पैरों से खाना परोसने से लूण लौटा तक, जानें- उत्तराखंड की अनोखी परंपराएं

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उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में कई ऐसे राज छुपे हैं जिन्हें सुनकर दुनिया हैरान हो जाती है लेकिन उत्तराखंड की धरती सिर्फ रहस्यों से नहीं बल्कि अनोखी और अलग परंपराओं से भी भरी पड़ी है। कुछ ऐसी परम्पराएं जिन्हे देख और सुनकर आप शायद बोल उठें-ये कैसे हो सकता है? इन परंपराओं में जहां कुछ आपको अद्भुत लगेंगी तो कुछ आपको अचंभे में डाल देंगी।

बहुपति प्रथा
बहुपति प्रथा को अंग्रेजी में polyandry कहते हैं। इसका मतलब होता है कि एक ही महिला के अनेक पति। उत्तराखंड में ये प्रथा पश्चिमी टिहरी और जौनसार बावर क्षेत्र में एक वक्त में काफी ज्यादा चलन में थी। हालांकि अब ये लगभग पूरी तरह खत्म हो चुकी है। उत्तराखंड के अलावा हिमाचल और तिब्बत में भी इस प्रथा का प्रचलन होने का उल्लेख मिलता है। साथ ही दक्षिण भारत और नॉर्थ ईस्ट में भी कई जनजातियां ऐसी हैं जहां ये प्रथा आज भी चल रही है। कई पति होने का ये मतलब नहीं है कि महिला किसी से भी शादी कर सकती है बल्कि इस प्रथा के हिसाब से एक महिला को घर के सभी भाइयों से शादी करनी होती है। पहले महिला अपने पति से शादी करती है फिर उसका विवाह उसके भाइयों से भी हो जाता है। इस प्रथा का प्रभाव सबसे ज्यादा हिमाचल के किन्नौर में देखा जाता है, यहां इसे घोटुल प्रथा कहा जाता है।

इस रिवाज को लेकर मान्यताएं महाभारत से भी जुड़ी हैं। कहा जाता है कि महाभारत काल में अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने हिमाचल और उत्तराखंड की इन पहाड़ियों में काफी समय बिताया था। माना जाता है कि तभी से इन क्षेत्रों में ये परम्परा चलन में रही। हालांकि एक और वजह जो गिनाई जाती है वो है जमीन की कमी होना। दरअसल पहाड़ी क्षेत्रों में खेती से उपज बहुत ज्यादा नहीं होती है। ऐसे में चार भाइयों के लिए चार शादियां करने से घर का खर्च बढ़ता है और उपज पूरी ना होने की आशंका रहती है। ऐसे में खेतों की उपज का बंटवारा होने से बचने के लिए भी इस तरह के विवाह किए जाते रहे हैं। 

इस प्रथा का सबसे बड़ा सबूत 1911 की जनगणना है जिसमें देश के उन इलाकों का उल्लेख है जहां बहुपति प्रथा चलन में थी। कुछ रिपोर्ट्स की मानें तो इस विवाह में तलाक का भी रिवाज होता है। इसके लिए सभी भाइयों को साथ जाकर तलाक की पारंपरिक परंपरा को पूरा करना होता है। इसमें दोनों पक्षों के बीच लोग बैठते हैं। एक सूखी लकड़ी लाई जाती है और उस लकड़ी को तोड़ दिया जाता है। लकड़ी तोड़ने का मतलब होता है कि उनके बीच अब तलाक हो गया है और इसके बाद संबंध खत्म हो जाता है। हालांकि तलाक के बाद कई बार फिर सहमति बनने पर दोबारा शादी का भी प्रावधान होता है।

 

पैरों से खाना देने वाली प्रथा 

हाथों से खाना तो पूरी दुनिया में दिया जाता है लेकिन उत्तराखंड में एक ऐसा समाज है जहां पर महिलाएं पैरों से थाली सरकाकर खाना परोसती हैं और इसका कोई भी बुरा नहीं मानते। ये प्रथा थारू जनजातियों में मानी जाती है। इस प्रथा का मुगलों के वक्त से होने के पीछे भी थारू जनजाति का इतिहास ही है। थारू जनजाति राजस्थान के थार रेगिस्तान से निकल कर उत्तराखंड, नेपाल, उत्तर प्रदेश और बिहार के तराई क्षेत्रों में बसे। थार रेगिस्तान से निकलने की वजह से ही इनका नाम थारू पड़ा।  

अलग-अलग जगहों पर मौजूद जानकारी के मुताबिक जब मुगलों ने राजस्थान के इलाकों में हमला किया तब वहां के राजपूतों ने अपने सेवकों और दासों संग अपनी रानियों और परिवार को हिमालय तलहटी के जंगलों में भेज दिया। लंबे इंतजार के बाद भी जब उनके परिवार के पुरुष वापस नहीं आ सके तो रानियों ने उन दासों के साथ विवाह कर लिया और अपने वंश को आगे बढ़ाया। बताया जाता है कि रानियों ने भले ही वंश बढ़ाने के लिए अपने दासों से विवाह कर लिया लेकिन वो दासता वाला भाव हमेशा उनके जेहन पर रहा। यही वजह थी कि ये रानियां उन्हें दासों की तरह देखती थीं और उन्हें पैरों से थाली सरका कर ही उन्हें खाना परोसा। हालांकि बदलते वक्त और परिवेश के साथ इस समाज में इस प्रथा का चलन काफी कम हो गया है।

इस प्रथा का एक दूसरा पहलू यह भी है कि थारु समाज में महिलाओं का वर्चस्व आज भी होता है। घर में महिलाओं का निर्णय ही सर्वोपरि होता है। उत्तराखंड के खटीमा, नैनीताल और उधमपुर नगर में आपको थारू जनजाति के लोग मिल जाते हैं। उत्तर भारत के हिंदू रीति-रिवाजों की अपेक्षा थारू समुदाय की महिलाओं को संपत्ति में मजबूत अधिकार प्राप्त हैं।

लूण लोटा   

जैसे कि आपको इस प्रथा के नाम से ही अंदाजा लग रहा होगा कि यहां बात लूण यानि नमक और लोटे की हो रही है। ये सुनने में जितना साधारण लगता है, ये उतनी ही मुश्किल और जानी-मानी प्रथा है। दरअसल लूण लौटा कसम खिलाने की एक प्रथा है। इस प्रथा के तहत जिस व्यक्ति ने जो कसम खाई है, उसे वो पूरी करनी ही होती है। अगर उसने ऐसा नहीं किया तो माना जाता है कि उसको इसके बड़े भयंकर परिणाम भुगतने होते हैं। इस प्रथा का प्रचलन काफ़ी लम्बे वक़्त से हिमालयी क्षेत्रों में रहा है। खासकर उत्तराखंड और हिमाचल में।

यहां की संस्कृतियों में देवताओं पर अटूट विश्वास की परम्परा हमेशा से रही है। इस प्रथा का इस्तेमाल विवादों का निपटारा करने के लिए किया जाता है। आपसी मतभेद को सुलझाने का ये एक शांतिपूर्ण तरीका था। हालांकि बदलते वक्त के साथ अब इसका इस्तेमाल चुनावों में भी किया जाता है। बीबीसी हिंदी की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रथा का इस्तेमाल पंचायती चुनावों में काफी ज्यादा होता है।ये यहीं तक सीमित नहीं है। कई लोग तो विधानसभा और लोकसभा चुनाव में भी इसका इस्तेमाल करने से गुरेज नहीं करते।

अब ये परंपरा निभाई कैसे जाती है, वो भी जान लीजिए। अगर किसी व्यक्ति को किसी से कसम खिलवानी है तो वह पानी से भरे लौटे में उस शख्स से नमक डलवाएगा और इस दौरान वो शख्स कसम खाएगा। अब इस प्रथा के तहत कसम खाने के बाद वह किसी भी सूरत में अपनी कसम नहीं तोड़ सकता। माना जाता है कि अगर कसम तोड़ी गई तो जिस तरह पानी में नमक घुला है, उसी तरह वह शख्स भी नष्ट हो जाएगा यानी कि उसके जीवन में दुखों का पहाड़ टूट पड़ेगा और उसे काफी नुकसान झेलना पड़ सकता है। माना जाता है कि कसम तोड़ने पर देवता रुष्ट हो जाते हैं और वो फिर नुकसान पहुंचाते हैं। 

उत्तराखंड के जौनसार-बावर के साथ ही हिमाचल के कई क्षेत्रों में ये प्रथा आज भी व्याप्त है। इसके अलावा कसम खाने और सच और झूठ का पता करने के लिए मंदिर के सामने पानी पिलाने और चावल देने की भी प्रथा है। हिमाचल के लाहौल-स्पीति में तो जाप के लिए इस्तेमाल की जाने वाली माला के जरिए भी कसम खिलाई जाती है।

जांजड परंपरा  

आम तौर पर दूल्हा अपनी बारात लेकर दुल्हन के घर जाता है लेकिन उत्तराखंड के जौनसार बावर में नहीं। जौनसार-बावर में एक ऐसा क्षेत्र है जहां दुल्हन बारात लेकर दूल्हे के घर जाती है। सिर्फ यही नहीं, कबायली संस्कृति की इन शादियों में महिलाओं की काफी ज्यादा अहमियत भी होती है। यही वजह है कि यहां पूरे गांव की महिलाओं को अलग से भोज करवाया जाता है। इस परंपरा को रहिंन जिमाना कहा जाता है। दुल्हन जब दूल्हे के घर बारात लेकर आती है तो बारात मेहमानों को लेकर दूसरे दिन लौट जाती है। लेकिन दुल्हन दूल्हे के घर पर 5 दिन तक रहती है। दुल्हन की बारात को ही जाजड़ा कहा जाता है और बारातियों को जोजोड़ा कहा जाता है। इसी से इस विवाह का नाम जोजोड़ा विवाह भी पड़ा है।

आजकल जहां लोग शादियों पर लाखों रुपए खर्च करते हैं, वहीं जौनसार बावर में शादी में दिखावा करना काफी ज्यादा खराब माना जाता है। शादी परंपराओं के हिसाब से करना बेहद जरूरी होती है। अगर किसी ने शादी में अमीरी दिखाने की कोशिश की और बहुत पैसा खर्च किया तो पूरा गांव उसका विरोध करता है। सदियों से चली आ रही ये परंपरा आज भी कई जगहों पर कायम है। जाजड़ परंपरा की शादी की एक और खास बात है, वो है विदाई। 

यहां जब विदाई का वक्त आता है तो दुल्हा–दुल्हन के परिवार वाले छत पर खड़े हो जाते हैं और गाना गाने लगते हैं। गाने के जरिये लड़के वाले लड़की पक्ष से कहते हैं कि सेवा में कुछ भूल–चूक हुई हो तो हमें माफ कर देना। वहीं, लड़की के पक्ष वाले कहते हैं आपने हमारी काफी सेवा की। हमारी लड़की जब आपके घऱ में रहना शुरू करेगी तो आप उसके साथ भी ऐसा ही व्यवहार करें। इस सुंदर शादी की परंपरा को यहां के लोग आज भी निभाते हैं।

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