यूकेडी पार्ट 3- जब हर तरफ़ गूंजता था यूकेडी का नाम लेकिन…

उत्तराखंड क्रांति दल

उत्तराखंड क्रांति दल

उत्तराखंड क्रांति दल स्थापना के एक साल बाद ही चुनाव में उतर गया और इसने संसदीय और विधानसभा चुनाव, दोनों में ताल ठोकी। संसदीय चुनाव में पार्टी अध्यक्ष डॉ. पंत अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए। लेकिन विधानसभा चुनाव में रानीखेत से जसवंत सिंह बिष्ट विधायक बने। दूसरे क्षेत्रों से खड़े हुए दल के उम्मीदवारों को भी संतोषजनक वोट मिले। 1984 में पार्टी ने फिर संसदीय चुनाव में ताल ठोकी और इस बार कांग्रेस के हरीश रावत ने बाजी मार ली। लेकिन जिस बात ने सबका ध्यान खींचा वो ये थी कि भाजपा के मुरली मनोहर जोशी और जसवंत सिंह बिष्ट के बीच वोटों का अंतर केवल दो हजार का था। यानि कि इस छोटे से क्षेत्रीय दल ने भाजपा की बराबरी कर ली थी।

पहली चुनावी जीत
1985 के विधानसभा चुनावों में डीडीहाट से काशी सिंह ऐरी चुनाव जीते। फिर 1989 के चुनावों में ऐरी और जसवंत सिंह बिष्ट दोनों ने ही जीत दर्ज की। संसदीय चुनावों में भी उक्रांद मजबूत होती दिखी। उक्रांद प्रत्याशियों ने अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ और टिहरी-उत्तरकाशी सीटों पर कांग्रेस को कड़ी टक्कर दी थी। एक तरफ उक्रांद चुनावों में मजबूत बन रही थी तो दूसरी तरफ, लगातार अलग उत्तराखंड राज्य की मांग के लिए जलसे, जुलूस, हड़ताल और चक्का जाम जैसे प्रदर्शन भी चल रहे थे। इसका नतीजा ये हुआ कि प्रवासी उत्तराखंडियों के बीच भी अलग उत्तराखंड राज्य का मुद्दा ज्वलंत होने लगा। उक्रांद ने पृथक राज्य का मुद्दा विधानसभा तक पहुंचा दिया। उत्तराखंड में उक्रांद राष्ट्रीय दलों का एक मजबूत विकल्प बनने लगा था।

जसवंत सिंह बिष्ट
जसवंत सिंह बिष्ट


1980 का ही दौर था जब उक्रांद ने संजय गांधी से तीन दिन की वार्ता की थी। संजय गांधी ने तब यूपी के पर्वतीय क्षेत्र को अलग राज्य का दर्जा देने की बात स्वीकार की थी। हालांकि उनके आकस्मिक निधन की वजह से ये बात वहीं खत्म हो गई। खैर, पृथक राज्य के मुद्दे पर उक्रांद को मिल रहे जनसमर्थन को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने भी इस मुद्दे को हाईजैक कर लिया।  इस बीच, पार्टी अध्यक्ष डॉ. डी. डी. पंत का कुछ समय के भीतर ही राजनीति से मोहभंग हो गया और वह फिर अपने मूल काम शिक्षा और प्रयोग पर लौट आए। और 2008 में अपनी मृत्यु तक इसी में जुटे रहे।

काशी सिंह ऐरी बने अध्यक्ष
डॉ. पंत के बाद उक्रांद की कमान युवा नेता काशी सिंह ऐरी के हाथ में आ चुकी थी। 24-25 जुलाई, 1992 को उक्रांद ने गैरसैंण में उत्तराखंड की प्रस्तावित राजधानी भी घोषित कर दी। काशी सिंह ऐरी ने चंद्रनगर के नाम से प्रस्तावित राजधानी की घोषणा की। इसी सम्मेलन में उक्रांद ने राज्य बनने तक चुनाव में भाग ना लेने का संकल्प भी लिया। हालांकि इसके बावजूद 1993 का विधानसभा चुनाव लड़ा गया और ऐरी चुनाव जीतकर विधायक बने। उत्तराखंड क्रांति दल ने पृथक राज्य के उस मुद्दे को जन-जन तक पहुंचाया था, जिसे अक्सर मजाक में उड़ा दिया जाता था। ये उक्रांद और इससे जुड़े आंदोलनकारियों का ही प्रभाव था कि लोगों ने खून से पत्र लिखकर अलग राज्य की मांग करनी शुरू कर दी । उक्रांद पृथक राज्य के लिए कितनी गंभीर थी वो इसी से पता चलता है कि जब अगस्त, 1994 में पौड़ी में आंदोलन भड़का तब अलग राज्य की मांग को लेकर काशी सिंह ऐरी ने विधानसभा से इस्तीफा दे दिया। वह जब इस्तीफा दे रहे थे तो उनका गला रूंधा हुआ था और अलग पृथक राज्य की मांग को दोहरा रहे थे। ऐरी का इस्तीफा कभी स्वीकार तो नहीं हुआ लेकिन उसके बाद वह विधानसभा गए भी नहीं।

युवा काशी सिंह ऐरी
युवा काशी सिंह ऐरी


उक्रांद के ही प्रयास थे जिनकी वजह से ज्यादातर राजनीतिक दल अलग उत्तराखंड राज्य के समर्थन में उतर चुके थे। और साथ ही इस मुद्दे को उठाने का श्रेय लेने की होड़ भी मचने लगी थी। लेकिन इन सबके बावजूद उक्रांद लोगों के दिल में जगह बना चुकी थी। हालांकि वो अलग बात है कि ये इस भावना को वोट में तब्दील नहीं कर पाई। उक्रांद और इससे जुड़े आंदोलनकारियों ने ही अलग उत्तराखंड राज्य दिलाया लेकिन जब अलग राज्य बना तब तक उक्रांद खुद कहीं खो चुकी थी। सत्ता निर्माण में यह दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही थी। और इसकी वजह भी कहीं ना कहीं खुद यह पार्टी और इसे चलाने वाले लोग रहे हैं।

जब हुई बिखराव की शुरुआत
उत्तराखंड क्रांति दल पर इसके नेताओं के निजी स्वार्थ शुरुआत से ही भारी पड़ने लगे थे। 1993 में जब उक्रांद का सितारा बुलंदियों पर था तब पहली बार पार्टी के भीतर विवाद हुआ और टिकट न मिलने की वजह से जसवंत सिंह बिष्ट ने पार्टी छोड़ दी थी। फिर दो अक्टूबर, 1994 को हुए मुजफ्फरकांड के बाद दूसरी फाड़ हुई। आम लोगों का गुस्सा मुलायम सरकार के खिलाफ तो था ही लेकिन उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति से भी नाराजगी थी। लोगों ने कहा कि इन नेताओं के बुलावे पर भीड़ एकत्रित हुई थी लेकिन ये उसे संभाल नहीं पाए। इंद्रमणि बडोनी ने भी स्वीकार किया था कि इतने ज्यादा जनसमर्थन को वह संभाल नहीं पाए। बता दें कि संघर्ष समिति के शीर्ष नेतृत्व यूकेडी के ऐरी और बडोनी के हाथ में ही था।

दिवाकर भट्ट
दिवाकर भट्ट


मुजफ्फरकांड के बाद उक्रांद के अंदर दो सोच बन गई थी। एक गुट का मानना था कि अब दूसरी ताकतों यानी कि दूसरी राजनीतिक पार्टियों को उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति में साथ लाना छोड़ देना चाहिए। लेकिन तब उक्रांद के अध्यक्ष काशी सिंह ऐरी इतना मजबूत महसूस नहीं कर रहे थे कि अकेले आंदोलन जारी रखा जाए। इस वजह से एक बार फिर पार्टी के अंदर ही दो गुट खड़े हो गए। लाल किला रैली में आपसी विवाद से दिवाकर भट्ट इतने आहत हुए कि उन्होंने पांच अक्टूबर 1994 को इस समिति से ही इस्तीफा दे दिया था। इस तरह उक्रांद के अंदर एक तरफ दिवाकर भट्ट और पूरण सिंह डंगवाल थे तो दूसरी तरफ, ऐरी और इंद्रमणी बडोनी थे। मुजफ्फरनगर  कांड की पहली बरसी पर ये अलगाव साफ नजर आ रहा था। दोनों ही गुट बिखरे-बिखरे से नजर आए। इस अलगाव का नतीजा ये हुआ कि दिवाकर गुट ने ऐरी को घेरना शुरू कर दिया।

ऐरी को यूकेडी नेताओं ने बनाया निशाना
कौशिक समिति की रिपोर्ट में जो सिफारिशें की गई थीं, वो लगभग उक्रांद की मांगों के अनुरूप ही थीं। इस वजह से काशी सिंह ऐरी ने मुलायम सिंह को समर्थन दे दिया। इसको लेकर दिवाकर गुट लगातार उन्हें घेरने में जुटा रहा। अगस्त में पौड़ी में हुए लाठीचार्ज के बाद ऐरी ने अपना समर्थन वापस ले लिया था लेकिन उनके खिलाफ यह नरैटिव बनाकर रखा गया कि वह अभी भी मुलायम को समर्थन दे रहे हैं। खुद यूकेडी के कई नेता उनके खिलाफ बयानबाजी कर रहे थे। 1996 में राज्य नहीं तो चुनाव नहीं को लेकर भी उक्रांद में विवाद हुआ।

यूकेडी के ज्यादातर पदाधिकारी और कार्यकर्ता चुनाव लड़ने के पक्ष में थे लेकिन काशी सिंह ऐरी और इंद्रमणि बडोनी ने सबकी भावनाओँ को दरकिनार कर चुनाव नहीं लड़ने का फैसला लिया। तब पत्रकार नीरज शर्मा अपने एक लेख में लिखते हैं कि कार्यकर्ता और अन्य नेता लाख चाहें लेकिन होता वही है जो ये दोनों नेता चाहते हैं। इन दोनों नेताओं पर तानाशाही के आरोप लगे। और दल में दोफाड़ होने की वजह भी इनकी तानाशाही को ही बताया गया। काशी सिंह ऐरी और बडोनी की जिद का परिणाम ये हुआ कि उक्रांद के अलावा सभी पार्टियों ने चुनाव लड़ा। और इसका सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिला। क्योंकि कांग्रेस से लोगों की उम्मीदें खत्म हो चुकी थीं।

फिर 9 नवंबर, 2000 को जब अलग उत्तराखंड राज्य बना तो इसका श्रेय भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी ले गए। ये सच है कि वाजपेयी ने भी प्रयास किए थे लेकिन उक्रांद के मुकाबले दूसरे पार्टियों के प्रयास ना के बराबर थे। उसके बावजूद भी जब अलग उत्तराखंड राज्य की पहली सरकार बनी तो राष्ट्रीय पार्टियों ने अपनी ही सांठ गांठ शुरू कर दी और यूकेडी हासिए पर पड़ी रही। फिर 2002 से लेकर 2022 तक के चुनावों में उत्तराखंड क्रांति दल सिर्फ सिमटता चला गया। 2002 के चुनाव में यूकेडी को करीब 6% वोट मिले थे जो 2017 तक पहुंचते-पहुंचते 0.7% पर आ गया। और 2022 में तो 90% यूकेडी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। लोकसभा चुनावों में तो यूकेडी की गत और बुरी हुई। और इन सबके लिए खुद यूकेडी जिम्मेदार रही।

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