दीक्षित आयोग ने गैरसैंण को राजधानी बनाने से क्यों इनकार किया?

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आप गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग और ना बनने के पूरे खेल को अब तक की सभी कारगुजारियों से समझ सकते हैं। गैरसैंण ही क्यों राजधानी चाहिए? दीक्षित आयोग की रिपोर्ट ने क्यों इसे राजधानी बनाने से इनकार किया? क्या प्रैक्टिकल चैलेंजेस हैं जो अक्सर गिनाए जाते हैं? क्यों और कब उत्तराखंडी आंदोलनकारियों ने गैरसैंण को राजधानी के लिए चुना। आगे अब आपको सिलसिलेवार ढंग से इन्हीं सभी सवालों के जवाब मिलेंगे।

गैरसैंण ही क्यों चाहिए राजधानी?
गैरसैंण को राजधानी बनाने का सिंपल लॉजिक है इसकी पॉजिशनिंग। गैरसैंण गढ़वाल और कुमाऊं के बीच में पड़ता है। यहां गढ़वाली और कुमाऊंनी दोनों ही भाषाएं बोली जाती हैं। गैरसैंण 1994 में बनाई गई कौशिक समिति की परिभाषा में भी फिट बैठता है। कौशिक समिति ने पृथक राज्य उत्तराखंड की राजधानी को लेकर कहा था कि यह पर्वतीय क्षेत्र में किसी केंद्रीय स्थल पर होनी चाहिए। बता दें कि तत्कालीन मुलायम सरकार ने अलग उत्तराखंड राज्य की संभावनाएं तलाशने के लिए कौशिक समिति का गठन किया था। इस समिति ने पूरे उत्तराखंड का भ्रमण किया और बताया कि 68% लोग चाहते हैं कि गैरसैंण को ही राजधानी बनाया जाए। खुद समिति ने भी कहा था कि प्रस्तावित उत्तराखंड की राजधानी हिमालयी क्षेत्र के नैसर्गिक और सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण के अनुरूप बनाई जानी चाहिए।

1960 में उठी पहली आवाज
गैरसैंण को उत्तराखंड की राजधानी बनाने की बात सबसे पहले 1960 के दशक में सामने आई। तब पेशावर कांड के हीरो वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने यह प्रस्ताव तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के सामने रखा था। हालांकि इस पर कुछ हुआ नहीं। फिर अलग उत्तराखंड राज्य की मांग के साथ गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग भी जैसे साथ जुड़ गई। फिर उत्तराखंड क्रांति दल ने 1992 में गैरसैंण को राजधानी घोषित भी कर दिया। उक्रांद ने चंद्रसिंह गढ़वाली के नाम पर राजधानी का नाम चंद्रनगर रखा और इसका शिलान्यास भी कर दिया था। पहाड़ के आम लोगों के मन में गैरसैंण के अलावा राजधानी के लिए कोई दूसरा नाम था ही नहीं। फिर 1994 में बनी कौशिक समिति ने भी एक तरह से इस मांग पर मुहर लगा दी। लेकिन 9 नवंबर, 2000 को जैसे ही उत्तराखंड देश का 27वां राज्य बना तो जिस तरह इस पर एक बाहरी प्रदेश का मुख्यमंत्री थोपा गया, उसी तरह देहरादून भी अस्थायी राजधानी बना दी गई। आंदोलनकारी गैरसैंण-गैरसैंण चिल्लाते रहे लेकिन वो चुपचाप देहरादून पर सेट हो गए। अलग राज्य उत्तराखंड तो मिल चुका था लेकिन आंदोलनकारियों के आंदोलन नहीं थमे थे। वजह थी -राजधानी।

दीक्षित आयोग की ढाल
अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने के लिए आंदोलन होते रहे। बल्कि आज भी मांग उठाई जा रही है। अब गैरसैंण के शोर को कम करने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी ने 11 जनवरी, 2001 को एक सदस्यीय आयोग बनाया। इस आयोग को राजधानी तय करने की जिम्मेदारी दी गई थी। हालांकि लोगों के भारी विरोध के बाद इसे भंग कर दिया गया। फिर 2002 और आखिरकार 1 फरवरी, 2003 को जस्टिस वीरेंद्र दीक्षित की अध्यक्षता में इस आयोग ने काम शुरू किया। भले ही स्थायी राजधानी बनाने के लिए आयोग बन चुका था लेकिन सत्ताधारियों को पता था कि नतीजा- देहरादून पर आकर ही रुकेगा। और ये सत्ताधारियों की हरकत से साफ नजर आ रहा था।

यहां आयोग ने अभी तय भी नहीं किया था कि स्थाई राजधानी कहां बनेगी, उससे पहले ही देहरादून में शासकीय व्यवस्थाओं के लिए करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए जा रहे थे। विधायक ट्रांजिट हॉस्टल, CM आवास, मंत्री आवास, राजभवन, सचिवालय समेत सभी चीजें यहीं बनाई जाने लगीं। और आयोग स्थाई राजधानी खोजने के लिए कितना गंभीर था, वो आप इसी से समझ सकते हैं कि जस्टिस दीक्षित के कार्यभार संभालने के बाद करीब 10 बार इस आयोग को एक्सटेंशन दिया गया और पूरे 8 साल बाद जाकर कहीं रिपोर्ट सरकार को सौंपी गई। और रिपोर्ट में क्या आया? वही जो बीजेपी-कांग्रेस चाहती थी। दीक्षित आयोग ने एक तरफ गैरसैंण को राजधानी ना बनाने के पक्ष में 17 कारण गिनाए और दूसरी तरफ, देहरादून को राजधानी के लिए सबसे मुफीद बताया।


दीक्षित आयोग ने चार भागों में अपनी रिपोर्ट को पेश किया। और चारों ही चरणों में देहरादून को ही बेस्ट बताया। आयोग ने पहले चरण में कहा कि राष्ट्र और राज्यों की राजधानी हमेशा उनके भौगोलिक केंद्रों पर होना जरूरी नहीं है। आयोग ने कौशिक समिति के उस तर्क को यहां पर दरकिनार कर दिया जिसमें कहा गया था कि राजधानी प्रदेश के केंद्र में होनी चाहिए। कहने का मतलब ये था कि पहाड़ की राजधानी पहाड़ में ही हो, ये जरूरी नहीं है। दूसरे चरण की रिपोर्ट में आयोग ने कहा कि पहाड़ राजधानी के लिए सही जगह है ही नहीं। राजधानी के लिए तराई और मैदानी क्षेत्र ही सबसे अच्छे विकल्प हैं। आयोग ने  फिर देहरादून को आगे किया और कहा कि सौंग नदी के किनारे वाला क्षेत्र सबसे मुफीद है। गैरसैंण को अब लिस्ट से बाहर ही कर दिया गया। तीसरे चरण की रिपोर्ट में आयोग ने देहरादून पर मुहर लगा दी और खानापूर्ति के लिए काशीपुर को दूसरे नंबर पर रख दिया। और इस तरह दीक्षित आयोग की रिपोर्ट में भी देहरादून को ही बेस्ट बताया गया।

नीयत में ही खोट था !
दीक्षित आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कुछ ऐसी हरकतें की जिनसे ये आशंका और प्रबल हो जाती है कि पहले ही दिन से देहरादून ही राजधानी के तौर पर फाइनल था…बाकी पहाड़ भ्रमण और अध्ययन सिर्फ दिखावा था। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक शंकर सिंह भाटिया इस रिपोर्ट की साख पर बड़े सवाल खड़ा करते हैं। भाटिया अपनी किताब उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास में बताते हैं कि इस रिपोर्ट में गैरसैंण को लेकर जो आंकड़े पेश किए गए, उनमें कई बुनियादी गलतियां थीं। आयोग ने पूरे प्रदेश का दौरा किया। लोगों से बात की। लेकिन जब फाइनल रिपोर्ट तैयार की गई तो उसमें आयोग ने अपने ही जनमत संग्रह को किनारे कर दिया। और इसकी जगह एक शोध छात्रा के निजी जनमत संग्रह को आधार बनाया जिसमें गैरसैंण को नकार दिया गया था। अब सवाल उठता है कि एक संवैधानिक आयोग ने अपनी खुद की व्यापक जांच के मुकाबले एक छात्रा के शोध को इतनी तवज्जो क्यों दी? शंकर सिंह भाटिया आशंका जताते हैं कि ये सब एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था, ताकि गैरसैंण के दावे को कमजोर किया जा सके।

गैरसैंण क्यों राजधानी नहीं बन सकती?
अब दीक्षित आयोग की मंशा भले ही जो रही हो लेकिन जिस तरह के कारण आयोग ने अपनी रिपोर्ट में गिनाए, उनसे चिंता की लकीरें जरूर उभरती हैं। आयोग ने कहा कि गैरसैंण जिस जगह पर है, वहां भारी-भरकम निर्माण नहीं किए जा सकते हैं। कई एक्सपर्ट्स भी इस बात का समर्थन करते दिखते हैं। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि यह क्षेत्र गंगा और रामगंगा के डिस्चार्ज जोन में बना हुआ है। इससे यहां पर भूजल विकास की संभावना ना के बराबर है। ऐसे में यहां पर पानी की काफी ज्यादा किल्लत हो सकती है।

इसके जवाब में एक रास्ता ये बताया गया कि रामगंगा से पानी लाकर गैरसैंण की प्यास बुझाई जा सकती है। हालांकि जानकारों का कहना है कि रामगंगा में इतना पानी है ही नहीं। दूसरा विकल्प कर्णप्रयाग स्थित अलकनंदा को बताया जाता है लेकिन ये गैरसैंण से करीब 1600 मीटर की ऊंचाई पर है। अब पानी को इतने ऊपर से लाने में काफी ज्यादा खर्च होगा। आयोग ने इसके लिए 500 करोड़ के खर्च का अनुमान लगाया था। चिंता सिर्फ आयोग की तरफ से ही नहीं पेश की गई थी। दिल्ली के स्कूल ऑफ प्लानिंग एण्ड आर्किटेक्चर ने भी कुछ ऐसी ही बात कही है। इनके मुताबिक यहां वाहन और प्रदूषण से नदियों को नुकसान पहुंच सकता है।

रिपोर्ट ने चेताया है कि ढाल, ढीली मिट्टी और भू-स्खलन की वजह से भी गैरसैंण भारी-भरकम निर्माण गतिविधियों के लिए सही जगह नहीं है। इन तर्कों को सुनकर तो लगता है कि गैरसैंण को राजधानी बनाया तो यह विनाशकारी साबित हो सकता है। हालांकि गैरसैंण का समर्थन करने वालों का तर्क है कि सरकारें पर्यावरणीय चिंताओं का डर दिखाकर गैरसैंण से मुख मोड़ लेना चाहती हैं। और ऐसा प्रतीत भी होता है। ये सरकारें जो पूरे पहाड़ को खोद चुकी हैं, वो सिर्फ राजधानी के नाम पर पर्यावरणीय चिंताओं को लेकर बैठ जाती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि गैरसैंण में प्रकृति का ध्यान रखकर निर्माण किए जाते हैं तो सारी पर्यावरणीय चुनौतियों से पार पाया जा सकता है।  और ऐसा भी नहीं है कि सबने गैरसैंण को नकार दिया हो।

भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग ने अपनी शुरुआती रिपोर्ट में गैरसैंण को हरी झंडी दे दी थी। फ्रांस की एक टाउन प्लानर एमैनुअल और दिल्ली के अर्बन डिजाइनर अशोक मेरी ने गैरसैंण में दूधातोली के आस-पास के इलाके को राजधानी के लिए सही बताया था। मेरी ने तो बताया था कि किस तरह गैरसैंण, भराड़ीसैण, थलीसैंण, खिर्सू और चौखुटिया तक के इलाके में राजधानी के लिए निर्माण कार्य किए जा सकते हैं। टाउन प्लानर एमैनुअल ने तो यहां तक बता दिया था कि गैरसैंण के 96.72 हेक्टेयर क्षेत्र में विधानसभा, विधायक निवास और संस्थान क्षेत्र विकसित किए जा सकते हैं। लेकिन इन सबके बावजूद गैरसैंण को राजधानी बनाने का मुद्दा लटकाया ही जाता रहा है।

दीक्षित आयोग की रिपोर्ट 2009 में विधानसभा में पेश की गई लेकिन इस पर हंगामे की वजह से कोई फैसला नहीं हो सका और ये मामला आज तक यूं ही लटका पड़ा हुआ है। हालांकि लोगों के निरंतर मांग उठाने से सरकारों पर थोड़ा दबाव बना और यहां पर छुटमुट निर्माण होने लगे। 3 नवंबर, 2012 को तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने गैरसैंण में दूसरा विधानसभा भवन बनाने की घोषणा की और 9 नवम्बर 2013 को भरीड़ीसैंण में विधानसभा भवन का भूमि पूजन किया गया। फिर 9 से 12 जून, 2014 के बीच विधानसभा सत्र टेंटों में हुआ। नवंबर, 2015 में भी विधानसभा सत्र लगा। 2017 में विधान सभा सत्र नवनिर्मित विधान सभा भवन में हुआ।

2018 में पहली बार उत्तराखंड के विधानसभा सत्र का पहला बजट सत्र यहीं किया गया। फिर 4 मार्च 2020 को तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने गैरसैंण को उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर दिया। और 8 जून, 2020 को अधिसूचना जारी होते ही ये आधिकारिक हो गया। और तब से इस ग्रीष्मकालीन राजधानी में सत्र करने में कभी हमारे नेताओं को ठंड लग जाती है तो कभी ऑक्सीजन कम हो जाती है। और उसके बावजूद अगर सत्र हो भी जाता है तो वह बहुत लंबा नहीं चलता है।

मैदान में राजधानी से कैसी दिक्कत?
इसका जवाब आपको उत्तराखंड आंदोलन क्यों किया गया, उसी में मिल जाएगा। अलग उत्तराखंड राज्य की मांग ही इसलिए की गई थी क्योंकि यहां के पहाड़ी क्षेत्र की स्थिति दयनीय हो चुकी थी और लखनऊ में बैठी सरकारें इस तरफ नहीं देखती थीं। पहाड़ की स्थिति सुधारने के लिए अलग उत्तराखंड राज्य मांगा गया था। कहा गया कि पहाड़ की राजधानी अगर पहाड़ में होगी तो हमारे नेता पहाड़ चढ़ेंगे। और जब नेता पहाड़ चढ़ेंगे तो वे लोग यहां के लोगों की तकलीफें और परेशानियों को समझेंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

और आज भी उत्तराखंड का पहाड़ी क्षेत्र उन्हीं दुश्वारियों से जूझ रहा है जो यूपी में रहने के दौरान थीं। तो दिक्कत मैदान में राजधानी होने से नहीं बल्कि पहाड़ का विकास ना होने से है। एक पहाड़ी राज्य में अगर पहाड़ ही सबसे बुरी स्थिति में है तो समझ जाइए कि उस राज्य का भविष्य क्या होगा। यहां के जनमानस को उम्मीद है कि पहाड़ में राजधानी होने से ही यहां के हालात बदल सकते हैं। और वैसे भी मैदानी क्षेत्र पहाड़ी क्षेत्रों के मुकाबले काफी समृद्ध और सशक्त हैं। ऐसे में मैदानी क्षेत्र के लोगों के लिए पहाड़ में राजधानी तक जाना कितना मुश्किल होगा।

कांग्रेस हो या बीजेपी, दोनों के लिए गैरसैंण चुनावी हथियार है। बीजेपी ने जहां ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाकर पहाड़ और मैदान, दोनों को साधने की कोशिश की है तो वहीं, कांग्रेस अब स्थायी राजधानी के वादे के साथ पहाड़ में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाना चाहती है। लेकिन कांग्रेस में इस मुद्दे को लेकर मतभेद रहते हैं, ये जगजाहिर है। कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि गैरसैंण राजधानी इसलिए नहीं बन पा रही क्योंकि वहां रहने के लिए सुविधाएं नहीं बल्कि ‘इच्छाशक्ति’ की कमी है। हकीकत ये है कि गैरसैंण को राजधानी बनाने के लिए ‘पहाड़’ जैसा जिगरा चाहिए, जो फिलहाल देहरादून के एसी वाले कमरों में नहीं मिलता है।

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