आजादी हिंद फौज के ‘गढ़वाली’

आज़ाद हिंद फौज में गढ़वाली

आज़ाद हिंद फौज में गढ़वाली

सुभाष चंद्र बोस की नेशनल इंडियन आर्मी यानी आजाद हिंद फौज के उत्तराखंडी आखिर तक सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बने रहे। पहाड़ी बोस के दिल के सबसे करीब थे और यही वजह रही कि आजाद हिंद फौज के सबसे प्रमुख पदों पर ज्यादातर उत्तराखंडी ही काबिज रहे। वो उत्तराखंडी ही थे जो ना सिर्फ बोस के सबसे फेवरेट थे बल्कि आजाद हिंद फौज को मजबूती देने में भी इन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


1942 में सिंगापुर में जब अंग्रेजों की जापानियों के हाथ शिकस्त हुई तो अंग्रेजों के सभी सैनिकों को युद्ध बंदी बना लिया गया। इन युद्ध बंदियों में गढ़वाल राइफल्स के भी हजारों सैनिक शामिल थे। भले ही पहाड़ी सैनिक अंग्रेजों की तरफ से लड़ रहे थे लेकिन दिल से वो भी भारत को आजाद देखना चाहते थे। उनकी इसी भावना ने उनके लिए ना सिर्फ जापान की कैद से निकलने का रास्ता तैयार किया बल्कि वे आजाद हिंदी फौज की शुरुआती टीम का हिस्सा भी बन गए।

1942 में जापानियों के हाथ अंग्रेजों की हार के बाद युद्ध बंदी बनाए गए सैनिकों की हालत बुरी हो चुकी थी। बंदी बनाए गए सैनिकों में 40 हजार भारतीय सैनिक शामिल थे। उनमें भी 2500 गढ़वाल राइफल्स के जवान थे। यहां ये जानना जरूरी है कि भारत दूसरे विश्वयुद्ध का हिस्सा नहीं था लेकिन अंग्रेजों ने कई भारतीय जवानों को युद्ध में लड़ने के लिए शामिल किया था।

अब क्योंकि जापान की दुश्मनी भारत से नहीं बल्कि अंग्रेजों से थी तो इसका फायदा भारतीय सैनिकों ने उठाया। इन्होंने जापानी अधिकारियों से दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी। 2/18 गढ़वाल राइफल्स के लेफ्टिनेंट बुद्धि सिंह रावत और रास बिहारी बोस ने जापानियों के साथ दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी। इस प्रयास का फायदा भी हुआ और जापानियों ने सभी भारतीय सैन्य अफसरों को अपना मित्र बना  साथ कर लिया। अब इन्हें सशर्त यहां-वहां घूमने की आजादी मिल गई थी।

इसी बीच 23 जून, 1942 को बैंकॉक में एक सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन में मोहन सिंह के नेतृत्व में 40 हजार भारतीय सैनिक शामिल हुए। यही 40 हजार सैनिक आजाद हिन्द फौज की नींव के पहले पत्थर यानी पहली सेना की टुकड़ी बने। आजाद हिन्द फौज में गढ़वाल राइफल्स की दूसरी और पांचवीं बटालियन के ढाई हजार सैनिकों और अफसरों को भी शामिल किया गया। इनका नेतृत्व कर्नल बुद्वि सिंह और कर्नल पितृशरण रतूड़ी ने किया। 

नेताजी सुभाष चंद्र बोस को गढ़वाली सैनिकों की गुरिल्ला युद्व शैली का आभास पहले से ही था। उन्होंने सिंगापुर में कर्नल बुद्वि सिंह को गढ़वाल राइफल्स की दूसरी और पांचवी बटालियन का सैन्य सचिव नियुक्त किया। बोस ने मेजर देवसिंह दानू, कप्तान गजेन्द्र पुण्डीर को गुप्तचर दस्ते का प्रमुख, मेजर मान सिंह भण्डारी और कप्तान गुमान सिंह को कार चालक बनाया। बोस ने कर्नल बुद्धि सिंह रावत को युद्ध नीतियों का प्रमुख सलाहकार भी बनाया। कर्नल बुद्धि सिंह रावत ही वह शख्स थे जिन्होंने आजाद हिन्द फौज के सैनिकों को ट्रेनिंग दी। जनवरी 1944 में नेताजी जब अपना मुख्यालय सिंगापुर से रंगून ले गए, तब कर्नल बुद्धि सिंह भी उनके साए की तरह, उनकी नीतियों को अजांम देने लगे। इस तरह भारत-बर्मा सीमा पर प्रमुख भारतीय सैन्य अधिकारियों की नियुक्ति से ब्रिटिश सेना की स्थिति कमजोर होने लगी थी। 

कर्नल पितृशरण रतूड़ी और बुद्धि सिंह के साझे प्रयास और रणनीतियों ने अंग्रेज और अंग्रेजी अलांयस की सेनाओं को खदेड़ कर आजाद हिन्द फौज का परचम लहराया।  इस तरह 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर के कैथल हॉल में आजाद हिन्दुस्तान की अस्थाई सरकार की घोषणा की गई। साथ ही 23 अक्टूबर 1943 को आजाद हिन्द ने ब्रिटेन और यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी।

 सुभाष चंद्र बोस गढ़वालियों से हुए प्रभावित
1942 में सुभाष चंद्र बोस का अगर गढ़वालियों की तरफ खास लगाव दिखा तो उसकी वजह भी थी। 1930 के पेशावर कांड में गढ़वाल राइफल्स के सैनिकों ने चंद्रसिंह गढ़वाली के नेतृत्व में अंग्रेजों का हुक्म मानने से इनकार कर दिया था। चंद्र सिंह गढ़वाली की अगुवाई वाली गढ़वाल राइफल्स की टुकड़ी ने पठानों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया था। इसका नतीजा यह हुआ कि उनका कोर्ट मार्शल कर दिया गया।

जब सुभाष चंद्र बोस को इस घटना की खबर लगी तो वह गढ़वाली सैनिकों की बहादुरी से काफी ज्यादा प्रभावित हुए। गढ़वालियों से बोस किस कदर प्रभावित थे, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आगे जाकर उनकी सुरक्षा में तैनात गार्ड से लेकर ड्राइवर तक उत्तराखंडी सैनिक थे। यही वो भरोसा था जिसने आजाद हिन्द फौज के लिए गढ़वाल राइफल्स के जवानों को बोस की पहली पसंद बना दिया। वह ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपनी सेना में शामिल करना चाहते थे। बोस के इसी लगाव से वो सिरा जुड़ता है जो जापान में कैद सैनिकों तक हमको लेकर जाता है।

आजाद हिंद सेना का खास मिशन
1944 में आजाद हिन्द फौज ने बरमा के रास्ते भारत की ओर कूच करने की योजना बनाई। आजाद हिंद फौज के पास कम सैनिक भले ही थे लेकिन बोस को अपनी सेना पर पूरा भरोसा था कि वो अपने मिशन में सफल होगी। अपने पहले मिशन में आजाद हिन्द फौज विजयी साबित हुई। इसके बाद फौज ने 18 मार्च, 1944 को जापानी सैनिकों के साथ भारत में प्रवेश किया। इन्होंने इम्फाल के साथ ही कोहिमा से अंग्रेजों को खदेड़ दिया। 14 मार्च 1945 को सेकेंड लेफ्टिनेंट ज्ञान सिंह बिष्ट, जो नेहरू ब्रिगेड की B कंपनी को लीड कर रहे थे, उन्हें मलाया (अभी म्यांमार के मलाया) में ब्रिटिश सैनिकों से भिड़ने की जिम्मेदारी सौंपी गई। ज्ञान सिंह बिष्ट अपने मात्र 98 सैनिकों के साथ टौंगजिन इलाके में पहुंचे ही थे कि वहां 17 मार्च, 1945 को उनका मुकाबला ब्रिटिश सेना से हुआ। 

टैंकों और सैकड़ों सैनिकों के साथ खड़ी ब्रिटिश सेना को हथियारों के बल पछाड़ना नामुमकिन था। ऐसे में ज्ञान सिंह बिष्ट ने तय किया कि ब्रिटिश सेना को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाया जाए। बताया जाता है कि उन्होंने अपने और अपने कुछ साथियों के शरीर पर एंटी टैंक माइन बांधी और दुश्मनों पर जबरदस्त हमला कर दिया। ये हमला इतना भीषण था कि ब्रिटिश सेना मोर्चा छोड़कर भागने पर मजबूर हो गई। लेकिन ज्ञान सिंह बिष्ट के साथ ही 40 अन्य सिपाही शहीद हो गए। 

ऐसा ही किस्सा एक और वीर का आता है कैप्टन महेंद्र सिंह बागड़ी का। जिनका सामना 22 अप्रैल 1945 को अंग्रेजों से बर्मा में हुआ। बताया जाता है कि यहां हालत इस कदर थे कि कैप्टन महेंद्र सिंह और उनके सैनिकों के पैर बारिश के चलते कीचड़ में फंस रहे थे। उनके पास बिल्कुल भी गोला-बारूद नहीं बचा था। ऐसे में उन्होंने और उनके साथियों ने पेट्रोल से भरी बोतलों को अपने शरीर पर बांधकर दुश्मनों के टैंकों पर हमला बोल दिया और उनके 15 से ज्यादा टैंक और तोपों को बरबाद कर दिया। आजाद हिन्द फौज ने इस धाकड़ एंट्री से अंग्रेजों को भारत के अंदर बैकफुट में लाने पर मजबूर कर दिया। फौज ने अंडमान को पूरी तरह से आजाद कर वहां भारत का झंडा तक गाड़ दिया था। लेकिन ये सबकुछ बदलने वाला था। 

जापान पर परमाणु हमला
जापान जिस तरह से अमेरिका के ऊपर टूट रहा था उसका जवाब अमेरीकियों ने 06 और 09 अगस्त 1945 को हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम बरसा कर दिया। इस हमले ने जापान को अंदर तक तोड़ दिया था। 15 अगस्त 1945 को जापान ने सरेंडर कर दिया। जापान आजाद हिंद फौज का मजबूत भागीदार था। जापान के सरेंडर करने की वजह से फौज को भी बहुत बड़ा झटका लगा। जो जरूरी चीज़ें जापान आजाद हिन्द फौज को दे रहा था वो सब आना एकदम से अब बंद हो चुका था। अब लंबे समय तक बिना संसाधनों के लड़ना आजाद हिन्द फौज के लिए मुमकिन नहीं था। 

जापान के सरेंडर की खबर के बाद फौज को एक और तगड़ा झटका लगने वाला था। 23 अगस्त को फौज को खबर मिली कि 18 अगस्त, 1945 को विमान क्रैश में नेता जी सुभाष चंद्र बोस का निधन हो गया है। अपने लीडर की मौत की खबर सुनकर फौज टूट चुकी थी। फौज ने वापस रंगून लौटने का फैसला किया। रंगून लौटने पर ब्रिटिश सेना ने उनका रास्ता रोक लिया और उन्हें आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दिया। ब्रिटेन ने आजाद हिन्द फौज के सैनिकों को बंदी बना लिया। बताया जाता है कि इस युद्ध में 800 उत्तराखंडी जवान शहीद हुए थे। भले ही अंग्रेजों ने गढ़वाल राइफल्स के सैनिकों को बंदी बना लिया था लेकिन उसके हाथ बंधे हुए थे। वजह था-भारत में आजाद हिंद फौज की प्रसिद्धी।

अंग्रेजी हुकूमत बंदी सैनिकों को सबक सिखाना चाहती थी लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाई। दरअसल आजाद हिन्द फौज आम भारतीयों के बीच अलग पहचान बना चुकी थी। लोगों के दिलों में उनके लिए प्यार और इज्जत थी। दूसरी तरफ, भारत छोड़ो आंदोलन से भी अंग्रेजों पर दबाव बढ़ रहा था। ऐसे में अंग्रेजों ने अपने हक में माहौल करने की सोची। अंग्रेज अफसरों ने आजाद हिंद फौज से समझौता करना चाहा लेकिन गढ़वाली अफसरों ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। 

इससे तिलमिलाए ब्रिटेन ने 15 नवंबर 1945 को लाल किले में सभी आजाद हिन्द फौज के सैनिकों पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया। वॉइसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने पंद्रह हजार अफसरों और जवानों की रिहाई, बर्खास्तगी, वेतन-भत्तों की जब्ती और फिर सेना में भर्ती नहीं किए जाने की शर्त इन पर थोपी। अंग्रेजों का ये फैसला उनके हक में नहीं गया। महज एक महीने बाद बॉम्बे और कराची में रॉयल इंडियन नेवी और एयर फोर्स के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया।

 अंग्रेजों पर हर तरफ से दबाव बन रहा था, जिसके चलते कर्नल बुद्धि सिंह रावत समेत कई गढ़वाली सैन्य अफसरों को जेल से रिहा कर दिया गया। कर्नल पित्रशरण रतूड़ी और कर्नल चांद सिंह नेगी के साथ कर्नल बुद्धि सिंह का लैंसडाउन छावनी में भव्य स्वागत किया गया। 15 अगस्त 1947 को आजाद हिंद फौज के सैनिकों और अफसरों को उचित सम्मान देते हुए भारतीय अर्द्धसैनिक बलों में नियुक्ति दी गई। हालांकि कई जगहों पर ये भी मिलता है कि 1949 तक इन पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया। इसीलिए आजाद हिंद फ़ौज के जवानों ने एक रैली करके अपनी मांगें सरकार के सामने रखीं। इन्होंने सरकार को याद दिलाया कि भारत को आजाद करने में उनका भी अहम योगदान था। और अब आजादी के बाद उन्हें सेना में वापसी का अधिकार मिलना चाहिए। 

इसके बाद अप्रैल, 1951 में पंडित नेहरू को एक ज्ञापन भी सौंपा गया। इसमें बताया गया कि किस तरह 1942 में 15 हजार भारतीय सैनिकों के वेतन-भत्ते का भुगतान अंग्रेजों ने रोक दिया था। ये राशि कुल 5 करोड़ थी जिसमें से सरकार ने सिर्फ 68 लाख की मंजूरी दी थी। बाद में हालांकि सरकार ने इन रणबांकुरों की सुनी और इन्हें सम्मान से भी नवाजा। साल 1975 में सरकार ने कई वीरों को तामपत्र से सम्मानित किया। इस तरह आजाद हिंद फौज की नींव बने गढ़वालियों ने ना सिर्फ नेता जी के दिल में जगह बनाई बल्कि दुनिया के सामने अपनी बहादुरी का लोहा भी मनवाया। 

ऐसा नहीं है कि आजाद हिंद फौज में सिर्फ गढ़वाल राइफल्स के सैनिक थे। इसमें देशभर के कई जवानों ने अपना योगदान दिया था। हालांकि गढ़वाली सैनिक नेताजी सुभाष चंद्र बोस के हमेशा दिल के करीब रहे। उत्तराखंडी आजाद हिंद फौज की शुरुआत से लेकर देश की आजादी के क्षणों तक नेताजी के सिद्धांतों पर चलते रहे और जीवनभर इन सैनिकों ने बोस को अपना लीडर माना रखा।

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