कौन हैं उत्तराखंड के दलित? क्यों सवर्णों ने कई सदियों तक हल को अछूत बनाया

उत्तराखंड के दलित

उत्तराखंड के दलित

 जो पाले पोसे कुमाऊं को
जूते मारो डूमो को

डोम चढ़े, अकाल पड़े

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
डुमडा कौम कहां से आई?

ये वो नारे हैं जो अलग उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान लग रहे थे। आरक्षण विरोधी आंदोलनकारियों का गुस्सा सिर्फ मुलायम-मायावती पर नहीं फूटा बल्कि पहाड़ के दलित भी इसकी चपेट में आए। पौड़ी के पाबो बाजार में एक पूर्व सैन्य चिकित्सा अधिकारी को सिर्फ इसलिए पीटा गया क्योंकि वो दलित था। गंगवाडस्यूं में तो एक दलित व्यक्ति को जूतों की माला पहनाई गई और पूरे बाजार में उसकी परेड करवाई गई। इसी तरह उत्तरकाशी की डुंडा तहसील में एक दलित व्यक्ति के सिर को मुंडा गया और पूरे बाजार में उसे परेड करवाई गई, ये जताने के लिए कि वह मायावती की मौत का शोक मना रहा है। लेकिन इसके बावजूद अलग राज्य की मांग के लिए रैलियों में ढोल लेकर सबसे आगे यही दलित खड़ा होता दिखा। इस उम्मीद में कि अलग राज्य मिलेगा तो शायद उसके भी हालात बदलेंगे। लेकिन क्या उसके बाद हालात बदले? तो जवाब है नहीं। अलग राज्य बनने के बाद भी वंचितों को इन प्रताड़नाओं से गुजरना पड़ रहा है।

काश ये प्रताड़ना करने वाले जानते कि हमारी देवभूमि में एक लंबे समय तक किसी से किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जाता था। जी हां। कोई भी भेदभाव या फिर प्रताड़ना नहीं की जाती थी। फिर चाहे वो ब्राह्मण हो या फिर शूद्र। सब एक समान थे। लेकिन फिर बाहर से आए कुछ लोगों ने पहाड़ के मनखियों के भीतर ऐसा जातिवादी जहर भरा कि जो आज भी अपना असर गाहे-बगाहे दिखाता रहता है। इसी जहर का परिणाम था कि कई सदियों तक सवर्णों ने सिर्फ इसलिए हल नहीं जोता क्योंकि यह अछूतों का काम समझा जाता था। और हल को अछूत बनाने के लिए सवर्णों ने ऐसी रणनीति रची कि जिसमें वंचित फंसते चले गए। इस रिपोर्ट में जानने की कोशिश करेंगे कि आखिर कौन हैं उत्तराखंड के दलित? कहां से आए? और कैसे बाहर से आए लोगों ने जातिगत भेदभाव से कोसों दूर उत्तराखंड में इस जहर को भरा है?

कौन हैं उत्तराखंड के दलित?
उत्तराखंड के इतिहास को जब आप खंगालते हैं तो पता चलता है कि आज के दलित ही उत्तराखंड के आदिम निवासी हैं। उत्तराखंड का समग्र राजनैतिक इतिहास में अजय सिंह रावत बताते हैं कि गढ़वाल और कुमाऊँ के आदिम निवासी किरात थे। रामायण और महाभारत में भी किरात लोगों के इस धरती पर रहने का जिक्र मिलता है। वहीं, डॉ. शिवप्रसाद डबराल के मुताबिक कोल उत्तराखंड के आदिम निवासी हैंऔर उनके बाद ही यहां किरात और खस आए। रावत लिखते हैं कि वर्तमान उत्तराखंड के दलित  जिन्हें शिल्पकार भी कहा जाता है, यही लोग किरातों के वंशज हैं। वह यह भी कहते हैं कि उत्तराखंड के ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अपना नाता मैदानी भूभागों से जोड़ते हैं लेकिन यहां के दलित खुद को यहां का आदिम निवासी होना ही स्वीकार करते हैं। इनमें कोई ऐसी जनश्रुति भी नहीं मिलती है कि जिसमें इनके किसी पूर्वज के बाहर से आने का जिक्र हो।

सिर्फ रावत ही नहीं बल्कि यशवंत सिंह कठोच और हरिकृष्ण रतुड़ी समेत लगभग सभी इतिहासकार यहां के वंचितों को ही पहाड़ का आदिम निवासी बताते हैं। इनकी अपनी परंपराएं और संस्कृति थी जो कि आर्यों एवं खसों से काफी अलग थी। हालांकि बाद में इन लोगों को खसों की ही परंपराओं को आत्मसात करना पड़ा और इसका नतीजा ये हुआ कि आज हमें इनकी संस्कृति के बारे में कोई भी जानकारी न के बराबर मिलती है।

उत्तराखंड के दलितों की 100 साल पुरानी एक तस्वीर
उत्तराखंड के दलितों की 100 साल पुरानी एक तस्वीर


जब नहीं था भेदभाव
वैसे तो वैदिक काल की शुरुआत तक पूरे भारत में कोई भेदभाव नहीं था। भेदभाव तो दूर यहां वर्ण व्यवस्था भी नहीं थी। ऋग्वेद को देखने से पता चलता है इस समय आर्यों ने अपने समाज को दो वर्गों में बांटा हुआ था और ये विभाजन वर्ण यानी रंग आधारित था। जहां गौरे वर्ण के लोग आर्य तो श्याम यानी कृष्ण वर्ण के लोगों को अनार्य कहा जाता था। अनार्य ही दास/दस्यु कहलाए जाते थे। ब्राह्मण ग्रंथों के रचनाकाल तक वर्ग व्यवस्था की जगह वर्ण व्यवस्था ले चुकी थी। और यही हमें उत्तराखंड में नजर आने लगती है।

आद्येतिहासिक काल में उत्तराखंड में आर्य यानी द्विज और अनार्य यानी द्विजेतर वर्ण व्यवस्था आ चुकी थी। ब्राह्मण, क्षत्रिय और विश वर्ग (जो कि बाद में वैश्य कहलाए) द्विज वर्ण में शामिल थे और खस तथा वंचित वर्ग द्विजेतर वर्ण में। हालांकि इस वर्गीकरण के बावजूद इनके बीच कोई भेदभाव या छुआछूत नहीं थी। मध्यकाल में द्विज और द्विजेतर की जगह यहां पर बीठ और बैरसुआ नाम से दो प्रमुख वर्ग मिलते हैं। बीठ में ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों आते थे। बैरसुआ में वंचित ही शामिल थे। ये लोग सवर्णों के गांवों के बाहरी हिस्से में रहा करते थे। इसलिए इन्हें गढ़वाली में भैरबसुवा और कुमाऊंनी में बैरसुआ कहा जाता था। कत्यूरियों के शासन में भी यही दो प्रमुख वर्ग थे लेकिन इनके बीच किसी भी तरह का भेदभाव या छुआछूत नहीं था।

अप्रवासियों का आगमन
अप्रवासियों का आगमन


दोनों ही वर्ग कृषि एवं पशुपालन किया करते थे। ब्राह्मण जहां पूजा-पाठ करते थे तो वहीं, वंचित शिल्पकारी और हर छोटा-बड़ा काम करने में माहिर थे। समाज के सभी लोग अपनी-अपनी भूमि के स्वामी हुआ करते थे। न कोई थोकदार होता था और न कोई खैकर। कत्यूरी काल की वर्ण व्यवस्था में दलित खसों से भी नीचे जरूर थे लेकिन उनके साथ छुआछूत नहीं किया जाता था। धार्मिक क्रियाकलापों में उनकी बराबर भागीदारी होती थी। लेकिन धीरे-धीरे ये सब तब बदलने लगा जब कत्यूरी शासन के आखिरी चरण में यहां बाहरी ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों का आना शुरू हो गया। इनके आगमन के साथ ही भेदभाव की लकीरें धीरे-धीरे ही सही लेकिन उभरने लगती हैं। बाहरियों के आगमन के बाद कत्यूरी राज में हमें 4 वर्गों का विभाजन मिलता है। इसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, खस और चांडाल शामिल हैं। आज के वंचित ही चांडाल वर्ग में थे। हालांकि इनकी स्थिति वेदों में वर्णित चांडाल से काफी बेहतर थी। कत्यूरी राज में अप्रवासियों का जो आना शुरू हुआ, वो चंदवंश में काफी ज्यादा बढ़ा।

कहां से आया डोम शब्द
आक्रांताओं से प्राण बचाने के लिए इस तरफ आए इन अप्रवासियों को पहाड़ के मूल निवासियों ने सिर-आंखों पर बिठाया लेकिन इन्होंने मूल निवासियों को ही दीन-हीन बनाने का काम किया। यहां ये भी जान लीजिए कि चंद राज से पहले के ऐतिहासिक ग्रंथों में कहीं पर भी डोम शब्द नहीं मिलता है। यह शब्द उन ब्राह्मण जागीरदारों की देन माना जाता है जो वंचितों को अपने खेतों में कृषि दासों के रूप में काम करवाते थे। ये लोग इन्हें डोम कहकर पुकारा करते थे। यह शब्द हर उस व्यक्ति लिए इस्तेमाल होता था जिन्हें दास बना लिया जाता था। इसमें खस भी शामिल होते थे। इस तरह ये शब्द बंधुवा मजदूर का बोधक था। हालांकि बाद में इस शब्द का उपयोग वंचितों के लिए आम बोलचाल में भी किया जाने लगा। और आज भी किया जाता है। खासकर इन्हें अपमानित करने के लिए।

गढ़वाल के शिल्पकारों का इतिहास किताब में बी एल दनोसी दावा करते हैं कि ये शब्द पांचवीं शताब्दी में अस्तित्व में आया। वह बताते हैं कि प्राचीन शासन काल में डोम जातिवाचक शब्द न होकर एक चतुर्थ श्रेणी का सरकारी पद था। इस पद पर जो भी कर्मचारी नियुक्त होता था, उसे श्मशान घाट पर जलने वाले मुर्दों के वारिसों से घाट का कर वसूलना पड़ता था। इस पद पर किसी भी जाति का व्यक्ति नियुक्त हो सकता था। दनोसी जानकारी देते हैं कि भारत में वैदिक सभ्यता विकसित होने के बाद डोम शब्द को भारत के मूल निवासियों और अनार्यों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा क्योंकि ये निम्नतम श्रेणी का पदनाम था। सवर्णों ने शूद्रों को डोम, दानव, दैत्य, अस्पृश्य, अछूत जैसे कई नाम दिए।

दलित समाज
दलित समाज


चंद काल में दुर्गति शुरू
चंद राज में वंचितों की दुर्गति का काल शुरू होता है।
बाहर से आए ब्राह्मण एवं राजपूत यहां के समाज को विकृत करना शुरू कर देते हैं। इन्होंने कत्यूरी काल के चांडालों को शूद्र कहना शुरू कर दिया। जातीय व्यवस्था में खुद को ठुलजात या भलजात कहने वाले सवर्णों ने इन्हें भ्यारजात यानि कि बाहर की जाति का तमगा थमा दिया। और इस तरह जो भीतर के थे वो बाहर के हो गए और जो बाहर के थे, उन्होंने भीतर पर कब्जा कर लिया। और इनके साथ छूआछूत की कुरीति भी शुरू हो गई। जिस कृषि लायक भूमि को इनके पूर्वजों ने पहाड़ काट-काटकर तैयार किया था, इन्हें उसी से वंचित कर दिया गया। और ये जमीनों के मालिक से भूमिदास बनकर रह गए।

अप्रवासी वर्ग बड़ी चालाकी से यहां के शासकों से अच्छी जमीन दान और पुरस्कार के रूप में हड़प लेता था। इन्होंने यहां के सम्राटों को ऐसे अपने वश में किया कि ये लोग यहां के जागीरदार, माफीदार बनकर करहीन भूमि के स्वामी बन गए। ये ब्राह्मण राजा-महाराजाओं को परलोक का सुख भोगने की एवज में उनसे खेत और जागीरें दान में ले लेते थे। राजाओं को पारलौकिक सुख का रंगीन सपना दिखाकर उनसे गांव के गांव की जमीनें दान में ले ली जाती थीं। अनुमान लगाया गया है कि कुमाऊँ की कुल जमीन का 20% हिस्सा राजाओं ने ब्राह्मणों को दान में दे दिया। इतना ही नहीं, ये सभी राजकीय अधिकारियों के पदों पर भी खुद आसीन हो गए। खुद ये लोग सत्ता सुख भोगते रहे और मूल निवासियों के खाने-पीने पर भी इन्होंने रोक लगा दी।

वंचितों के दो वर्ग
चंदकाल में वंचित दो वर्गों में बंटे हुए नजर आते हैं। एक शिल्पी/शिल्पकार तो दूसरा दास/कृषिदास। शिल्पकार में उन वंचितों को शामिल किया जाता था जिनके बिना सवर्ण क्या, राजा-महाराजाओं का काम चल नहीं सकता था। ये लोग वस्त्र, शस्त्र, देवमूर्तियां, कृषि उपकरण समेत अन्य कई तरह के उपकरण तैयार करते और कई कामों को निपटाते थे। यही वजह थी कि इन शिल्पकारों की समाज में कृषिदास या हलिया के मुकाबले ज्यादा अच्छी स्थिति थी। इन्हें प्रति वर्ष फसल का एक हिस्सा तो मिलता ही था। इसके अलावा तीज-त्योहारों पर भी इन्हें फसल और पुरस्कार दिए जाते थे। सामंतीकाल में तो उत्कृष्ट शिल्पियों को अपने क्षेत्र में बसाने की होड़ भी लगी रहती थी। लेकिन वंचितों का दूसरा वर्ग जिन्हें दास या कृषिदास भी पुकारा जाता था, उनकी स्थिति जानवरों से भी बद्तर थी।


जब हल भी हो गया अछूत
चंद शासनकाल में बाहर से आए अप्रवासियों ने खेती करना और हल लगाने के काम को भी अछूत घोषित कर दिया। दरअसल ये अप्रवासी अधिकारी पदों पर काबिज हो चुके थे। इस वजह से इनके पास कृषि करने का टाइम नहीं था। दूसरा, ये लोग जानते थे कि पहाड़ में कृषि करना कोई आसान काम नहीं है। इस वजह से इन ठुलजात वालों ने प्रसारित किया कि कृषिकर्म करना ब्राह्मणों के लिए वर्जित है और जो ऐसा करता है, वो निम्नकोटि का ब्राह्मण है। इस प्रचार की वजह से ब्राह्मणों ने हल पकड़ना छोड़ दिया और इसे भी अछूत मान लिया। हल को अछूत मानने की यह मानसिकता 1940-50 के दशक में भी थी।

इस दौर तक सवर्णों के बच्चे कृषि विश्वविद्यालयों में जाकर  पढ़ने लगे थे। यहां उन्हें पाठ्यक्रम के हिस्से के तौर पर हल चलाना पड़ रहा था लेकिन जब वे घर आते तो इससे परहेज ही करते। 1925 में कुमाऊं परिषद के बागेश्वर अधिवेशन में ब्राह्मणों को भी हल चलाने का प्रस्ताव रखा गया। तब राष्ट्रीय नेता हरगोविंद पंत ने इसका पुरजोर विरोध किया था। हालांकि बाद में 1929 में खुद हरगोविंद पंत ने उत्तरायणी मेले में हल चलाने का सांकेतिक एक्ट किया और कहा कि जब हमारे बच्चे कृषि विद्यालयों में हल चला सकते हैं तो घर में चलाने में क्या नुकसान है। हालांकि उनके इस कदम का भी सवर्णों ने काफी ज्यादा विरोध किया।

दलित
दलित


वंचितों को बनाया गया कृषिदास
खैर, चंदकाल में वापस लौटते हैं। यहां हम देखते हैं कि ब्राह्मणों की तरफ से हल को निम्नस्तर का बना दिया गया था और इसी का परिणाम ही कृषिदासों के रूप में सामने आया। ये कृषि दास वंचित वर्ग के ही लोग होते थे और इनकी गत बहुत बुरी थी। ठुलजात वालों ने कृषि दासों को एक-दूसरे को बेचना शुरू कर दिया। एटकिंसन बताते हैं कि हलिया वर्ग के जो दास परिवार होते थे, उन्हें परिवार समेत भी बेच दिया जाता था। और ये कुप्रथा 20वीं शताब्दी तक भी प्रचलित रही थी।

स्थिति इतनी बुरी थी कि वंचितों को अपने स्वामी से भोजन प्राप्त करने के अलावा उनके पास कोई भी नागरिक अधिकार नहीं था। अगर किसी कृषिदास के घर में झगड़ा हो गया तो उसको सुलझाने के लिए उसे बैठक करने का अधिकार भी नहीं था। ठुलजात वालों ने इनके संगठित न होने देने का भी इंतजाम कर रखा था। एक वंचित का दूसरे वंचित के साथ सामाजिक आदान-प्रदान करने पर भी प्रतिबंध था। स्थिति इतनी बद्तर थी कि अपने शिशु का नाम भी वह बिना अपने गुंसाईं की अनुमति के नहीं रख सकता था। ये लोग नए कपड़े नहीं पहन सकते थे। ये लोग सिर्फ मृतक के शरीर से उतार गए और होली के बाद उतार गए कपड़ों को ही धारण कर सकते थे।

ये लंगोट के अलावा कोई भी शरीर वस्त्र धारण नहीं कर सकते थे। ये लोग सोना-चांदी और जूते भी नहीं पहन सकते थे। इन्हें छतरी रखने का भी अधिकार नहीं था। न ही ठुलजात वालों के सामने किसी उच्च स्थान पर ही ये लोग बैठ सकते थे। 1960 के दशक तक भी इन्हें धोती पहनने का अधिकार नहीं था। और इन जैसी हजारों कुरीतियों में से कई आज भी विद्यमान हैं।

समाज की विडंबना
विडंबना देखिए कि जिन देवालयों और देवों की मूर्ति को इन्हीं शिल्पकारों ने बनाया, उनमें ही इनका प्रवेश वर्जित होता था और आज भी काफी हद तक है। स्थिति ये थी कि इनकी परछाई भी देवताओं की डोली पर नहीं पड़ने दी जाती थी। वंचित लोग बीठों के शादी-ब्याह में ढोल-दमो तो बजा लेते थे लेकिन खुद के समाज की शादी में वह किसी भी तरह का वाद्य नहीं बजा सकते थे। इन्हें न मुकुट बांधने का अधिकार था और न ही डोला-पालकी में बैठने का। इनके फेरे आंगन में अग्नि जलाकर संपन्न कर दिए जाते थे। किसी तरह का पूजा-पाठ नहीं होता था। इनकी बारात सवर्णों के इलाके से नहीं जा सकती थी और न ही ये दिन के उजाले में अपनी बारात लेकर जा सकते थे। सवर्ण इनके विवाह को देखना भी पसंद नहीं करते थे। कुमाऊं में इसीलिए एक कहावत है कि डूमक ब्या, आंखैकि किरकिरि।

सवर्णों और वंचितों के रास्ते भी अलग होते थे। वंचितों के घर गांव के बाहर ही होते थे। आज भी काफी हद तक हमें पहाड़ में ये व्यवस्था देखने को मिलती है। वंचित सवर्णों के नल से पानी नहीं भर सकते थे। जहां पर एक ही नौला-धारा होता था, वहां उन्हें बहकर आने वाले पानी को भरना होता था। इनकी हालत इतनी बुरी थी कि अगर कोई वंचित गलती से ब्राह्मण की किसी वस्तु को छू ले। या मंदिर में प्रवेश कर ले तो इन्हें सीधे प्राणदंड की सजा दी जाती थी।  कई जगह मंदिरों में तो इन्हें आज भी प्रवेश नहीं है। अगर किसी वंचित ने प्रवेश करने की हिमाकत भी की तो उसे आग में जलाने से भी ये जातिवादी हिचकते नहीं हैं। उत्तराखंड में अंग्रेजों के आगमन से पहले तक वंचितों की स्थिति बहुत खराब थी।

अंग्रेजों के आगमन के बाद बदले हालात
अंग्रेजों के आने के बाद ही वंचितों को मानवतुल्य समझा जाने लगा। अंग्रेजों ने कृषिदास जैसी कुरीति पर बैन लगाया। इसके बावजूद भी 21वीं शताब्दी तक भी कृषिदास जैसी कुरीतियों के कुछ उदाहरण देखने को मिल जाते थे। अंग्रेजों की बदौलत वंचितों को शिक्षा का अधिकार मिला। उन्हें भूमि मिली। वो अलग बात है कि आज भी उनके पास न के बराबर भूमि है लेकिन उन्हें कुछ भूमि मिली जिसे वो अपना कह सकते थे। बाद के वर्षों में हरिप्रसाद टम्टा समेत कई समाज सुधारक आए जिन्होंने वंचितों के जीवन को बेहतर बनाने के कई प्रयास किए। और इसी दिशा में इन्हें शिल्पकार और हरिजन नाम भी मिला।

वर्तमान स्थिति
वर्तमान में भी वंचितों की स्थिति कुछ बहुत अच्छी नहीं है। आज भी उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता है। आज भी उन्हें सवर्णों के धारों से पानी भरने की इजाजत नहीं है। आज भी उत्तराखंड में उस तरह की घटनाएं होती रहती हैं जिस तरह के करम उत्तराखंड आंदोलन के दौरान वंचितों के साथ हो रहे थे। कुछ लोग वंचितों के साथ अत्याचार करने के लिए किस हद तक गिर सकते हैं, उसकी एक बानगी है 1996 का एक मामला।

उत्तरकाशी के कंटाड़ी जिले की एक दलित महिला अतोला देवी के पति ने गांव के मंदिर का निर्माण किया था। जब अतोला देवी अपने पति का पारिश्रमिक मांगने गांव के ठाकुर के पास गई तो उसे डूमड़ी जैसे कई अपमानजनक शब्द कहे गए और गालियां दी गई। जब अतोला देवी ने इसका विरोध किया तो गांव के कुछ सवर्णों ने उसे घेर लिया। सिर्फ घेरा नहीं, उसके सिर को मुंडा दिया। उसके कपड़े फाड़ दिए और उसके मुंह पर कालिख पोथकर उसे पूरे गांव में घुमाया गया। इतना ही नहीं, उसके मुंह में मल भी ठूंसा गया। आखिर में उसे गांव के पंचायत घर में बंद कर दिया गया और विडंबना देखिए कि अतोला देवी को ही मंदिर को नुकसान पहुंचाने के आरोप में गिरफ्तार कर दिया गया। अतोला देवी आज लगभग 65 वर्ष की हैं और उस दिन के घाव आज भी उनके शरीर पर दिख जाते हैं। अतोला के परिवार ने न्यायालय में लंबी लड़ाई लेकिन 16 साल बाद इस मामले के सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया। अतोला ने इस लड़ाई को लड़ने के लिए सोना-चांदी, अपना सबकुछ बेच दिया और आखिर में कुछ भी हासिल नहीं हुआ।

इसी तरह टिहरी में एक युवक को सिर्फ इसलिए मार दिया गया क्योंकि उसने सवर्णों के सामने कुर्सी पर बैठकर खाना खाया था। टिहरी के ही गंगी गांव के वंचितों को जिला मुख्यालय में सिर्फ इसलिए शरण लेनी पड़ गई क्योंकि उनके समाज से जुड़ा एक औजी सवर्ण के यहां ढोल बजाने नहीं पहुंचा। नैनीताल के जगदीश ने एक लड़की को अपने सौतेले बाप की प्रताड़ना से बचाने की कोशिश की तो उसका अपहरण कर हत्या कर दी गई। राज्य बनने के बाद भी हर वर्ष तकरीबन 300 मामले दलितों के खिलाफ अत्याचार के दर्ज किए जाते हैं। और कई ऐसे मामले हैं जो दर्ज भी नहीं होते।

जातीयता का दंभ भरने वाले कुछ सवर्ण ये नहीं जानते कि अगर वंचित न होते तो शायद उनका और उनसे जुड़े कई लोगों का इतिहास आज किसी को पता भी नहीं चलता। वो वंचित ही थे जिन्होंने गढ़वाल के गढ़ों का निर्माण किया। वो वंचित ही थे जो सैनिकों के साथ रणभूमि में हुड़का लेकर उतरते थे और जिनके सुरों को सुनकर सैनिक जोश से उद्वेलित हो जाते थे। आज अगर आप राजुला-मालुशाही, हरू-हीत और गोरिल जैसे देवताओं की गाथाओं को सुन पा रहे हैं तो इसका श्रेय भी वंचितों को जाता है।

आज अगर आपके देवी-देवता अवतरित हो पाते हैं तो उसका श्रेय भी वंचितों को जाता है। महाभारत के कल्या लोहार हों या फिर संग्रादू राम। ऐतवारु मिस्त्री हों चाहे फिर मुताड़ी लाल चर्मकार… इतिहास ऐसे दलितों से भरा-पड़ा है जिन्होंने हमारे पहाड़, हमारे उत्तराखंड, हमारे देश को बनाने में सबसे ज्यादा योगदान दिया है… लेकिन फिर भी हमने इन्हें अछूत मानकर हमेशा इनका अपमान किया है। आपके लिए गहने बनाने हों या फिर मंदिर, वंचितों ने हर वो काम किया जो उन्हें दिया गया। और बदले में उन्हें क्या मिला सिर्फ प्रताड़ना और अत्याचार।आपके घर का निर्माण करने से लेकर आपके देवी-देवताओं को बुलाने तक, लगभग हर चीज के लिए आप वंचितों पर निर्भर हो। उन वंचितों पर जिनका आपने हमेशा तिरस्कार किया है।

लेकिन इन सभी तिरस्कारों और अपमानों के बावजूद वो वंचित… उत्तराखंड का वो शिल्पकार लगातार लगा हुआ है… यहां की संस्कृति को जीवित रखने में। वो कोशिश कर रहा है कि जिस शिल्पकला ने उत्तराखंड को उसकी खूबसूरती और संस्कृति दी, उसे बचा लिया जाए। नई पीढ़ी के हाथ से ढोल को फिसलते देख उसे भी चिंता हो रही है।… लेकिन वो अब मजबूर है। उसकी नई पीढ़ियां लिख-पढ़ गई हैं। अपने अच्छे और गलत के लिए सोच और लड़ सकती हैं… और क्योंकि सवर्णों ने ढोलिए की न कभी इज्जत समझी और न ही उसे उसका सही मेहनताना दिया तो नई पीढ़ी इस ढोल को भी नहीं थामना चाहती। जिन शिल्पकारों ने केदारनाथ, बदरीनाथ जैसे मंदिर बनाए, वो आज इस काम को छोड़ने के लिए मजबूर हैं क्योंकि उनकी इस पहचान ने उन्हें हमेशा अपमानित करवाया है। और इसके बाद भी अगर आप जातीय दंभ में रहते हो तो वो दिन दूर नहीं जब वंचित वो सब छोड़ देगा जिस पर आपकी संस्कृति टिकी हुई है।… और तब आपके पास कुछ नहीं बचेगा। न शिल्प कला… और ना ही पहाड़ की संस्कृति। आखिर में आरक्षण हटाने की मांग करने वालों से सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा… दोस्त… आरक्षण हटा दो लेकिन आरक्षण हटाने से पहले अपने मन में जमे भेदभाव के मैल को हटाना पड़ेगा। अगर उसे हटा सकते हो तो आरक्षण भी हट ही जाएगा।

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