उत्तराखंड में बसने वाले पहले मुसलमान कौन थे?
Muslims in Uttarakhand
कभी आपने सोचा है कि भारत की देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में मुसलमान कहां से आए? यह सवाल इसलिए भी उठता है क्योंकि मुसलमान यहां के मूल निवासी नहीं हैं। आज भी देवभूमि में मुसलमानों की संख्या काफी कम है। लेकिन इनका उत्तराखंड के साथ जुड़ा इतिहास काफी पुराना है। आज भले ही हिंदू और मुस्लिम में फर्क की बात कही जा रही हो लेकिन एक वक्त में इन दोनों के बीच बहुत ज्यादा फर्क नहीं था।
एक वक्त था जब उत्तराखंड के मुसलमान अल्लाह को नहीं बल्कि बाकियों की तरह ही देवी-देवताओं को पूजा करते थे। उत्तराखंडी मुस्लिमों के हिंदू धर्म में आस्था रखने वालों के साथ रिश्ते लगते थे। और ये लव जिहाद या जबरदस्ती से नहीं बल्कि सर्वसहमति के संबंध थे। पहाड़ ने सिर्फ मुस्लिमों को नहीं अपनाया बल्कि उनके भूत-प्रेतों को भी स्वीकार किया। इसी का नतीजा है कि आज भी पहाड़ में मुस्लिमों का जागर हिंदू लगाते हैं। इतिहास इस बात का गवाह है कि भारत में इस्लाम का प्रसार शांतिपूर्ण ढंग से कम और तलवार की नोक से ज्यादा हुआ लेकिन उत्तराखंड के मामले में स्थिति इससे थोड़ी बहुत अलग रही। खुद उत्तराखंड के राजाओं ने यहां मुस्लिमों को बसाने का क्रम शुरू किया। इनको बसाने के पीछे मकसद यहां इस्लाम को बढ़ावा देना नहीं बल्कि वो काम करवाने थे जो पहाड़ में नहीं हुआ करते थे।
इस रिपोर्ट में पेश है मुस्लिमों के उत्तराखंड में बसने का पूरा इतिहास। जब हम इतिहास के पन्नों से कोई जानकारी देते हैं तो उसमें कई ऐसी चीजें छुपी होती हैं जिन्हें सुनना और अपना पाना मुश्किल हो सकता है। देवभूमि में मुस्लिमों की मौजूदगी के इतिहास को जब हम आगे जानेंगे तो इसमें भी कई ऐसी चीजें आएंगी जो आज होना संभव नहीं लगतीं। इसलिए मन में कोई पूर्वाग्रह और घृणा पाले बिना इस रिपोर्ट को पढ़ें।ताकि आप इतिहास को इतिहास की नजर से देख सकें और इसे किसी पक्ष या विपक्ष का एजेंडा ना समझें।
भारत में इस्लाम के पहले कदम
साल 610 में पैगंबर हजरत मोहम्मद ने इस्लाम धर्म की स्थापना की। 632 में उनकी मृत्यु के बाद महज 8 सालों के भीतर उनके उत्तराधिकारी खलिफाओं ने सीरिया, मिस्र और ईरान का भी इस्लामीकरण कर दिया। अब इन खलिफाओं की नजर उस भारत पर थी जिसकी समृद्धि के किस्से इन्होंने अरब व्यापारियों से सुने हुए थे। धर्मप्रचार और धन-संपदा की लूट के इरादे से अरबों की सेना ने 663 ईसवी में सिंध के किकान प्रदेश पर पहला आक्रमण किया। हालांकि उन्हें इसमें कुछ खास सफलता नहीं मिल पाई। सदियों तक चले अरबों और फिर तुर्कों के आक्रमण ने इस्लाम को उत्तर भारत तक पहुंचा दिया। इन अत्याचारी राजाओं ने तलवार की नोक पर लोगों का धर्मांतरण किया।
तुर्क शासकों की आमद
11वीं सदी के शुरुआती 30 सालों में तुर्क शासक महमूद गजनवी कन्नौज, बनारस और बहराइच से गंगा-जमुना दोआब तक मुस्लिम बस्तियां बसा चुका था। 1192 में पृथ्वीराज चौहान का पतन होने के बाद दिल्ली, अजमेर, ग्वालियर समेत कई बड़े क्षेत्रों में मुस्लिम राज्य फैल गया था। इससे यहां के राजाओं के सामंत, सैनिक और आश्रित मुस्लिम आक्रांताओं से बचने के लिए बीहड़ और जंगलों में आश्रय लेने लगे। चौहान सामंत और सैनिक शिवालिक की ढालों एवं उत्तरी पांचाल में बदायूं, बरेली, पीलीभीत तक बसे। इनकी कटेहरी शाखा ने इन क्षेत्रों के जंगल-झाड़ियों को साफ़ करके यहां अपने नए गांव तैयार किए। इन्हीं की वजह से वर्तमान रोहेलखंड को कटेहर कहा जाने लगा। हालांकि अभी भी मध्य हिमालय के पहाड़ी भाग तक मुसलमानी आक्रांता पहुँच नहीं पाए थे।
शिवालिक पहाड़ियों पर नजर
14वीं शताब्दी तक मुस्लिम शासक अम्बाला और सहारनपुर जिले तक अपना शासन ला चुके थे। अब उनकी नज़र शिवालिक पहाड़ियों पर थी। शिवालिक पहाड़ियों पर कब्जा करने के इरादे से 1337 में दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद तुगलक ने कराचल पर्वत यानी वर्तमान कुमाऊं पर आक्रमण किया। इस दौर में जहां गढ़देश यानी आज के गढ़वाल के उत्तरी भाग पर पवाँर वंशियों का राज था तो वहीं, दक्षिण भाग में अनेक गढ़पति राज कर रहे थे। दूसरी तरफ़, कुमाऊं के अधिकांश भाग पर कत्यूरी शाखाएं बनी हुई थीं और चंपावत में चंदवंशी शासन कर रहे थे। सुल्तान के एक लाख घुड़सवार और हजारों पैदल सैनिकों ने कराचल पर हमला बोल दिया लेकिन उन्हें मुँह की खानी पड़ गई। भारी बारिश और पहाड़ के कठिन रास्तों पर उनके लिए युद्ध करना मुश्किल हो गया। नतीजा ये हुआ कि लाखों की इस सेना में से सिर्फ तीन ही दिल्ली को अपनी हार की जानकारी देने के लिए बच पाए।
मनहूस खड़गू
इधर कटेहरी किसी भी हाल में मुस्लिम अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। मुहम्मद तुगलक के बाद 1351 में फिरोजशाह तुगलक दिल्ली के तख्त पर बैठा और उसने कटेहर को मुस्लिम राज्य बनाने के हर संभव प्रयास किए। इसी दौरान बदायूं के जागीरदार सय्यद मुहम्मद और कटेहर के गढ़पति खड़कसिंह अथवा खड़गू के बीच प्रदेश के सीमांत के लिए युद्ध होते रहते थे। एक दिन खड़गू ने सय्यद मुहम्मद और उसके भाई सय्यद अलाउद्दीन को अपने घर भोज के लिए बुलाकर उनकी हत्या कर दी।
इस घटना से तिलमिलाए फिरोजशाह ने 1380 में कटेहर पर तीखा हमला बोला। उसने इस क्षेत्र में आकर हिंदुओं का ऐसा कत्लेआम किया जिसकी जानकारी देते हुए लेखकों ने लिखा है कि इस कत्लेआम से सय्यदों की आत्मा भी थर्रा उठी थी। खड़गू तुगलक की सेना से लड़ नहीं पाया और वह कमायूं प्रदेश यानी आज के कुमाऊं की ओर भाग गया। तुगलक की सेना भी उसका पीछा करते हुए यहां पहुँच गई। खड़गू तो इन मुसलमानी आक्रांताओं के हाथ नहीं लगा लेकिन उन्होंने यहां के बेगुनाह पर्वतीयों की निर्मम हत्या की। 23 हज़ार से ज्यादा नर-नारियों को बंदी बनाकर जबरदस्ती उनका धर्मांतरण किया।
कुमाऊं में मुसलमानी आक्रांताओं के घुसने और यहां के नर-नारियों का धर्मांतरण करने की ये पहली घटना थी। हालांकि उन्होंने यहां पर स्थायी सत्ता नहीं बनाई। क़रीब 40 साल पहले जो हाल मुहम्मद तुगलक का हुआ था, वो उन्हें याद था, यही वजह है कि तुगलक की सेना बरसात से पहले यहां से निकल गई। जब तुगलक की सेना वापस लौट रही थी तो उसने एक अफ़ग़ान को सँभल का सूबेदार नियुक्त किया और उसे आदेश दिया कि वह कटेहर का विध्वंस करता रहे। सूबेदार हुक्म की तालीम करता रहा। इसका नतीजा ये हुआ कि जब भी कटेहर पर आक्रमण होता तो यहां के हिंदू माल यानी भाबर की तरफ़ भागने लगते और जब ये लोग इस तरफ़ भागते तो मुसलमानी शासक इनका पीछा करते हुए यहां पहुँच जाते और पर्वतीयों पर भी अत्याचार ढाते।
दूसरी तरफ़, माल यानी भाबर में आने वाले कटेहरों ने तत्कालीन राजा ज्ञानचंद की अधीनता स्वीकार नहीं की। इस स्थिति से निपटने के लिए ज्ञानचंद साल 1410 से 1413 के बीच फिरोजशाह तुगलक से मिलने के लिए दिल्ली पहुंचा। ज्ञानचंद पहला चंदवंशीय राजा था जिसने दिल्ली दरबार में हाजिरी दी थी।
दरअसल ज्ञानचंद अपनी प्रजा को सताए जाने से और माल पर कटेहरों के प्रभुत्व से परेशान हो चुका था। उसने दिल्ली दरबार को विश्वास दिलाया कि कटेहरों को शरण देने में उसकी प्रजा का कोई हाथ नहीं है। और ऐसे में पर्वतीयों को दंडित करना न्यायसंगत नहीं है। इस पर फिरोजशाह ने ना सिर्फ ज्ञानचंद का तर्क स्वीकार किया बल्कि उसे माल की जागीर भी दे दी। ये कुमाऊं के राजाओं और मुगल दरबार के बीच मित्रता की शुरुआत का पहला कदम था। संभवतः फिरोजशाह ने सोचा होगा कि माल अगर कुमाऊंनी राजा के पास रहेगा तो कटेहरों की हरकतों पर नज़र रखना आसान होगा। और हुआ भी यही। आगे जाकर चंद राजाओं ने कई मोर्चों पर मुगल राजाओं का साथ दिया।
खैर, रुहेलखंड के नज़दीक होने की वजह से कुमाऊं पर आंवला, बदायूं और कटेहरों के आक्रमण बराबर होते रहे। ये लोग लूटपट करते। यहां के लोगों को बंदी बनाकर ग़ुलाम बनाते और उनका धर्म परिवर्तन करते। इसका एक सबूत ये है कि रोहिला की चेला पलटन में पर्वतीय दासों की सबसे ज्यादा संख्या थी। कई नर-नारियों को बाजारों में बेच दिया जाता था। 1414 में दिल्ली के तख्त पर खिज्र खां नाम का सरदार बैठा।
खिज्र खां 1418 में कटेहर के राजा हरिसिंह का पीछा करते हुए फिर कुमाऊं में पहुंचा। हालांकि हरिसिंह को ना पकड़ पाने की वजह से कुछ महीनों के घेराव के बाद वो वापस चला गया। फिर 1423-24 में सैय्यद मुबारकशाह ने भी यहां पर असफल आक्रमण किया। इनके आक्रमण भले ही असफल रहे लेकिन यहां की जनता का धर्म परिवर्तन ये लोग ज़रूर करते। अभी तक कुमाऊं में धर्म परिवर्तन ही हुआ था। और संभव है कि जब इन पीड़ितों को मौका मिला होगा, ये वापस हिंदू धर्म में आ गए होंगे। लेकिन मुसलमानों के यहां शांतिपूर्ण तरीके से आने की शुरुआत 1545 से मानी जाती है।
मुसलमानों के बसने की शुरुआत
राजा कल्याणचंद ने सरदार खवास खां को 1545 से 1550 के बीच शरण दी थी। खवास खां ने दिल्ली के सुल्तान इस्लामशाह के विरोध में आवाज़ उठाई थी। ये वो दौर था जब राजा या सरदार सैकड़ों लोगों के लाव-लश्कर के साथ ही कहीं पर जाया करते थे। इस लश्कर में उनके सेवक, नौकर और निजी अंगरक्षक हुआ करते थे। ऐसे में खवास खां के साथ कई मुसलमान भी कुमाऊं आए होंगे और इस तरह इनके साथ ही उत्तराखंड में इस्लाम का प्रवेश हुआ माना जाता है। चंद राजाओं में कल्याण चंद एक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने खवास खां को बचाने के लिए दिल्ली दरबार को सीधा जवाब दे दिया था। जब कल्याण चंद खवास खां को सौंपने के लिए तैयार नहीं हुए तब दिल्ली सुल्तान ने धोखे से खवास खां को मरवा दिया। इस जैसी एकाध घटना को छोड़ दें तो चंद राजाओं के मुगल बादशाहों से अच्छे संबंध ही रहे हैं।
मुगलों से मित्रता
राजाओं की मुगलों से मित्रता की वजह से भी कुमाऊं में मुसलमानों का संपर्क बढ़ता गया। मुगल बादशाह अकबर ने राजा रुद्रचंद से प्रसन्न होकर उसे चौरासी माल की जागीर दी। शाहजहां और औरंगज़ेब के शासनकाल में भी ये संबंध परस्पर मज़बूत बने रहे। इन संबंधों की एक झलक हमें 1223 से 1233 के बीच थोरचंद और बाघचंद के शासनकाल में भी नजर आती है। इन दोनों चचेरे भाइयों ने मिलकर कुमाऊं पर शासन किया। इनके पास एक छोटी सी सेना थी जिसमें काली कुमाऊं के सैनिक तो होते ही थे लेकिन ज़्यादातर मैदान से लाए गए मुगल पठान सैनिक थे।
जब हिंदुओं को बनाया गया मुसलमान
बारहवीं शताब्दी से ही बंदी बनाए गए हिंदुओं, सैनिकों और योद्धाओं को जबरदस्ती मुसलमान बनाया जाने लगा। सेना में कई लोग भले ही जन्म से मुसलमान नहीं थे लेकिन उन्हें मुगल पठान कहकर ही पुकारा जाता। आगे जाकर कुमाऊं के राजाओं ने सेना में पठान-रोहिलों को भी भर्ती किया।
जब बाजबहादुर कुमाऊं का राजा बना तो उसने भी मुगल दरबार में हाजिरी दी। बाज बहादुर मुगल दरबार के ठाट-बाट देखकर इतना मुग्ध हुआ कि उसने अपने दरबार को भी वैसे ही बनाने की कोशिश की। इसके लिए उसने कई मुसलमान कर्मचारियों को अथाह पैसा खर्च कर नियुक्त किया। बाज बहादुर ने दरबार में नक्कारे यानी नगाड़ा बजाने के लिए कुछ मुसलमान नक्कारचियों को नियुक्त किया। इन मुसलमानों के परिवारों को अल्मोड़ा के नक्कारची टोला यानी मौजूदा नियाजगंज में बसाया। कुछ चोबदार भी नियुक्त किए गए जो राजा के आगे-पीछे चांदी के भाले लेकर चलते थे।
मुसलमानों की नियुक्ति
कई मुसलमान कर्मचारी भांड्, मिराशी और बहरूपिए बनने के लिए भी नियुक्त किए गए थे। बाद में चंदों के राजनीतिक सलाहकारों और सेनानायकों के रुहेलों से मैत्री संबंध रहे और इस वजह से भी यहां पर मुसलमानों का आना-जाना लगा रहा। राजा मोहनचंद ने 1777 में हुसैनबख्स को माल की जागीर दी थी जिसमें काफी मुसलमान आकर बस गए थे। वहीं, माल तराई के दुर्गों की रक्षा के लिए राजा रुद्रचंद ने हेड़ी मेवाती जाति के मुसलमानों को बसाया और सेना में भर्ती भी किया था।
मुसलमानों का हिंदुओं से विवाह
इस वक्त कुमाऊं में जात-पात की व्यवस्था थी लेकिन उसके बावजूद यहां बसे मुसलमान हरिजन परिवारों की स्त्रियों के साथ विवाह रचा सकते थे। इस तरह मुसलमानों के हिंदू परिवारों में रिश्ते लगने शुरू हुए। इसके अलावा चंद राजाओं ने अपने परिवार और अपने सामंतों की स्त्रियों के सजने के लिए ऐसे मुसलमानों को भी यहां बसाया जिन्हें चूड़ियां, मालाएं, कांच के हार जैसे आभूषण बनाने आते थे। चंद राजाओं ने इन्हें भाबर के टनकपुर के नज़दीक भूमि प्रदान की। साथ ही इन्हें पहाड़ में भी बसाया गया। लोहाघाट-चंपावत मोटर मार्ग से करीब 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित खूना बोरा एक ऐसा ही गाँव है। पहाड़ में मुस्लिम आबादी वाले चंद गांवों में इसे गिना जाता है। यहां रहने वाले लोगों को मनिहार कहा जाता है। मैदानी क्षेत्रों से पहाड़ आकर बसने वाले मुसलमानों में ये सबसे पुराने जान पड़ते हैं। इनमें से कुछ लोग ख़ुद को धामपुर, बिजनौर और कुछ दिल्ली से अपने पूर्वजों के आने की बात कहते हैं।
कुमाऊं में बसने लगे मुसलमान
माल तराई, अल्मोड़ा के अलावा कई नगरों और गांवों में मुसलमान व्यापारी, जोगी, फेरीवाले, तेली, शिकारी, मनिहार, डफलची, मिरासी पहुंचने लगे थे। बाजबहादुर ने मुगलों की देखादेखी करके कई मुसलमान कर्मचारी नियुक्त तो किए लेकिन उनके लिए कोई प्रार्थना स्थल नहीं बनवाया। ऐसा नहीं है कि उसका ये रवैया सिर्फ मुसलमानों को लेकर ऐसा था, हिंदुओं के मंदिरों के लिए भी उसने बहुत ख़ास काम नहीं किया था। तराई भाबर में इसी समय हेड़ी और मेवाती वैतनिक मुसलमानों को कर की वसूली के लिए नियुक्त किया गया। राजा के लिए मिठाई बनाने वाले हलवाई भी मैदान से बुलाए गए। ड्योढ़ी पर दरबान भी मुस्लिम नियुक्त किए गए। यहां मुसलमानों के बसने के क्रम में एक मुख्य पड़ाव 1743-44 में भी आया था।
रुहेलखंड में मची थी हलचल
इस काल में एक तरफ़ रुहेलखंड के सरदार अली मोहम्मद खां ने कुमाऊं पर हमला किया तो दूसरी तरफ, अवध के नवाब मंसूर अली खां ने भी कुमाऊं पर आक्रमण कर दिया। कल्याणचंद ने रोहिलों से लड़ने के लिए अपनी सेना भेजी। दोनों सेनाओं के बीच भीमताल के नीचे छखाता में स्थित विजयपुर में लड़ाई हुई। लेकिन एकता ना होने से कुमाऊंनी सेना बिखर गई और ये भागकर अल्मोड़ा की तरफ़ आ गए और रोहिले भी इनका पीछा करते हुए अल्मोड़ा पहुंच गए। कल्याण चंद डरकर गढ़वाल भागा और अल्मोड़ा रुहेलों के हाथ लग गया।
रोहिलों के डर की वजह से कई लोग मुसलमान बन गए और आज भी अल्मोड़ा में बहुत से मुसलमान हिंदू जाति नाम रखते हैं। और इस तरह जो मुसलमान आज हमें कुमाऊं में नज़र आते हैं, उनके यहां बसने और मुस्लिम बनने का क्रम शुरू हुआ। अब क्योंकि कुमाऊं में मुगलों से संपर्क की वजह से इस्लाम की पहुँच बढ़ रही थी तो गढ़वाल भी इससे कैसे अछूता रहता।
मुगलों के शासनलकाल में गढ़वाल भी मुसलमानों के संपर्क में आने लगा था। 1621 में राजा श्यामशाह जहांगीर के दरबार में पहुँचा था। हालांकि बाद में ये रिश्ते तब तल्ख हो गए जब शाहजहां की ताजपोशी में राजा महिपतिशाह नहीं पहुंचा। इससे शाहजहां श्रीनगर के राजा से नाराज हुआ बैठा था और वह गढ़वाल पर युद्ध करने के एक सही मौके की तलाश में था। ये मौका उसे तब मिल गया जब 1635 में महिपतिशाह की मृत्यु हो गई। महिपतिशाह के नाबालिग पुत्र की संरक्षिका उसकी रानी बनी।
नाक काटी रानी
शाहजहां ने गढ़वाल से सिरमौर के राज्य को वापस लेने के बहाने 1653 में कांगड़ा के फौजदार नवाज़त खां के नेतृत्व में आक्रमण करवाया लेकिन रानी ने मुगलिया सेना को ऐसा सबक़ सिखाया कि उसका नाम ही नाककाटी रानी पड़ गया। इस हार से बौखलाए शाहजहां ने 1654 में फिर गढ़वाल पर आक्रमण बोला। इस दौरान उसने सैकड़ों नर-नारियों की हत्या करने के साथ ही हजारों को ग़ुलाम बनाया और उनका धर्म परिवर्तन कर दिया। हालांकि राजा सहजपाल और बलभद्रशाह के समय में मुगल दरबार के साथ अच्छे संबंध रहे।
इस काल में मुस्लिम धर्म अनुयायियों का गढ़वाल की तरफ़ प्रवास आरंभ हो गया था। बाद में गढ़वाल के राजाओं ने ही कुछ मुसलमानों को शिकारियों के रूप में नियुक्त किया। इसके अलावा बाहर से आने वाले मुस्लिम अतिथियों के लिए खाना बनाने के लिए भी कुछ मुस्लिमों को गढ़वाल में नियुक्त किया गया। इसी तरह 1658 में जब दारा शिकोह का बेटा सुलेमान शिकोह औरंगज़ेब से बचते-बचाते गढ़वाल के राजा पृथ्वीपति शाह की शरण में आया तो उसके साथ दो पेंटर शाम दास और हर दास भी आए थे। साथ ही 18 और लोग भी उसके लाव-लश्कर में शामिल थे। बाद में जब सुलेमान को मेदिनीशाह ने औरंगज़ेब के हवाले कर दिया तो ये सभी लोग यहीं रहे। शाम दास और हर दास की ही चौथी पीढ़ी में मौलाराम का जन्म हुआ था। जिन्हें गढ़वाल पेंटिंग का जनक कहा जाता है।
गढ़वाल में कब आए मुसलमान?
गढ़वाल में मुसलमान ज्यादातर व्यापारिक स्थानों में ही मिलते थे। इनमें से ज़्यादातर मैदानों से ही यहां आए थे। धनाई (तैली चांदपुर), भैरगांव (अजमेर) में कुछ गढ़वाली मुसलमान रहते थे जो मनिहारी यानी चूड़िहारी का काम किया करते थे। इसके अलावा टिहरी के पास भी मुसलमानों का एक गांव था जहां के लोग गर्मियों में मूसरी जाया करते थे और वहां वेटर और खानसामा का काम किया करते थे। हालांकि 20वीं शताब्दी तक भी टिहरी रियासत के ग्रामीण मुसलमानों और हरिजनों में बहुत ज्यादा अंतर नहीं था।
चूड़ेर यानी मनिहारी जाति के इन लोगों के रीति-रिवाज और बोली-भाषा सब गढ़वालियों की तरह ही था। एक प्रथा जो इनमें अलग थी वो ये कि ये लोग मृत को जलाने की बजाय दफनाया करते थे। ये चूड़ेर कहलाते थे क्योंकि ये चूड़ियां बनाए करते थे। हालांकि ये कृषि और दूसरे काम भी किया करते थे। 20वीं सदी की शुरुआत तक ये लोग स्थानीय लोगों की तरह ही नृसिंह, नाग, चंद्रबदनी, भगवती और देवी-देवताओं को पूजा करते थे। ये लोग पहले हिंदुओं से किसी भी तरह का भेदभाव करना नहीं जानते थे। हालांकि राजा कीर्तिशाह ने जब यहां पर एक मदरसा खुलवाया तो उसके लिए मैदान से मौलवी बुलाए गए। और इन मौलवियों ने ही इनके अंदर हिंदुओं से अलग होने की भावना पैदा की।
अंग्रेजों के शासनकाल में बढ़ी आवक
19वीं शताब्दी तक भी गढ़वाल-कुमाऊं में मुसलमान बहुत ज्यादा ना थे। जो थे वो छोटे मोटे काम कर अपना जीवनयापन किया करते थे। देश के दूसरे हिस्सों के मुकाबले उनकी संख्या यहां काफी कम थी। इतनी कम कि उनके पास ना सामूहिक रूप से प्रार्थना करने के लिए कोई मस्जिद थी और ना ही कोई मौलाना ही थे। 1821 में पूरे कुमाऊं में सिर्फ 494 मुसलमान थे। अल्मोड़ा में 57 व्यापारी और 18 मुसलमान नौकर थे।
मुसलमानों की आवक अंग्रेज़ों के शासनकाल में ज्यादा हुई। अंग्रेजों ने मांसाहारी भोजन तैयार करने के लिए कई मुसलमानों को पहाड़ में बसाया। अंग्रेजों ने कई बावर्चियों, बूचर, कसाईयों को नियुक्त किया। इसके अलावा हज्जाम, धोबी, बढ़ई, जुलाहे, लोहार जैसे कामों के लिए भी मुसलमानों को यहां लाया गया। और इन्हें यहीं पर बसाया गया। तराई क्षेत्र में भले ही मध्यकाल में ही ईदगाह बन गई थी लेकिन पहाड़ में नहीं। हालांकि अब अंग्रेजों को इसकी जरूरत महसूस होने लगी थी।
दरअसल ब्रिटिश सेना में कई मुसलमान भर्ती हुए थे और उनके लिए एक गार्डन में करबला नाम से स्थान बनाया गया था। जहां पर ये लोग जाकर तजिया यानी प्रार्थना किया करते थे। बाद में 1829 में कुमाऊं में पहली मस्जिद का निर्माण किया गया। तब भी हिंदुओं ने इसके बनने का विरोध किया था लेकिन तत्कालीन कमिश्नर ट्रेल ने उनकी कुछ शर्तों को मानते हुए मस्जिद के विरोध को ख़ारिज कर दिया। कुमाऊं की पहली मस्जिद अल्मोड़ा में बनाई गई। इसके बाद 1850 में नैनीताल, 1860 में रामनगर और हल्द्वानी, 1890 में काठगोदाम में मस्जिद का निर्माण हुआ। टिहरी रियासत में 20वीं शताब्दी में पहले मदरसा का निर्माण किया गया। देहरादून में भी 1827 तक किसी भी मस्जिद के होने के प्रमाण नहीं मिलते हैं। बाद में राजपुर रोड समेत दूसरी जगहों पर ये बन चुके थे। और इस तरह गढ़वाल-कुमाऊं में इनकी संख्या बढ़ती गई और ये लोग भी देवभूमि के अभिन्न अंग होते गए।
वैसे तो पहाड़ आए मुस्लिमों ने हिंदू आस्था को बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं किया लेकिन मुस्लिम संतों और पीरों का प्रभाव यहां ज़रूर दिखाई देता है। उत्तराखंड में कई स्थानों पर मुस्लिम संतों की मजारों पर हिंदू भी सिर नवाते हैं। इसमें अल्मोड़ा, लालढांग में स्थित कालू सय्यद की मज़ार, श्रीनगर में शाहपीर काकी के तकिए शामिल हैं। इसी तरह की कई मजारें तराई क्षेत्र में भी हैं। और इसी परंपरा का हिस्सा है ये वीडियो जो आपने इस एपिसोड की शुरुआत में देखा था। ये वीडियो टिहरी गढ़वाल के भरपूर गांव का है। ये एक पुराना वीडियो है और इसमें जो हिंदू मुसलमानी कपड़ों में आपको नाचते दिख रहे हैं, ये कोई और नहीं बल्कि सैद यानी सैय्यद हैं।
उत्तराखंड में काफी समय से सैदों की परंपरा है। और इन सैदों को नचाने के लिए सैद्वाली लगाई जाती है। उत्तराखंड में मुसलमानी भूत-प्रेतों को सैद या सैयद कहा जाता है। और इन्हीं से छुटकारा पाने के लिए सैद्वाली मंत्र बोले जाते हैं। गाई जाने वाली सैद्वाली में हमें तुर्कनी के पुत्र वीर मैमंदा यानी मुहम्मद का आह्वान किया जाता है। मैमंदा कोई मुसलमान देवता है जो दास-शिल्पकारों के पूज्य देवता हैं। इन्हें भूत-प्रेत, छल-छिद्र आदि अनिष्टकारी शक्तियों से मुक्ति दिलाने वाला देवता माना जाता है। कुछ लोग ये तर्क भी देते हैं कि जब किसी पर मुसलमानी भूत लगा होगा तो उसने उसे भगाने का तरीका सैद्वाली के रूप में निकाला होगा।
ये तर्क इसलिए भी दिया जाता है क्योंकि सैद्वाली में उर्दू शब्द काफी मिलते हैं। सैद्वाली में उन स्थानों का ज्यादा उल्लेख मिलता है, जहां मुस्लिमों की जनसंख्या ज्यादा है। टिहरी के प्रतापनगर के कांडा गांव समेत कई गांवों में सैद देवता का मंदिर है। सैद्वाली में दलितों के आराध्य देव कलुआ का भी स्मरण किया जाता है। सैद्वाली दलितों पर संत गोरखनाथ और कबीर के व्यापक प्रभाव का नतीजा बताया जाता है।
तो ये थी पूरी कहानी मुस्लिमों के उत्तराखंड में बसने की। आज भले ही मजारों को उजाड़ना एक उपलब्धि मानी जा रही है लेकिन एक वक्त था जब उत्तराखंड में मुस्लिम हिंदू त्योहारों में भागी बनते थे। पहाड़ों में होने वाले रामायण मंचन को सफल बनाने में भी इनकी भूमिका होती थी। आक्रांताओं को अगर छोड़ दें तो आम लोग फिर चाहे वह मुस्लिम हो या फिर हिंदू, पहाड़ के सभी लोगों ने मिलजुल कर रहना सीखा है। अब ये फैसला मैं आप पर छोड़ता हूं कि आप किस दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं।
