सम्मान से मरने का अधिकार मिला और वह सम्मान से चला गया

हरीश राणा इच्छामृत्यु

हरीश राणा

11 मार्च, 2026 का दिन। यह दिन भारत की न्यायिक प्रणाली के इतिहास में महत्वपूर्ण दिन बन गया है। यह दिन याद किया जाएगा सुप्रीम कोर्ट के एक बहुत ही महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील फैसले के लिए। इस दिन सुप्रीम कोर्ट ने 32 वर्ष के हरीश राणा के मामले में ऐसा निर्णय दिया कि जो पहले देश में कभी नहीं हुआ था। इस फैसले ने ना सिर्फ हरीश राणा एवं उनके परिवार को बल्कि देश में एंड-ऑफ-लाइफ केयर एवं इच्छामृत्यु से जुड़े कानूनों पर भी एक नई बहस को जन्म दिया। सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के जीवन रक्षक उपचार को रोकने की अनुमति दे दी थी। कोर्ट के इसी फैसले के बाद हरीश राणा को एम्स में भर्ती किया गया था। यहां 24 मार्च को हरीश राणा का निधन हो गया। हरीश राणा के मामले में यह फैसला जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया था कि इस फैसले को सक्रिय इच्छामृत्यु नहीं कहा जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि इसे ऐसे मामले के रूप में देखा जाना चाहिए जहां चिकित्सा उपचार को रोका या हटाया जा रहा है। यह मामला और इस पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला कई मायनों में ऐतिहासिक माना है। अदालत की अनुमति के साथ जीवन रक्षक उपचार वापस लेने का यह भारत में पहला मामला माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या-क्या कहा? कैसे यह सक्रिय इच्छामृत्यु से अलग है? इन सवालों का जवाब लेने से पहले हरीश राणा का पूरा मामला समझ लीजिए।

कौन हैं हरीश राणा?

हरीश राणा मूल रूप से एक साधारण परिवार से आने वाले युवक थे। सिविल इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहे हरीश के जीवन में एक हादसे ने सबकुछ बदल कर रख दिया। साल 2013 में हरीश चंडीगढ़ की एक यूनिवर्सिटी से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। उसी दौरान एक दिन वह जिस इमारत में रह रहे थे, उसकी चौथी मंजिल से गिर गए। इस हादसे में हरीश राणा को काफी गंभीर चोटें आई थीं। इस हादसे में उनके मस्तिष्क पर भी कई गंभीर चोटे लगी थीं। दुर्घटना के बाद उनका इलाज चंडीगढ़ के पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पीजीआई) में शुरू हुआ। इसके बाद उन्हें दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) और कई निजी अस्पतालों में भी ले जाया गया। डॉक्टरों ने उनकी जान बचाने के लिए हर संभव कोशिश की। हालांकि हरीश को इतनी गंभीर चोटें आई हुई थीं कि उनके दिमाग को काफी अधिक नुकसान पहुंच चुका था।

सिर्फ जीवित थे हरीश
हरीश राणा दुर्घटना के बाद से ही वेजिटेटिव स्टेट में चले गए। चिकित्सा विज्ञान में इसे पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट नाम से जाना जाता है। यह ऐसी स्थिति होती है जिसमें व्यक्ति का शरीर जीवित रहता है लेकिन उसकी चेतना समाप्त हो जाती है। मरीज सांस ले सकता है। दिल भी धड़कता रहता है लेकिन वह अपने आसपास की दुनिया को समझ नहीं पाता। अपने शरीर को भी नियंत्रित नहीं कर पाता है। हरीश की स्थिति भी कुछ ऐसी ही हो चुकी थी। वह न बोल सकते थे। न हिल सकते थे और न ही अपने किसी निर्णय के बारे में बता सकते थे।

जीवन रक्षक उपचार पर थे हरीश

हरीश राणा को जीवन रक्षक उपचार दिया जा रहा था। हरीश को सांस लेने में सहायता दी जा रही थी। उन्हें भोजन व दवाइयां देने के लिए उनके शरीर में एक नली लगाई गई थी। इसे पीईजी ट्यूब कहा जाता है। पीईजी ट्यूब के माध्यम से सीधे पेट में भोजन पहुंचाया जाता है। यह उन मरीजों में इस्तेमाल की जाती है जो खुद खाना नहीं खा सकते और पानी नहीं पी सकते। पिछले करीब 13 साल से हरीश इसी अवस्था में बिस्तर पर लेटे-लेटे संघर्ष कर रहे थे। हरीश के साथ ही संघर्ष कर रहे थे उनके माता-पिता।

परिवार का संघर्ष

हरीश के पिता अशोक राणा ने अपने बेटे को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया। उन्होंने कई अस्पतालों में इलाज कराया और हर नई उम्मीद को आजमाया। उन्होंने एक बार मीडिया से कहा था कि डॉक्टरों ने हमें बताया कि उसके दिमाग की नसें पूरी तरह सूख चुकी हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि सीटी स्कैन कराने की भी जरूरत नहीं है। डॉक्टरों के इस तरह का जवाब मिलने के बावजूद परिवार ने हार नहीं मानी। परिवार हरीश को अलग-अलग अस्पतालों में ले गया। दुवाओं के साथ दवाओं का सिलसिला भी लगातार बना रहा। उन्हें उम्मीद थी कि शायद कोई चमत्कार हो जाएगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। हरीश के इलाज में परिवार को भी काफी संघर्ष करना पड़ा। यह संघर्ष सिर्फ भावनात्मक नहीं था बल्कि आर्थिक स्तर पर भी था। हरीश के इलाज में परिवार की आर्थिक स्थिति भी बुरी तरह प्रभावित हुई। उनके पिता को दिल्ली के द्वारका में अपना घर तक बेच देना पड़ा। इतने सारी कवायदों एवं प्रयासों के बावजूद हरीश की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।

जब खत्म होने लगी उम्मीद

हरीश राणा की स्थिति सुधरने की बजाय बिगड़ती ही जा रही थी। समय के साथ डॉक्टरों ने साफ कर दिया कि हरीश की स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं है। करीब 13 साल तक कोई बदलाव नहीं हुआ। हरीश उसी स्थिति में बने रहे। आखिरकार परिवार को यह एहसास हुआ कि यह इलाज उन्हें ठीक करने के लिए नहीं बल्कि सिर्फ निर्जीव अवस्था में जीवित रखने के लिए चल रहा है। इसी के बाद उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया। इस मामले की कानूनी प्रक्रिया भी काफी लंबी रही। साल 2024 में हरीश के परिवार ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2018 में तय किए गए दिशा-निर्देशों के अनुसार हरीश का जीवन रक्षक उपचार बंद करने की अनुमति दी जाए लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट का कहना था कि हरीश मैकेनिकल लाइफ सपोर्ट पर नहीं हैं और बाहरी सहायता के बिना भी जीवित रह सकते हैं। इसके बाद परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। शुरुआत में वहां भी उन्हें राहत नहीं मिली लेकिन अदालत ने उन्हें यह अनुमति दी कि आवश्यकता होने पर वह दोबारा याचिका दायर कर सकते हैं। परिवार ने बाद में फिर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

सुप्रीम कोर्ट क्या बोला?

अब जाकर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया और हरीश राणा के परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की। अदालत ने कहा कि ऐसा निर्णय लेना किसी भी परिवार के लिए बेहद कठिन होता है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हम हरीश के परिवार से कहना चाहते हैं कि हमें इस बात का पूरा एहसास है कि यह फैसला भावनात्मक रूप से कितना कठिन है। यह कभी-कभी समर्पण या हार मानने जैसा लग सकता है लेकिन हमारे अनुसार यह गहरी करुणा और साहस से भरा कदम है। अदालत ने आगे कहा कि आप अपने बेटे को छोड़ नहीं रहे हैं। आप उसे गरिमा के साथ विदा होने की अनुमति दे रहे हैं। यह आपके निस्वार्थ प्रेम एवं उसके प्रति आपकी गहरी निष्ठा को दर्शाता है। इस टिप्पणी ने इस मामले के मानवीय पक्ष को स्पष्ट रूप से सामने रखा है। और 24 मार्च को हरीश राणा ने सबको माफ करते हुए और माफी मांगते हुए इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

क्या आया फैसला?

सुप्रीम कोर्ट ने संवेदनशील रुख अपनाते हुए हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी थी। कोर्ट ने 11 मार्च को फैसला सुनाने से पहले मामले की गंभीरता को देखते हुए दो मेडिकल बोर्ड गठित करने का आदेश दिया था। एक, प्राइमरी मेडिकल बोर्ड गाजियाबाद में और दूसरा, सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड दिल्ली एम्स में। दोनों मेडिकल बोर्डों ने हरीश की हालत का विस्तृत परीक्षण किया। दोनों बोर्डों ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि हरीश स्थायी रूप से वेजिटेटिव स्टेट में हैं। उनकी स्थिति में सुधार की संभावना लगभग नहीं है। बोर्ड ने कहा कि उन्हें दिया जा रहा उपचार सिर्फ उन्हें जीवित रखने के लिए है। इन रिपोर्टों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

सभी रिपोर्टों और परिवार के बयान सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि यदि मरीज की हालत में सुधार की कोई संभावना नहीं है। उपचार सिर्फ पीड़ा को लंबा कर रहा है तो उसे जारी रखना उचित नहीं है। अदालत ने हरीश राणा के जीवन रक्षक उपचार को रोकने की अनुमति दे दी। इसके साथ ही अदालत ने दिल्ली के एम्स अस्पताल को निर्देश दिया कि इस प्रक्रिया को पूरी तरह मानवीय और गरिमापूर्ण तरीके से किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने एम्स को निर्देश दिए कि हरीश को घर से अस्पताल में भर्ती कराया जाए। लाइफ सपोर्ट हटाने की प्रक्रिया के लिए एक विस्तृत योजना बनाई जाए। पूरी प्रक्रिया के दौरान मरीज की गरिमा और सम्मान बनाए रखा जाए। कोर्ट ने साथ ही कहा कि हरीश को दर्द से राहत देने के लिए उचित दवाएं दी जाएं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया सावधानीपूर्वक और चिकित्सकीय मानकों के अनुसार की जानी चाहिए। इस मामले को पैसिव यूथेनेशिया यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु के रूप में देखा गया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पैसिव यूथेनेशिया शब्द भ्रम पैदा करता है। इसलिए अब चिकित्सीय उपचार को रोकना या हटाना शब्द इस्तेमाल करना अधिक उचित है।

हरीश राणा इच्छामृत्यु
हरीश राणा इच्छामृत्यु

 

पैसिव यूथेनेशिया क्या है?

पैसिव यूथेनेशिया का मतलब उस स्थिति से है जहां मरीज लाइलाज बीमारी से जूझ रहा हो। ऐसी स्थिति जहां पर उसके ठीक होने की कोई संभावना नजर ना आ रही हो। इस तरह के हालात में उसे जीवित रखने वाले उपचार को रोक दिया जाता है। पैसिव यूथेनेशिया में वेंटिलेटर हटाना, कृत्रिम भोजन बंद करना एवं अन्य जीवन रक्षक उपचार भी रोक देना शामिल होता है।


इच्छामृत्यु को समझें

इच्छामृत्यु दो प्रकार की मानी जाती हैं। पैसिव यूथेनेशिया जिसे हमने समझा। इसमें जीवन रक्षक उपचार रोक दिया जाता है और प्रकृति को अपना काम करने दिया जाता है। दूसरा होता है एक्टिव यूथेनेशिया। इसमें जानबूझकर ऐसा कदम उठाया जाता है जिससे मरीज की मौत हो जाए। इसमें अक्सर घातक इंजेक्शन दे दिया जाता है। दुनिया के कई देशों में यूथेनेशिया के लिए कानून है। हालांकि भारत में एक्टिव यूथेनेशिया अभी भी गैरकानूनी है।


इच्छामृत्यु से जुड़े प्रमुख फैसले

भारत में इच्छामृत्यु से जुड़े फैसले धीरे-धीरे विकसित हुए हैं। इसकी शुरुआत होती है 1996 से। 1996 का ज्ञान कौर बनाम पंजाब सरकार का मामला काफी चर्चा में रहा था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीने का अधिकार में मरने का अधिकार शामिल नहीं है। इसके बाद एक प्रमुख फैसला 2011 में दिया गया। नर्स अरुणा शानबाग मामले में कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था। मुंबई के केईएम अस्पताल की नर्स अरुणा शानबाग 1973 में हुए एक हमले के बाद वेजिटेटिव स्टेट में चली गई थीं। वह 42 साल तक बिस्तर पर रहीं। 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने उनके मामले में पैसिव यूथेनेशिया को सैद्धांतिक मंजूरी दी और दिशा-निर्देश जारी किए थे। हालांकि यहां भी इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं दी गई। बाद में अरुणा की देखभाल करने वाली नर्सों ने इस फैसले का विरोध किया। 2015 में निमोनिया की वजह से अरुणा शानबाग की मृत्यु हो गई।

हरीश राणा-अरुणा शानबाग
हरीश राणा-अरुणा शानबाग

2018 का महत्वपूर्ण फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु को लेकर 2018 में एक महत्वपूर्ण फैसला दिया था। इसे इच्छामृत्यु के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता दी थी। इसके साथ ही लिविंग विल को भी अनुमति प्रदान की थी। लिविंग विल एक कानूनी दस्तावेज होता है। यह वह दस्तावेज है जिसमें कोई व्यक्ति पहले से लिख सकता है कि अगर वह भविष्य में ऐसी स्थिति में पहुंच जाए जहां वह निर्णय लेने में सक्षम न हो तो उसके इलाज के बारे में क्या किया जाए। इस विल में संबंधित निर्देश दे सकता है कि ऐसी स्थिति में उसे वेंटिलेटर पर रखा जाए या लाइफ सपोर्ट हटा दिया जाए। यह दस्तावेज डॉक्टरों और परिवार को निर्णय लेने में मदद करता है।

2023 में नियमों में बदलाव

जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के फैसले में कुछ बदलाव किए। इन बदलावों का उद्देश्य प्रक्रिया को सरल बनाना था। 2023 में हुए मुख्य बदलावों में कुछ जरूरी चीजें जोड़ी गई थीं। जैसे कि मेडिकल बोर्ड के निर्णय के लिए समय सीमा तय कर दी गई थी। इसके साथ ही न्यायिक मजिस्ट्रेट की भूमिका को भी सीमित कर दिया गया था।

पैलिएटिव केयर क्या होती है?

हरीश राणा के मामले में अदालत ने पैलिएटिव केयर का भी उल्लेख किया। पैलिएटिव केयर ऐसी चिकित्सा व्यवस्था है जिसमें लाइलाज बीमारी से जूझ रहे मरीज को आराम और दर्द से राहत देने पर ध्यान दिया जाता है। इसका उद्देश्य मरीज की जिंदगी को लंबा करना नहीं बल्कि उसे अधिक आरामदायक बनाना होता है। एम्स की पैलिएटिव केयर विभाग की पूर्व प्रमुख डॉक्टर संगीता भटनागर ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि अगर मरीज ठीक नहीं हो सकता तो हमारा लक्ष्य यह होता है कि उसके जीवन का अंत गरिमा और आराम के साथ हो।

क्या बोला परिवार?

हरीश के पिता अशोक राणा ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया।उन्होंने कहा कि हमने अदालत का रुख तब किया जब हमें एहसास हुआ कि हमारे बेटे की स्थिति असाध्य और लाइलाज है। हम चाहते थे कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश हमारे बेटे के मामले में लागू हों। उन्होंने कहा कि यह फैसला उनके परिवार के लिए बेहद कठिन है लेकिन वे अपने बेटे के सर्वोत्तम हित में निर्णय ले रहे थे।

फैसले के बाद क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हरीश राणा को एम्स में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों की टीम ने एक प्रक्रिया तय की। हरीश को पीईजी ट्यूब के माध्यम से दिया जा रहा जीवन रक्षक उपचार बंद कर दिया गया। उन्हें दर्द निवारक दवाएं और आरामदायक देखभाल दी गई। इसके बाद प्रकृति को अपना काम करने दिया गया और कुछ ही दिन के भीतर हरीश इस संसार से विदा हो गए।

व्यापक कानून की जरूरत

सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के मामले में फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार को भी सुझाव दिए। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि एंड ऑफ लाइफ केयर और इच्छामृत्यु से जुड़े मामलों पर व्यापक कानून बनाने पर विचार किया जाए। फिलहाल भारत में यह विषय मुख्य रूप से न्यायालय के दिशा-निर्देशों पर आधारित है।

हरीश राणा का मामला भारतीय न्याय व्यवस्था और चिकित्सा नैतिकता दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। 13 वर्षों तक वह एक ऐसी अवस्था में रहे जहां जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा बेहद धुंधली थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में जो निर्णय दिया, वह केवल कानून का फैसला नहीं बल्कि एक मानवीय दृष्टिकोण का भी उदाहरण है। यह फैसला उन हजारों परिवारों के लिए भी उम्मीद और स्पष्टता लेकर आया जो अपने प्रियजनों को ऐसी ही परिस्थितियों में संघर्ष करते देखते हैं। अब यह देखना बाकी है कि केंद्र सरकार इस विषय पर व्यापक कानून बनाने की दिशा में क्या कदम उठाती है। हालांकि इतना निश्चित है कि हरीश राणा का मामला भारत में गरिमा के साथ जीवन और मृत्यु की बहस को हमेशा के लिए बदल चुका है।

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