मुलायम सिंह: जो था कभी उत्तराखंड का हीरो, कैसे बन गया पहाड़ का विलन?
मुलायम सिंह यादव
1992 का साल था। तब सामाजिक जनता पार्टी से जुड़े मुलायम सिंह यादव ने एक बड़ी घोषणा की। उन्होंने कहा कि अगर भविष्य में सामाजिक जनता पार्टी की सरकार यूपी में बनती है तो वह अलग उत्तराखंड राज्य की मांग के लिए केंद्र को प्रस्ताव भेजेंगे। लेकिन पार्टी ने यादव के बयान से किनारा कर दिया। पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर जब टिहरी पहुंचे तो उन्होंने साफ किया कि उनकी पार्टी छोटे राज्यों के पक्ष में नहीं है। इस बात को लेकर मुलायम की चंद्रशेखर से तकरार भी हुई और ये तकरार इतनी बढ़ गई कि मुलायम ने अलग होने का फैसला कर लिया। इसके बाद देहरादून में विनोद बड़थ्वाल, सूर्यकांत धस्माना, रामशरण दास और मुलायम सिंह यादव ने एक खास मीटिंग की। इस मीटिंग में चंद्रशेखर के बयान को अलग उत्तराखंड राज्य के विरोध में करार दिया गया। और तय किया गया कि समाजवादी पार्टी नाम से एक नया राजनीतिक संगठन बनाया जाएगा। इस तरह 4 अक्टूबर, 1992 को मुलायम ने लखनऊ में समाजवादी पार्टी के गठन का आधिकारिक ऐलान कर दिया।
वह मुलायम सिंह यादव ही थे जिन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद अलग उत्तराखंड राज्य के लिए कौशिक समिति बनाई। वो यहीं नहीं रुके। उन्होंने पार्टी स्तर पर भी विनोद बड़थ्वाल की अध्यक्षता में एक और कमिटी बनाई। और इसे अलग राज्य बनाने की पूरी संभावनाओं को आंकने का काम सौंपा गया। 1993 के उस दौर में मुलायम उन नेताओं में से थे जो अलग उत्तराखंड राज्य के पक्ष में मुखर होकर बोल रहे थे। मुलायम पहाड़ियों के हीरो बन चुके थे। समाजवादी पार्टी में शामिल होने के लिए पहाड़ में लाइन लग जाती थी। लेकिन मुलायम के एक फैसले ने सबकुछ बदल कर रख दिया। जो मुलायम सिंह एक वक्त में उत्तराखंड के सबसे बड़े हीरो थे, वही यहां के सबसे बड़े विलन भी बन गए। जिसे हिमालय पुत्र की उपाधि दी गई, उसी ने बाद में पहाड़ को हिंसा की आग में ढकेल दिया। और आज तक मुलायम को पहाड़ी एक विलन के तौर पर ही देखते हैं। और ऐसा होना भी लाजमी है। हिल जात्रा की इस खास सीरीज नेताजी में आज कहानी मुलायम सिंह की। कहानी जो बताती है कि कैसे पहाड़ों का मसीहा बन चुके मुलायम यहां के सबसे बड़े विलन साबित हुए।

अगर कॉमरेड पी सी जोशी को छोड़ दें तो राष्ट्रीय स्तर पर पहाड़ का कोई भी नेता अलग उत्तराखंड राज्य के पक्ष में नहीं था। मुलायम सिंह यादव भी पहले इसी कतार में खड़े थे। वह भी पृथक उत्तराखण्ड राज्य के विरोधी थे। वह कहते थे कि उत्तराखंड यूपी का सिर है और इसे कभी कटने नहीं देंगे। (उत्तराखंड राज्य आंदोलन का इतिहास, pg १०१) 1991 में जब भाजपा ने अलग उत्तरांचल राज्य का प्रस्ताव केंद्र को भेजा तब मुलायम ये कहकर इसके खिलाफ हुए थे कि ये देश हित के विरोध में है लेकिन 1992 के बाद मुलायम के सुर बदलने लगे। वह अलग उत्तराखंड राज्य के समर्थन में खड़े हो गए। सिर्फ खड़े नहीं हुए बल्कि उन्होंने सबसे ज्यादा सार्थक प्रयास भी किए। भले ही वो प्रयास खुद को बचाने के लिए ज्यादा थे लेकिन फिर भी प्रयास तो किए थे। और इस तरह हमें मिलते हैं द हीरो-मुलायम सिंह।
द हीरो
साल 1992 में समाजवादी पार्टी का देहरादून में अधिवेशन हुआ। इसमें सपा बनने के बाद पहली बार मुलायम सिंह ने अलग उत्तराखंड राज्य के समर्थन में सार्वजनिक ऐलान किया। सपा के चुनावी घोषणापत्र में भी अलग उत्तराखंड राज्य के गठन की बात रखी। 1993 में सपा ने बहुजन समाजवादी पार्टी के साथ यूपी में सरकार बनाई और मुलायम मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री बनने के बाद मुलायम सिंह अलग उत्तराखंड राज्य के गठन के लिए कितने गंभीर थे, ये अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि उन्होंने दो समितियां गठित कीं। कैबिनेट मंत्री रामाशंकर कौशिक की अध्यक्षता में कौशिक कमिटी बनाई गई तो वहीं, विनोद बड़थ्वाल की अध्यक्षता में दूसरी कमिटी बनाई गई ताकि जनभावनाओं का भी समावेश किया जा सके।
मुलायम सिर्फ कमिटी बनाने तक सीमित नहीं रहे। (उत्तराखंड आंदोलन स्मृतियों का हिमालय, Pg-51) जून, 1994 में उन्होंने कौशिक समिति की सिफारिशों को ना सिर्फ माना बल्कि यादव के कार्यकाल में ही पहली बार उत्तराखण्ड विकास विभाग के लिए अपर मुख्य सचिव की नियुक्ति की गई थी। कौशिक कमिटी की रिपोर्ट को स्वीकार करने के बाद मुलायम पहाड़ के हीरो बन गए थे। पहाड़ में सपा में शामिल होने की होड़ सी लग गई थी। नेता दूसरे दलों को छोड़कर सपा में भविष्य तलाशने लगे थे।

देहरादून के FRI में उत्तराखंड के पूर्व फौजियों ने मुलायम सिंह का सम्मान किया। समारोह में यादव को उत्तराखंड का सबसे बड़ा हितैषी, विकास पुत्र और हिमालय पुत्र जैसी कई उपाधियों से नवाजा गया। उन्हें हेमवती नंदन बहुगुणा से भी बड़ा नेता साबित करने की कोशिश की गई। मुलायम ने उत्तर प्रदेश विधानमंडल में उत्तराखंड राज्य विधेयक पारित कर केंद्र को भी भेजा। अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को समर्थन से पहाड़ में समाजवादी पार्टी की मजबूती और मुलायम सिंह का कद लगातार बढ़ रहा था लेकिन तब आया 10 मई, 1994 का दिन।
मुलायम सरकार ने आदेश निकाला कि राज्य के तमाम डिग्री कॉलेज और विश्विविद्यालय अपने यहां 50 प्रतिशत आरक्षण लागू करें। यानि कि पहले से ही मौजूदा अनुसूचित जाति-जनजाति के 23 प्रतिशत के अलावा 27% अन्य पिछड़ी जातियों यानी OBC के लिए दाखिले में आरक्षण। ये फैसला आया ही था कि हलचल शुरू होने लगी। हालांकि अभी भी मुलायम की छवि पर इस फैसले की वजह से कुछ खास असर नहीं पड़ा था। 17 जून, 1994 को इस आदेश की अधिसूचना लागू होने के बाद पहाड़ में सुगबुगाहट होने लगी थी। इसके बावजूद जुलाई, 1994 में FRI में मुलायम का सम्मान किया गया था। लेकिन धीरे-धीरे मुलायम की आरक्षण को लेकर जिद ने उन्हें पहाड़ का सबसे बड़ा विलन बना दिया।
द विलन
मुलायम सिंह यादव पर आरक्षण लागू करने का फितूर इस कदर हावी था कि उन्होंने साम-दाम-दंड-भेद सब लगा दिए। मई, 1994 में जब OBC आरक्षण का फैसला आया तो यूपी की 13 यूनिवर्सिटीज ने इसे लागू करने से इनकार कर दिया क्योंकि वे स्वायत्त यानी सोवरेन थीं। आनन-फानन में मुलायम सरकार ने कानून में संशोधन किए और इन यूनिवर्सिटीज को इसे लागू करने का अध्यादेश भेज दिया। पहाड़ी भाग में क्योंकि पिछड़ी जातियां तत्कालीन 8 जिलों में 2-3 फीसदी ही थीं तो पहाड़ी इस फैसले के विरोध में उतरने लगे। इस फैसले का विरोध सबसे पहले छात्रों ने शुरू किया। पहाड़ के छात्रों को डर सताने लगा कि आरक्षण लागू होने से पहाड़ की सरकारी सेवाओं और शिक्षण संस्थानों में मैदानी क्षेत्रों से आकर लोग काबिज हो जाएंगे।

छात्रों ने महसूस किया कि इस फैसले के बाद उनसे उत्तराखंड में मौजूद सरकारी नौकरियां भी छीनी जा सकती हैं। उत्तराखंड संयुक्त छात्र संघर्ष समिति और संयुक्त छात्र संघर्ष मोर्चा जैसे संगठनों के बैनर तले आंदोलन शुरू हो चुका था। जगह-जगह विरोध प्रदर्शन होने लगे थे। खुद मुलायम सिंह यादव को ऐसे विरोध की उम्मीद नहीं थी। और होती भी कैसे। अभी तक मैदान में बैठी सरकारें जो भी फैसले लेती थीं, वो पहाड़ विरोधी होने के बावजूद भी पहाड़ी जनता मन मसोसकर मान लेती थी। इसलिए मुलायम सिंह भी इस आंदोलन को बहुत गंभीरता से लेने के मूड में नहीं थे। और यही उनकी बड़ी गलती साबित होने वाली थी।
2 अगस्त, 1994 को इस आंदोलन में उत्तराखंड क्रांति दल भी कूद पड़ा। इंद्रमणि बडोनी के नेतृत्व में पौड़ी में आमरण अनशन शुरू किया गया। 8 अगस्त को अनशन पर बैठे यूकेडी के नेताओं को जबरदस्ती उठाकर मेरठ मेडिकल कॉलेज में शिफ्ट कर दिया गया। इस दौरान हुए लाठीचार्ज और गोलीबारी ने इस आंदोलन को पूरे उत्तराखंड में फैलाने में मदद की।
यहां ये जानना बहुत जरूरी है कि अभी तक ये आंदोलन सिर्फ छात्रों का आंदोलन था और इसमें अलग उत्तराखंड राज्य की मांग कहीं भी शामिल नहीं थी। उग्र होते आंदोलन को देख मुलायम की पेशानी पर बल पड़ने लगा था। मुलायम ने उत्तराखंड में सपा नेता विनोद बड़थ्वाल के जरिए छात्रों से बातचीत की पेशकश की। मुलायम ने बड़थ्वाल के जरिए 3 फॉर्मूला भी छात्रों तक पहुंचाए थे। पहला फॉर्मूला ये था कि जब दाखिले शुरू होंगे तब अगर पहले 15 दिनों के भीतर पर्वतीय क्षेत्रों में ओबीसी छात्र प्रवेश लेने नहीं आते हैं तो खाली आरक्षित स्थानों पर सामान्य वर्ग को दाखिला दिया जाएगा।
मुलायम के दूसरे फॉर्मुले के मुताबिक पर्वतियों को पहाड़ के बाहर के जिलों में नौकरी में 2% आरक्षण दिया जाएगा। उन्होंने ये फॉर्मूला भी रखा कि पर्वतीय क्षेत्रों के सरकारी दफ्तरों में तीसरी और चौथी श्रेणी के पद केवल स्थानीय लोगों से भरे जाएंगे। एक तरफ यहां मुलायम छात्रों से बातचीत की पेशकश कर रहे थे तो दूसरी तरफ, आगरा-ऋषिकेश पैसेंजर ट्रेन रोकने वाले छात्रों और महिलाओं को बुरी तरह पीटा जा रहा था। 14 अगस्त को बातचीत की पेशकश रखी गई लेकिन छात्रों ने इसे खारिज कर दिया।

अभी तक भी आंदोलन आरक्षण विरोध तक ही सीमित था लेकिन मुलायम के एक बयान ने इस आरक्षण विरोधी आंदोलन को अलग उत्तराखंड राज्य की मांग में तब्दील कर दिया। 17 अगस्त, 1994 को मुलायम सिंह यादव ने बाकायदा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आंदोलनकारियों को धमकाने की कोशिश की। मुलायम ने पहाड़ियों को मैदानी क्षेत्रों से खदेड़ देने की चेतावनी तक दे डाली। मुलायम ने कहा कि मैं जरा भी इशारा कर दूं तो मैदानों में हमारे लोग जवाब दे देंगे। पर अभी मैंने मना किया है।
मुलायम ने कहा, “उत्तराखंड की 19 विधानसभा सीटों में से सिर्फ एक पर मेरी पार्टी जीती है। मैं उत्तराखंड की बदौलत सत्ता में नहीं हूं। मुझे इसकी परवाह नहीं है कि पहाड़ के लोग क्या सोचते हैं। क्योंकि ये मेरे मतदाता नहीं हैं। आरक्षण के सवाल पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। और अगर पहाड़ के लोग 27% आरक्षण के ख़िलाफ़ हैं तो इन लोगों को मैदान में क्यों आरक्षण मिले?”
मुलायम ने कहा कि पहाड़ में तो कोई नौकरी करने तक नहीं जाता तो पढ़ाई करने कौन जाएगा। उन्होंने कहा कि खुद पहाड़ी अफसर पहाड़ पर जाने से कतराते हैं। मुलायम सिंह के इस बयान ने जैसे उत्तराखंड की आत्मा को झकझोकर कर रख दिया। लोगों ने इसे अपने आत्मसम्मान पर चोट की तरह लिया। अब ओबीसी आरक्षण पीछे छूट गया और अलग उत्तराखंड राज्य का मुद्दा आंदोलन का मुख्य विषय बन चुका था। हालांकि मुलायम दूसरी ही रणनीति बनाने में जुटे हुए थे। मुलायम उत्तराखंड पर आरक्षण का फैसला थोपकर यूपी के मैदानी क्षेत्र के 27% OBC वोटरों को अपनी तरफ करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने जानबूझकर उत्तराखंड में आंदोलन को भड़कने दिया। मुलायम की रणनीति थी कि उत्तराखंड में आरक्षण का जितना विरोध होगा, उतना ही वो ओबीसी वोटरों के करीब आएंगे। इसके लिए 13 सितंबर, 1994 को आरक्षण के समर्थन में राज्य बंद बुलाया गया।
मुलायम ने अपने पार्टी से जुड़े कुछ छात्र नेताओं के जरिए इस आंदोलन को तोड़ने की कोशिश भी की। दूरदर्शन पर कुछ छात्र नेताओं से घोषणा करवाई गई। इसमें छात्रों के जरिए कहा गया कि उत्तराखंड के छात्र अपना आंदोलन वापस लेने को तैयार हो गए हैं और बदले में उत्तराखंड के शिक्षण संस्थानों में 50 प्रतिशत स्थानों की बढ़ोतरी की जाएगी। साथ ही छात्रों को बस किराए में 50% की छूट दी जाएगी। दूरदर्शन पर इस घोषणा को सुनकर आंदोलनकारी ओर उग्र हो गए और घोषणा करने वाले छात्र नेताओं के घरों पर पथराव होने लगा। अक्सर कुमाऊं-गढ़वाल में बंटा रहने वाला उत्तराखंड पहली बार जै उत्तराखंड के नारे लगाने के लिए साथ आ चुका था।
धरने प्रदर्शन, लाठीचार्ज जैसी खबरें अब आम हो गई थीं। इसी बीच, विधानसभा का मॉनसून सत्र शुरू हुआ लेकिन मुलायम सरकार भारी मांग के बावजूद उत्तराखंड के मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार नहीं थी। 23 अगस्त को पूरे पहाड़ में बंद का ऐलान किया गया और ये काफी सफल भी रहा। लेकिन इसके बावजूद मुलायम ने साफ कर दिया कि आरक्षण का फैसला रद्द नहीं होगा।
चौतरफा आलोचना से घिरे मुलायम ने 24 अगस्त को विधानसभा में आनन-फानन में अलग उत्तराखंड राज्य का प्रस्ताव पारित करा दिया। लेकिन अब तक बहुत देर हो चुकी थी। अब उत्तराखंडियों को मुलायम पर रत्ती भर भरोसा भी नहीं था। इस वजह से इस कदम का बहुत ज्यादा असर नहीं हुआ। 25 अगस्त को उत्तराखंड के विधायकों के साथ हुई बैठक में मुलायम छात्रों से 2 सितंबर को बातचीत के लिए तैयार हो गए। इस बीच, 25 अगस्त को लोकसभा में भी अलग उत्तराखंड राज्य का मुद्दा उठा। कई सांसदों ने चेताया कि अगर उत्तराखंडियों की मांग नहीं मानी जाती है तो आंदोलन गंभीर मोड़ ले सकता है।
लेकिन मुलायम इसके बावजूद गलत बयानबाजी से बाज नहीं आ रहे थे। 29 अगस्त को गाजियाबाद में उ्न्होंने फिर दोहराया कि वो आरक्षण का फैसला वापस नहीं लेंगे। मुलायम के इस अडियल रवैए की वजह से अब आंदोलन उग्र होने लगा था। इस वजह से 2 सितंबर को तय मीटिंग में छात्रों ने जाने से इनकार कर दिया। अब मुलायम बौखला चुके थे और उन्होंने हिंसा के बल पर आंदोलन को दबाने की कोशिश की। इसका सबसे पहला नमूना 1 सितंबर, 1994 को खटीमा गोलीकांड के तौर पर दिखा। यहां पर पुलिस की गोलीबारी में 7 लोग शहीद हो गए। खटीमा कांड के विरोध में 2 सितंबर को मसूरी में विरोध प्रदर्शन हुए। यहां भी पीएसी जवानों की गोलीबारी में 7 लोग मारे गए।
अब तक उत्तराखंड आंदोलन पर मौन रहे मौनी बाबा यानी नरसिम्हा राव ने मुलायम को तलब किया। बैठक में मुलायम ने कहा कि वो बातचीत से हल निकालेंगे लेकिन जब मीडिया ने उनसे इस बारे में पूछा तो उन्होंने कुछ भी नहीं कहा। जैसे कि वो ये हिंसा जारी रखना चाहते थे। दूसरी तरफ, सपा के नेता बेनी प्रसाद वर्मा अपने कार्यकर्ताओं को उकसा रहे थे कि आंदोलनकारियों के खिलाफ डंडा उठाओ। फिर भले ही इसके लिए सौ दो सौ लोगों को कुर्बानी देनी पड़े। लखनऊ में आंदोलन को लेकर मीडिया को गलत जानकारी दी जाती थी। मायावती आंदोलनकारियों को देशद्रोही कह चुकी थी। और मुलायम बैठकें तो बुलाते लेकिन पुराना ही राग अलापते रहते।
13 सितंबर को सपा-बसपा ने बंद बुलाया लेकिन उत्तराखंड में सब कुछ खुला रखा गया। इस बंद में भी नौ लोग मारे गए। मुलायम सरकार के तरीकों से साफ हो गया था कि वो अब खुन्नस निकालने का काम कर रही है। आंदोलनकारियों पर गलत धाराओं में मुकदमे दर्ज किए गए। मुलायम ने खटीमा और मसूरी गोलीकांड की अदालती जांच से इनकार कर दिया। और फिर दोहराया कि आरक्षण पर कोई बात नहीं होगी। पूरे सितंबर महीने में आंदोलनों का उग्र दौर जारी रहा। केंद्र सरकार बैठक-बैठक खेल रही थी और मुलायम अपना उल्लू सीधा करने में जुटे हुए थे। अलग उत्तराखंड के इस आंदोलन को सबसे बड़ा झटका एक-दो अक्टूबर, 1994 को लगा।
मुलायम नहीं चाहते थे कि आंदोलनकारी दिल्ली जाएं। यही वजह थी कि एक अक्टूबर की शाम तक आंदोलनकारियों को दिल्ली जाने के लिए बसों के परमिट नहीं दिए गए। परमिट पाने के लिए हल्द्वानी में भरत दीक्षित ने आत्मदाह का प्रयास किया तो वहीं, ताराशंकर जोशी ने एक ऊंचे पेड़ से छलांग लगा दी। दोनों जब घायल हुए तब जाकर कहीं परमिट जारी किए गए। और फिर 1-2 अक्टूबर की दरमियानी रात जो बर्बरता हुई, वो इतिहास में दर्ज है।
मुजफ्फरनगर कांड ने पूरे उत्तराखंड को तोड़ कर रख दिया था। जिस तरह की बर्बरता वहां आंदोलनकारियों और पहाड़ की महिलाओं के खिलाफ हुई थी, उससे आंदोलनकारियों का मनोबल टूटने लगा था। इतनी बड़ी घटना होने के बाद भी ना केंद्र और ना ही राज्य सरकार मुजफ्फरकांड की सीबीआई जांच को तैयार थी। फिर उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और सीबीआई जांच शुरू हुई। मुलायम ने भारी मन से सीबीआई जांच स्वीकार की।
लेकिन मुलायम लगातार कह रहे थे कि वहां महिलाओं के साथ कुछ भी नहीं हुआ। मायावती दोषी पुलिसवालों को बचाने की कोशिश में ही जुटी रही। जनवरी, 1995 में सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में पुष्टी की थी कि उत्तराखंड की महिलाओं के साथ पुलिस ने सामूहिक दुष्कर्म किया। 17 अन्य महिलाओं के साथ भी दुर्व्यवाहर की पुष्टी की गई। सीबीआई ने एसपी, डीआईजी समेत कई पुलिस अधिकारियों को आरोपी ठहराया।

सीबीआई ने कोर्ट में बताया कि राज्य पुलिस ने जांच में सहयोग नहीं किया। इतना सबकुछ होने के बावजूद केंद्र ने साफ कर दिया था कि अलग उत्तराखंड राज्य नहीं बनेगा। मुलायम भी कुछ इसी तरह की बयानबाजी कर रहे थे। लेकिन देशभर में कड़े विरोध के बाद मुलायम के सुर बदलने लगे थे। मुलायम ने घड़ियाली आंसू बहाते हुए रामपुर तिराहा कांड पर दुख जताया और साथ ही कहा दुष्कर्म की बात सच निकली तो वो माफी मांगेंगे। वो बात अलग है कि पुष्टी होने के दो दशक बाद भी मुलायम ने माफी नहीं मांगी। हालांकि अमर उजाला की एक रिपोर्ट में लिखा गया है कि मुलायम ने माफी मांगी थी। हालांकि कब मांगी थी, ये पता नहीं।
खैर, आखिरकार देश-विदेश में छिछालेदर होने के बाद कांग्रेस के लिए मुलायम सरकार को समर्थन जारी रख पाना मुश्किल हो गया। और 31 जनवरी, 1995 को कांग्रेस ने अपना समर्थन वापिस ले लिया। मुलायम सरकार अल्पमत में आ गई। और इस तरह एक वक्त में उत्तराखंड का हीरो बने मुलायम यहां के सबसे बड़े विलन बन चुके थे और आज भी हैं। आंदोलन मुलायम के हटने के बाद भी जारी रहा और आखिरकार 9 नवंबर, 2000 में हमें अपना उत्तराखंड मिला। लेकिन क्या एक वक्त में मुलायम सच मे उत्तराखंड के हीरो थे तो जवाब है नहीं।
ऊपर से देखें तो मुलायम शुरुआती दौर में उत्तराखंड के हीरो जरूर नजर आते होंगे। लेकिन मुलायम उत्तराखंड के हीरो कभी थे ही नहीं। क्योंकि अलग उत्तराखंड राज्य का समर्थन करने से पहले वह इसके विरोध में थे। और सिर्फ राजनीतिक लाभ लेने के लिए ही उसने अलग उत्तराखंड राज्य का समर्थन किया था। लेकिन जब उन्हें लगा कि यहां से कुछ नहीं मिलने वाला तो उन्होंने वो काम करना शुरू किया जिससे वो विलन बन गए और हमेशा बना रहेगा। आप इस पर क्या राय रखते हैं, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
