अपने ही निकले पहाड़ के दुश्मन, कहानी गोविंद बल्लभ पंत के मुंह फेरने की
गोविंद बल्लभ पंत
उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने के लिए कई लोगों ने अपने प्राण दे दिए। हमारी मां-बहनों ने अपनी आत्मा पर जख्म खाए लेकिन ये सब होने से रोका जा सकता था। हमें बिना किसी हिंसा और जख्म के अलग राज्य मिल सकता था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि उत्तराखंड के ही एक प्रतिष्ठित नेता ने ऐसा होने नहीं दिया। उत्तराखंड राज्य 1950 के दशक में ही अलग हो चुका होता लेकिन एक पहाड़ी की जिद के सामने पूरा उत्तराखंड हारता गया और ऐसी नौबत आई कि उत्तराखंडियों को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा।
उत्तराखंड को अलग राज्य या इकाई बनाए जाने के प्रयास ब्रिटिश काल में ही शुरू हो गए थे। उत्तराखंड के कुछ ज्ञानियों ने ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के सामने एक प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव में उत्तराखंड को अलग प्रांत बनाए जाने की बात कही गई लेकिन 1897 में उठी ये मांग 2000 में आकर पूरी हुई। वो भी कई आंदोलनों के बाद। 15 अगस्त, 1947 को जब देश आजाद हुआ तो अलग उत्तराखंड राज्य मिलने की उम्मीदें काफी बढ़ गईं। दरअसल भारत सरकार ने देश में राज्यों के पुनर्गठन के लिए एक आयोग बनाया था। इसका काम था कि वह देश में किन-किन भागों को राज्य बनाना है, वो तय करे।
के. एम. पणिक्कर जैसे सदस्यों के नेतृत्व में इस राज्य पुनर्गठन आयोग ने काम किया। इस आयोग ने तब कहा था कि उत्तर प्रदेश का पहाड़ी भाग आर्थिक रूप से कमजोर है और इसे अलग राज्य का दर्जा दिया जाना चाहिए। लेकिन तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे गोविंद बल्लभ पंत ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। वही पंत जो उत्तराखंड की धरती में ही जन्मे थे। पंत ने एक तरफ जहां उत्तराखंड बनाने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया तो दूसरी तरफ, हिमाचल प्रदेश बनाने के लिए उन्हें अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया। अलग उत्तराखंड राज्य बनाने का विरोध करते हुए पंत ने कहा कि यूपी का पहाड़ी भाग आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ है। यहां संसाधनों की कमी है। इसलिए इसे अलग राज्य नहीं बनाया जा सकता।

1950 में दिल्ली में बनी पर्वतीय जन विकास समिति ने भी एक नया प्रस्ताव पेश किया। इस समिति ने हिमाचल के कांगड़ा से लेकर अल्मोड़ा तक एक बृहद हिमालयी राज्य बनाने का प्रस्ताव उत्तर प्रदेश सरकार को भेजा लेकिन इसे भी यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने अस्वीकार कर दिया। 1952 में एक बार फिर हलचल बढ़ी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव कामरेड पी सी जोशी ने भारत सरकार को अलग उत्तराखंड राज्य के लिए ज्ञापन दिया। राज्यों के गठन के लिए बने राज्य पुनर्गठन आयोग के सामने अलग पर्वतीय राज्य के गठन का प्रस्ताव गया था। लेकिन यहां भी गोविंद बल्लभ पंत के दबाव में इस प्रस्ताव को नकार दिया गया। सिर्फ नकारा नहीं गया बल्कि अलग पहाड़ी राज्य के समर्थक आयोग के सदस्य एम पाणिक्कर को पद से हटा दिया गया।
1954 में फिर पर्वतीय राज्य बनाने का प्रस्ताव सौंपा गया। इसी साल बद्रीदत्त पांडे ने जवाहरलाल नेहरू पर दबाव डालकर अलग राज्य की बात मनवाने की कोशिश की। चौधरी चरण सिंह ने भी पांडे की हिमायत की लेकिन गोविंद बल्लभ पंत के सामने किसी की एक ना चली। दरअसल गोबिंद बल्लभ पंत का मानना था कि पहाड़ियों का उत्तर प्रदेश में ही रहना उनके लिए हितकर है। उन्होंने तब कहा था कि नौकरियों की दृष्टी से पहाड़ी लोगों के लिए उत्तर प्रदेश में रहना ही बेहतर है। खुद एक पहाड़ी होने के बावजूद पंत यूपी के टुकड़े नहीं करना चाहते थे। कई जानकार कहते हैं कि यह फैसला राजनीति से प्रेरित था। जानकार कहते हैं कि पंत समेत कई नेताओं को लगता था कि अगर यूपी का बंटवारा हो गया तो उनकी राजनीतिक शक्ति कमजोर पड़ सकती है। उत्तराखंड राज्य का विरोध करने वाले ये वही गोबिंद बल्लभभाई पंत थे जिन्होंने राज्य पुनर्गठन आयोग से अलग हिमाचल राज्य का प्रस्ताव खारिज होने के बाद अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल किया और हिमाचल को अलग राज्य बनाया।
जब कुछ बनता ना दिखा तो 1955 में दिल्ली पर्वतीय जन विकास समिति ने एक प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव में कहा गया कि उत्तराखंड को हिमाचल में ही जोड़ दिया जाए और इसे वृहद हिमाचल प्रदेश बना दिया जाए। इस दौरान योजना आयोग के अध्यक्ष रहे टी टी कृष्णाचारी ने उत्तराखंड की समस्याओं पर विशेष ध्यान दिया। उनके ही प्रयासों का परिणाम था कि 1960 में चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जिलों को सरकारी गजट में उत्तराखंड के रूप में मान्यता मिली।
यहां से पृथक राज्य की सोच रखने वालों को एक नाम के तहत संघर्ष करने का अधिकार मिल गया। 1960 और 70 के दशक में पहाड़ियों के सब्र का बांध टूटने लगा था। लोग ज्ञापन और प्रस्ताव सौंप-सौंप कर थक चुके थे। अलग-अलग संस्थाओं के जरिए अब पैदल यात्रा और गिरफ्तारियां देने का सिलसिला शुरू हो चुका था। हालांकि अभी इस चिंगारी को आग बनने में वक्त था। और यह चिंगारी मशाल बनी 90 के दशक में। 1993 में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने 27% OBC आरक्षण का फैसला लाया था। इस फैसले का विरोध सबसे पहले छात्रों ने किया और फिर बाद में यह अलग उत्तराखंड राज्य के आंदोलन में तब्दील हो गया। और इस तरह कई शहादतों और लाखों उत्तराखंडियों के चोट खाने के बाद उत्तराखंड राज्य मिला। 9 नवंबर, 2000 को उत्तरांचल प्रदेश बना।
इतिहास में अगर हमारे अपने ही नेता हमारे खिलाफ ना होते तो शायद ना मुजफ्फरनगर कांड हुआ होता और ना ही आम आंदोलनकारियों को अपनी जान गंवानी पड़ती। लेकिन बात वही है कि हमारे प्रतिष्ठित नेताओं ने अपने पहाड़ से ज्यादा अपनी कुर्सी से प्यार किया।
