उत्तराखंड में गुलदार-बाघ क्यों हुए आदमखोर? हैजा वजह !

उत्तराखंड में गुलदार के हमले

उत्तराखंड में गुलदार के हमले

पहाड़ के लोगों और जंगली जानवरों के बीच वन्यजीव संघर्ष होना कोई नई बात नहीं है। आए दिन गुलदार के हमलों की कई खबरें सामने आती रहती हैं। और अब गुलदार के साथ ही बाघों के हमले भी बढ़ गए हैं। मौजूदा स्थिति ये है कि उत्तराखंड में अब गुलदारों के साथ ही बाघों के हमले भी आम आदमी पर बढ़ गए हैं। इस स्थिति से खुद एक्सपर्ट्स भी हैरान हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक लगभग छह हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित बिनसर के जंगल में बाघ की मूवमेंट अल्मोड़ा के डीएफओ ने खुद अपने कमरे में कैद की है। अगस्त, 2023 में बागेश्वर के गरुड़ राजकीय इंटर कॉलेज अम्सारी के बच्चों पर बाघ ने स्कूल जाते समय हमला कर दिया था। बाघ के हमले में भिलकोट क्षेत्र के दो बच्चे घायल हो गए थे। उनके साथ के दो बच्चों ने साहस दिखाते हुए पत्थर मार कर किसी तरह बाघ को भगाकर उनकी जान बचाई थी। 12 दिसंबर, 2023 को अल्मोड़ा के जागेश्वर धाम स्थित शौकियाथल के पास बाघ फिर दिखाई दिया। यहां शौकियाथल के पास निर्माणाधीन थिकलाना-त्रिनैली सड़क पर बाघ की मूवमेंट का वीडियो वायरल होने से हड़कंप मच गया।

बढ़ी है बाघों की संख्या
उत्तराखंड में लगातार बढ़ी बाघ की मूवमेंट के लिए इनकी संख्या में हुई बढ़ोतरी को माना जा रहा है। अमर उजाला से बात करते हुए भारतीय वन्यजीव संस्थान में टाइगर सेल के वैज्ञानिक प्रोफेसर कमर कुरैशी ने बताया था कि साल 2006 में यहां महज 178 बाघ थे। पिछले 16 सालों में प्रोजेक्ट टाइगर की वजह से ये संख्या 2024 तक 382 बढ़कर 560 से ज्यादा पहुंच चुकी है।  आबादी बढ़ने की वजह से शिकार के लिए स्पर्धा भी बढ़ी है। आबादी के कारण बाघों को जंगल में पर्याप्त शिकार नहीं मिल पा रहा है। इसके साथ ही बढ़ती संख्या की वजह से जंगलों में बाघों को पर्याप्त जगह भी नहीं मिल पा रही है। जंगल में बाघिन को 10 से लेकर 60 वर्ग किलोमीटर जबकि बाघ को 50 से 150 वर्ग किलोमीटर तक का दायरा चाहिए होता है। इसे आप इनका इलाका कह सकते हैं। उत्तराखंड में कार्बेट टाइगर रिजर्व का कुल क्षेत्र 1288.31 वर्ग किलोमीटर है जबकि राजाजी टाइगर रिजर्व करीब 820 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इन दोनों वन क्षेत्रों में बाघों का अतिरिक्त दबाव हो गया है। इसलिए बाघ अपने लिए नए क्षेत्र की तलाश में जंगल से बाहर निकल रहे हैं। दूसरी तरफ, बाघिन भी अपने शावकों की सुरक्षा के लिए महफूज ठिकाने की तलाश कर रही हैं।

उम्रदराज बाघों के लिए संकट
प्रोफेसर कमर कुरैशी कहते हैं कि जंगलों में बाघों के बीच अस्तित्व के लिए लड़ाई शुरू से होती रही है। जंगल का नियम है कि यहां जो शक्तिशाली होगा वही उस क्षेत्र में राज करेगा। इसके चलते जवान नर बाघों ने ताकत के बलबूते अपनी टेरिटरी या क्षेत्र बना लिया है। इसमें वह किसी और को नहीं घुसने देते। इससे खासकर उम्रदराज बाघों के लिए संकट आ रहा है। आबादी काफी बढ़ने के कारण बाघों के बीच एक तरफ संघर्ष की स्थिति बढ़ गई है तो दूसरी तरफ उम्रदराज बाघों को शिकार के लिए भी परेशान होना पड़ रहा है। कई दिनों तक भूखे रहने पर मजबूरन बूढ़े बाघ जंगल छोड़कर गांवों का रुख करने के लिए विवश हो रहे हैं। कुरैशी कहते हैं कि जंगलों में संख्या अधिक होने के कारण ही कई बाघ पहाड़ों का रुख कर रहे हैं। बाघों को पहाड़ की चढ़ाई वाली स्थितियां पसंद नहीं हैं। इसके बाद भी शिकार और आसरे की तलाश में वह पहाड़ों पर भी चढ़ रहे हैं। कुरैशी कहते हैं कि लगातार बढ़ रही बाघों की संख्या और गांवों में होते बाघों की आवक को रोकने के लिए बाघ संरक्षित क्षेत्रों को बढ़ाना होगा। बाघों को उन जगहों पर शिफ्ट करना होगा, जहां इनकी कमी है। वन क्षेत्रों में बाघों को पर्याप्त शिकार मिले, इसकी व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी।

मिलता है मुआवजा
अगर कोई व्यक्ति वन्यजीव संघर्ष में आता है या कोई पालतू पशु घायल हो जाता है या मर जाता है तो सरकार मुआवजा देती है। सरकार ने जंगली जानवरों की एक सूची बनाई है। इसमें बाघ, तेंदुआ, हाथी, भालू ,जंगली सुअर, लकड़बग्घा, सियार, भेड़िया, गेंडा, जंगली कुत्ता, मगरमच्छ एवं घड़ियाल शामिल हैं। अगर इन जानवरों के हमले से किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है या फिर कोई व्यक्ति विकलांग हो जाता है तो सरकार की तरफ से मुआवजा मिलता है। यह मुआवजा एक लाख से दस लाख रुपए तक मिलता है। आपको कितना मुआवजा मिलेगा, ये आपको हुए नुकसान पर पूरी तरह निर्भर करेगा। अगर वन्यजीव संघर्ष में भैंस, गाय, बैल की मृत्यु हो जाती है तो भी मुआवजे का प्रावधान है।

क्यों हुए गुलदार आदमखोर?
उत्तराखंड में वन्यजीव संघर्ष कोई नई बात है। ये कई बरसों से चला आ रहा है। वैसे तो गुलदारों और बाघों के आदमखोर होने के पीछे कोई एक वजह नहीं है। हालांकि जिम कॉर्बेट अपनी किताब मैन ईटर ऑफ़ रुद्रप्राग में इसके लिए एक वजह हैजा की बीमारी को बताते हैं। वह लिखते हैं कि 20वीं सदी में जब पूरी दुनिया में हैजा फैला तो पहाड़ भी इससे अछूता नहीं रहा। हैजा से जान गंवाने वालों का पारंपरिक तरीके से दाह-संस्कार करना संभव नहीं था। ऐसे में लोगों ने शवों को पहाड़ों से नीचे खाई में फेंकना शुरू कर दिया।  इससे जंगली जानवर खासकर बाघों को आसानी से मांस मिलने लगा। जिम यह भी लिखते है कि असल दिक्कत तब शुरू हुई जब ये बीमारी यानि हैजा का असर कम होने लगा। बीमारी का असर कम हुआ तो जंगल में शव पहुंचने भी कम हुए। अब तक आदमखोर बन चुके बाघों ने जंगल छोड़कर गावों का रुख करना शुरू कर दिया।

एक्सपर्ट एक वजह 2013 में आई केदारनाथ आपदा को भी बताते हैं। उनका मानना है कि बाढ़ के साथ जो शव बह कर आये वो जंगलों में अटक गए जिन्हें बाघों ने खा लिया। इसके अलावा जो सबसे बड़ा कारण एक्सपर्ट की ओर से गिनाया जाता है वह यह है कि जब बाघ बूढ़ा या जख़्मी हो जाता है तो वह ऐसा शिकार खोजता है जिस पर उसे ज्यादा मेहनत ना करनी पड़े। और यही वजह है कि वह इंसानों और पालतू जानवरों को फिर शिकार बनाता है। मौजूदा वक्त में भी ये वजह वन्यजीवन संघर्ष बढ़ने में अहम भागीदारी निभाती नजर आ रही है। एक्सपर्ट की राय और ताजा हालातों को देखकर तो यही लगता है कि सरकार को जल्द से जल्द इन बाघों के लिए कोई दूसरी जगह देखनी होगी। जिन जगहों पर बाघों की संख्या ज्यादा है उन्हें उन जगहों में भेजा जाए जहां इनकी आबादी कम है। जब तक ये व्यवस्था नहीं की जाती तब तक उत्तराखंड में ये वन्यजीव संघर्ष चलता ही रहेगा और शायद खतरनाक मोड पर पहुंच जाए।

खैर सरकार जब इस मुद्दे पर सोचेगी तब सोचेगी तब तक आपको सतर्क रहने की जरूरत है। कहीं पर भी बाघ या गुलदार दिखता है तो प्रशासन को जरूर खबर दीजिए।

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