नेपाल आपदा: वो सच जिससे बचा इकलौता घर, आपदा ने खोली सरकारों की पोल

नेपाल आपदा

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नेपाल में मची तबाही ने अब तक सात सौ से ज्यादा लोगों की जान ले ली है। दो हजार से भी ज्यादा लोग लापता हैं। जब तक आप इस रिपोर्ट को देख रहे होंगे, शायद तब तक मौत का ये आंकड़ा और बढ़ गया होगा। लेकिन नेपाल में आई इस त्रासदी ने फिर सरकारों की पोल खोलकर रख दी है। इस पर बात करेंगे लेकिन सबसे पहले ये वीडियो देखिए। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा ये वीडियो भी नेपाल में आई इसी आपदा का है।

इस वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे पानी के भयंकर सैलाब के बीच ये घर अपनी नींव पर खड़े रहने की कोशिश में जुटा हुआ है। और इसी घर में हैं कुछ लोग जो उम्मीद कर रहे हैं कि ये सैलाब उनके घर को न बहा ले। अब अच्छी खबर ये है कि इस घर के सभी बाशिंदे सुरक्षित बाहर निकाल लिए गए हैं। लेकिन इसके साथ ही एक सवाल ये भी उठ रहा है कि पूरे शहर को मटियामेट करने वाले इस सैलाब के सामने ये घर कैसे टिक पाया? और जब हम इस सवाल का जवाब जानेंगे तो हमें पता चलेगा कि ये आखिरी सैलाब नहीं है और हिमालयी क्षेत्रों में ऐसी विनाशकारी आपदाएं आती रहेंगी और इनकी संख्या गुजरते वक्त के साथ बढ़ती रहेंगी। और ऐसा होता रहेगा क्योंकि खुद ये सरकारें ऐसा होने देंगी। फिर चाहे नेपाल हो, हिमाचल हो या फिर उत्तराखंड।

वायरल घर का पूरा सच
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे एक घर पूरे सैलाब से मुकाबला कर रहा है और फिर भी डटा हुआ है। बीबीसी के मुताबिक यह वीडियो नेपाल की त्रिशूली नदी से सटे इलाके का है। रिपोर्ट बताती है कि बालकनी में खड़े ये लोग किसी तरह बचे रहे। और इस बीच घर की छत पर मदद के लिए कोई लाल दुपट्टा लहरा रहा था।

रिपोर्ट के मुताबिक सैलाब थमने के बाद लोग इनकी मदद के लिए पहुंचे और इन्हें सुरक्षित बचा लिया गया है। इस वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर लोग हैरानी भी जता रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि इस घर का इतने विकराल सैलाब के बीच बचे रहना किसी चमत्कार से कम नहीं है। NIDM और NDMA की रिपोर्टें बताती हैं कि केवल मजबूत इमारत बना देना काफी नहीं है। अगर नीचे की जमीन कमजोर है, नींव सही नहीं है या ढलान अस्थिर है तो अच्छे से अच्छा भूकंप रोधी मकान भी गिर सकता है। रिपोर्ट्स कहती हैं कि पहाड़ों में सड़क, होटल, मकान या दूसरी परियोजनाएं बनाते समय प्राकृतिक ड्रेनेज सिस्टम को रोकना, पानी का रास्ता बदलना या फिर ढलान को बिना जांच के काटना खतरनाक हो सकता है।

अब ये घर तो बच गया लेकिन दूसरे घर क्यों नहीं बचे या फिर क्यों नहीं बच पाते। हिमालयी क्षेत्रों में अक्सर जब भी प्राकृतिक आपदा आती है तो यहां बने घर ताश के पत्ते की तरह बिखर जाते हैं। और इसकी वजह है इनका बेतरतीब निर्माण करना। NIDM और NDMA की रिपोर्ट कहती हैं कि हिमालय में सुरक्षित मकान बनाने की शुरुआत मजबूत दीवारों, सीमेंट और सरिये से नहीं बल्कि सही जगह चुनने से होती है। रिपोर्ट कहती हैं कि ढलान पर मकान या कोई बड़ा निर्माण करने से पहले मिट्टी, चट्टान, दरारों, झरनों, पानी के रिसाव और प्राकृतिक नालों की जांच होनी चाहिए। यानी पहला सवाल यह होना चाहिए कि यहां निर्माण करना सुरक्षित है भी या नहीं।

NDMA यह भी कहता है कि पहाड़ी राज्यों में land-use planning, building rules और development plans में landslide safety को जरूरी हिस्सा बनाया जाना चाहिए। ये रिपोर्ट सुझाव देती हैं कि बड़े प्रोजेक्ट जैसे कि स्कूल, अस्पताल समेत दूसरे महत्वपूर्ण ढांचे केवल इंजीनियरिंग डिजाइन के आधार पर नहीं बल्कि पूरे इलाके के खतरे को देखकर बनाए जाने चाहिए। लेकिन क्या ऐसा होता है तो जवाब है नहीं। खुद सरकारें इन नियमों को ताक पर रखकर निर्माण करती हैं या करने देती हैं।

सिर्फ यही नहीं, नेपाल में आपदा कोई अचानक नहीं आई थी बल्कि सरकारों को ऐसी आपदाएं आने का इल्म पहले से ही था लेकिन आम जनों को इनसे बचाने के लिए जुगत करने की जहमत ये सरकारें नहीं उठाती हैं। खैर, इस पर बात करने से पहले जान लीजिए कि NIDM उत्तराखंड की पारंपरिक लकड़ी और पत्थर की परतों से बनाई जाने वाली वास्तु कला को भूकंप रोधी मानती है। कुल मिलाकर हिमालयी क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से जिस तरह घर बनाए जाते थे, वो काफी मुफीद और सुरक्षित होते थे। लेकिन फिर हमने नदी किनारे मकान बनाने शुरू कर दिए। हमने उनकी सुरक्षा से ज्यादा उनके सुंदर दिखने और सुंदर लोकेशन पर होने को अधिक महत्व दिया। सरकारें भी इसी रवानगी में बहती चली गईं और हमने नदी से उसका रास्ता छीनना शुरू कर दिया। उत्तराखंड में नदी किनारे जो निर्माण हुए हैं, उसमें सिर्फ निजी अतिक्रमण नहीं है बल्कि इसमें सरकारों की भी गंभीर खामियां सामने आई हैं। 

2013 की केदारनाथ आपदा को लेकर एक स्टडी बताती है कि यहां पर केदारनाश से रामबाड़ा, गौरीकुंड, सोनप्रयाग, चंद्रापुरी, तिलवाड़ा, रुद्रप्रया और श्रीनगर तक कई बसावट और कमर्शियल भवन नदियों के अपना रास्ता बदलने की आदत को नजरअंदाज करके निर्माण किया गया था। सरल शब्दों में कहें तो ये निर्माण नदियों के तट पर किए जाने लगे। 2013 की आपदा के बाद कोर्ट और एनजीटी ने सख्ती दिखाते हुए पहाड़ी क्षेत्रों में नदी के बीच से 100 मीटर तक प्रतिबंधित या eco-sensitive zone रखने का नियम किया। साथ ही 100 से 300 मीटर तक रेगुलेटरी जोन की व्यवस्था बनाई। इसके बावजूद नदी किनारे होटल, रेस्तरां, मकान और दूसरे व्यावसायिक निर्माण होते रहे।

2016 में एनजीटी ने Darrameks Hotels & Developers पर 20 लाख रुपए का जुर्माना लगाया था। क्यों? क्योंकि  ये लोग गंगा के riverbed पर होटल निर्माण कर रहे थे। बड़ी बात ये रही कि संबंधित सरकारी अधिकारियों ने ठीक से निरीक्षण किए बिना ही एनओसी जारी कर दिया था। सरकारें इन नियमों को लेकर कितनी लापरवाह हो सकती हैं, उसका एक नमूना खुद उत्तराखंड सरकार के डिजास्Dटर मिटिगेशन एंड मैनेजमेंट सेंटर  की रिपोर्ट देती है। रिपोर्ट बातती है कि बंसवाड़ा की मुख्य बस्ती मंदाकनी से काफी ऊंचाई पर थी लेकिन सरकारी गढ़वाल मंडल विकाल निगम यानी GMVN का टूरिस्ट कॉटेज नदी के टेरेस  के सबसे निचले स्तर पर बना दिया गया था। और 2013 में मंदाकिनी ने इस टेरेस का कटाव किया और इस कॉटेज को बुरी तरह नुकसान पहुंचा। यानि कि सरकार खुद का निर्माण भी नियमों के तहत नहीं कर रही थी।

2025 में आई धराली आपदा के बाद स्थानीय लोगों ने सरकार पर अनदेखी का आरोप लगयाा। स्थानीय लोगों का कहना था कि हमने प्रशासन से नदी किनारे निर्माण कार्य पर रोक लगाने की मांग की थी। ड्रेनेज चैनल्स को साफ़ करने की अपील की थी लेकिन सरकार ने कुछ भी नहीं किया। अब ये तो समझ में आता है कि सरकार आम लोगों की नहीं सुनती लेकिन ख़ुद अपने विभाग की तो सुन लेती। जी हां। उत्तराखंड के डिजास्टर मिटिगेशन एंड मैनेजमेंट सेंटर  ने 2012 में ही कह दिया था कि भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में विस्फोट नहीं किए जाने चाहिए और ना ही यहां पर नदी किनारे बसत होनी चाहिए। रिपोर्ट ने ये भी कहा कि अगर लोग बस चुके हैं तो उन्हें समय रहते वहां से शिफ्ट कर दिया जाए लेकिन सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। और कुछ यही तस्वीर हमें नेपाल में आई आपदा में भी दिखती है।

पिघल रहे ग्लेशियर
वैसे तो एक्सपर्ट्स कई सालों से चिल्ला रहे हैं कि हिमालय गर्म हो रहा है और यहां ग्लेशियर पिघल रहे हैं। लेकिन नेपाल में आई इस आपदा के महज कुछ महीने पहले अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र यानी (ICIMOD) ने दो रिपोर्टें जारी की थीं। रिपोर्ट में कहा गया था कि हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं और इससे भविष्य में अचानक आने वाली बाढ़ और ग्लेशियर से जुड़ी दूसरी आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है। आम तौर पर हिमालयी क्षेत्रों की सभी सरकारों को मुस्तैद हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा हुआ नहीं। और आगे भी ऐसा होगा, लगता नहीं।

12% कम हुआ ग्लेशियर क्षेत्र
रिपोर्ट्स में बताया गया था कि 1990 से 2020 के बीच इस पूरे क्षेत्र के ग्लेशियरों का कुल क्षेत्रफल करीब 12 प्रतिशत कम हुआ है और उनमें जमा बर्फ का अनुमानित भंडार लगभग 9 प्रतिशत घट गया। साल 2000 के बाद ग्लेशियरों की बर्फ घटने की रफ्तार पहले की तुलना में लगभग दोगुनी हो गई। सबसे ज्यादा खतरा उन छोटे ग्लेशियरों को है जिनका क्षेत्रफल आधे वर्ग किलोमीटर से कम है और हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र के लगभग तीन-चौथाई ग्लेशियर इसी श्रेणी में आते हैं। लेकिन हमारे पास इतनी विस्तृत रिपोर्ट होने के बावजूद हम चौकन्ने नहीं रहे। ये बात सही है कि इन ग्लेशियरों की निगरानी करना आसान नहीं है लेकिन नदी किनारे बस्तियों को बसाने से रोकना और मकानों का सही ढंग से निर्माण करना तो आपके हाथ में है। वो तो कर लीजिए।

ऐसा नहीं है कि ये पहली बार इस नदी में ऐसे हालात खड़े हुए हों। 2020 में ICIMOD और UNDP ने नेपाल की तीन प्रमुख नदी घाटियों में 47 संभावित खतरनाक ग्लेशियल झीलें चिन्हित की थीं। इनमें Trishuli उप-घाटी की झीलें भी शामिल थीं। भले ही अब तक वैज्ञानिक रूप से मौजूदा आपदा को इन 47 झीलों में से एक से जोड़ा नहीं गया है लेकिन ये इतना पूछने के लिए काफी है कि जब सरकारों के पास ये जानकारी थी तो जरूरी कदम क्यों नहीं उठाए गए। जिस घाटी में ये आपदा आई है, इसी में जुलाई, 2025 में भी आपदा आई थी। कुछ इसी तरह उत्तराखंड के ग्लेशियरो की झील भी टाइमबम बनी हुई हैं।

जिन पर अगर ध्यान नहीं दिया गया तो नेपाल जैसी आपदा आ सकती है। बताया जा रहा है कि उत्तराखंड में करीब 426 ग्लेशियर झीलें हैं। NDMA ने 13 झीलों को खतरनाक बताया है। इन झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने के लिए केंद्र ने 30 करोड़ रुपए मंजूर किए थे लेकिन कई कारणों से काम अभी तक शुरू नहीं हुआ है।

8 जुलाई 2025 को रसुवा क्षेत्र में Bhote Koshi नदी में अचानक बाढ़ आई थी। तब इसके लिए तिब्बत में एक supraglacial lake के तेजी से खाली होने को इसकी वजह बताया गया।  झील नेपाल-चीन सीमा से करीब 35 किमी ऊपर थी। कम-से-कम 9 लोगों के शव मिले और 19 लोग लापता थे। यानि कि सरकार को पता था कि ये संवेदनशील क्षेत्र है लेकिन इसके बावजूद कुछ ऐहतियातन कदम नहीं उठाए गए। 2024 में भी  ऐसी घटना हुई थी। एवरेस्ट क्षेत्र के थेम गांव के ऊपर दो ग्लेशियल लेक्स से कुल लगभग 185 ओलंपिक साइज के स्विमिंग पुल के बराबर  का पानी आया था। इसने कई लोगों को विस्थापित किया था।

1970 के दशक से नेपाल लगातार इस तरह की आपदाएं झेल रहा है लेकिन उसके बाद भी यहां की सरकारें नहीं जागती हैं। कुछ यही हाल भारत के हिमालयी क्षेत्रों का भी है। हर साल आपदाएं आती हैं। जानें जाती हैं। खरबों का नुकसान होता है… और सरकारीं शोक जताकर आगे बढ़ जाती हैं। लेकिन सरकारों को अब समझना होगा कि हालात अब बिगड़ते जा रहे हैं। हिमालयी क्षेत्रों में जो पैसा राहत कार्यों में खर्च होता है, उसे पहले ही अगर पुख्ता इंतजा करने में और नियम बनाने में खर्च किया जाए तो न सिर्फ नुकसान बचेगा बल्कि हर साल आपदाओं में जान गंवाने वाले हजारों पहाड़ियों की जान भी बचेगी।

देखिए आपदाएं हमेशा से आती रही है। और आगे भी आती रहेंगी। लेकिन अब जिस तरह से हिमालय को हमारा और सरकारों का लालच गर्म कर रहा है, उससे ये आपदाएं विनाशकारी साबित होती जा रही हैं। हम प्राकृतिक आपदाओं को अगर रोक नहीं सकते तो कम से कम ऐसे हालात भी न पैदा करें जिससे कि प्राकृतिक आपदाएं विनाशकारी हो जाएं। और ऐसा होने के लिए जरूरी है कि सरकारें समझें। और प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करना बंद कर दें। वरना वो दिन दूर नहीं, जिस दिन इन ग्लेशियरों का पानी इन सरकारों के सरकारी आवास तक पहुंचेगा और बहा ले जाएगा सबकुछ… सरकारी भवन, इंसान और इस पूरे पहाड़ को। 

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