क्या है 5th शेड्यूल जिसकी माँग बॉबी पवाँर उठा रहे हैं?
उत्तराखंड में मूल निवास और भू-कानून के बाद एक बार फिर पांचवीं अनुसूची की मांग उठने लगी है। इस मांग को सबसे पहले उठाने का श्रेय उत्तराखंड एकता मंच को जाता है। उत्तराखंड एकता मंच काफी समय से पूरे उत्तराखंड में 5वीं अनुसूची की मांग को लेकर आवाज उठा रहा है। जनमत को इसके पक्ष में मजबूत कर रहा है। अब यह मुद्दा उत्तराखंड की राजनीतिक जमीन पर भी आ चुका है। उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा ने भी अब इस मुद्दे को लपक लिया है। शनिवार को मोर्चा के पदाधिकारियों ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और इसमें उत्तराखंड में 5वीं अनुसूची को लागू करने की मांग उठाई। बॉबी पंवार ने बाकायदा ऐतिहासिक दस्तावेज दिखाकर यह साबित करने की कोशिश की कि उत्तराखंड पहले 5वीं अनुसूची में शामिल था। अब 5वीं अनुसूची क्या है? क्या सच में यह पहाड़ में कभी लागू था? इन सभी सवालों का जवाब तो लेंगे लेकिन पहले जरा स्वाभिमान मोर्चा का तर्क भी जान लेते हैं।
क्या कह रहा स्वाभिमान मोर्चा?
उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा की तरफ से एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई है। इसमें बताया गया है कि ब्रिटिश काल से देश के अनेक क्षेत्रों को विशेष संरक्षण एवं संवर्धन हासिल था। यह संरक्षण विशिष्ट ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर मिला हुआ था। स्वाभिमान मोर्चे का कहना है कि अंग्रेजों ने तत्कालीन उत्तर प्रदेश के गढ़वाल-कुमाऊं क्षेत्र को भी इस सूची में शामिल किया था। मोर्चा का तर्क है कि यह जो व्यवस्था अंग्रेजों के राज में थी, आज यही व्यवस्था भारतीय संविधान के 5वीं एवं छठवीं अनुसूची में है। मोर्चे की तरफ से सांस्कृतिक एवं भौगौलिक, कई वजहें गिनाई गई हैं जिनके आधार पर उत्तराखंड को 5वीं अनुसूची में शामिल किया जाना चाहिए।

अब उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा हो या उत्तराखंड एकता मंच, ये सब आवाज तो उठा रहे हैं। लेकिन 5वीं अनुसूची को लागू करना इतना आसान भी नहीं है। खुद सोनम वांगचुक लद्दाख में 6वीं अनुसूची लागू करने के लिए आंदोलनरत रहे हैं। उन्होंने इस मांग के समर्थन में एक बड़ा जनसमूह भी खड़ा कर दिया था। उसके बावजूद वहां पर अभी तक इस मांग को लागू करने की कोई बात नहीं कही गई है। तो क्या उत्तराखंड में ये संभव हो पाएगा? इन सवालों का जवाब लेते हैं, उत्तराखंड में उठने वाली इस पूरी मांग को समझने से।
क्या है 5th शेड्यूल?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244 के तहत दो शेड्यूल यानी अनुसूचियां शामिल हैं। एक वो जिसकी मांग सोनम वांगचुक कर रहे हैं यानी कि 6वीं अनुसूची और दूसरी, 5वीं अनुसूची। दोनों ही अनुसूचियों का संबंध देश के विशेष क्षेत्रों और जनजातीय यानी शेड्यूल ट्राइबल वाले इलाकों की शासन-व्यवस्था से है।दोनों का उद्देश्य जनजातीय क्षेत्रों को देश के दूसरे राज्यों की तरह विकसित होने के लिए समान मौके देना और इन क्षेत्रों की संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज को संरक्षण देना है। लेकिन इसके बावजूद दोनों में एक बुनियादी फर्क है। बात करें 6th शेड्यूल की तो असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन आता है।
छठी अनुसूची के तहत जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त जिले यानी ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्सट्स बनाने का प्रावधान है। हर ऑटोनॉमस जिले में एक ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल बनाई जाती है। इस काउंसिल को भूमि, जंगल, जल, कृषि, ग्राम परिषद, स्वास्थ्य, स्वच्छता, ग्राम और नगर स्तर की पुलिसिंग, विरासत, विवाह और तलाक, सामाजिक रीति-रिवाज और खनन आदि से जुड़े कानून, नियम बनाने का अधिकार है। अब ऐसा तो है नहीं कि सिर्फ पूर्वोत्तर राज्यों में आदिवासी यानी शेड्यूल ट्राइब हैं तो देश के दूसरे राज्यों के जिन लोगों को भी शेड्यूल ट्राइब का दर्जा मिला हुआ है, उन्हें 5th शेड्यूल में शामिल किया गया है। यानी कि 5th शेड्यूल में अलग-अलग राज्यों के वो क्षेत्र आते हैं जहां शेड्यूल ट्राइबल्स की जनसंख्या 50% या उससे ज्यादा जनसंख्या है। मौजूदा वक्त में आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात समेत ये सारे राज्य हैं जिनके कुछ क्षेत्र इस अनुसूची में शामिल हैं। 6th शेड्यूल की तरह ही ये अनुसूची इन क्षेत्रों के प्रशासन, विकास, जनजातीय संस्कृति की सुरक्षा सुनिश्चित करती है। जहां 6th शेड्यूल में ऑटोनॉमस काउंसिल को कई विषयों पर कानून और नियम बनाने का अधिकार है। वहीं, 5th शेड्यूल में संसद से पास किए गए नियमों और कानूनों को इस क्षेत्र में लागू करना या उनमें बदलाव करने का अधिकार राज्यपाल के पास है।
उत्तराखंड को 5th शेड्यूल ही क्यों चाहिए?
सोनम वांगचुक 6th शेड्यूल की मांग कर रहे हैं क्योंकि उनका कहना है कि वहां के लोगों को अपने क्षेत्र को लेकर फैसले लेने का अधिकार मिलना चाहिए। लेकिन फिर उत्तराखंड क्यों लद्दाख की तरह ही 6th शेड्यूल नहीं मांग रहा? इसका एक बड़ा कारण ये है कि 6th शेड्यूल में बहुत ही सीमित राज्य रखे गए हैं जिनका भूगौल और परिस्थितियां काफी ज्यादा भिन्न हैं। दूसरी बड़ी वजह ये है कि उत्तराखंड में पहले ही 5th शेड्यूल लागू था। और इस तरह 5th शेड्यूल की डिमांड करने के लिए पहले ही आंदोलनकारियों के पास एक जमीन तैयार है।

उत्तराखंड में 5th शेड्यूल की मांग क्यों?
मौजूदा वक्त में उत्तराखंड कुछ ऐसी चुनौतियों से जूझ रहा है जिनका समाधान अलग राज्य बनने के बाद से अब तक नहीं निकल पाया है। लगातार बढ़ता पलायन यहां की सबसे बड़ी चुनौती है। पहाड़ी क्षेत्र में 1700 से ज्यादा गांव ऐसे हैं जो भूतिया हो चुके हैं। पहाड़ों में लचर शिक्षा व्यवस्था और अस्वस्थ स्वास्थ्य व्यवस्था के कई नमूने हमें आए दिन देखने को मिलते रहते हैं। पहाड़ की जमीन पर भू-माफियाओं का कब्जा होने का खतरा पैदा हो गया है। यही हालात रहे तो राज्य के शहरी भागों को छोड़कर पहाड़ खाली होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
ऐसा नहीं है कि राज्य सरकारें पलायन को रोकने के लिए प्रयास नहीं कर रहीं लेकिन ये प्रयास भी नाकाफी साबित हो रहे हैं। उत्तराखंड की इसी सूरत को बदलने के लिए यहां 5th शेड्यूल लागू करने की मांग उठाई जा रही है। इस मुद्दे पर आंदोलन खड़ा कर रहे उत्तराखंड एकता मंच का दावा है कि राज्य के ये सभी हालात 5th शेड्यूल लागू होने से बदल सकते हैं। इनका कहना है कि इससे पहाड़ में पलायन कम होगा। रोजगार बढ़ेगा। यहां के जल-जंगल और जमीन की भी रक्षा हो सकेगी। और ये बात गलत भी नहीं है। दरअसल 5th शेड्यूल सिर्फ संबंधित क्षेत्र के लिए अलग नीतियां बनाने का अधिकार नहीं देता, ये इससे काफी बढ़कर है।
ताकतवर है 5th शेड्यूल
सुप्रीम कोर्ट ने समता Vs स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश मामले में फैसला सुनाते हुए कहा था कि अनुसूचित क्षेत्रों में सरकारी जमीन, जंगल और आदिवासियों की जमीन को किसी नॉन-ट्राइबल यानी गैर-आदिवासी को ट्रांसफर नहीं किया जा सकता है। इस क्षेत्र के जल,जंगल और जमीन पर पहला अधिकार यहां के मूल निवासियों का होगा। 5th शेड्यूल में शामिल क्षेत्रों के लिए राज्यपाल के पास विशेष शक्तियां होती हैं। ऐसे में अगर राज्य सरकार कोई ऐसा कानून पास करती है जो इन क्षेत्रों के हितों का उल्लंघन करता है तो राज्यपाल विधानसभा के बनाए गए किसी भी कानून को यहां लागू ना करने का फैसला ले सकते हैं। इससे ये क्षेत्र राज्य सरकारों के उन फैसलों से बच सकते हैं जो वोटों की राजनीति को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं।
दूसरा, 5th शेड्यूल में शामिल क्षेत्रों के लिए जनजातीय सलाहकार परिषद का गठन किया जाता है। इस परिषद का काम होता है कि वह राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्रों में प्रशासनिक और विकासात्मक गतिविधियों के संबंध में सलाह दे। ये परिषद क्षेत्र की अलग-अलग चुनौतियों से राज्यपाल को अवगत कराती है और फिर राज्यपाल उस आधार पर ऐसी नीतियां और नियम लागू करवाते हैं जिससे यहां के हालात सुधर सकें। उत्तराखंड में ये परिषद सबसे फायदेमंद साबित हो सकती है क्योंकि ये परिषद पहाड़ में पलायन, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताओं को लेकर नीतियां बनाने में मदद कर सकती है।
सिर्फ यही नहीं, यहां के यूथ को केंद्रीय शिक्षण संस्थानों और नौकरियों में 7.5 फीसदी के आरक्षण का फायदा भी मिलेगा। सबसे बड़ी बात ये है कि मोटे तौर पर आप देखेंगे तो उत्तराखंड के अलावा हिमाचल समेत सभी पहाड़ी राज्यों के कहीं पूरे तो कहीं आधे क्षेत्र 5वीं और छठवीं अनुसूची में शामिल हैं। लद्दाख और जम्मू-कश्मीर धारा 370 की वजह से इससे बाहर थे। जानकारों का कहना है कि अगर उत्तराखंड को 5वीं अनुसूची में शामिल किया जाता है तो ये पहाड़ के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह होगा।
उनका कहना है कि आज जिस तरह से उत्तराखंड के संसाधनों का दोहन हो रहा है, उस पर लगाम लग सकेगी। यानि कि उत्तराखंड के कई रोगों की एक दवा है- 5th शेड्यूल। वो 5th शेड्यूल जो यहां पर कभी लागू था। जी हां। उत्तराखंड में 5th शेड्यूल पहले से लागू था लेकिन सरकारों की मेहरबानी रही कि इसे हटा दिया गया।
किसने हटाया 5th शेड्यूल?
ब्रिटिश राज से लेकर नवंबर, 2000 तक उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा था। जब यहां अंग्रेज आए तो उन्होंने यहां की जरूरतों और हालातों के आधार पर इस क्षेत्र को ट्राइब स्टेट्स दिया हुआ था। इस क्षेत्र में जमीन खरीद-फरोख्त से लेकर दूसरे नियम बाकी ब्रिटिश इंडिया से काफी अलग थे। 1931 में भी तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने यूपी के पहाड़ी जिलों यानि आज के उत्तराखंड को Scheduled Districts Act 1874 के निहित रखा हुआ था। कुल मिलाकर उत्तराखंड को ब्रिटिश सरकार में वही अधिकार मिले थे, जो आज के संविधान की 5वीं और 6वीं अनुसूची में हैं। लेकिन जब देश आजाद हुआ तो पहले उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया गया और बाद में इससे ट्राइबल एरिया का तमगा भी छीन लिया गया। 1972 में यूपी के पर्वतीय क्षेत्र को 5वीं अनुसूची से हटा दिया गया। लेकिन आरक्षण की कुछ व्यवस्था जरूर बनाए रखी गई।

इस व्यवस्था के तहत चिकित्सा और शिक्षा में प्रवेश पर आरक्षण को बनाए रखा गया। तत्कालीन यूपी सरकार को ये भी रास नहीं आया। 1996 में चिकित्सा-शिक्षा में प्रवेश सम्बंधी ये प्रावधान भी खत्म कर दिए गए। इन्हें हटाने का परिणाम हम आज तक भुगत रहे हैं। इस तरह यहां के संसाधनों, लोगों और संस्कृतियों की रक्षा करने वाला 5th शेड्यूल हटा दिया गया। यहां पर ये भी जान लीजिए कि जौनसार-बावर और पिथौरागढ़ के कुछ क्षेत्रों को ट्राइबल यानी जनजाति का दर्जा हासिल है। हालांकि ये क्षेत्र 5th शेड्यूल में शामिल नहीं है। यानि कि आदिवासी के नाते उन्हें जो आरक्षण मिलने चाहिए वो मिलते हैं लेकिन इस क्षेत्र के विकास के लिए 5th शेड्यूल जैसी कोई व्यवस्था नहीं है।
उत्तराखंड में लागू होगा 5th शेड्यूल?
संविधान की 5वीं अनुसूची में उत्तराखंड शामिल हो सकता है या नहीं? इसका जवाब आपको खुद-ब-खुद मिल जाएगा, जब आप इसमें शामिल होने की शर्तों को जानेंगे। पहले शेड्यूल्ड एरिया और शेड्यूल ट्राइबल कमीशन ने कुछ शर्तें तय की हैं। इनके मुताबिक
- 5th शेड्यूल में शामिल होने के लिए जरूरी है कि उस क्षेत्र की कम से कम 50% जनसंख्या ट्राइबल यानी जनजातीय हो।
- क्षेत्र कॉम्पैक्ट यानी छोटी साइज का हो ताकि प्रबंधन करना आसान हो।
- क्षेत्र काफी अविकसित यानी अंडर-डेवलप्ड हो।
- इस संबंधित क्षेत्र में रहने वाले लोगों के जीवन में काफी ज्यादा आर्थिक विषमताएं हों।
कौन हैं ट्राइबल?
इन शर्तों पर उत्तराखंड का पहाड़ी क्षेत्र काफी हद तक फिट बैठता है। फिर बात आती है कि उत्तराखंड में कहां शेड्यूल ट्राइब या जनजाति हैं? तो पहले तो ये समझ लीजिए कि आदिवासी या शेड्यूल ट्राइब की कोई तय परिभाषा संविधान में नहीं है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति और गवर्नर का रोल आता है। भारत के संविधान का अनुच्छेद 244 देश के राष्ट्रपति को शक्ति देता है कि वह भौगोलिक या फिर अन्य परिस्थितियों के आधार पर किसी भी राज्य को ट्राइबल यानी जनजातीय स्टेट घोषित कर सकते हैं। अगर परिभाषा से चलें तो ये साफ है कि किसी भी क्षेत्र में अगर वहां के आदिम यानी मूल निवासी कम से कम 50% हैं और वहां की परिस्थितियां तय नियमानुसार खराब हैं तो वहां 5वीं अनुसूची का नियम लागू किया जा सकता है।उत्तराखंड एकता मंच का कहना है कि उत्तराखंड की ज्यादातर जनसंख्या खस जनजाति से नाता रखती है। जिसकी जनसंख्या यहां पर 50% से काफी ज्यादा है। यानि कि उत्तराखंड 5th शेड्यूल में लागू होने की सभी शर्तों को पूरा करता है। अब ये राज्य सरकार पर है कि वो राज्य को 5वें शेड्यूल में शामिल करना चाहती है या नहीं? क्योंकि प्रस्ताव राज्य सरकार को ही केंद्र को भेजना होगा। अगर जवाब हां है तो उसे केंद्र सरकार तक इसका प्रस्ताव लेकर जाना होगा और सभी कमियां राज्य कि गिनानी होंगी जिसके आधार पर इसे 5वीं अनुसूची में शामिल किया जा सकेगा। लेकिन जब तक केंद्र और राज्य में राष्ट्रीय पार्टियों की सरकार रहेगी, तब तक यह काम होना नामुमकिन है।उत्तराखंड भी उन सभी बॉक्सेज को टिक करता है जो 5वीं अनुसूची में शामिल होने के लिए जरूरी हैं। लेकिन इस दिशा में कोई ठोस कदम कब उठाया जाता है, ये अभी कोई नहीं जानता। इसमें शामिल होने के लिए कवायद राज्य सरकार को ही करनी होगी। अगर राज्य सरकार कवायद नहीं करती है तो शायद अब ये 5th शेड्यूल का मुद्दा भी बड़ा आंदोलन बने।
5वीं अनुसूची में भी कई कमियां हैं। इसमें शामिल मौजूदा क्षेत्रों में भी जनजातियों के उत्पीड़न की कई खबरें आती रहती हैं। ऐसा नहीं है कि 5वीं अनुसूची में शामिल होने के बाद उत्तराखंड की सभी समस्याओं का रामबाण इलाज मिल जाएगा। लेकिन इतना जरूर है कि इससे विकराल होती पलायन जैसे चुनौतियां शिथिल जरूर पड़ सकती हैं। कम से कम पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था के हालात बेहतर होने की उम्मीद की जा सकती है। हालांकि 5वीं अनुसूची में उत्तराखंड को शामिल करने के लिए अभी लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। क्योंकि अभी चंद कोनों पर इसकी सुगबुगाहट है। ये आंदोलन का रूप कब और कैसे लेती है, ये भविष्य के गर्भ में है।
