कौन हैं नेहा बोरा जिसने उड़ाई सत्ता की नींद

नेहा बोरा पेपर लीक के खिलाफ अनशन पर

नेहा बोरा पेपर लीक के खिलाफ अनशन पर

एक 29 साल की लड़की जो विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख चेहरा बन चुकी हैं। उसका बेबाक बोलने का तरीका और सत्ता के सामने निडर होकर खड़े होने की हिम्मत ने पूरे देश को उसका दीवाना बना दिया है। कोई उसे नेशनल क्रश बुला रहा है तो कई उसे उत्तराखंड की शेरनी कहकर संबोधित कर रहे हैं। नाम है नेहा बोरा और पहचान है- उस स्टूडेंट एक्टिविस्ट की जो सत्ता से सीधे सवाल कर रही है। अब ये तो सब जानते हैं कि नेहा बोरा लेफ्ट स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। लोग ये भी जानते हैं कि वो उत्तराखंड के खटीमा से आती हैं लेकिन उनके परिवार और परिवार से उनके संबंधों को लेकर जो जानकारी दी जा रही है, वो काफी सीमित और काफी हद तक भ्रामक भी हैं।

भले ही नेहा ने कई इंटरव्यूज में बताया है कि किस तरह उनका अपने परिवार से राजनीतिक सोच को लेकर एक टकराव है लेकिन बहुत ही कम लोग जानते हैं कि आज जो नेहा आपको सड़कों पर दहाड़ मारती दिख रही है, उसको गढ़ने का काम भी इन्हीं माता-पिता ने किया है। साथ ही कई लोग पूछते हैं कि नेहा कैसे कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन से जुड़ीं, इस रिपोर्ट में उसका भी जवाब है। उत्तराखंड से खास लगाव रखने वाली नेहा वीर चंद्रसिंह गढ़वाली से भी प्रेरणा लेती हैं। इस रिपोर्ट में हम आपको नेहा बोरा का वो सच बताने जा रहे हैं जो बहुत ही कम लोगों को पता है।

कौन हैं नेहा बोरा?
नेहा बोरा का वर्तमान परिचय देखें तो वह भाकपा माले लिबरेशन से जुड़े छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। वह थियेटर और परफॉर्मेंस स्टडीज में जेएनयू से पीएचडी कर रही हैं। लेफ्ट विचारधारा के छात्र संगठन से जुड़ी नेहा तब लाइमलाइट में आई थीं, जब पेपर लीक को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुए थे। उस दौरान सोनम वांगचुक के साथ अनशन पर नेहा बोरा समेत दूसरे लोग भी बैठे थे। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगने के लिए हुए इस आंदोलन के बाद नेहा राष्ट्रीय खबरों में छाई रहीं। जंतर-मंतर आंदोलन के बाद छात्र संगठन आइसा ने देशभर में जेन ज़ी राइजिंग कार्यक्रमों का आयोजन शुरू किया। इन आयोजनों के जरिए नेहा बोरा न सिर्फ खबरों में बनी रहीं बल्कि उन्होंने देश के अलग-अलग कोनों में जाकर अपनी बात रखी।

इसी दौरान वह तब भी खबरों में आईँ, जब उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ टिप्पणी की थी। पेपर लीक आंदोलन के बाद से लगातार नेहा खबरों में बनी हुई हैं। उनका बेबाक बोलने का अंदाज लोगों को खूब भा रहा है। और अब चुनावी प्रक्रिया को लेकर खड़े हुए आंदोलन का भी नेहा प्रमुख चेहरा बनकर उभर रही हैं। कई लोग उनके राजनीतिक भविष्य के कयास लगाना शुरू कर चुके हैं। लेकिन क्या नेहा खुद अपना एक राजनीतिक भविष्य देख रही हैं या नहीं? इस पर भी बात करेंगे लेकिन पहले जरा नेहा के मूल और उनके परिवार को जान लेते हैं।

कहां से आती हैं नेहा
नेहा मूल रूप से कुमाऊं की बोरा राजपूत हैं। खटीमा उनका मूल निवास है। नेहा की शुरुआती स्कूली पढ़ाई यहीं से हुई है। नेहा ने कई इंटरव्यूज में बताया कि वह आज भी खटीमा में बीते अपने बचपन के दिनों को याद करती हैं। वो कहती हैं कि उन्हें पहाड़ आज भी याद आते हैं। पहाड़ी महिलाओं की बात करते हुए नेहा कहती है कि एक आम सोच है कि पहाड़ की महिलाएं शांत और शर्मीली होती हैं लेकिन ऐसा नहीं है। नेहा कहती हैं कि हम काफी मजबूत होती हैं और यही मजबूती मुझे आज भी बड़ी-बड़ी मुसीबतों के सामने खड़े रहने की हिम्मत देती है। बचपन को अगर छोड़ दें तो उसके बाद लगभग सारा समय नेहा का खटीमा के बाहर ही गुजरा है।

कहां से की पढ़ाई?
दरअसल नेहा के पिता सेना में अफसर हैं और इसकी वजह से परिवार लगभग हर दो वर्ष में शहर-दर-शहर बदलता रहता था। इसी क्रम में नेहा ने अपनी दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा की पढ़ाई पश्चिम बंगाल के शिलिगुड़ी में रहकर पूरी की। पश्चिम बंगाल ही वो जगह थी जहां नेहा की पहचान लेफ्ट विचारधारा से होने लगी थी। हालांकि उससे पहले स्कूल में वह जेईई एग्जाम देने की तैयारी कर रही थीं। नेहा बताती हैं कि उन्हें फिजिक्स और गणित विषय काफी पसंद था। लेकिन 11वीं तक पहुंचते-पहुंचते उनकी रुचि जेईई एग्जाम को लेकर कम होती गई और आखिरकार उन्होंने तय किया कि वह इस एग्जाम को नहीं देंगी। इसके बाद उन्होंने इंग्लिश लिटरेचर की पढ़ाई शुरू कर दी। बंगाल ही वो जगह थी जिसने नेहा की राजनीतिक सोच को आकार देना शुरू किया। यहां रहने के दौरान उन्होंने चारु मजूमदार, पाब्लो नेरुदा और अरुंधति रॉय की रचनाओं को पढ़ना शुरू किया। नेहा कहती हैं कि इसी धरती ने मुझे पहली बार दक्षिणपंथ से दूरी बनाना सिखाया।

थियेटर से जुड़ाव
बंगाल के बाद नेहा दिल्ली आ गईं और यहां पर कॉलेज में पढ़ाई शुरू की। जब नेहा ने कॉलेज में पढ़ना शुरू किया तो उनकी रुचि थियेटर में जगी। पहले उन्होंने कॉलेज के एक आम थियेटर ग्रुप को ज्वॉइन किया और बाद में यही से वो लेफ्ट से जुडे़ थियेटर ग्रुप संगवारी से जुड़ गईं। इस ग्रुप से जुड़ने के बाद वह दूसरे छात्रों के साथ मिलकर जगह-जगह नुक्कड़ नाटक किया करते थे। इस तरह उनके एक्टिविज्म की शुरुआत हो गई थी। नेहा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के अरबिंदो कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। इसके बाद उन्होंने बीआर अंबेडकर यूनिवर्सिटी से एमए की पढ़ाई पूरी की। वर्तमान में वह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में शोधार्थी हैं। नेहा कॉलेज की शुरुआत में ही आइसा से जुड़ गई थीं। बाद में उनकी लीडरशिप क्वॉलिटी को देखते हुए उन्हें इस छात्र संगठन का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया।

जिस पद पर वह आज भी काबिज हैं। अब ज्यादातर लोग नेहा को पेपर लीक प्रदर्शन के बाद से जानते हैं लेकिन इससे पहले वह सीएए के विरोध में हुए आंदोलन में भी उतर चुकी हैं। नेहा इस आंदोलन को अपने जीवन का टर्निंग प्वाइंट बताती हैं। वह कहती हैं कि सीएए के विरोध में हुए आंदोलन ने उन्हें सक्रियता से राजनीति में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। लेकिन वो पेपर लीक वाले आंदोलन से कैसे जुड़ीं?, उसका जवाब लेने से पहले जरा नेहा के परिवार के उन हालातों की बात कर लेते हैं जिनसे नेहा एक विद्रोही किस्म की युवा बनी।

पारिवारिक स्थिति ने सिखाया
नेहा बोरा के अंदर जो आग भरी हुई नजर आती है, उसका कनेक्शन उनके परिवार और पारिवारिक स्थिति से काफी ज्यादा है। बचपन में नेहा के परिवार ने काफी दिक्कतों का सामना किया है। पिता सेना की नौकरी में थे और यहां मां ही बच्चों को संभाला करती थीं। नेहा बताती हैं कि परिवार में कई तरह की दिक्कतें चल रही थीं। उन दिक्कतों के बीच हमारी मां ने मुझे और मेरे भाई को पढ़ाया। नेहा बताती हैं कि मैंने अपनी मां से सीखा कि कैसे आप चुप रहकर भी अपना विरोध जता सकते हैं। नेहा अपने जिस भाई की बात कर रही हैं, वह उनसे छोटा है और वह डाउन सिंड्रोम से पीड़ित हैं। नेहा के मुताबिक उनके भाई को नई चीजें सीखने और समझने में समय लगता है। 


नेहा जिस माहौल में पली-बढ़ी, वहां इस तरह का बालक होना आसान नहीं था। समाज की तरफ से कई तरह के ताने और बातें परिवार को सुननी पड़ती थी। नेहा कहती हैं कि मैंने अपने भाई से ये सीखा कि ये दुनिया काफी निठुर है। इसे हम या तो विरोध और हंसी के साथ फेस करें या फिर इसे झेलते रहें। नेहा के भाई मजबूती से इस दुनिया में अपनी जगह बना रहे हैं और नेहा कहती हैं कि उन्होंने अपने भाई से यह गुणा सीखा। और वह कहती हैं कि मैं आज जो कुछ भी हूं, उसमें मेरे छोटे भाई का बड़ा रोल है। 


परिवार से मनमुटाव 
नेहा जब अपने पिता को लेकर बात करती हैं तो वह उनसे थोड़ा उखड़ी सी नजर आती हैं लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि नेहा को गढ़ने में उनके पिता ने कोई योगदान नहीं दिया है। नेहा बताती हैं कि जब वह छोटी थीं तो उनके पिता अक्सर घऱ आकर सेना में वर्गीकरण के खिलाफ अपना गुस्सा प्रकट किया करते थे। और जब वह बच्चों के सामने अपनी बात रख रहे थे तो नेहा ने उसकी गांठ बांध ली और यह समझ लिया कि जब कोई बड़ा कुछ गलत बोल रहा है तो उसके खिलाफ खड़े होने में कुछ भी गलत नहीं है। नेहा कहती हैं कि भले ही मेरे पिता मुझे सिखा नहीं रहे थे लेकिन मैं उनसे सीख रही थी कि आपको पावर के सामने खड़ा होना चाहिए। आपको सवाल पूछना चाहिए। नेहा कहती हैं कि मैंने जो सीखा है, वह सब अपने परिवार से सीखा है। सबसे ज्यादा श्रेय वह अपने छोटे भाई को देती हैं।

विचारधार का फर्क
अब ये सच है कि नेहा के माता-पिता राजनीति की राइटविंग विचारधारा से वास्ता रखते हैं या रखते थे। माता-पिता और नेहा के बीच यह द्वंद्व इतना अधिक था कि परिवार और नेहा के बीच काफी गंभीर झगड़े भी हुए हैं। यह भी सच है कि नेहा ने काफी समय तक अपने पिता से बात नहीं की। हालांकि नेहा की इस बात को कई लोग इस तरह पेश कर रहे हैं जैसे कि इनके बीच कोई बातचीत हो ही न। कुछ पोस्ट में तो यह भी कहा जा रहा है कि फौजी पिता अपनी बेटी को सख्त नापसंद करते हैं। और उन्हें नेहा की देशभक्ति पर संदेह है। हालांकि ऐसा कुछ भी नहीं है। फेसबुक पर नेहा के परिवार के एक मित्र ने इस भ्रम को दूर किया। उन्होंने लिखा कि कुछ वर्षों तक उनके पिता नेहा को लेकर चिंतित रहते थे। हर मां-बाप की तरह वह भी नेहा के अनिश्चित करियर को लेकर आशंकित थे। यही चिंता वह अपनी बेटी के सामने भी रखते थे। कई बार यही झगड़े की जड़ बन जाती थी। वह लिखते हैं कि नेहा के पिता को बेटी की स्पष्ट समझ, उसके दृढ़ निश्चय और संगठन क्षमता पर गर्व है।

साथ खड़ा है परिवार
आज नेहा के साथ उनका पूरा परिवार खड़ा है। परिवार वर्तमान में बरेली में रहता है। नेहा एक इंटरव्यू में बताती हैं कि उनकी दादी को उन पर गर्व है। वह कहती हैं कि अगली बार मैं तेरी ही पार्टी को वोट दूंगी। इस पर नेहा जवाब देती हैं कि जहां हम रहते हैं, वहां पर हमारी पार्टी का बेस नहीं है। इस पर दादी फिर जवाब देती है कि जब तेरी पार्टी आएगी, तब वोट दूंगी। नेहा की मां भी अब उन्हें लगातार कॉल करके उनका हालचाल पूछती रहती हैं। भले ही पिता के साथ बहुत अधिक बातचीत न हो लेकिन दोनों के रिश्तों में कोई खटास भी नहीं है।

अब जब नेहा नेशनल सेंसेशन बन चुकी हैं। जब वह लगभग हर आंदोलन का हिस्सा बन रही हैं, तब परिवार को उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता होने लगी है। नेहा कहती हैं कि मैं अपने परिवार से मिलने जाना चाहती हूं और उन्हें सबकुछ बताना चाहती हूं कि मैं क्या कर रही हूं। वह कहती हैं कि मैं उन्हें मेंटली प्रीपेयर भी करना चाहती हूं कि  कुछ भी हो सकता है, वो उसके लिए रेडी रहें।

नेहा राजनीति में ही करियर बनाने का मन बना चुकी हैं। वो कई अवसरों में बात करते हुए कह चुकी हैं कि मुझे राजनीति में मजा आता है और मैं इसी फील्ड में आगे बढ़ूंगी। भविष्य का तो पता नहीं लेकिन वर्तमान में नेहा बोरा चुनाव आयोग के खिलाफ खड़े आंदोलन में लीड लेती दिख रही हैं। नेहा कहती हैं कि मैं चंद्रसिंह गढ़वाली की धरती से आती हूं और हमने सत्ता से लोहा लेना ही सीखा है। अब उनकी जिस तरह की तस्वीरें और भाषण सामने आ रहे हैं, वो एक फ्यूचर लीडर के रूप में उनकी छवि को तैयार तो जरूर कर रहे हैं। हालांकि ये फ्यूचर लीडर फ्यूचर में कितना सशक्त लीडर बन पाती हैं या नहीं, वो तो वक्त ही बताएगा लेकिन फिलहाल उत्तराखंड की इस शेरनी को सलाम जो पूरी सत्ता के खिलाफ आवाज बुलंद किए हुए हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *