बद्री प्रसाद बमोला: वो उत्तराखंडी जो फिजी का महाराजा बना

बद्री प्रसाद बमोला

बद्री प्रसाद बमोला

उत्तराखंड के कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने देश-विदेश में इस धरती का नाम शुमार किया लेकिन आज उनके बारे में कम ही लोग जानते हैं। ऐसे ही एक शख्स थे- बद्री प्रसाद बमोला। बद्री प्रसाद बमोला रुद्रप्रयाग के एक छोटे से गांव के रहने वाले थे। 18 साल की उम्र में उन्होंने अपना घर-बार छोड़ा और एक सुनहरे भविष्य की तलाश में बनारस जा पहुंचे। लेकिन यहां उनके साथ धोखा हुआ और उन्हें धोखे से फिजी में मजदूरी करने के लिए भेज दिया गया। बमोला भले ही एक शर्तिया मजदूर के तौर पर फिजी पहुंचे थे लेकिन बाद में उन्होंने यहां की राजनीति का परिपेक्ष ही बदल कर रख दिया। कुछ ही सालों बाद वह यहां के शर्तिया मजदूरों  और दूसरे भारतीयों के प्रमुख नेता बन गए। एक ऐसा नेता जिसने ना सिर्फ जबरदस्ती की मजदूरी खत्म करने के लिए आंदोलन छेड़ा बल्कि उन्होंने इन मजदूरों और भारतीयों के लिए सबसे पहला स्कूल भी यहां खोला।

फिजी में काफी भारतीय
आगे जाकर वह फिजी की संसद में भारतीयों के सबसे पहले प्रतिनिधि बनकर भी पहुंचे। भारत में भले ही कम लोग बद्री प्रसाद बमोला के बारे में जानते हैं लेकिन फिजी में आज भी कई लोग इनका नाम सम्मान से लेते हैं। हर साल यहां मनाए जाने वाले गिरमिटिया दिवस के दिन बद्री दत्त बमोला को याद किया जाता है। आज बात रुद्रप्रयाग के उस शख्स की जो विदेश यानी फिजी की धरती पर सबसे मजबूत नेता उभरकर सामने आया। फिजी दक्षिण प्रशान्त महासागर के मेलानेशिया में स्थित एक द्वीप देश है। इस द्वीप को खोजने का श्रेय अबेल तास्मेन को जाता है। बाद में विलियम ब्लिग ने जब फिजी पर लिखना शुरू किया तो इससे यूरोपियों को इस देश के बारे में पता चला। यूरोपीय देशों के लोग फिजी आकर बसने लगे और वे यहां पर खेतों और कारखानों के मालिक बन गए। फिजी ट्राइबल के प्रमुख सेरू काकाबाऊ की वित्तीय स्थिति बिगड़ने लगी तो उन्होंने 1874 में फिजी को अंग्रेजों को सौंप दिया। और इस तरह 1874 से लेकर 1970 तक फिजी अंग्रेजों का एक औपनिवेशिक देश बना रहा। यही अंग्रेज वजह हैं कि आज फिजी की जनसंख्या में करीब 49 फीसदी लोग भारतीय मूल के हैं।

बमोला जब फिजी पहुंचे
फिजी पहुंचने वाले सबसे पहले भारतीयों में से एक थे बद्री प्रसाद बमोला जो बाद में बद्री महाराज के नाम से पहचाने जाने लगे। बद्री प्रसाद बमोला के जीवन पर बात करने से पहले आपको ये जानना होगा कि क्यों और कैसे बमोला समेत दूसरे भारतीय अपनी मर्जी के खिलाफ फिजी पहुंचे थे। बात है 1834 की। ब्रिटिश सरकार ने दास प्रथा को खत्म करने के लिए एक नया कानून लाया। ब्रिटिश सरकार की सभी कॉलोनियों यानी उपनिवेशों में ये कानून लागू हुआ। 1838 में जब ये कानून पूरी तरह से लागू हुआ तो इससे फिजी समेत सभी उपनिवेशों में मजदूरों की कमी होने लगी। इस दौरान ब्रिटिश कारोबारी उपनिवेशों में गन्ना, कॉफी, चाय, चावल और रबड़ की खेती किया करते थे। मजदूरों की कमी को पूरा करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने भारत में शर्तिया मजदूर रखने का एक कानून लाया। इस कानून के तहत भारतीयों को दूसरे उपनिवेशों में खेतों और कारखानों में काम करने के लिए भेजा जाता था।

इसके तहत उत्तरी भारत और मद्रास प्रेसिडेंसी के गांवों से भारतीयों को चुना जाता और उन्हें विदेशों में काम करने के लिए भेजा जाता। इस कानून के तहत ऐसी व्यवस्था की गई थी कि मजदूर बनकर जा रहा भारतीय 5 साल के लिए संबंधित मालिक के अधीन हो जाता था। ये एग्रीमेंट इतना कड़ा होता था कि भारतीय अगर 5 साल का ये करार तोड़ता तो उसके खिलाफ आपराधिक मामला तक चल सकता था। यूजीन डिसूजा अपने रिसर्च पेपर Indian Indentured Labour in Fiji में बताती हैं कि इसी प्रथा के तहत पहली बार 14 मई, 1879 को 481 भारतीय मजूदरों का पहला जत्था शर्तिया मजदूर के तौर पर फिजी पहुंचा। हम यहां पर जिन्हें शर्तिया मजदूर कह रहे हैं, फिजी में इन्हें गिरमिटिया कहा जाता है। गिरमिट अंग्रेजी शब्द एग्रीमेंट से बना है और आज भी इन लोगों की पहचान गिरमिटिया के तौर पर होती है।

बमोला कैसे बने गिरमिटया?
बद्री प्रसाद बमोला के शर्तिया मजदूर बनने के पीछे वजह है, अंग्रेजों का इन मजदूरों को चुनने का तरीका। शर्तिया मजदूरों को ढूंढने का काम कुछ अंग्रेजी एजेंटों ने अपने हाथ में लिया था। यूजीन डिसूजा बताती हैं कि ब्रिटिश सरकार का इन एजेंटों पर कुछ खास नियंत्रण नहीं था। ये लोग पूरे भारत में खासकर उत्तर भारत में घूमते थे और जो इन्हें हट्टे-कट्ठे दिखते, उन्हें कई बार ऑफर देकर और कई बार बहला-फुसलाकर शर्तिया मजदूर बना लेते। बताया जाता है कि बद्री प्रसाद बमोला महज 18 साल के थे जब वह अपने घर से भाग गए थे। घर से भागने के बाद वह बनारस जा पहुंचे। यहां बमोला लगातार बेहतर भविष्य के लिए काम की तलाश में थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात एक अंग्रेज से हुई जो संभवत: शर्तिया मजदूर जुटाने वाले एजेंट था। इस शख्स ने बद्री प्रसाद बमोला को धोखे से उस जहाज पर बिठा दिया जो मजदूरों को ले जाकर फिजी जा रहा था। और इस तरह बद्री प्रसाद 1889 में एक गिरमिटिया के तौर पर फिजी पहुंचे। बद्री प्रसाद को भी दूसरे मजदूरों की तरह यहां के खेतों में ब्रिटिश कारोबारियों के लिए काम करना पड़ा। हालांकि अपनी बुद्धिमता और रणनीति की बदौलत उनका ये मजदूरी वाला वक्त ज्यादा समय तक नहीं चला।

गन्ना उत्पादन से जुड़े बमोला
बहुत ही कम समय में वह एक गिरमिटिया से गन्ना उत्पादक बन गए। उन्होंने खुद यहां खेती करना शुरू किया और उस पर भारतीयों को काम दिया। ये वो वक्त था जब गिरमिटिया होने का मतलब ही असहाय और गरीब था। ऐसे में जब बद्री प्रसाद बमोला तेजी से प्रोग्रेस कर रहे थे तो वह उन भारतीयों की आंखों में खटकने लगे जो यहां स्वतंत्र मजदूर थे। लेकिन बद्री प्रसाद बमोला जिस तेजी से तरक्की कर रहे थे, उसी रफ्तार से वह गिरमिटिया मजदूरों का भविष्य सुधारने के लिए भी काम कर रहे थे। बद्री प्रसाद बमोला को कई भारतीय ब्रिटिश सरकार के नुमाइंदे के तौर पर देखा करते थे। एक ऐसा व्यक्ति जो ब्रिटिश सरकार का साथ देने के लिए भारतीयों को धोखा दे सकता है। भले ही बद्री प्रसाद बमोला की छवि इस तरह की बनाई गई थी लेकिन बमोला हमेशा कहा करते थे कि वह विरोध करने की बजाय आपसी सहयोग से रास्ता निकालने में विश्वास करते हैं। और उनकी इस नीति का फायदा हुआ भी।

पहले भारतीय स्कूल की शुरुआत की
1898 में भी उन्होंने फिजी का पहला स्कूल खोला जिसमें भारतीय मजूदरों के बच्चे पढ़ाई कर सकते थे। बमोला ने राकीराकी नाम के स्थान पर Wairuku Indian School की शुरुआत की। आज वाइरुकु प्राइमरी स्कूल के नाम से पहचाने जाने वाले इस स्कूल की शुरुआत करने के लिए बद्री प्रसाद बमोला ने अपनी जेब से पैसे लगाए थे। इस स्कूल के शुरुआती छात्रों में फिजी के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख चेहरे और यहां के सबसे फेमस लीडर्स में से एक रहे रातु सर लाला सुकुना भी थे। सिर्फ यही नहीं बद्री प्रसाद बमोला पहले गिरमिटिया थे जिन्होंने हायर स्टडीज के लिए अपने बच्चों को न्यूजीलैंड भेजा। बाद में उनकी तरह ही दूसरे भारतीयों ने भी अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए न्यूजीलैंड भेजना शुरू किया।

मजदूरों की लड़ाई लड़ी
बद्री प्रसाद बमोला ने भारतीय मजदूरों के लिए मजबूत लड़ाई लड़ी। हालांकि वह ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग और समन्वय के जरिए अपनी मांगें पूरी करवाया करते थे। यही वजह रही कि उन्हें अक्सर उन भारतीयों के विरोध में बताया जाता है जो ब्रिटिश सरकार के खिलाफ यहां मोर्चा खोले हुए थे। KL गिलियन अपनी किताब द फिजी इंडियन्स: चैलेंज टू यूरोपियन डोमिनेंस 1920-1946 किताब में बताते हैं कि बद्री दत्त महाराज 1916 में फिजी कीं संसद के पहले और इकलौते भारतीय मेंबर थे। बमोला 1929 तक इस पद पर बने रहे। हालांकि बीच में भारतीय मजदूरों पर टैक्स लगाए जाने के विरोध में उन्होंने अपने इस पद से इस्तीफा दे दिया था। उनका मानना था कि जो वोटर हैं उन पर ही टैक्स लगाया जाए लेकिन मजदूरों पर टैक्स लगाने के वो खिलाफ थे।

बाद में सरकार को झुकना पड़ा और मजदूरों पर टैक्स लगाने का फैसला वापस लेना पड़ा। उसके बाद फिर से बमोला संसद के सदस्य चुने गए। संसद में भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के दौरान उन्होंने भारतीयों के कई मुद्दे उठाए। उन्होंने मैरिज एज को बढ़ाने का प्रस्ताव भी लाया था। भारतीय मजदूरों के अधिकारों के लिए वह अक्सर संसद में आवाज उठाया करते थे। हालांकि ब्रिटिश सरकार से नजदीकी की वजह से बमोला पर कई आरोप भी लगे।

भारतीयों का आंदोलन और बमोला
साल 1920। यहां आए भारतीय मजूदरों ने ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया था। इस आंदोलन में मजदूरों को अच्छा वेतन देने के साथ ही काम की बेहतर सुविधाएं देने की मांग उठाई जा रही थीं। लेखक ब्रिज लाल अपनी किताब In the Eye of the Storm और BitterSweet- An Indo-Fijian Experiance में इस आंदोलन का जिक्र करते हैं। ब्रिज लाल बताते हैं कि जब सारे भारतीय अंग्रेज सरकार के खिलाफ आवाज उठाए हुए थे। उस दौरान बद्री प्रसाद आंदोलनकारियों के खिलाफ खड़े रहे। के सी गिलियन अपनी किताब में बताते हैं कि इस आंदोलन के दौरान बद्री दत्त बमोला भी काफी एक्टिव रहे।

उन्होंने प्रदर्शनकारियों के साथ मीटिंग की और उनकी मांगों को सरकार तक पहुंचाया। हालांकि बमोला पर आंदोलन के दौरान तोड़-फोड़ करने वाले आंदोलनकारियों को जेल पहुंचाने में मदद करने के आरोप भी लगे। उन पर ये भी आरोप लगाए गए कि उन्होंने भारतीयों के खिलाफ कई सीक्रेट इंफोर्मेशन ब्रिटिश सरकार को दी। हालांकि सारे आरोपों और प्रत्यारोपों के बावजूद एक बात आज भी फिजी के लोग याद रखते हैं और वो है बमोला का काम। बद्री प्रसाद बमोला को फिजी में बद्री दत्त महाराज कहकर पुकारा जाता है। खुद बमोला ने बाद में अपना उपनाम महाराज कर दिया था। कहा तो ये भी जाता है कि लोग उन्हें महाराज-महाराज कहकर पुकारा करते थे। बमोला फिजी की राजनीति में प्रमुख चेहरा थे। उन्होंने यहां के कई कानूनों को मूर्त रूप से देने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। संसद में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में उन्होंने हमेशा भारतीयों के मुद्दे उठाए। फिजी में रहने के बावजूद बद्री दत्त महाराज अपनी मातृभूमि को भूले नहीं थे।

जन्मभूमि हमेशा याद रही
बद्री प्रसाद बमोला का जन्म 1868 में उत्तराखंड के बमोली गांव में हुआ था। महज 18 साल की उम्र में वह अपनी जन्मभूमि छोड़कर चले गए थे। फिजी में एक कद्दावर नेता और संपन्न व्यक्ति बनने के बाद भी उन्हें अपनी जन्मभूमि याद रही। बताया जाता है कि बद्री दत्त महाराज ने 1898 में आजमगढ़ के ब्राह्मण परिवार की एक कन्या से विवाह रचाया। इनके कुल 6 पुत्र और तीन पुत्रियां हुईं। उनके पुत्र राघवानंद ने एक सरकारी क्लर्क के तौर पर काम किया।

बमोला के वंशज
बद्री प्रसाद बमोला के  बच्चे आज न्यूजीलैंड समेत दूसरे देशों में बस चुके हैं। 1928 में बमोला भारत आए तब ब्रिटिश सरकार ने सरकारी मेहमान का दर्जा देकर उनकी पूरी व्यवस्था की । तीन माह तक वे गांव बमोली में अपने परिवार के साथ रहे। बमोला फिजी में आर्य समाज की स्थापना करने वाले शुरुआती लोगों में से एक भी हैं। बमोला को फिजी के अग्रदूतों में गिना जाता है। बद्री महाराज का 1932 में निधन हो गया। अपने जीवन के आखिरी क्षण तक वह फिजी में भारतीयों के अधिकारों के लिए आवाज उठाते रहे। अंग्रेजों के साथ उनके संबंधों को लेकर भले ही आरोप लगते रहे लेकिन आज फिजी में हर साल गिरिमिटिया दिवस का आयोजन किया जाता है और उस दिन बद्री दत्त महाराज समेत दूसरे लीडर्स को सम्मान के साथ याद किया जाता है। क्योंकि इन्हीं लोगों ने फिजी में भारतीयों के अधिकारों के लिए लड़ाई की शुरुआत की थी।

जिस तरह बद्री प्रसाद बमोला ने फिजी में भारतीयों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी, कुछ उसी तरह शिल्पकारों को उनके मूलभूत अधिकार दिलाने के लिए इन्होंने लड़ाई लड़ी। ये हैं उत्तराखंड के आंबेडकर। जानिए इनकी पूरी कहानी और इनकी तरफ से किए गए सभी कामों की पूरी डिटेल इस रिपोर्ट में। बमोला जी को लेकर बहुत ज्यादा दस्तावेज मौजूद नहीं हैं। इसलिए हमने आपके सामने सिर्फ वही तथ्य रखने की कोशिश की है जिनकी पुष्टी हो पाए। अगर आपके पास भी इनको लेकर कोई और जानकारी हो तो उसे जरूर साझा करें और कमेंट बॉक्स में लिखें। इसके साथ ही ये रिपोर्ट अगर आपको पसंद आई हो तो इसे लाइक और शेयर जरूर करें। और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करना भी ना भूलें। धन्यवाद। 

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