क्यों शहर नहीं बनना चाहते हैं ये गाँव?

उत्तराखंड का गांव

अगर मैं आपसे कहूं कि आपका गांव अब शहर बनने वाला है तो…? ज्यादातर लोग ये सुनकर खुश हो जाएंगे। और हों भी क्यों ना? गांवों के शहर बनने का मतलब है कि यहां अब विकास होगा। विकास की उजली तस्वीर दिखने के बावजूद देश के कई गांव हैं जिन्हें शहर बनने का मौका मिल रहा है लेकिन वो इसका विरोध कर रहे हैं। ये गांव शहर बनना ही नहीं चाहते। इन्हें शहर बनने से इतनी दिक्कत है कि ये सड़कों पर उतरकर प्रशासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी कर रहे हैं। और देश के इन गांवों में उत्तराखंड के अल्मोड़ा और उत्तरकाशी के भी कुछ गांव शामिल हैं। लेकिन सोचने वाली बात है कि क्यों?

आखिर क्यों ये गांव वाले शहरवासी नहीं बनना चाहते। शहर की जिस चकाचौंध को देखने के लिए लोग गांव छोड़कर शहरों की तरफ आते हैं, जब वो चकाचौंध खुद चलकर गांव आ रही है तो फिर उसका विरोध क्यों? क्या इन लोगों को अपने गांव में शहर जैसी चकाचौंध… या उस जैसा विकास और रोजगार नहीं चाहिए? जवाब है नहीं। क्योंकि इस चकाचौंध के लिए गांवों को बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। इसी वजह से कई गांव शहर बनने का विरोध कर रहे हैं। सिर्फ गांव शहर बनने का विरोध नहीं कर रहे बल्कि जो गांव शहर बन चुके थे, वह वापस गांव बनना चाहते हैं। आखिर क्यों? क्यों गांव शहर नहीं बनना चाहते? और जो बने हैं, वो क्यों फिर से गांव बनने की बात कर रहे हैं? आखिर शहरों से इन गांवों को दिक्कत क्या है? दिक्कत शहरों से है या फिर शहरवासी बनने से है? जवाब है शहरवासी बनने से दिक्कत है।

शहर के मायाजाल का इतिहास

गांवों को शहरों में मिलाने का सिलसिला ब्रिटिश काल से ही शुरू हो गया था, लेकिन इसे हवा मिली देश की आजादी के बाद। उस वक्त लोगों ने इस चीज का काफी स्वागत भी किया गया लेकिन आज कई गांव इसका विरोध कर रहे हैं। जिसका एक उदाहरण है देश की राजधानी दिल्ली के गांव। दिल्ली में करीब 350 गांव हैं। इनमें से 130 से ज्यादा गांव 1950 के दशक में ही ‘शहरी’ घोषित हो गए थे। इसके बाद 170 से ज्यादा गांवों को 2018 और 2019 के बीच बाद के चरणों में शहरी कर दिया गया है। लेकिन ये ग्रामीणों को नागवार गुजरा। ग्रामीण गांवों के शहरीकरण के खिलाफ कोर्ट तक पहुंच गए। इतना ही नहीं हाई कोर्ट ने इस शहरी मायाजाल को गांव वासियों के अधिकारों का दोहन बताया।

द हिन्दू से बात करते हुए गांव के एक निवासी भगवान कहते हैं कि अगर कोई सिंचाई के लिए पानी के पंप के लिए बिजली कनेक्शन चाहता है, तो उन्हें यह नहीं मिल पाएगा क्योंकि उनके पास स्पष्ट भूमि अधिकार नहीं हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि शहर में मिलने के बाद ग्राम पंचायत के सारे अधिकार समाप्त हो जाते हैं और सारे संसाधन पर नगर निगम का अधिकार हो जाता है। दिल्ली के मामले में ये अधिकार केंद्र सरकार के पास चला गया है। शहरी होने बाद गांव में क्या विकास हुआ है, इस पर गांव के एक और निवासी डी. आनंद बताते हैं कि हमारे गांव को शहरी घोषित किए जाने के बाद भी पहले जैसी ही स्थिति है। सड़कें अभी भी गहरे गड्ढों से भरी हैं। पानी की कमी अक्सर रहती है। शहरों का ये मायाजाल समय के साथ-साथ और भी भीषण रूप लेता जा रहा है।

घट रहा गांवों का दायरा
भारत में शहरीकरण की रफ्तार लगातार तेज होती जा रही है जबकि ग्रामीण इलाकों का दायरा सिमटता दिख रहा है। जनगणना के आंकड़े इस बदलाव की साफ तस्वीर पेश करते हैं। वर्ष 2011 में जहां शहरी क्षेत्रों की जनसंख्या वृद्धि दर 31.8 प्रतिशत रही, वहीं 2001 से 2011 के बीच ग्रामीण आबादी का अनुपात 72.19 प्रतिशत से घटकर 68.84 प्रतिशत पर आ गया। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह रुझान और मजबूत होगा। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत राष्ट्रीय जनगणना आयोग के अनुमान के अनुसार, वर्ष 2036 तक देश की शहरी आबादी बढ़कर 38.2 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।

इस बढ़ती शहरी जनसंख्या को समायोजित करने के लिए गांवों को नगर निकायों में बदला जा रहा है या उन्हें शहरी सीमाओं में शामिल किया जा रहा है। भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 के तहत अनुच्छेद 243क्यू से 243जेडजी तक नगरपालिकाओं के गठन, उनकी शक्तियों, कार्यों और प्रशासनिक ढांचे का प्रावधान किया गया है। इन्हीं संवैधानिक आधारों पर राज्य सरकारें अपने-अपने नगर निकाय अधिनियम बनाती हैं, जिनमें ग्राम पंचायतों को शहरी निकायों में परिवर्तित करने की प्रक्रिया और मानक तय किए जाते हैं।

गांव के शहर होने के क्या फायदे?


गांव को शहर बनाने के दो तरीके होते हैं। एक तो शहर को बढ़ा करके उसके आस पास के गांवों को शहर के अंदर ले लिया जाता है। दूसरा जब गांव की आबादी बढ़ती है तो उसे नगर निकाय का दर्जा दे दिया जाता है। इसके बाद जिन योजनाओं के तहत शहरों में विकास हो रहा है, वो सारी योजनाएं इन गांवों में भी लागू हो जाती है। गांव को शहर बनाने के पीछे सरकार का हमेशा से तर्क रहा है कि इससे सड़क, बिजली, पानी, नालियां, और पार्क जैसी मूलभूत सुविधाओं का विकास होगा। जब नए शहर बनते हैं तो सरकार की टैक्स के रूप में आमदनी बढ़ती है। इसके साथ ही नई जमीनों पर नए उद्योग लगाने का भी मौका होता है। निगम में आ जाने के बाद जल, जंगल और जमीन पर नगर निकायों का हक हो जाता है और ग्राम पंचायत के सारे हक खत्म हो जाते है।

शहर बनने से लोगों का जो सबसे बड़ा फायदा होता है वो है जमीनों के भाव का बढ़ना। इसके साथ ही गांव के शहर में बदलने से रोजगार के नए अवसर मिलते हैं।बुनियादी सुविधाएं बेहतर होती हैं। लोगों को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन का लाभ मिलता है। ऐसे में देखा जाए तो गांवों को शहर में मिलाने के पीछे विकास और रोजगार ही दो पहलू है, जिसके लिए गांव शहर बनना चाहते है। लेकिन क्या ऐसा होता है? इसका उत्तर देते हैं देश की राजधानी के गांव जो आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।

शहर का मायाजाल: नुकसान

कोई भी गांव जब शहर की श्रेणी में आता है तो सबसे पहले खत्म होती है ग्राम पंचायत। कहने को तो ग्राम पंचायत भारत के लोकतंत्र की सबसे निचली इकाई है, लेकिन यही सबसे मजबूत भी है। दरअसल ग्राम पंचायत में हर व्यक्ति की समस्या को सुना जाता है। सामूहिक निर्णय लिए जाते हैं। ग्राम पंचायतें ना सिर्फ गांव के लोगों की समस्या सुलझाती है बल्कि अपने क्षेत्र में क्षेत्रवासियों के हित के लिए विकास भी करती है। साथ ही गांव के हक-हकूकों के लिए लड़ती भी है। लेकिन जब किसी गांव को नगर निकाय या फिर शहर में शामिल कर दिया जाता है तो उन्हें अपनी समस्याओं के समाधान के लिए दर-दर भटकना पड़ता है।

गांव के शहर में मिल जाने के बाद यहां के निवासियों को शहर की सारी योजनाओं का लाभ मिलता है तो वहीं दूसरी ओर  जो लाभ ग्रामीण क्षेत्रों को मिलते हैं तो वो शहर में आने के बाद खत्म हो जाते हैं। उदाहरण के लिए मनरेगा। देश के अधिकतर गांव सिर्फ मनरेगा के छिन जाने की वजह से शहर बनने के विरोध में खड़े हुए हैं। मनरेगा एक कानून है जो साल 2005 में लागू हुआ था, और इसका काम है ग्रामीण क्षेत्रों में हर परिवार को हर साल 100 दिन का कम से कम न्यूनतम रोजगार की गारंटी देना। हाल ही में इस कानून का नाम बदलने को लेकर काफी बवाल मचा हुआ है।

मनरेगा छिन जाने का डर
कोरोना के वक्त में भी मनरेगा ने पूरी देश की अर्थव्यवस्था को संभालने का काम किया था। साल 2024-25 में पूरे भारत में काम कर रहे मनरेगा मजदूरों की संख्या 13 करोड़, 48 लाख, 7739 थी। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मनरेगा  का ग्रामीण इलाकों की आय में कितना बड़ा रोल है। ऐसे में गांव के शहर में मिल जाने के बाद मनरेगा के ना मिलने से ग्रामीणों को काफी नुकसान उठा ना पड़ रहा है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी के मुराड़ी के लोग कहते हैं कि गांव के नगर बन जाने के बाद यहां के लोगों से मनरेगा का हक भी छीन लिया गया है। लोगों का कहना है कि मनरेगा से न केवल मजदूरी मिल जाती थी, बल्कि गांव के कई ऐसे काम भी हो जाते थे जोकि उनका जीवन आसान करने और आजीविका में मददगार होते थे। खेतों की सुरक्षा दीवार बनानी हो, जल संरक्षण के लिए चाल-खाल बनानी हो, खेतों तक जाने के लिए रास्ते बनाने हों, पशुओं के लिए बाड़े बनाने हों, ये सब काम मनरेगा में हो जाते थे, लेकिन अब यह सब काम भी बंद हो गए हैं।

अजीम प्रेमजी विश्विविद्यालय के प्रोफेसर राजेन्द्रन नारायणन कहते है कि पंचायतें भंग कर नगर निकाय बनाने से ग्रामीणों का आर्थिक संकट खत्म होने की बजाय बढ़ेगा क्योंकि शहरों में रोजगार उपलब्ध नहीं है। इसके उलट ग्राम पंचायत में रहते हुए उन्हें काम की गारंटी यानी मनरेगा मिलती है । गांव के शहरों में मिलने का बस इतना ही नुकसान नहीं है। जब ग्राम पंचायत खत्म हो जाती है तो गांव वासियों को हर काम के लिए निगम के पास जाना होता है, जो काफी दूर होते हैं। डाउन टू अर्थ से बात करते हुए सेंटर फॉर यूथ,कल्चर, लॉ एण्ड एनवायरमेंट के संयोजक पारस त्यागी बताते हैं कि साल 1966 में उनकी ग्राम पंचायतों को भंग कर उनके गांव को शहर घोषित कर दिया। इसके बावजूद आज भी उनके गांव में मूलभूत सुविधाएं नहीं है। उन्हें अपनी छोटी-छोटी समस्याओं के लिए 15 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।

दिल्ली के कई गांव हैं जो शहर में मिलने के बाद उन्हें अपना काम करवाने के लिए 15 किलोमीटर तक दूर जाना पड़ता है। उत्तराखंड के भी कुछ गांव खुद को शहर बनाने का विरोध कर रहे हैं। उनके इस विरोध की जड़ में भी यही आशकाएं हैं। जब दिल्ली के गांवों को 15 किलोमीटर दूर जाना पड़ रहा है तो उत्तराखंड जैसे राज्यों के गांव की क्या हालत होगी, इसकी कल्पना आप कर ही सकते हैं। दिक्कतें बस इतनी भर नहीं है। जब कोई गांव शहर में मिलता है तो वहां की जमीनों की खरीद-बिक्री के नियमों में काफी छूट दे दी जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि गांव को कंक्रीट का शहर बनने में वक्त नहीं लगता।

शहर के मायाजाल में फंसता पहाड़!

देशभर में जहां शहर फैल रहे हैं तो वहीं गांव सिकुड़ते जा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है उत्तराखंड की अस्थाई राजधानी देहरादून। देहरादून जो अपनी खूबसूरती को सालों पीछे छोड़ कंक्रीट का जंगल बन चुका है। यहां का प्रशासन धीरे- धीरे इसके आस पास के गांवों को देहरादून में मिलाने की कोशिश कर रहा है ताकि कंक्रीट के जंगल को और फैलाया जा सके। 2017 में करीब 60 गांवों को परिसीमन के बाद देहरादून में मिलाने का प्लान पास किया गया था। बाद में ग्राम पंचायत और लोगों ने मिलकर इसका कड़ा विरोध किया और मामला हाईकोर्ट तक गया।

लोगों का कहना था कि गांव को शहर में शामिल करने से वन भूमि में अतिक्रमण होने और पर्यावरण को नुकसान होने की संभावना है। हाईकोर्ट ने भी फैसला गांव वासियों के पक्ष में सुनाया था। अगर आप देहरादून शहर को ही देखोगे तो एक शहर के तौर पर खुद वो मूलभूत सुविधाओं से झूझ रहा है। स्मार्ट सिटी होने के बाद भी कचरा निस्तारण, ट्रैफिक जाम, पानी और बिजली जैसी समस्याओं से लोग आए दिन परेशान रहते हैं। ऐसे में यहां का सरकारी महकमा शहर को और बड़ा करने के पीछे लगा है। ये स्थिति सिर्फ देहरादून की नहीं है बल्कि जिन भी राज्यों में गांवों को शहर बनाने की कोशिश की गई या की जा रही है, वहां पर ऐसी स्थिति देखने को मिल रही है।

गांव नहीं चाहते नगर का दर्जा
देश के कई राज्यों में गांव खुद को शहर बनाने का विरोध कर रहे हैं। राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक व तमिलनाडु में भी विरोध हो रहा है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के नौगांव नगर पंचायत में शामिल मुराड़ी गांव भी विरोध में जुटा हुआ है। यहां के लोग चाहते हैं कि उनसे नगर का दर्जा ले लिया जाए और फिर से गांव की श्रेणी में शामिल कर लिया जाए। इसी गांव के कृष्ण मुरारी रमोला बताते है कि गांव के हर छोटे-बड़े फैसले पंचायत लेती थी। गांव का हर व्यक्ति अपनी समस्या पंचायत को बताता था। समस्याओं का समाधान भी हो जाता था लेकिन नगर पंचायत बनने के बाद हमारी सुनने वाला कोई नहीं है।

वह यह भी कहते हैं कि नगर पंचायत में शामिल होने के बाद लोगों को फायदे की बजाय नुकसान हो रहा है। उनकी आय का प्रमुख स्रोत खेती है लेकिन नगर पंचायत में कोई भी ऐसी मदद नहीं है, जिससे उन्हें खेती बाड़ी में फायदा मिल सके। खेती की वजह से उनका गांव बेहद खुशहाल है। लघु सिंचाई योजना के तहत बनी इन नहरों की देखरेख और मरम्मत का काम ग्राम पंचायत किया करती थीं। लेकिन पांच साल पहले जब ग्राम पंचायत भंग कर नगर पंचायत में गांव को शामिल किया गया, तब से सिंचाई का प्रबंधन ही समाप्त हो गया। शहर में आने से मुराड़ी के लोगों को इस बात का डर भी है कि जल्द ही यहां से भी पलायन होने लगेगा। 

विकास के लिए भी लंबा इंतजार
गांव के विकास कार्यों के लिए भी अब इंतजार लंबा होता जा रहा है। पहले बजट सीधे ग्राम सभा में जा रहा था, लेकिन अब विकास के लिए निगम की बोर्ड बैठक का इंतजार करना पड़ता है। ग्रामीणों का आरोप है कि गांवों में हर महीने बैठक होती थी जबकि निगम में महीनों तक बैठक नहीं होती। निगम की बोर्ड बैठक में मंजूर प्रस्ताव पर भी शासन की मुहर जरूरी है। यानी, दो से तीन महीने और खिं जाते हैं। देहरादून के एक गांव नवादा के पार्षद सचिन थापा बताते हैं कि अब हर कार्य के लिए मीलों दूर नगर निगम के दफ्तर जाना पड़ रहा।

गांवों के समय एक-दो किमी में ही प्रधान व ग्राम पंचायत अधिकारी उपलब्ध रहते थे। कोई भी समस्या आसानी से हल हो जाती थी। जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्रों के लिए भटकना नहीं पड़ता था। निगम में तो प्रमाण-पत्र बनाने के लिए कम से कम पांच से छह बार चक्कर लगाने पड़ते हैं। वक्त के संग पैसे की भी बर्बादी होगी। शहरी क्षेत्र में मिलने का ग्रामीणों को अभी तो नुकसान ही हुआ है।

गांव के शहर बनने के फायदे और नुकसान को देखा जाए, तो निष्कर्ष ये निकलता है कि जरूर गांवों के शहर बनने के फायदे हैं लेकिन फायदे से ज्यादा नुकसान है। शहर में आने के बाद जमीनों के भाव तो बढ़ जाते हैं, लेकिन मूलभूत सुविधाओं के लिए फिर भी तरसना पड़ता है। गांव रहते हुए तो समस्याओं का समाधान ग्राम पंचायत में ही हो जाता है लेकिन निगम में मिल जाने के बाद उन समस्याओं के समाधान के लिए मिलों का सफर तय करना ही एक रास्ता समस्या बन जाता है। प्रशासन को चाहिए कि पहले जो क्षेत्र शहरों के अंदर आते हैं उनका विकास करे। उनकी दुविधाओं का समाधान खोजे। फिर आस पास के गांवों को उन शहरों में मिलाया जाए। ना कि अपने लालच के लिए गांवों को शहर में मिलाकर गांव वासियों को और भी मुसीबतों में डाला जाए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *