यूकेडी पार्ट 4: अपनी बर्बादी के लिए ख़ुद यूकेडी नेता ज़िम्मेदार
2012 में यूकेडी पी का चुनाव चिह्न
उत्तराखंड क्रांति दल आज जिस हाशिए पर खड़ा है, उसकी एक बड़ी वजह खुद उक्रांद के नेता रहे हैं। 1979 में जब यूकेडी के गठन की बैठक हुई, उसी में ही खींचतान शुरू हो गई थी और फिर यह खींचतान कभी खत्म ही नहीं हुई। राज्य आंदोलन के दौरान सबकी जुबान पर यूकेडी था लेकिन उक्रांद नेताओं की आपसी कलह, महत्वाकांक्षा, स्वार्थ और घटिया राजनीति से लोगों का इन पर विश्वास बन ही नहीं पाया। अलग राज्य बनने के बाद जहां यूकेडी को आत्ममंथन करना था, वहीं वो सत्ता लालच में आकर अपनी विचारधारा से समझौता करने लगी।
सत्ता लालच पड़ा भारी
2002 के पहले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने बहुमत के साथ चुनाव जीता और यूकेडी के भी चार विधायक बने। यूकेडी भले ही सरकार का हिस्सा नहीं रही लेकिन वह कांग्रेस सरकार के खिलाफ भी खड़ी होती नहीं दिखी। इलेक्शन बीते ही थे कि यूकेडी में दोफाड़ हो गई। हार पर आत्ममंथन करने की बजाय दिवाकर भट्ट और त्रिवेंद्र सिंह पंवार आमने–सामने आ गए। नतीजा ये हुआ कि दिवाकर भट्ट ने यूकेडी डेमोक्रेटिक नाम से पार्टी बना ली और मुख्य यूकेडी पंवार के पास ही रही। बाद में 2007 में फिर यह दोनों दल साथ आ गए। 2007 में भारतीय जनता पार्टी 34 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल बनकर उभरी तब सरकार बनाने के लिए यूकेडी ने उसे समर्थन दे दिया। और इनाम के तौर पर उक्रांद से दिवाकर भट्ट खंडूड़ी मंत्रिमंडल में शामिल हो गए। हालांकि यही पद उक्रांद के बिखरने की वजह भी बना।
यूकेडी में दोफाड़
दिसंबर 2010 में उक्रांद ने भाजपा सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया लेकिन दिवाकर भट्ट हटने को तैयार नहीं थे। यूकेडी का एक धड़ा उनके साथ खड़ा रहा। इसका नतीजा ये हुआ कि उक्रांद फिर दो हिस्सों में बंट गई। एक तरफ दिवाकर भट्ट–यूकेडी (डेमोक्रेटिक), दूसरी तरफ, त्रिवेंद्र सिंह पंवार—यूकेडी (पी) थी। जब ये मामला चुनाव आयोग के पास पहुंचा तो आयोग ने पार्टी के चुनाव चिह्न कुर्सी को ही फ्रीज कर दिया। फिर 2012 में हुए विधानसभा चुनावों में दिवाकर भट्ट और ओमगोपाल रावत ने भाजपा के चिह्न पर चुनाव लड़ा और दोनों हार गए। वहीं, पंवार गुट के प्रीतम सिंह पंवार यमुनोत्री से विजयी बने। और इस बार पंवार की उक्रांद ने कांग्रेस को समर्थन दे दिया। यहां भी इनाम के रूप में प्रीतम सिंह पंवार कैबिनेट मंत्री बने।
प्रीतम पवाँर का सत्ता प्रेम?
उक्रांद ने एक साल के भीतर ही 13 मार्च, 2013 को राज्यपाल से मिलकर अपना समर्थन वापस ले लिया। लेकिन दिवाकर भट्ट की तरह ही प्रीतम पंवार भी सत्ता छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। नतीजा वह सरकार के साथ बने रहे। इससे नाराज होकर यूकेडी पी के अध्यक्ष त्रिवेंद्र सिंह पंवार ने प्रीतम को पार्टी से निलंबित कर दिया। जवाबी हमला करते हुए प्रीतम ने कहा कि त्रिवेंद्र सिंह पंवार का कार्यकाल 25 जुलाई, 2012 को ही पूरा हो चुका है और वो अवैध रूप से पार्टी और कार्यालय पर कब्जा जमाए हुए हैं। वो अलग बात है कि बाद में प्रीतम पंवार बीजेपी में ही शामिल हो गए।
जब दिवाकर भट्ट ने की अपील
जिस पार्टी ने उत्तराखंड राज्य दिलाया था, उसका ये हाल देखकर दिवाकर भट्ट काफी दुखी हो गए थे। भट्ट उत्तराखंड जनतांत्रिक पार्टी बना चुके थे लेकिन वह यूकेडी को नहीं छोड़ पाए। भट्ट ने यूकेडी के सभी धड़ों को एक होने की अपील की। उन्होंने कहा कि भले ही मुझे अलग बिठा दो लेकिन यूकेडी को एकजुट करो। ऐरी भी इस टूट से काफी परेशान थे और उन्होंने भी तब कहा था कि पार्टी तानाशाही से नहीं बल्कि एकजुटता से चलेगी। यूकेडी में एकजुटता करने की कोशिशें होती रहीं और आखिरकार 2017 तक दोनों में विलय हो गया और पार्टी को उसका चुनाव चिह्न भी वापस मिल गया। लेकिन उक्रांद की किस्मत में जैसे शांति लिखी ही नहीं थी।
फिर हुई टूट
2023 में एक बार फिर उक्रांद दो गुटों में बंटती दिखी। जुलाई 2023 में यूकेडी के दो धड़े वर्चस्व की लड़ाई को लेकर आपस में भिड़ गए। इस हंगामे के बाद पार्टी से निष्कासित शिवप्रसाद सेमवाल गुट ने अपनी नई पार्टी- राष्ट्रवादी रीजनल पार्टी का गठन किया। उत्तराखंड क्रांति दल के भीतर ऐसे कई राजनीतिक घमासान हुए जिन्होंने इस पार्टी को भारी नुकसान पहुंचाया। और पार्टी के सत्ता प्रेमी नेताओं और आपसी झगड़ों की वजह से ही उत्तराखंड की जनता कभी इस दल पर विश्वास नहीं कर पाई और उसने हर बार राष्ट्रीय पार्टियों को ही जिताया।
