नौटी या कुरुड़ की , नंदा देवी किसकी?
नंदा देवी
“हम सबको खुद से ये सवाल पूछना चाहिए कि क्या इस विवाद से हममें से किसी का भी भला होगा? नंदा हमारी देवी हैं लेकिन अगर हमारा आचरण ठीक नहीं रहा और हमने ये यात्रा सही ढंग से पूरी नहीं की तो शायद नंदा हमारी देवी ही न रहे।”
आंखों में आंसू और रूंदे हुए गले से नंदा देवी के पश्वा ने 1987 में तब ये बात कही थी, जब पुजारियों के दो गुट आपस में लड़ रहे थे। और 2026 में फिर वही हालात खड़े हो गए हैं। जो होना नहीं चाहिए था, वो हो रहा है। सैकड़ों वर्षों से जिस झगड़े को खत्म करने की कोशिश की जा रही थी, इस बार वो पूरी तरह सतह पर आ चुका है। नंदा देवी की बड़ी जात शुरू हो चुकी है और राज जात 2027 में किए जाने की बात कही जा रही है। अब अगर आपको लगता है कि नंदा देवी जात में ये जो टकराव दिख रहा है, वो पहली बार है तो आप गलत हैं। इस टकराव की जड़ें सैकड़ों साल पुरानी हैं और इससे पहले 1987 में भी ये झगड़ा खुलकर बाहर आ चुका है। 87 में कई परंपराएं तोड़ी गईं और अब 2026-27 में भी यही दोहराया जा रहा है। ये लड़ाई सिर्फ जात को 2026 की जगह 2027 में करने की नहीं है बल्कि ये वो युद्ध है जो वर्षों से चांदपुर गढ़ी और बधाण पट्टी के लोगों के बीच चल रहा है।
इस रिपोर्ट में हम आपको उस राजनीति से रूबरू करवाना चाहते हैं जो पहाड़ की अधिष्ठात्री देवी नंदा को बांटती हुई नजर आ रही है। सोशल मीडिया पर नौटी Vs कुरूड़ की लड़ाई दिख रही है। इसमें साबित करने की कोशिश की जा रही है कि नंदा आखिर है किसकी? नौटी और कुरुड़ के बीच विवाद की असली जड़ क्या है? हम इन सभी सवालों का जवाब भी देंगे और ये भी जानने की कोशिश करेंगे कि आखिर क्यों ये लड़ाई गलत है और कैसे ये सुलझाई जा सकती है? और इन सभी सवालों का जवाब देने की शुरुआत करते हैं 1987 की नंदा देवी राजजात में हुए उस विवाद से जिसके बाद से माना जाता है कि नंदा देवी के नाम पर होने वाली राजनीति खुलकर सामने आ गई है।
1987 का विवाद
साल 1986। नंदा देवी राज जात का मुहूर्त निकालने का समय आ चुका था। लेकिन इस बार माहौल कुछ तनावपूर्ण था। नंदा देवी के पुजारी दो गुटों में बंट चुके थे। एक तरफ थे चांदपुर पट्टी और उससे लगे इलाके वाले यानि कि नौटि के पुजारी और दूसरी तरफ, बधाण के पुजारी मोर्चा संभाले हुए थे। 86 में जब ये तय हो चुका था कि 1987 में नंदा देवी की राज जात जाएगी तो दोनों ही पक्ष एक्टिव हो गए। दोनों ही पक्षों ने लोकल मीडिया में अपनी-अपनी बात रखनी शुरू कर दी। बधाण पट्टी वालों ने आरोप लगाया कि उन्हें राजजात समिति की बैठकों और फैसलों से बाहर रखा गया। उनका ये भी आरोप था कि जात के लिए उनके गांव या उसके आसपास कोई भी धनराशि खर्च नहीं की गई है।
आरोप लगाया गया कि चांदपुर पट्टी के कुछ बड़े लोगों ने अपने हितों के लिए राजजात की परंपरा को विकृत कर दिया है। उन्होंने मुकदमा करने तक की धमकी दी। जब इससे भी बात नहीं बनी तब बधाण वालों के एक गुट ने एक पोस्टर जारी कर राज जात का अलग कार्यक्रम ही घोषित कर दिया। इस नए कार्यक्रम के अनुसार, उनकी अपनी नंदा देवी यानि कि बधाण की नंदा यात्रा का नेतृत्व करेंगी और यात्रा तय कार्यक्रम से एक दिन बाद समाप्त होगी। ये भी कहा गया कि मां नंदा के चरणों में भैंसे की बलि भी दी जाएगी। हालांकि नौटी वाला पक्ष बलि के लिए तैयार नहीं था और उसने जवाब में सिर्फ इतना ही कहा कि जो कार्यक्रम तय है, उसी हिसाब से आगे बढ़ा जाए।
1987 में जब नंदा देवी राज जात नौटी से शुरू हुई तो पहले हफ्ते में सबकुछ ठीक रहा। लेकिन जैसे-जैसे जात बधाण पट्टी के नजदीक पहुंचने लगी तो माहौल फिर गर्म हो गया। अफवाह फैली कि चौसिंग्या खाड़ू मर गया है और उसकी जगह नकली खाड़ू को रख दिया गया है। जात जोगमाया पहुंची ही थी कि यहां पर बधाण वालों ने मांग उठाई कि यात्रा को एक दिन आगे बढ़ाया जाए और काल रात्री को भैंसे की बलि दी जाए। दरअसल कालरात्रि के दिन मां नंदा के यंत्र को बाहर निकाला जाता है और इस दिन भैंसे की बलि देने की प्रथा भी थी लेकिन नौटी वाला पक्ष इसके लिए तैयार नहीं था। माहौल कितना बिगड़ चुका था, उसका पता इससे ही चलता है कि राजा को हिदायत दी गई कि अब से वो तीन चीजों की रक्षा करे। चौसिंग्या खाडू की, राज छंतोली की और खुद की। आखिर में तय किया गया कि जो देवी बोलेगी, वही किया जाएगा। फिर नौटी के पक्ष के एक व्यक्ति पर काली अवतरित हुई और देवी ने कहा कि मुझे बलि नहीं चाहिए।
इतना बोलना ही था कि बधाण का एक व्यक्ति चिल्लाया कि ये फर्जी है। इस पर काली नहीं आती है। दोनों ही पक्ष एक-दूसरे के पश्वा को झुठलाने पर उतारू हो गए थे। आखिर में राजा को सामने आना पड़ा और कहना पड़ा कि दोनों तरफ की देवियां एक साथ आएँगी और वो जो बोलेंगी, वही सबको मान्य होगा। इस पर सबने हामी तो भरी लेकिन ऐसा कुछ हुआ ही नहीं। आखिर में बधाण वाले बेदिनी बुग्याल से वापस लौट आए जैसे वो हर साल की जात में करते हैं। और नौटी वाले राज जात को होमकुंड तक लेकर गए। इस तरह दोनों गुटों के बीच का झगड़ा सतह पर आ चुका था। लेकिन 1987 की इस राज जात में कई परंपराएं तोड़ी गईं। जोगमाया में श्रीयंत्र को बाहर नहीं निकाला गया। नंदाबल में जो देवियों का मिलन होता था, वो नहीं हुआ और कई अन्य परंपराओं का भी निर्वहन नहीं किया गया। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा जिसकी हुई, वो था चौसिंग्या खाडू का कैलाश से वापस आना। जात जब होमकुंड पहुंची तो चौसिंग्या खाडू कैलाश की ओर जाने के मुकाबले बार-बार वापस आ रहा था। आखिर में एक पुजारी को खाडू को गोद में उठाकर कुछ दूरी पर छोड़ना पड़ा। तब जाकर वह कैलाश की तरफ अंतर्धान हुआ। इस पूरे झगड़े को लेकर लोगों का यही कहना था कि पुजारियों ने धर्म को राजनीति के अधीन कर दिया है।
1987 का संघर्ष ऊपरी तौर पर बलि का विवाद नजर आता है लेकिन वास्तव में ये लड़ाई नंदा की बड़ी जात पर अधिकार की थी। बधाण वाले चाहते थे कि बेदिनी कुंड और होमकुंड तक पहुंचने की तिथि उनकी परंपरा के अनुसार हो। बधाण की नंदा यात्रा का नेतृत्व करे। स्थानीय नंदा और उसकी मूर्ति को छूने और पूजा करने का अधिकार उन्हीं के पास रहे। वहीं, नौटी-चांदपुर पक्ष का कहना था कि राजजात नौटी की राजपुरोहितों और चांदपुर के पुराने राजवंश से जुड़ी परंपरा है तो ये अधिकार उनके पास है। 2026 में भी यही हुआ। नौटी वालों ने बिना बधाण वालों को पूछकर जात को 2027 में करने का फैसला लिया और इससे एक बार फिर वो पुराना झगड़ा सतह पर आ गया जो कई वर्षों से दबा हुआ था।
विवाद की जड़
विवाद की जड़ सिर्फ नंदा देवी को अपना आराध्य बताने तक सीमित नहीं है बल्कि वह सोच भी है जो ये दोनों गुट एक-दूसरे के प्रति रखते हैं। यहां का सामाजिक परिवेश भी इस विवाद को हवा देता नजर आता है। भले ही इस क्षेत्र के लोग इस पर बात न करें लेकिन एक सोच है जो गाहे-बगाहे ऊपर आ ही जाती है। विलियम सैक्स जिन्होंने खुद 1987 की राज जात का पूरा विवाद अपनी आंखों से देखा है, वो लिखते हैं कि बधाण वालों को लगता है कि नौटी वाले उन्हें पिछड़ा मानकर नीचा दिखाते हैं। वहीं, नौटी वाले सोचते हैं कि वो बधाण के पुजारियों से श्रेष्ठ हैं। अब वैसे तो नौटी और कुरुड़, दोनों ही शाखाएं गौड़ ब्राह्मणों की ही हैं। लेकिन क्योंकि नौटी के नौटियाल राजाओं के राजपुरोहित रहे हैं तो वो खुद को कुरुड़ के गौड़ ब्राह्मणों से श्रेष्ठ मानते हैं।
नौटी के नौटियाल मानते हैं कि नंदा देवी राज जात को लेकर प्रमुख फैसले लेने का अधिकार उनका है। क्योंकि ये जिम्मेदारी राजा की वजह से उनको मिलती है। वहीं, कुरुड़ के लोगों का तर्क है कि डोली उनकी है। पुजारी भी उनके ही रहे हैं तो ये अधिकार उनके पास क्यों नहीं है। इस पूरे विवाद की जड़ में पशु बलि भी रही है। नौटी पक्ष ने पशु बलि खत्म करने की पहल की थी और बधाण पक्ष शुरुआत में इसके खिलाफ था। इससे भी दोनों पक्षों के बीच एक दीवार सी खड़ी होती गई।
मौजूदा विवाद की पृष्ठभूमि में जाएंगे तो इसका एक बड़ा कारण कुरुड़ का नंदा राज जात मार्ग के प्रमुख स्थानों में शामिल न होना भी रहा है। अब तक नौटी से जो भी राज जात निकली है, उसमें कुरुड़ कहीं पर भी प्रमुख पड़ाव के रूप में नजर नहीं आता है। अमूमन कुरुड़ की देवी नंदकेशरी में जात के साथ शामिल होती है और वहां से अगुवानी करती है। अब ये जगजाहिर है कि कुरुड़ मां नंदा का शक्तिपीठ है। बताया जाता है कि यहां पर मां नंदा की सदियों पुरानी स्वयंभू शिला-मूर्ति है। बधाण पट्टी के लोग कुरुड़ को ही नंदा का प्रमुख सिद्धपीठ मानते हैं। जागर गायिका बसंती बिष्ट भी ये तर्क रखती हैं। वह कहती हैं कि नंदा देवी का प्रमुख सिद्धपीठ कुरुड़ है और यहीं से नौटी हो चाहे कुमाऊं, नंदा देवी गई है। इसकी पुष्टि क्षेत्र में प्रचलित एक लोकगाथा भी करती है। इसका लब्बोलुवाब ये है कि कुरुड़ नामक स्थान पर मां नंदा शिला बनी थी जो यहां पर स्वयं प्रकट हुई थी।
एक और जो विवाद की जड़ है, वो मां नंदा का मायका क्षेत्र है। ज्यादातर किताबों में जिक्र मिलता है कि चांदपुर पट्टी वाला क्षेत्र मां नंदा का मायका है और बधाण व कुरुड़ उनका ससुराल क्षेत्र। इस मुताबिक जाएंगे तो राज जात नौटी से ही शुरू होनी तार्किक है। लेकिन क्षेत्र में गाए जाने वाले एक जागर में वर्णन आता है कि कुरड़ बधाण मैती पुजारी हैं। अब कुरुड़ वाले भी यही बात कर रहे हैं कि वह मां नंदा का मायका क्षेत्र है और यहीं से नंदा की बड़ी जात का शुभारंभ होना चाहिए।
जो जानकार बताते हैं, उससे एक चीज तो प्रतीत होती है कि कुरुड़ नंदा देवी की पूरी कहानी में प्रमुख स्थान जरूर रखता है। क्योंकि आज भी नौटी में जो डोली नंदा देवी की है, वो कुरुड़ की ही मानी जाती है। इससे एक बात हालांकि 100% कन्फर्मेशन के साथ नहीं, जरूर कही जा सकती है कि शायद कुरुड़ ही मां नंदा का मूल स्थान रहा होगा।
वहीं बात करें बड़ी जात की तो कुरुड़ पक्ष एक तर्क ये भी देता है कि सदियों पहले यहीं से नंदा देवी की जात निकलती थी। राजा अपनी मनौती लेकर इसमें शामिल हुआ करते थे। तब ये ठुल जात यानी कि बड़ी जात के नाम से जानी जाती थी। हालांकि बाद में इसे राजा की जात कहकर प्रचारित किया गया और कुरुड़ को जात के प्रमुख मार्ग में भी शामिल नहीं रखा गया। अब पहले बड़ी जात कुरुड़ से निकलती थी या नहीं, इस तर्क को कन्फर्म करना काफी मुश्किल है। क्योंकि अब तक नंदा देवी पर जितनी भी किताबें मैंने पढ़ी हैं, वो सब नंदा देवी राज जात पर केंद्रित नजर आती हैं। उनमें नौटी से ही राजजात के शुरू होने का जिक्र मिलता है। अब इसका सच जो भी हो लेकिन विवाद की एक जड़ ये भी है। मां नंदा देवी के जो जागर नरेंद्र सिंह नेगी या प्रीतम भरतवाण ने गाए हैं, उनमें भी यात्रा रूट पर कुरुड़ प्रमुख स्थान के रूप में नहीं सुनने को मिलता है।
कुरुड़ के विरोध में नौटी वालों का एक ही पक्ष है कि उन्हें 12 वर्ष बाद राज जात करने का अधिकार खुद राजा ने दिया है। वो कहते हैं कि माता 12 वर्ष बाद राजा पर दोष लगती है, तब जाकर जात की तैयारियां होती हैं। नौटी पक्ष के लोग तर्क देते हैं कि जब दोष राजा पर लगना है तो उसका निर्वहन करने के लिए जात भी तो वही निकालेगा। कुल मिलाकर जहां एक तरफ कुरुड़ पक्ष बड़ी लोकजात के कार्यक्रम पर अपना पारंपरिक अधिकार बताता है तो वहीं, नौटी पक्ष मुख्य राजजात की धार्मिक-अनुष्ठानिक केंद्रीयता पर जोर देता है।
ये तो वो जड़े हैं जो सदियों से इस पूरी जात के परिपेक्ष्य में पनपी रहीं लेकिन बीते कुछ जात दोनों पक्षों ने शांतिपूर्ण तरीके से निभाई हैं। हालांकि इस बार 2026 में नौटी वालों के राज जात का समय बदलने की वजह से ये विवाद फिर खुलकर सामने आ गया।
अब ऊपर जो भी तर्क हमने देखे और सुने, उस आधार पर नंदा देवी किसकी है? अगर ये सवाल कुरुड़ Vs नौटी के परिपेक्ष्य में पूछा जाए तो तथ्यात्मक जवाब कुरुड़ होना संभव है लेकिन हमें जो याद रखने की जरूरत है, वो ये कि नंदा सिर्फ कुरुड़ और नौटी की नहीं बल्कि पूरे उत्तराखंड की है। इसीलिए इस विवाद का समाधान खोजने पर ध्यान देना चाहिए न कि इस पर राजनीति करने पर। और समाधान क्या हो सकता है। समाधान ये हो सकता है कि नौटी पक्ष और बधाण पक्ष, दोनों ही मिलकर राजजात को सद्भाव और प्रेम से आयोजित करें।
नौटी की मां भी नंदा है और कुरुड़ की देवी भी इसी का रूप है। ऐसे में कुरुड़ को नौटी से निकलने वाली राजजात के मार्ग में प्रमुख पड़ाव रखने में संकोच नहीं होना चाहिए। नंदा देवी राजजात को लेकर पहले भी कई परंपराएं बदली गई हैं। बलि प्रथा हो चाहे महिलाओं का एक क्षेत्र के बाद आगे जाने की बात। जिन परंपराओं से आपसी सद्भाव खराब होता हो और जिन परंपराओं को बदलने से भाईचारा बढ़ता हो, उनमें मां नंदा की सहमति लेकर बदलाव करने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए। और अगर नंदा देवी जात के दोनों पक्ष इस बात को समझ जाएं तो ये झगड़ा यहीं खत्म हो जाएगा। और अगर ऐसा नहीं किया गया तो वो दिन दूर नहीं, जिस दिन 1987 में एक पुजारी की कही गई ये बात सच हो जाएगी। जागिए। मां नंदा हम सबकी अधिष्ठात्री है। मां नंदा से पहाड़ का गौरव है, इसे राजनीति की भेंट मत चढ़ाइए। साथ करिए। साथ बढ़िए और साथ मिलकर बोलिए- जय मां नंदा की।
