क्या है हिमालयी कुंभ कही जाने वाला नंदा देवी राज जात?
नंदा देवी राज जात
दुर्गम हिमालय की खूबसूरत वादियों के बीच 280 किलोमीटर की पैदल यात्रा। एक चार सिंगों वाला मेढ़ा आगे-आगे चलता है और उसके पीछे सैकड़ों लोग 20 दिन तक चलते रहते हैं। उम्र 25 हो चाहे 75, हर कोई इस यात्रा का हिस्सा होना चाहता है। और हो भी क्यों न ये सभी लोग अपनी दियाण को विदा करने जा रहे हैं। जी हां। दुनिया की सबसे लंबी पैदल यात्राओं में से एक दरअसल मायके से बेटी की विदाई की यात्रा है। हर 12 वर्ष में उत्तराखंड के लोग अपने घर की बेटी नंदा को विदा करने होमकुंड तक जाते हैं। और नम आंखों से विदा करते हुए कैलाश की ओर भेज देते हैं। देवभूमि की इस बेटी नंदा के कैलाश तक जाने की ये यात्रा नंदा देवी राज जात के नाम से जानी जाती है।
नंदा को विदाई देने के लिए जब उसके सैकड़ों मायके वाले हिमालय के कठिन रास्तों पर चलते हैं तो ये हिमालय का महाकुंभ बन जाता है। हिमालय का ये महाकुंभ 5 सितंबर से शुरू हो चुका है और 30 सितंबर को इसका समापन होगा। हालांकि इस बार ये महाकुंभ राज जात नाम से नहीं बल्कि बड़ी जात के रूप में आगे बढ़ रहा है। और राज जात 2027 में होने वाली है। अब ऐसा क्यों है? उस पर भी आपको जानकारी देंगे लेकिन सबसे पहले नंदा देवी और उसकी राज जात को जानते हैं।
कौन हैं नंदा देवी?
नंदा देवी उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र की प्रमुख आराध्य देवी हैं। धार्मिक मान्यता में ये भगवान शिव की अर्धांगिनी हैं। पुराणों में प्रसंग मिलता है कि भगवान शिव अलग-अलग युग में आदि शक्ति से विवाह के बंधन में बंधते हैं। सतयुग में शिवजी का विवाह दक्ष प्रजापति की पुत्री सती से, त्रेता युग में हिमालय की पुत्री पार्वती से और द्वापर में नंद की पुत्री नंदा से हुआ। देवभूमि की लोकपरंपरा में इन्हें हिमालय की बेटी माना जाता है। स्थानीय जागर गीतों में इन्हें नंदा के अलावा गौरा, शैलपुत्री, नंदुला, राजराजेश्वरी जैसे नामों से भी जाना जाता है।

लोकमान्यता है कि नंदा का जन्म ऋषासो भूमि में रहने वाले हेमन्त ऋषि और मैनावती के घर होता है। भगवान शिव से विवाह होने के बाद नंदा कैलाश को विदा हो जाती है। कैलाश का कठोर जीवन जीते-जीते नन्दा बेहद दुखी रहने लगती है। उसे अपने मायके की याद आती है। लेकिन 12 वर्ष बीत जाने के बाद भी मायके वालों ने उसकी कोई सुध नहीं ली। इससे नाराज नंदा अपने मायके में दुर्भिक्ष उत्पन्न करना शुरू कर देती है और फिर हेमंत ऋषि को अपनी बेटी की याद आती है।
नंदा को मायके बुलाने के लिए धर्म भाइयों हित और विन्सर को भेजा जाता है। मां नंदा उनके साथ ऋषासो आती है और आठ दिन मायके का वैभव पाकर वह फिर कैलाश को लौट जाती हैं। बेटी को विदा करने के लिए उसके माता-पिता, धर्म भाई और समस्त ग्रामवासी पहुंचते हैं। मां नंदा को मायके से ससुराल यानी कैलाश विदाई का यही पावन पर्व ‘श्री नन्दा देवी जात कहलाता है।
ये पवित्र महायात्रा उत्तराखण्ड के चमोली जनपद से निकलती है। एक यात्रा प्रति वर्ष जनपद के कुरुड़ नाम के गांव से बैदनीकुंड तक जाती है। इसे छोटी जात कहा जाता है। वहीं, 12वें वर्ष में होने वाली जात जनपद के नौटी गांव से प्रस्थान करती है और होमकुंड तक पहुंचती है। इसे ठुल जात यानि कि बड़ी जात भी कहा जाता है। वैसे तो नंदा देवी की जात होने के प्रमाण हमें सातवीं शताब्दी से पहले के भी मिल जाते हैं। हालांकि इसके राजजात बनने की बात नौवीं शताब्दी के आसपास सामने आती है।

राज जात बनने की कहानी
बताया जाता है कि नौवीं शताब्दी के आसपास राजा भानुप्रताप ने अपनी बेटी का विवाह धार-मालवा से आए कनकपाल से किया। भानुप्रताप ने कनकपाल को चांदपुर गढ़ी का राजपाठ सौंपने के साथ ही देवी का श्रीयंत्र भी दिया। बता दें कि कनकपाल गढ़वाल के पंवार राजवंश को स्थापित करने वाले पहले व्यक्ति था। कनकपाल ने अपने राजगुरु के निर्देश पर श्रीयंत्र को नौटी गांव में स्थापित कर दिया।
मान्यता है कि कुछ समय बाद उसके राज्य में अनहोनी होने लगी। पुरोहितों ने गणना की तो मां नंदा का दोष बताया और संकल्प कराया। इससे राज्य में अमन-चैन फिर कायम हो गया। मां नंदा के चमत्कार से प्रभावित होकर राजा ने अपनी राजधानी चांदपुरगढ़ से होमकुंड तक नंगे पैर पैदल यात्रा की। माना जाता है कि इसके बाद ही इसे राज जात का नाम मिला और इसी वजह से ये नौटी से शुरू होती है। नौटी में ही राजा के राजगुर नौटियाल रहा करते हैं। कहते हैं कि गढ़वाल के प्रतापी राजाओं में से एक अजयपाल ने राज-काज में व्यस्त होने की वजह से राज जात की जिम्मेदारी अपने कण्सु यानी कि छोटे भाई को सौंप दी और कण्सु भाई का ये गांव आज कांसुवा नाम से जाना जाता है।
कैसे शुरू होती है नंदा देवी जात
आज भी नंदा राज जात करने के लिए दो अहम संकेत जरूरी होते हैं। मान्यता है कि नंदा देवी अपने मैत्यों यानी मायके के गांव कांसुवा पर दोष लगती है। मां नंदा के दोष लगने का मतलब है कि इस क्षेत्र में कुछ अप्रिय घटनाएं होने लगती हैं। इससे कांसुवा के कुंवर समझ जाते हैं कि उन्हें जात की तैयारी करनी है। कई बार माता कुंवरों के सपनों में आकर राज जात का आयोजन करने की बात कहती है। मां के दोष लगने पर चांदपुर क्षेत्र में एक चौसिंग्या खाडू यानि चार सिंगों वाला मेढ़ा जन्म लेता है। इसके बाद ही राज जात की तैयारियां शुरू की जाती हैं।
नंदा देवी राज जात पर विवाद
हालांकि इस बार नंदा देवी राज जात को लेकर विवाद खड़ा हो गया। यह विवाद तब खड़ा हुआ जब आधिकारिक नंदा देवी राजजात समिति ने जात 2026 की जगह 2027 में कराने की घोषणा की। इस फैसले से नाराज कुरुड़ पक्ष ने आरोप लगाया कि उन्हें बिना बताए ही जात का समय बदला गया। कुरुड़ पक्ष का कहना था कि जब पहले से ही तय था कि जात 2026 में करनी है तो फिर अचानक इसे 2027 में करने का फैसला क्यों लिया गया? दोनों पक्षों के बीच कोई सहमति न बनने के बाद कुरुड़ पक्ष इसी साल 5 सितंबर को नंदा देवी बड़ी जात लेकर गया है। तो वहीं, नौटी वाले पक्ष का कहना है कि वह 2027 में ही राज जात लेकर जाएगा। दो गुटों के इस झगड़े से नंदा देवी जात की प्रतिष्ठा को धक्का जरूर पहुंचा है लेकिन माना जा रहा है कि आज नहीं तो कल, दोनों गुट साथ मिलकर इसका कोई न कोई समाधान भी निकाल ही लेंगे।
पहाड़ की स्त्री का प्रतिबिंब
संस्कृतकर्मी नंदकिशोर हटवाल कहते हैं कि नंदा उत्तराखण्ड की लोकगाथा का सिर्फ एक दैवीय चरित्र नहीं है। वो यहां की बेटियों और बहुओं का प्रतिनिधित्व करती है। नंदा के संघर्ष स्त्रियों के अपने संघर्ष हैं। इस गाथा में शिव को स्त्रियों ने पुरूषों के प्रतिनिधि चरित्र के रूप में गढ़ा है। राज जात में मां नंदा जब भी किसी गांव से गुजरती हैं तो उस गांव की महिलाएं सुबक-सुबक कर रोने लगती हैं। वो नंदा की डोली को ऐसे गले लगाती हैं जैसे कि उनकी ही बेटी विदा हो रही हो।
दरअसल मां नंदा पहाड़ की उन महिलाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं जिन्होंने अपनी पीठ पर उठाकर पहाड़ को सहारा तो दिया लेकिन उनके दुख के पहाड़ को कोई समझ नहीं पाया। नंदा की बात करते हुए पहाड़ी स्त्रियों को अपने-अपने ससुराल का कठिन भौगोलिक क्षेत्र दिखने लगता है। ससुराल को देखते ही जो भाव स्त्रियों के मन में आते हैं, उसे उन्होंने कैलाश की संज्ञा दे दी है। जिस तरह कैलाश में मां नंदा को अकेलापन और मायके की याद में रहना पड़ा, कुछ उसी तरह पहाड़ की स्त्रियां रहा करती थीं। एक लड़की का विवाह जब कई जंगलों पार स्थित गांव में हुआ करता था तो वो भी मां नंदा की तरह मायके की याद में रोया करती थी। सास की निठुरता, पहाड़ का कमरतोड़ काम उसे अपने मायके की याद में खोने को विवश कर देता… और वो आंखों में आंसू लिए आश करने लगती कि जल्द ही उसके मायके वाले उसे बुलाने आएंगे। यही वजह है कि स्त्रियों ने नंदा की गाथा में नंदा के मायके रिसासो को अपने मायके की तरह सुंदर और मनमोहक रूप में गढ़ा है।
मानवशास्त्री विलियम एस. सैक्स अपनी किताब ‘माउंटेन गॉडेस’ में भी इस राजयात्रा को विवाहित महिलाओं से जोड़ते हैं। वह इसे मायके से पति के घर जाने की यात्रा की अनुष्ठानिक अभिव्यक्ति बताते हैं। इस दृष्टि से नंदा की उपासना को समझने में पहाड़ की महिलाओं का जीवन और विवाह के बाद बदलने वाले पारिवारिक संबंध विशेष महत्त्व रखते हैं। नंदा के प्रति श्रद्धा में देवी की पूजा और बेटी के प्रति अपनापन एक साथ दिखाई देते हैं। यही रिश्ता उनकी धार्मिक परंपरा को पहाड़ी समाज के पारिवारिक अनुभवों से जोड़ता है। नंदा देवी और उसकी राज जात इसी का एक स्वरूप है।
नंद किशोर हटवाल कहते हैं कि नंदा के सम्पूर्ण मिथक कीघटनाएं, चरित्र-चित्रण, और संवाद की रचनाकार यहां की स्त्रियां ही हैं। और इन स्त्रियों ने नंदा के स्वरूप में अपने जीवन की खुशियां और दुखों को गढ़ा है और उसे दैवीय स्वरूप दिया है। कुल मिलाकर मां नंदा और उसकी जात यहां के समाज और यहां के देवत्व का प्रतिबिंब है। और इस प्रतिबिंब में आप चाहे 2026 में शामिल हों या फिर 2027 में… मां नंदा का आशिर्वाद सबको मिलता है। और मिलता रहेगा।
