान कहां पर है? भरत के जन्म को लेकर अलग-अलग तरह के दावे किए जाते हैं लेकिन कोटद्वार की धरती पर ही वह कण्व आश्रम है जहां महर्षि कण्व के गुरुकुल में चक्रवर्ती सम्राट भरत का जन्म हुआ था। और इस बात को पुख्ता करती है वरिष्ठ पत्रकार मनोज इष्टवाल की शोधपरक रचना ‘कण्वाश्रम’। पत्रकार मनोज इष्टवाल ने करीब 25 वर्षों के शोध, लेखन एवं संकलन कार्य कर कण्वाश्रम-भरत से भारतवर्ष नाम से शोधपरक पुस्तक तैयार की है। 

पौड़ी गढ़वाल के कोटद्वार में 18 जुलाई को मनोज इष्टवाल की कॉफी टेबल स्वरूप में आई इस पुस्तक का विमोचन किया गया। यहां आयोजित एक भव्य सैनिक समारोह में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व की इस अनूठी कृति का विमोचन किया गया। इस कार्यक्रम में उत्तराखंड की विधानसभा अध्यक्ष ऋतु भूषण खण्डूड़ी,पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज, सैनिक कल्याण मंत्री गणेश जोशी, मेयर शैलेन्द्र रावत, लेफ्टिनेंट जनरल जे एस नेगी उपस्थित रहे। इन गणमान्य लोगों ने संयुक्त रूप से मनोज इष्टवाल की लिखित ‘कण्वाश्रम’ पुस्तक का विमोचन किया।

कार्यक्रम के दौरान मंच पर मौजूद सभी अतिथियों ने पत्रकार इष्टवाल के प्रयासों की न सिर्फ सराहना की बल्कि इतनी शोधपरक पुस्तक तैयार करने के लिए उन्हें शुभकामनाएं भी प्रेषित कीं। सैन्य समारोह में पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने इस पुस्तक के बहाने कण्वाश्रम का जिक्र छेड़ा। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक सिर्फ एक शोध ग्रंथ नहीं है बल्कि यह देश के गौरवशाली इतिहास को सामने लाने में एक मील का पत्थर साबित होगी। अपने वक्तव्य में उन्होंने बताया कि कण्वाश्रम का इतिहास भारतवर्ष की पहचान से सीधे जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि मनोज इष्टवाल की यह कॉफी टेबल बुक सिर्फ सजाने के लिए नहीं बल्कि संरक्षणीय भी है।

उन्होंने कहा कि इस पुस्तक के माध्यम से युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों को समझने का मौका मिलेगा। सतपाल महाराज ने कहा कि कण्वाश्रम सिर्फ उत्तराखंड की नहीं बल्कि पूरे देश की धरोहर है। उन्होंने कहा कि पर्यटन विभाग इस पुस्तक के साक्ष्यों के आधार पर कण्वाश्रम को एक वैश्विक सांस्कृतिक पर्यटन सर्किट के रूप में विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

वहीं, ​विधानसभा अध्यक्ष और स्थानीय विधायक ऋतु खण्डूड़ी भूषण ने भी मनोज इष्टवाल के शोध कार्य की मुक्त कंठ से सराहना की। उन्होंने इस अवसर पर कहा कि कोटद्वार और कण्वाश्रम का यह गौरवशाली इतिहास हर उत्तराखंडी को गौरवान्वित करता है। विधानसभा अध्यक्ष ने यह भी कहा कि कण्वाश्रम के विकास और इसके ऐतिहासिक स्वरूप को पुनर्जीवित करने के लिए हर संभव प्रयास किए जाएंगे।

वरिष्ठ पत्रकार मनोज इष्टवाल अपनी इस पुस्तक के माध्यम से हमारे सामने कण्वाश्रम को जीवित कर लाते हैं। इस पुस्तक में लगे कण्वाश्रम के चित्र और शोध आपको उसी स्थान पर लेकर जाता है जहां पर आश्रम स्थित है। इष्टवाल की यह किताब सिर्फ एक ऐतिहासिक दस्तावेज न होकर यह कण्वाश्रम के वैभव एवं पौराणिकता पर भी प्रकाश डालती है। मनोज इष्टवाल बताते हैं कि कण्वाश्रम के बारे में शोध करने के लिए और पुख्ता जानकारी जुटाने के लिए वह वर्षों से काम कर रहे थे। उन्होंने इस आश्रम के तथ्य जुटाने के लिए मालिनी नदी से ऊपर का पैदल ट्रेक भी किया। इष्टवाल बताते हैं, “मैंने इस पुस्तक को शोध एवं तथ्यपरक रखने की कोशिश की है। इसमें मैंने अपने वर्षों से किए कड़े शोध और तथ्यों का पूरा निचोड़ दे दिया है।”

कोटद्वार में आयोजित हुए सैन्य समारोह में जब कण्वाश्रम का विमोचन हुआ तो आम लोगों ने भी इसके बारे में और जानकारी लेने की इच्छा जाहिर की। दर्शक दीर्घा में बैठे कई लोगों ने कण्वाश्रम को लेकर मनोज इष्टवाल के प्रयासों को सराहा और कहा कि यह पुस्तक उन्हें कण्वाश्रम को और अच्छे तरीके से जानने एवं समझने में मदद करेगी। ऐसा हो भी क्यो न। क्योंकि लेखक की यह पुस्तक केवल एक साहित्यिक कृति नहीं बल्कि गहन शोध का परिणाम है।

इस पुस्तक को तैयार करने के लिए मनोज इष्टवाल ने दशकों का समय दिया है। उन्होंने न सिर्फ उन जगहों का खुद जाकर दौरा किया जहां पर कण्वाश्रम को लेकर कुछ तथ्य मिल सकते थे बल्कि उन्होंने प्राचीन ग्रंथों, पुरातात्विक साक्ष्यों और स्थानीय लोक कथाओं की भी खाक छानी। इन्हीं सभी का समिश्रण कर एवं तथ्यों को उजागर कर उन्होंने कण्वाश्रम नाम की यह पुस्तक तैयार की है।

इस पुस्तक में आपको विस्तार से भरत के भारतवर्ष बनने की कहानी मिलेगी। आप जानेंगे कि कैसे भरत की कहानी महाभारत काल से जुड़ी है। जब आप किताब के पन्ने पलटते हैं तो कण्वाश्रम के सुंदर चित्रों के साथ आपको पता चलता है कि कैसे यह स्थल भारतवर्ष की सांस्कृतिक नींव बना।

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