अपने ही गीत को क्यों नहीं सुनना चाहती उत्तराखंड सरकार?
उत्तराखंड का राज्यगीत
देवभूमि के प्रतिष्ठित लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी और प्रतिष्ठित लोकगायिका अनुराधा निराला ने उत्तराखंड की खातिर एक गीत गाया। गायन के लिए लाखों की फीस लेने वाले इन गायकों ने ये गीत मुफ्त में गाया। इन लोगों को लगा था कि ये गीत वो अपने उत्तराखंड को भेंट कर रहे हैं और ये गीत स्कूलों से लेकर घर-घर में बजेगा और हर उत्तराखंडी गर्व के साथ इस गीत को गाएगा लेकिन हुआ इसके उलट। यूट्यूब के किसी कोने में ये गीत आपको पड़ा तो मिल जाएगा लेकिन ये ना स्कूलों में सुनाई देता है और ना ही घर-घर बजता है। पूरी संभावना है कि आपने भी इस गीत को शायद ना ही सुना हो।
इस गीत को भले ही नेगी और अनुराधा निराला ने गाया हो लेकिन इसे बनवाया और गवाया खुद उत्तराखंड सरकार ने था लेकिन जिस उत्तराखंड सरकार ने इस गीत को बनवाया फिर उसी सरकार ने इस गीत को दफन भी कर दिया। लेकिन क्यों? इस सवाल का जवाब लेने से पहले जान लीजिए कि हम जिस गीत की बात कर रहे हैं, वो कोई ऐसा-वैसा गीत नहीं बल्कि उत्तराखंड का आधिकारिक राज्य गीत है। बाकायदा सरकार की तरफ से इस गीत को स्कूलों और सरकारी कार्यक्रमों में गवाए जाने के लिए नोटिफिकेशन भी जारी किया गया था। लेकिन उसके बावजूद ये गीत आज कहीं नहीं सुनाई देता है।
वैसे उत्तराखंड के राज्य गीत का विवादों से कोई नया नाता नहीं है। जब इसके बनने की प्रक्रिया शुरू हुई ही थी तब ही ये विवादों में आ गया था। इस पर विवाद इतना ज्यादा बढ़ गया था कि इस गीत के लेखक हेमंत बिष्ट ने गीतकार के तौर पर अपना नाम हटवाने की अपील तक कर डाली। गीत गितांग के इस एपिसोड में बात करेंगे उत्तराखंड के राज्य गीत की। जानेंगे कि कैसे उत्तराखंड का राज्य गीत बना और क्यों इस पर शुरू में ही विवाद हो गया? साथ ही ये भी समझने की कोशिश करेंगे कि क्या उत्तराखंड का राज्य गीत सियासत की भेंट चढ़ गया है? और बताएंगे कि क्यों उत्तराखंड को इस मोर्चे पर बिहार से सीखने की जरूरत है। हर सवाल का जवाब इस एपिसोड में।
केंद्र सरकार ने हाल ही में राष्ट्रगीत यानी कि वंदे मातरम को गाना अनिवार्य कर दिया है। जिस तरह आप राष्ट्रगान के लिए नियमों का पालन करते हैं, उसी तरह अब वंदे मातरम के लिए भी आपको सावधान की मुद्रा में खड़ा होना होगा। अब ये तो बात हो गई राष्ट्रीय स्तर की। इस नियम को हर राज्य लागू करेगा। लेकिन बिहार एक और कदम आगे बढ़ा है। बिहार ने स्कूलों और सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान के अलावा राज्य गीत को भी अनिवार्य कर दिया है। यानि कि बिहार में राज्य गीत- मेरे देश के कंठहार को स्कूलों और सरकारी कार्यक्रमों में गाना अनिवार्य होगा।
बिहार सरकार का ये फैसला ना सिर्फ बिहारी अस्मिता को मजबूत बनाने वाला है बल्कि इससे जन-जन के बीच राज्यगीत भी पहुंचेगा। लेकिन क्या खुद को बिहार से आए हुए बताने वाले उत्तराखंड सरकार के मंत्री अपने राज्य में भी ऐसा करेंगे? जवाब है – शायद नहीं। क्योंकि पूरी संभावना है कि खुद मौजूदा उत्तराखंड सरकार के मंत्रियों को भी शायद राज्य गीत का पता ही ना हो। इसकी और भी वजह हैं जिन पर बात करेंगे लेकिन सबसे पहले अपने राज्यगीत को जान लेते हैं और फिर उस पर उठे विवाद की बात भी करेंगे।
उत्तराखंड का राज्यगीत
अगर आपको भी ये बात सुनकर आश्चर्य हो रहा है कि उत्तराखंड का अपना राज्यगीत है तो आप अकेले नहीं हैं। कई ऐसे लोग हैं जिनको इस बारे में पता ही नहीं है। खुद सरकार को भी याद नहीं। 2025 की ये खबर देखिए। एक व्यक्ति ने जब सीएम हेल्पलाइन पर फोन कर सरकार को याद दिलाया कि उत्तराखंड का राज्यगीत भी है तो ऊधमसिंह नगर के शिक्षा विभाग ने शिकायत पर कार्यवाही करने का आदेश दे दिया। हालांकि यह आदेश सिर्फ ऊधमसिंह नगर तक ही सीमित है और इस आदेश के बाद भी क्या ये गीत स्कूलों में बज रहा है? शायद नहीं। अगर बज रहा होता तो इसका असर राज्य के दूसरे क्षेत्रों में भी होता है। खैर, उत्तराखंड राज्यगीत अगर आपको पता नहीं है तो इसमें आपकी गलती नहीं बल्कि खुद उत्तराखंड की सत्ता में बैठने वाले नेताओं की है।
साल 2016 में उत्तराखंड का राज्यगीत बनकर तैयार हुआ। उत्तराखंड मातृभूमि, देवभूमि… शत्-शत् वंदन… अभिनंदन। करीब 10 मिनट का ये गीत तत्कालीन हरीश रावत सरकार ने तैयार करवाया था। मूल रूप से यह गीत हिंदी भाषा में है लेकिन यह गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी तक भी पहुंचता है। इस गीत में उत्तराखंड की संस्कृति के साथ ही यहां के इतिहास, धार्मिक स्थल और शहीदों को भी शामिल किया गया है। 2016 में जब इस गीत को तब के मुख्यमंत्री हरीश रावत की उपस्थिति में जारी किया गया तो बताया गया कि इसके दो वर्जन बनेंगे। एक तो पूरा जो आज आप आसानी से यूट्यूब पर सुन सकते हैं और दूसरा एक छोटा वर्जन भी तैयार किया गया था। हालांकि वह वर्जन हमें कहीं मिला नहीं। खैर, आधिकारिक तौर पर रिलीज होने के बाद यह गीत एक बार 15 अगस्त के दिन बजा और बाद में हरीश रावत सरकार गिरने के साथ ही यह गीत भी कहीं गिर गया और फिर धरातल पर कभी दिखा ही नहीं। राज्यगीत बाद में भले ही ना सुनाई दिया हो लेकिन जब यह गीत बनाने की तैयारी चल रही थी, तब इसको लेकर हो रहा विवाद हर तरफ सुनने को मिल रहा था।
हरीश रावत सरकार ने 2015 में राज्यगीत बनाने के लिए राज्यगीत समिति का गठन किया। मेरा जीवन लक्ष्य उत्तराखंडियत किताब में हरीश रावत बताते हैं कि मैं इस समिति और राज्य गीत को राजनीतिक छाया से दूर रखना चाहता था। इसीलिए मैंने किसी भी नेता को इस समिति में शामिल नहीं किया। समिति की अध्यक्षता कुमाऊं विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष रहे और जाने-माने साहित्यकार लक्ष्मण सिंह बिष्ट बटरोही को चुना गया। लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी समिति के उपाध्यक्ष बने। इन दोनों दिग्गजों के अलावा समिति में लोकगायक हीरासिंह राणा, नाट्यकर्मी जहूर आलम, कवि अतुल शर्मा, रतनसिंह जौनसारी समेत अन्य कई लोग शामिल थे।
समिति के गठन के बाद 30 अप्रैल, 2015 को राज्य के सभी बड़े अखबारों में एक विज्ञापन दिया गया। इसमें राज्यगीत लिखने की शर्तों को शामिल करते हुए कहा गया कि इच्छुक लोग 15 जुलाई, 2015 तक अपनी रचनाएं भेज दें। और नियम भी बता दिए गए। नियमों के मुताबिक
– गीत हिंदी भाषा से शुरू होगा और उत्तराखंड की प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं में प्रवेश करेगा।
- राज्यगीत का आकार स्थायी और अन्तरा सहित 20 लाइनों से ज्यादा ना हो
- समित के पास ये अधिकार होगा कि वह गीत में आवश्यकतानुसार संशोधन कर सकेगी
- सभी गीत टाइप करके भेजे जाने अनिवार्य हैं
- गीत में कोई भी ऐसी बात या लाइन नहीं आनी चाहिए जिससे कि रचनाकार का पता लगे
समिति ने लेखकों का नाम, पता, फोन और ईमेल अलग से लिखकर मंगाए। इसके बाद अंतिम तिथि को 203 गीत समिति को मिले। अब इन गीतों को चुनने में किसी तरह का भेदभाव ना हो इसलिए हर गीत को एक नंबर दिया गया। यानि कि समिति के किसी भी सदस्य को नहीं पता था कि कौन सा गीत किस लेखक का है। उनके पास सिर्फ एक लिफाफा पहुंचा जिस पर रचना के लिए एक अंक दर्ज था। 203 में से पहले 10 और बाद में 3 गीत चुने गए। आखिर में सर्वसहमति से रचना नंबर 101 पर मुहर लगी और इसे ही राज्यगीत के तौर पर चुना गया। यह रचना थी नैनीताल के प्रोफेसर हेमंत बिष्ट की। लेकिन बिष्ट का नैनीताल का होने की वजह से भी विवाद खड़ा हो गया।
इस विवाद पर बात करेंगे लेकिन उससे पहले राज्यगीत को लेकर ही सवाल उठाए जाने लगे। बटरोही अपने एक फेसबुक पोस्ट में बताते हैं कि राज्यगीत बनने की सिर्फ खबर ही बाहर आई थी कि इसको लेकर स्थानीय अखबारों और सोशल मीडिया पर विवाद सा खड़ा हो गया। वह लिखते हैं कि बिना सन्दर्भ और पृष्ठभूमि को जाने कई अख़बारों ने और फेसबुक में कहा और लिखा गया कि ये राज्यगीत की बात कौन उठा रहा है? बटरोही कहते हैं कि कई लोगों ने गिर्दा के गीत को ही राज्य गीत मान लिया था। और कइयों ने कहा कि जो राज्यगीत उत्तराखंडी भाषाओं में नहीं होगा, उसे हम राज्यगीत नहीं मान सकते। धमकी दी गई कि इसके खिलाफ जन आंदोलन खड़ा किया जाएगा।
खैर, कोई आंदोलन तो खड़ा नहीं किया गया लेकिन रचना और रचनाकार का नाम सार्वजनिक होने के बाद कई तरह के विवाद उठे। पहले समिति के कई सदस्यों ने कहा कि गीत के लेखक के तौर पर पूरी समिति का नाम जाना चाहिए। क्योंकि गीत में समिति ने कई संशोधन किए थे। जैसे-तैसे समिति हेमंत बिष्ट का ही नाम रखने पर तैयार हुई तो कइयों ने गीत की लाइनें चुराने का आरोप भी लगाया और न्यायालय जाने की धमकी भी दी। इन्हीं आरोपों से परेशान होकर हेमंत बिष्ट ने समिति के अध्यक्ष बटरोही से गीत के लेखक के तौर पर अपना नाम हटाने तक की अपील कर दी। उन्होंने बटरोही से कहा कि मेरे लिए यही खुशी की बात है कि मैंने राज्य गीत लिखा। मुझे नहीं चाहिए नाम। अनर्गल आरोपों से आहत हुए हेमंत काफी समझाने-बुझाने के बाद माने।
हेमंत बिष्ट शांत हुए तो अब गीत की धुन बनाने की बात आई। गीत धुन बनाने के लिए भी कई लोग आगे आए। जब कोई फैसला नहीं हो पाया तब अध्यक्ष बटरोही ने नरेंद्र सिंह नेगी को इस काम के लिए चुना। अब नेगी दा का नाम संगीतकार के तौर पर आया तो कई लोगों ने तंज कसते हुए लिखा कि ये नरेंद्र सिंह नेगी संगीतकार कब से हो गया?
खैर, इन सारे वाद-विवादों के बीच दिल्ली के एक स्टूडियो में नेगी दा और अनुराधा निराला ने साथियों के साथ यह गीत रिकॉर्ड किया। और 2016 में सीएम आवास पर यह गीत लॉन्च कर दिया गया। उत्तराखंड के राज्यगीत की सबसे खास बात ये रही कि यह गीत मुफ्त में तैयार हुआ। ना रचनाकार ने कोई पैसा लिया। ना ही समिति ने और ना ही इस गीत को गाने वाले नरेंद्र सिंह नेगी और अनुराधा निराला ने। इस तरह बिना किसी बड़ी लागत के उत्तराखंड का राज्यगीत तैयार हो चुका था। 15 अगस्त के दिन यह गीत बजा भी। गैरसैंण में भी यह गूंजा लेकिन फिर लुप्त हो गया। गाने के दो वर्जन तैयार किए गए थे एक छोटा और एक बड़ा। लेकिन अब ना छोटा सुनाई देता है और ना ही बड़ा।
कहां और कैसे खोया राज्यगीत?
कांग्रेस की सरकार जाने के बाद भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई लेकिन इस सरकार ने इस गीत को बढ़ावा देने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। बढ़ावा तो छोड़ो सरकारी आदेश के बावजूद स्कूलों और कॉलेजों तथा सरकारी कार्यक्रमों में भी ये गीत कभी नहीं बजा। सरकारी नोटिफिकेशन जारी होने के बाद भी अगर यह गीत आज कहीं नहीं सुनाई देता है तो इससे साफ पता चलता है कि सियासत के चलते इस गीत को जानबूझकर भुला दिया जा रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं है क्योंकि इस गीत को कांग्रेस की सरकार ने तैयार किया था तो बीजेपी सरकार उसे तवज्जो नहीं देगी? दरअसल हमारा राज्यगीत इन नेताओं की आपसी सियासत का शिकार हो चुका है।
इन नेताओं को फर्क नहीं पड़ता कि इस गीत को पूरे उत्तराखंड के लिए तैयार किया गया है। इसमें ना किसी पार्टी का नाम है और ना ही किसी नेता का। लेकिन क्योंकि कांग्रेस ने इसे तैयार किया था तो बीजेपी इसे क्यों बढ़ावा देगी? एक उत्तराखंड सरकार 2015-16 की थी जिसने इस गीत को तैयार किया और एक ये है कि जो इस गीत को जानबूझकर भुला दे रही है। एक पल के लिए अगर मान भी लिया जाए कि इस सरकार को पता ही नहीं था कि उत्तराखंड का कोई राज्यगीत भी है लेकिन अब तो पता चल गया होगा। पिछले दिनों कांग्रेस की तरफ से राज्यगीत की वर्षगांठ मनाई गई।
इस कार्यक्रम में नरेंद्र सिंह नेगी का दर्द साफ छलका। उन्होनें कहा कि मैंने ये गीत राज्य के लिए बनाया था। इसके लिए सरकार से कोई पारिश्रमिक नहीं लिया। क्योंकि, यह मेरी मातृभूमि के प्रति सेवा थी लेकिन जिस प्रकार इस गीत को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है, ये अत्यंत दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं व्यक्तिगत रूप से राज्य-गीत की उपेक्षा से बहुत आहत हूं। नेगी के दुख जताने के बाद भी ढाक के तीन पात हैं। और हमारी सरकारें और यहां की व्यवस्थाएं मासूम शर्मा की गालियों को तो बड़े चाव से सुनती है लेकिन अपने ही राज्यगीत को कहीं दफन कर दिया गया है।
हमारे राज्यगीत की ये स्थिति है कि यूट्यूब के अलावा आपको ये कहीं पर नहीं दिखेगा और सुनाई देगा। सिर्फ यही नहीं, मैं आपको इस गीत को यहां पर सुना भी नहीं सकता। क्यों? क्योंकि यूट्यूब पर जिस भी महाशय ने इस गीत को डाला है, उसने इस गीत को अपनी संपत्ति बना लिया है। यही वजह है कि जैसे ही आप इस गीत की एक लाइन में भी अपने किसी वीडियो में यूज करते हैं तो आप पर कॉपीराइट क्लेम आ जाता है। सोचिए जो गीत पूरे उत्तराखंड का होना था, वो सिर्फ एक आदमी का होकर रह गया है।
कांग्रेस हो चाहे बीजेपी… दोनों पार्टियों को समझना होगा कि कम से कम उत्तराखंड की अस्मिता को ना बांटा जाए और इसे बढ़ावा देने के लिए हर छोटा-बड़ा प्रयास किया जाए। बाकी आप राज्य गीत सुनना चाहें तो यूट्यूब पर सुन सकते हैं। और इसे बढ़ावा देने के लिए छोटा ही सही लेकिन प्रयास कर सकते हैं तो जरूर करें।
