कहानी बाबा बौखनाग की जिन्हें सिलक्यारा टनल हादसे से जोड़ा जाता है
12 नवंबर, 2023। उत्तरकाशी जिले में निर्माणाधीन सिलक्यारा टनल में एक हादसा होता है। सुरंग का एक हिस्सा धंस जाता है और यहां काम कर रहे मजदूर अंदर ही फंस जाते हैं। बंद हो चुकी सुरंग से मजदूरों को बाहर निकालने के लिए एक देशव्यापी अभियान चलाया जाता है। उत्तराखंड समेत राष्ट्र की पूरी मीडिया का ध्यान इस हादसे पर रहता है। मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्री घटनास्थल पर पहुंच जाते हैं। सिलक्यारा टनल हादसे की जब भी चर्चा होती थी तो एक नाम अक्सर इसके साथ जोड़ा जाता था। और वो था- बाबा बौखनाग। बताया गया कि बाबा बौखनाग की नाराजगी की वजह से ये हादसा हुआ। तब लोगों ने बाबा बौखनाग के बारे में खोजना शुरू किया। और लोगों को मालूम पड़ा कि ये स्थानीय भूमियाल हैं जिनकी नाराजगी की वजह से सिलक्यारा टनल हादसा हुआ।
करीब 17 दिन तक सिलक्यारा टनल में फंसी 41 जिंदगियों को सुरक्षित निकालने के लिए काफी ज्यादा मशक्क्त करनी पड़ी। स्थानीय लोगों की मानें तो ये मुसीबत टनल बनाने वाली कंपनी की अनदेखी की वजह से ही खड़ी हुई है। स्थानीय लोगों के मुताबिक जहां टनल बनी है, वहां पर बाबा बौखनाग का एक मंदिर था। टनल का काम शुरू होने से पहले कंपनी ने कहा था कि वह देवता का नया मंदिर बनाएगी। हालांकि काम शुरू होने के बाद कंपनी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। ग्रामीणों का कहना है कि कंपनी की इस अनदेखी की वजह से ही ये हादसा हुआ है। उनके मुताबिक इस अनदेखी की वजह से बाबा बौखनाग नाराज हो गए और ये आपदा आ गई। ग्रामीणों के इस पक्ष को सामने लाने के बाद टनल के करीब ही एक छोटा सा मंदिर बाबा बौखनाग का बनाया गया। यहां पर मजदूरों के रिश्तेदार लगातार माथा टेकते और अंदर फंसे अपने मजदूरों की सुरक्षा की कामना करते।
कौन हैं बाबा बौखनाग?
कई जगहों पर बाबा बौखनाग को बौखनाथ भी लिखा जाता है। हालांकि देवता का नाम बौखनाग है। ये नाम इसलिए है क्योंकि बाबा बौखनाग वासुकी नाग के अवतार माने जाते हैं। ये टिहरी गढ़वाल के पश्चिमोत्तर क्षेत्र, रवांई और भंडारस्यूं पट्टियों के बहुमान्य नाग देवता हैं। इनका प्रमुख थान यानी स्थान कफनोल में है। बाबा बौखनाग के पुजारी डिमरी होते हैं तो वहीं पंडित डोभाल जाति के लोग होते हैं। बाबा बौखनाग उत्तरकाशी क्षेत्र के लोगों के ईष्ट और रक्षक देवता हैं। सिर्फ यही नहीं, इन्हें यहां के पहाड़ों और प्रकृति का रक्षक भी माना जाता है। यहां हर दो साल में एक मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें सिलक्यारा समेत 22 गांव शामिल होते हैं और अपनी मन्नतें देवता के सामने रखते हैं।

उत्तरकाशी के नौगांव के राड़ी टॉप इलाके में बाबा बौखनाग का एक विशाल मंदिर है जो कि चारों ओर से पहाड़ों से घिरा है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण टिहरी जनपद के सेम-मुखेम से पहले यहां पहुंचे थे, इसलिए एक वर्ष सेम मुखेम और दूसरे वर्ष बौखनाग में भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। इस दौरान बौखनाग में रात भर जागरों का दौर चलता है। राडी कफनौल मोटर मार्ग के निकट 10 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है बौखनाग का मंदिर। यहां मेले में निसंतान दंपतियों और नव विवाहितों द्वारा नंगे पैर सम्मिलित होने की प्रथा है। कहते हैं कि ऐसा करने से बाबा बौखनाग उनकी मनोकामना पूरी करते हैं। यहां नाग रूप में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना की जाती है। बता दें कि यहां वासुकी नाग को बौखनाग के तौर पर पूजा जाता है। वासुकी को भगवान शिव का प्रिय सेवक माना जाता है। पुराणों के अनुसार वासुकी शेषनाग के भाई हैं। शिव जी के गले में आप जिस नाग को देखते हैं तो वो वासुकी ही हैं। समुद्र मंथन के दौरान रस्सी की जगह वासुकी को ही मेरु पर्वत पर बांधकर समुद्र मंथन किया गया था। कहते हैं कि जब वासुदेव श्री कृष्ण को टोकरी में रखकर यमुना नदी पार कर रहे थे, तब भयंकर बरसात से वासुकी ने ही श्रीकृष्ण की रक्षा की थी।
बाबा बौखनाग की भविष्यवाणी
करीब 17 दिन तक चले रेस्क्यू मिशन में कई तरह की दिक्कतें आईं। कभी मशीनें खराब हो गईं तो कभी ऊपर से मलबा गिर जाता। बचावकर्मियों को कोई ऐसा रास्ता नहीं मिल पा रहा था जिसके जरिए वे मजदूरों को बाहर निकाल सकें। आखिर में जब कुछ काम करता ना दिखा तो यहां पर बाबा बौखनाग के पश्वा जिन्हें माली कहा जाता है, उन्हें बुलाया गया। बाबा बौखनाग के पश्वा ने यहां पूजा अर्चना की। इसके साथ ही कंपनी के प्रतिनिधि और अन्य लोग बाबा बौखनाग की शरण में पहुंचे। वहां इन्होंने मजदूरों की सकुशल वापसी की कामना की। इस पर बाबा बौखनाग ने ना सिर्फ मजदूरों की सुरक्षा की जिम्मेदारी ली। इसके साथ ही कहा कि अगले 3 दिन में मजदूर बाहर आ जाएंगे। और हुआ भी ऐसा ही। बौखनाग के पश्वा संजय डिमरी ने वचन दिया था कि अगले तीन दिन में सुंरग में फंसे मजदूर सुरक्षित निकाल लिए जाएंगे। इस बीच कोई अड़चन नहीं आएगी। ठीक तीन दिन बाद यानी 28 नवंबर को सभी मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। अब यहां पर विश्वास और अंधविश्वास को लेकर तर्क-कुतर्क हो सकते हैं लेकिन ये तय है कि जब आप स्थानीय मान्यताओं और परंपराओं को अनदेखा नहीं कर सकते।
कंपनी ने कहां की गलती?
उत्तराखंड को देवताओं की भूमि कहने की एक वजह ये देवता ही हैं। पहाड़ में आज भी जब लोग कोई नया काम करते हैं तो सबसे पहले अपने ईष्ट का सुमिरन करते हैं। यहां तक कि जब लोग परदेश से अपने घरदेस जाते हैं। कहीं सफर शुरू करते हैं। या फिर कोई शादी-विवाह भी होता है तो रास्ते में पड़ने वाले देवताओं को जरूर याद किया जाता है। कई देवताओं को श्रीफल चढ़ाया जाता है। बौखनाग मंदिर के पुजारी गणेश प्रसाद बिजल्वाण ने बड़े ही सुंदर शब्दों में इस बात को टनल हादसे के संदर्भ में पेश किया है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड देवताओं की भूमि है। यहां पर किसी भी पुल, सड़क या सुरंग के निर्माण से पहले स्थानीय देवता को पूजा जाता है या फिर उनके लिए एक छोटा सा मंदिर बनाया जाता है लेकिन कंपनी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। स्थानीय लोग बताते हैं कि पहले सुरंग के बाहर एक मंदिर था। मजदूर मंदिर में सिर नवाकर फिर अंदर काम करने जाते थे लेकिन बाद में इस मंदिर को हटा दिया गया और उसके बाद ही ये हादसा हुआ।

अब बौखनाग की वजह से ही ये हादसा हुआ या फिर उनकी वजह से ही मजदूरों की जान बची? इस पर बहस हो सकती है। कई इसे अंधविश्वास भी बताएंगे लेकिन एक बात है जिससे कोई इनकार नहीं कर सकता और वो है आस्था। कई बार विज्ञान भी आस्था के सामने सिर नवाता है। इसका एक नमूना हमने तब देखा, जब इंटरनेशनल टनल एक्सपर्ट अर्नोल्ड डिक्स और मुख्यमंत्री भी बाबा बौखनाग के सामने नतमस्तक हुए। जरूरी नहीं है कि इनके नतमस्तक होने से ही काम हो गया लेकिन किसी देवता की उपस्थिति एक सकारात्मक ऊर्जा जरूर फैलाती है और उससे लोग सकारात्मक दिशा में काम करते हैं।
देवताओं का साथ होना एक ऐसे सहयोगी का साथ होने जैसा है जो दिखता तो नहीं है लेकिन आपके जेहन में सकारात्मक ऊर्जा तैयार जरूर करता है। पहाड़ की प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने वाले लोगों को बाबा बौखनाग ने एक बार फिर चेतावनी जरूर दी कि पहाड़ों की प्रकृति से खिलवाड़ होगा तो कुछ इसी तरह के नतीजे हमें देखने को मिलते रह सकते हैं। इन नतीजों से बचना है तो सरकार को प्रकृति के मुताबिक काम करना होगा क्योंकि हर जगह और हर बार देवभूमि के देवता रक्षा करने नहीं पहुंचेंगे। वह नहीं पहुंचेंगे क्योंकि जिस प्रकृति की रक्षा वो करते हैं, उसी के सीने में अगर छेद किया जाएगा तो इनका नाराज होना लाजमी है। सिलक्यारा टनल हादसा सरकारों के लिए भी एक सबक है कि पहाड़ के मुताबिक निर्माण होगा तो इंसानों के साथ देवता भी खुश होंगे।
