केदारनाथ आपदा: 2004 में ही मिल गया था पहला संकेत लेकिन सरकार सोई रही
केदारनाथ आपदा
12 जुलाई, 2004 का दिन था। दैनिक जागरण के देहरादून स्थित ऑफ़िस में हड़कंप मचा हुआ है। वजह है एक ख़बर। स्थानीय संपादक इस ख़बर पर विश्वास ही नहीं कर पा रहे थे। वह ख़बर लिखने वाले पत्रकार से बार-बार सवाल पूछ रहे थे। वो पूछ रहे थे कि आख़िर ऐसा कैसे हो सकता है? और अगर ऐसा हो रहा है तो कोई इस पर कुछ बोल क्यों नहीं रहा? खबर लिखने वाले पत्रकार ने संपादक के हर सवाल का जवाब दिया और बताया कि उसने अपनी आंखों से हालात देखने के बाद ही ये खबर लिखी है। उसने संपादक को सभी सबूत भी सौंपे लेकिन इसके बावजूद स्थानीय संपादक कनविंस नहीं हो पा रहे थे। और होते भी कैसे? क्योंकि खबर बहुत बड़ी थी।
स्थानीय संपादक ने तब कानपुर स्थित दैनिक जागरण के हेडक्वॉर्टर में मुख्य संपादक से इसको लेकर बात की। हालांकि इस बातचीत के बावजूद कई दिनों तक दैनिक जागरण के संपादक मंडल के बीच खबर छापें या ना छापें, इसको लेकर विचार-विमर्श चलता रहा। और आखिरकार 1 अगस्त, 2004 को तय किया गया कि ये बहुत बड़ी ख़बर है और इसे फ़्रंट पेज की लीड ख़बर होना चाहिए। इस तरह 2 अगस्त, 2004 के दैनिक जागरण के अख़बार में ख़बर छपी। शीर्षक था- अब केदारनाथ खतरे में, बम की तरह फटेगा चौराबाड़ी ग्लेशियर।

ये ख़बर छपी ही थी कि दैनिक जागरण के ऑफ़िस में लगातार फ़ोन घनघनाने लगे। ख़बर लिखने वाले पत्रकार लक्ष्मी प्रसाद पंत पर इस ख़बर का खंडन छापने का दबाव बनाया गया। हालांकि सभी सबूत होने की वजह से खंडन तो नहीं छपा लेकिन इस ख़बर को अनदेखा करना बहुत भारी पड़ा। साल 2013 15-16 जून की तारीख़ थी और ये ख़बर सच हो आई। बम की तरह चौराबाड़ी ग्लेशियर फटा और केदारनाथ सिर्फ खतरे में नहीं आया बल्कि हजारों लोगों की जान ये बम लील गया।
इस ख़बर को लिखने वाले पत्रकार लक्ष्मी प्रसाद पंत अपनी किताब हिमालय का कब्रिस्तान में लिखते हैं कि अगर 2004 में इस ख़बर के छपने के बाद सरकार शांत ना रहती। इससे जुड़े वैज्ञानिक सरकारी दबाव में आकर बैकफ़ुट पर ना आते और लगातार चेतावनियां देते रहते तो शायद ये हादसा होता ही नहीं। ये वही झील थी जिसकी 2003 से निगरानी हो रही थी लेकिन खबर छपने के बाद जैसे सरकारी महकमा इसे विकराल रूप लेने से बचाने की बजाय खबर को झुठलाने में जुट गया और परिणाम विनाशकारी साबित हुआ।
मौसम विभाग ने भी दी थी चेतावनी
ऐसा नहीं है कि सरकारों ने सिर्फ इस ख़बर को ही इग्नोर किया। 15-16 जून को केदारनाथ में तबाही मच सकती है, इसके संकेत सरकार को पहले से ही मिल गए थे लेकिन गहरी नींद में सोने वाली सरकार तब जागी, जब हजारों मौत की नींद सो गए। ऐसा नहीं है कि लापरवाहियों और अनदेखी का ये सिलसिला यहीं थम गया हो। ये सिलसिला उत्तराखंड में आई कई बड़ी आपदाओं में भी जारी रहा। सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं बल्कि हिमाचल और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में भी सरकारों के इस आंख चुराने वाले रवैए से कई आपदाएं आईं और उनमें कई जानें गईं। जो आपदाएं प्राकृतिक थीं, उन्हें विनाशकारी सरकारों ने बनाया है। इसके पुख्ता सबूत खुद सरकारी और अन्य रिपोर्ट्स में पड़े हुए हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि थराली में आई आपदा भी काफी हद तक सरकारों की ही देन थी।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
हमारी सरकारें आपदा के बाद जितनी एक्टिव दिखती हैं, उतनी ही सुस्त वो पहले पड़ी रहती हैं। और ये कहानी सिर्फ उत्तराखंड की नहीं है बल्कि सभी प्रभावित हिमालयी राज्यों में यही स्थिति है। और इसी स्थिति को लेकर 18 जुलाई,2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक गंभीर टिप्पणी भी की। कोर्ट ने कहा कि अगर हालात इसी तरह चलते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब पूरा हिमाचल भारत के नक्शे से गायब हो सकता है। भगवान न करे ऐसा हो।”
ये याचिका हिमाचल से जुड़ी हुई थी तो कोर्ट ने हिमाचल का जिक्र किया लेकिन उत्तराखंड की भी कमोबेश यही स्थिति है। कोर्ट ने इसके लिए मानवीय गतिविधियों को ज़िम्मेदार ठहराया। और सरकारों को हिदायत दी कि वो अपना मुनाफा पर्यावरणीय स्थिरता यानी इकोलॉजिकल सस्टेनेब्लिटी की कीमत चुकाकर ना कमाएं। लेकिन क्या आजतक ऐसा हुआ है? और क्या आगे जाकर ऐसा होगा? इन सवालों को थाम के रखिएगा। क्योंकि इनके जवाब आपको तब मिल जाएंगे, जब आप देखेंगे कि किस तरह सरकारें आपदा को बुलाने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। और इसे जानने की शुरुआत करते हैं केदारनाथ आपदा से ही।
लापरवाहियों ने विनाश को न्यौता दिया
ऐसा नहीं है कि केदारनाथ आपदा का पहला संकेत 2004 में छपी इस ख़बर ने ही दिया था। देहरादून स्थित मौसम विभाग ने 2013 में 13 जून से लेकर 16 जून तक लगातार तेज़ और भारी बारिश का पूर्वानुमान सटीक दिया था। कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल की रिपोर्ट में भी ये बात कही गई है। रिपोर्ट बताती है कि मौसम विभाग ने पहली चेतावनी 13 जून को सुबह 11 बजे जारी की थी। उसके बाद 15 जून को भी चेतावनी जारी की गई। मौसम विभाग ने यात्रियों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचने की एडवाइज़री भी जारी की थी। 16 जून, 2013 को हालात कितने ख़राब थे, ये इसी से पता चलता है कि मौसम विभाग ने दो एडवाइजरी जारी कीं और यात्रियों को हिदायत दी कि वे पहाड़ी जगहों पर घूमने ना जाएं।
2013 में शायद ये पहली बार था जब मौसम विभाग ने चार धाम यात्रा रोकने की एडवाइजरी जारी की थी। विभाग के ये अलर्ट अधिकारियों तक पहुँचे जरूर लेकिन इन पर कोई एक्शन नहीं लिया गया। CAG की रिपोर्ट कहती है कि मौसम विभाग की सही जानकारी के बावजूद उत्तराखंड सरकार ख़ामोश रही। ये चेतावनियां इतनी सटीक थीं कि अगर इन पर एक्शन लिया जाता तो हालात काफी हद तक काबू में आ सकते थे। लेकिन एक्शन लेता कौन?
आपदा विभाग का अता-पता नहीं था
प्रदेश में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण यानी SDMA का कोई अता-पता नहीं था। सरकारें कितनी सुस्त हैं, वो इससे ही पता चलता है कि स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट, 2005 के बनने के बाद से केदारनाथ त्रासदी तक केवल एक ही मीटिंग हुई थी। मतलब सरकार इस विभाग को बनाकर भूल चुकी थी। बदइंतजामी यहीं नहीं रुकी। आपदा के बाद एक तरफ़ जहां सेना अपनी जान दांव पर लगाकर लोगों को बचा रही थी तो वहीं, सरकारी बाबू इस दौरान होटलो में ठहरकर बिरयानी खा रहे थे और मौज उड़ा रहे थे।
खैर, केदारनाथ आपदा ने सरकारी इंतज़ाम की पोल खोलकर रख दी थी। सरकारों की तरफ़ से भविष्य के लिए बेहतर इंतज़ाम करने की बात भी कही गई। लेकिन क्या सरकारें 2013 के बाद अपनी नींद से जाग गईं थीं? तो जवाब 2021 में आई विष्णुगाड़ आपदा ने दे दिया था।
