अमेरिका की वो लड़की जिसे लोगों ने मां नंदा का अवतार माना
नंदा देवी अनसोइल्ड पिता विली अनसोइल्ड के साथ
उसका जन्म अमेरिका में हुआ था लेकिन उसका मन हमेशा नंदा देवी में बसा रहा। बचपन से ही उसे नंदा देवी से अपना खास रिश्ता महसूस हुआ करता था। स्थानीय लोगों ने उसकी आभा देखकर उसे मां नंदा देवी का रूप बताया। इस नंदा को देखकर वो जितने खुश थे, उतना ही उनके मन में डर और आशंका भी थी। आशंका ये कि अमेरिका की नंदा देवी यहां से वापस नहीं जा पाएगी।
स्थानीय लोगों ने ये संदेश उस लड़की और उसके साथियों तक भी पहुंचाने की कोशिश की लेकिन उन्होंने उनका विश्वास नहीं किया। बावजूद इसके कि पूरी टीम को इसके संकेत मिलने शुरू भी हो गए थे। ये विदेशी लड़की जब अपनी टीम के साथ नंदा देवी पर्वत पर पर्वतारोहण कर रही थी तो उसे कई संकेत मिले। सबसे पहला संकेत एक साथ आई महिला पर्वतारोही का बीमार होना था। उसके बाद खुद अमेरिका की नंदा देवी रह-रहकर बीमार होने लगी थी लेकिन उसके बावजूद भी वो आगे बढ़ती रही। और तब तक नहीं रुकी, जब तक वह नंदा देवी की गोद में हमेशा के लिए सो नहीं गई। आज भी वो 22 वर्ष की विदेशी नंदा नंदा देवी की बाहों में सोई हुई है।

स्थानीय लोगों ने कहा कि वो मां नंदा का अवतार थी और इसीलिए मां नंदा ने उसे अपने साथ ही रख लिया है। ये कहानी है अमेरिका की उस नंदा की जो सिर्फ नाम से नंदा नहीं थी बल्कि वो कइयों के लिए सचमुच देवी थी। वो देवी जो पहाड़ों से प्यार करती थी। जो अन्याय होते हुए देखती तो उसके विरोध में उतर आती और जो मौत को सामने देखकर भी लगातार नंदा देवी की तरफ बढ़े जा रही थी। ये कहानी है आस्था, विश्वास और साहस की।
विलि अनसोइल्ड की इच्छा
साल 1948। अमेरिका का एक 22 वर्ष का युवा विलि अनसोइल्ड भारत की खाक छान रहा था। उसे पहाड़ों से प्यार था और इसी दिशा में जब वो घूमने निकला था तो उसकी नजर नंदा देवी पर्वत पर पड़ी। वो नंदा देवी की सुंदरता और चमक को देखकर इतना प्रभावित हुआ कि उसने उसी समय एक संकल्प लिया। संकल्प ये कि अगर कभी मेरी बेटी हुई और वो इतनी ही सुंदर हुई तो मैं उसका नाम नंदा देवी रखूंगा। कुछ वर्षों बाद विलि का विवाह जोलेन नाम की लड़की से हुआ। और 1954 में अमेरिका के ओरेगन में अनसोइल्ड दंपति की दूसरी संतान एक बेटी हुई। बिलकुल वैसी जैसी विलि ने सोचा था। विलि ने अपनी बेटी का नाम रखा- नंदा देवी।

नंदा देवी एक प्यारी सी गुड़िया थी जिसे साहसिक खेलों में मजा आता। उसे पहाड़ों से प्रेम था। और उसका पहाड़ों से ये प्रेम तब और बढ़ गया जब वो अपने माता-पिता के साथ नेपाल में रहने लगी। नेपाल में रहने के दौरान उसने न सिर्फ नेपाली सीखी बल्कि नंदा देवी समेत दूसरे पहाड़ों के प्रति उसका प्रेम बढ़ता ही गया। 1967 में अनसोइल्ड परिवार वापस अमेरिका लौटा और मैसाच्युसट्स राज्य में रहने लगा। यहां नंदा देवी ने 11वीं कक्षा में दाखिला लिया।
देवी को जानने वाले लोग बताते हैं कि वो चलती-फिरती मुस्कान थीं। देवी कभी वियतनाम युद्ध के विरोध में उतरती तो कभी दुनिया से भुखमरी मिटाने जैसे सामाजिक मुद्दों के लिए आवाज उठाती। जब उसे इन कामों से फुर्सत मिलती तो वो अपने पिता के साथ पहाड़ चढ़ा करती थी। और 1974 में देवी ने तय किया कि वो नंदा देवी से मिलने जाएगी। और इस तरह संयुक्त इंडो-अमेरिकन नंदा देवी एक्सपीडिशन 1976 की नींव पड़ी। टीम ने तय किया कि वो नंदा देवी पर्वत के उत्तरी मुख से चढ़ाई करेंगे क्योंकि इस रूट से अभी तक कोई भी नंदा देवी पर्वत पर नहीं गया था।
जुलाई, 1976 में नंदा देवी, उनके पिता विलि अनसोइल्ड और टीम के दूसरे मेंबर दिल्ली पहुंचे। यहां पत्रकारों से बात करते हुए नंदा देवी ने कहा था कि मैं नंदा देवी के साथ बहुत गहरा जुड़ाव महसूस करती हूं। मैं इसे शब्दों में बयां नहीं कर सकती लेकिन जन्म से ही इस पर्वत को लेकर मेरे भीतर एक खास एहसास रहा है। और ये एहसास कितना खास था, वो पर्वतारोहण के दौरान भी खूब दिखा।
जब नंदा देवी ने साथियों के साथ नंदा देवी पर्वत पर पर्वतारोहण शुरू किया तो साथ आए स्थानीय कूली उसे दीदी पुकारा करते थे। नंदा देवी भी उनके साथ टूटी-फूटी गढ़वाली में बात करती और उनका खयाल रखती। दल में शामिल पर्वतारोही पीटर लीव बताते हैं कि स्थानीय सहयोगियों ने नंदा देवी को मां नंदा का स्वरूप मान लिया था।

देवी के सुनहरे बालों की वजह से लोग उसे मां नंदा का स्वर्णिम रूप गौरा मानने लगे थे। हालांकि दल के साथ गए स्थानीय लोगों को डर था कि नंदा देवी वापस जिंदा नहीं लौट पाएगी। उन्होंने दल समेत देवी को भी इस बारे में जानकारी दी लेकिन सबने इसे मानने से इनकार कर दिया। और परिणाम दिखने लगे थे। दल की एक महिला साथी बेस कैंप पर ही बीमार पड़ गई थी। वो इतना बीमार हो गई कि आखिर में उसे इस मिशन से वापस जाना पड़ा। नंदा देवी ने पर्वतारोहण तो शुरू कर दिया था लेकिन उसकी तबीयत भी बिगड़ने लगी थी।
देवी के पेट में हर्निया की दिक्कत हो गई थी। साथ गए डॉक्टर ने साफ हिदायत दी कि हर्निया के साथ ऊंचाई पर जाना खतरनाक हो सकता है। लेकिन देवी हार मानने को तैयार नहीं थी। वो एक मां की तरह दल में आए सभी लोगों का ख्याल रखा करती थी। खासकर उन स्थानीय सहयोगियों का जो उनका सामान लेकर जा रहे थे। वो रात में कई बार उनका तंबू लगाने में मदद करती। उनके साथ उनकी ही भाषा में बात करने की भी कोशिश करती।
सिंतबर आते-आते नंदा देवी की तबीयत और बिगड़ने लगी थी। वो एक दिन ठीक रहती और दूसरे दिन बीमार पड़ जाती लेकिन इसके बावजूद नंदा देवी की चोटी पर पहुंचने का उसका उत्साह बना ही रहा। टीम कैंप थ्री तक पहुंची थी कि अब देवी का हर्निया बहुत खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका था। डॉक्टर ने एक बार फिर हिदायत कि उसे यहीं से वापस चले जाना चाहिए लेकिन देवी इसके लिए तैयार नहीं थी। 8 सितंबर की सुबह जब देवी उठी तो उसका चेहरा सूजा हुआ और नीला पड़ने लगा था। तंबू के बाहर बर्फीला तूफान चल रहा था इसलिए आज किसी ने भी शिखर चढ़ने की कोशिश नहीं की। सुबह के 11 बजकर 45 मिनट हुए होंगे।
देवी तंबू के अंदर लेव, हार्वर्ड के साथ बैठी हुई थी। देवी ने कॉफी की चुस्कियां ली और अचानक उसने लेव को अपनी नब्ज देखने को कहते हुए कहा- मैं मरने वाली हूं। लेव याद करते हैं कि जैसे ही नंदा ने वो लाइन कही, उसने पूरी कॉफी उल्टी कर दी और जमीन पर गिर पड़ी। वहां अफरा-तफरी मच गई। देवी के पिता विली दौड़कर तंबू के अंदर आए और उन्होंने देवी को सीपीआर देने की कोशिश की। अनहोनी की सोचकर घबराए एक पिता ने 15 मिनट तक अपनी बेटी को वापस लाने की कोशिश की लेकिन कोई असर नहीं हुआ। लेव याद करते हैं, वो मर गईं। बस ऐसे ही। एक झटके में।
विली लिखते हैं कि मैं समझ गया था कि मैंने देवी को खो दिया है। उसके बावजूद आधे घंटे तक हम उसे होश में लाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। और आखिर में हमने देवी के शरीर को उसी पर्वत को सौंप दिया, जिससे उसे गहरा लगाव था। देवी आज भी 24 हजार फुट की ऊंचाई पर नंदा देवी की बाहों में विश्राम कर रही है। 22 वर्ष की देवी मर चुकी थी। बचपने से उसने जिस नंदा देवी से मिलने का सपना अपने अंदर पाला था, वो आखिर में उसी की गोद में सो गई।
स्थानीय लोगों को जब नंदा देवी की मौत की खबर मिली तो लोगों ने कहा कि वो मरी नहीं बल्कि अपने घर वापस लौट आई है। स्थानीय लोगों का मानना था कि विली ने 1948 में जब अपनी बेटी का नाम नंदा देवी रखने का संकल्प लिया तो उसी कारण देवी ने उनकी बेटी के शरीर में प्रवेश कर अवतार लिया था। लोगों ने कहा कि जिसे मृत्यु समझा जा रहा है, वो वास्तव में मां नंदा देवी का अपने पर्वत पर, अपने घर लौटने का तरीका था। और इस तरह अमेरिका की नंदा देवी भी हमारे क्षेत्र की नंदा देवी पर्वत से जुड़ी पवित्र लोक कथाओं में शामिल हो गई।
लेकिन एक सवाल जरूर उठता है कि स्थानीय लोगों ने आखिर पहले ही कैसे नंदा देवी की मृत्यु की घोषणा कर दी थी। इसका जवाब हमें 1981 में मिलता है। 1981 में हर्षवंती बिष्ट ने नंदा देवी पर पर्वतारोहण करने की योजना बनाई। तब लोगों ने उनसे कहा कि मां नंदा कभी नहीं चाहेगी कि कोई महिला उसकी चोटी पर खड़ी हो। बताया गया कि ऐसा अगर होता है तो मां नंदा रुष्ट हो जाएगी। और शायद इसी वजह से स्थानीय लोगों ने पहले ही उसकी मौत होने की भविष्यवाणी कर दी थी। बाद में संभावना भी जताई गई कि देवी की मौत के पीछे ये भी एक वजह शायद रही हो।
देवी का नंदा देवी पर्वत से कितना लगाव था, उसको विली अनसोइल्ड भी शेयर करते हैं। वह लिखते हैं कि वह अपने नाम के पर्वत से मिलने के लिए बहुत ज्यादा उत्साहित थी। अभियान के सदस्यों के बीच उभरते अनोखे और अनमोल रिश्तों को देखकर वो खिलखिलाकर हंस पड़ती थीं। नंदा को सभी पर्वतों से प्रेम था लेकिन इस पर्वत से खास लगाव था। इसीलिए उसने जी-जान से चढ़ाई की थी। दूसरों की मदद में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। बड़ी उम्मीदें संजोई थीं और अंतिम सफलता के सपने बेहद आनंद में डूबकर देखे थे। विली लिखते हैं कि अगर मैं नंदा के नजरिए से सोचूं तो मेरा मन यह मान ही नहीं पाता कि वो निराश हुई होगी।
अब सच को आप आस्था के आइने से देखें या फिर विज्ञान और तथ्यों के हवाले से लेकिन अमेरिका की नंदा देवी मां नंदा की तरह ही सबका भला चाहने वाली थी। वो गलत के खिलाफ आवाज उठाती। मजलूमों की मदद को आगे आती और पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए वो चिंतित रहती। बचपन से उसने जिस नंदा देवी से मिलने का सपना देखा था, आखिर में वो उससे सिर्फ मिली नहीं बल्कि हमेशा हमेशा के लिए उसी के साथ हो गई।
पर्वतारोहियों के बीच नंदा देवी का नाम आज भी बड़े गर्व के साथ याद किया जाता है। अमेरिका की नंदा देवी मां नंदा का अवतार थीं या नहीं, ये तो शायद कभी न पता चले लेकिन वो हमारी लोक कथाओं में सदा के लिए अमर जरूर हो गई है। नंदा देवी अनसोइल्ड को भावपूर्ण श्रद्धाजंलि और नमन।
