यूकेडी -5: उक्रांद को बर्बाद करने में बीजेपी का हाथ !
अब बाहर से अगर आप देखेंगे तो ये सिर्फ उक्रांद के आपसी मतभेद नजर आते हैं लेकिन जब आप गहराई में जाते हैं तो पता चलता है कि भारतीय जनता पार्टी ने उत्तराखंड क्रांति दल को तोड़ने की कई साजिशें रची हैं। दरअसल उत्तराखंड में अगर उक्रांद मजबूत होती है तो इससे बीजेपी-कांग्रेस को नुकसान होता है और इसी वजह से उक्रांद में फूट डालने के हर बार प्रयास किए जाते हैं। ये कहना गलत नहीं होगा कि उत्तराखंड में भाजपा ने जो भी राजनीतिक ताकत हासिल की है, वो उक्रांद से हड़पकर ही की गई है।
कमज़ोर उक्रांद भाजपा की मजबूती
शंकर सिंह भाटिया अपनी किताब उत्तराखंड राज्य आंदोलन का इतिहास में कहते हैं कि उक्रांद का कमजोर होना भाजपा को और मजबूती देता है। और इसके कई उदाहरण बिखरे पड़े हैं। 1980 के दशक में जब उत्तराखंड में भाजपा कहीं नहीं थी और यूकेडी लगातार परवान चढ़ रही थी। तब बीजेपी ने 1989 में पृथक राज्य का मुद्दा उक्रांद से हाईजैक कर लिया। और इसकी बदौलत 1991 में पहली बार बीजेपी ने 19 में से 15 सीटें जीतकर कांग्रेस का किला ध्वस्त कर दिया। 1994 में उत्तराखंड राज्य आंदोलन अपने चरम पर था। इस वजह से भारतीय जनता पार्टी को समर्थन जताना पड़ा। हालांकि समर्थन के बावजूद इसका पूरा श्रेय उक्रांद को जा रहा था। और ये भाजपा को रास नहीं था। इस वजह से भाजपा ने उक्रांद को मात देने की चाल चली।
यूकेडी नेताओं को मोहरा बनाया
बीजेपी ने यूकेडी के तथाकथित गरमपंथी नेताओं को मोहरा बनाया। इन नेताओं ने भाजपा के कहने पर तब भड़काऊ बयान दिए जब आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा था। भाजपा ने उक्रांद को तोड़ने के लिए फूट डालो और राज करो की नीति भी खूब अपनाई। जब उक्रांद को तोड़ने के षड्यंत्र सफल नहीं हुए तब कुमाऊं और गढ़वाल के मुद्दे पर भी उक्रांद में फूट डालने की कोशिश की गई। गरमपंथि दल के नेता उक्रांद अध्यक्ष ऐरी के खिलाफ बयानबाजी करने में जुटे हुए थे। ये नेता मुलायम सिंह को समर्थन देने के मुद्दे पर ऐरी को घेरते रहे। और इस तरह 1996 में यूकेडी में जो दो फाड़ हुई, वह भी भाजपा की ही साजिश थी। 2003 में हुई फूट भले ही यूकेडी के नेताओं का आंतरिक झगड़ा ज्यादा था लेकिन परदे के पीछे भाजपा भी शामिल थी।
जब बीजेपी ने करवाए सर्वे
भारतीय जनता पार्टी यूकेडी को एकजुट ना होने देने के लिए कितनी प्रतिबद्ध है, इसका पता 2007 के चुनावों में चलता है। दरअसल भाजपा हाईकमान लगातार उत्तराखंड में सर्वेक्षण करवा रहा था। इस सर्वेक्षण में उत्तराखंड के अंदर उक्रांद के प्रति सहानुभूति बचे होने के प्रमाण उसे मिल रहे थे। अब भाजपा सत्ता के बल पर एक संदेश जनता के बीच देना चाहती थी कि उक्रांद और इसके नेता बार-बार टूटते-बिखरते रहते हैं। और इस मैसेज को जनता तक पहुंचाने का काम उक्रांद के ही सत्ता के लालची नेताओं ने किया।
दल के अंदर बहुत सारे लोग भाजपा सरकार के साथ जाने के खिलाफ थे लेकिन सत्ता में बैठने के लिए उतावले हुए नेताओं ने किसी की ना सुनी। और इस तरह एक बार फिर भाजपा अपने मकसम में कामयाब हुई। 2011 में हुई उक्रांद में फूट की पूरी पटकथा ही भाजपा ने लिखी थी। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस भी यूकेडी को चाहती है लेकिन जिस सिद्धत से भाजपा ने यूकेडी को कमजोर करने का काम किया है, उस तरह कांग्रेस ने नहीं किया। और इस तरह एक क्षेत्रीय दल को मूर्छित करने के लिए राष्ट्रवादी पार्टियों ने साम-दाम-दंड-भेद, सबका उपयोग किया।
निष्कर्ष
इन सभी सच्चाइयों और तथ्यों के बावजूद यह कहना गलत ना होगा कि उक्रांद का नेतृत्व अगर मजबूत होता है। अगर उक्रांद के नेता सत्ता लालच में पड़ने की बजाय खुद को मजबूत करने पर ध्यान देते तो शायद आज इसका कुछ जनाधार बचा हुआ होता। आज भी आम उत्तराखंडियों के मन में उक्रांद के लिए भावना है। आम उत्तराखंडी चाहता है कि उक्रांद के हाथ सत्ता दी जाए लेकिन जब आम जनता उक्रांद की तरफ देखती है तो वह एक ऐसी लाचार पार्टी नजर आती है जहां ना मजबूत नेतृत्व है और ना ही कोई रणनीति।
दरअसल उक्रांद आंदोलनकारियों का एक समूह बनकर रह गई है। अब उक्रांद के हाशिए पर जाने के लिए कई और भी कारण हैं। उन पर भी कभी किसी दूसरे वीडियो में चर्चा करेंगे लेकिन फिलहाल अब देखना होगा कि क्या 2027 में उक्रांद अपनी खोई हुई थोड़ी ही सही लेकिन कुछ जमीन वापिस पाने में कामयाब होती है या नहीं?, तब तक आप भी सोचिए कि इस बार आप किसे चुनना चाहेंगे। उसे जो पहाड़ की बात करे या फिर उसे जो पहाड़ को नोचकर खा जाए और फिर पहाड़ियों को ही गाली दे। फैसला आपके हाथ में है।
