बिल्ली ने करवाई महाभारत ! कुमाऊं की अनोखी गायन परंपरा
महाभारत युद्ध
देवभूमि उत्तराखंड में अनेकों परंपराएं एवं संस्कृतियां हैं। जब आप देवभूमि उत्तराखंड की इन परंपराओं के और अंदर घुसते हैं तो आपको कई ऐसी परंपराओं का पता चलता है जिनके बारे में शायद आपने सुना भी नहीं होगा। कुछ ऐसी ही एक परंपरा उत्तराखंड में है जिसे भारत गायन नाम से जाना जाता है। जिस तरह देवताओं के भजन और जागर लगाए जाते हैं, उसी तरह भारत भी गाई जाती है लेकिन एक ट्विस्ट के साथ। यह भारत वैसे तो किसी भी धार्मिक विषय पर हो सकती है लेकिन उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में महाभारत से जुड़ी एक अनोखी भारत का पता चलता है। एक ऐसी भारत जिसमें बिल्ली और मुर्गी के झगड़े की वजह से महाभारत का युद्ध हो जाता है। सिर्फ इतना नहीं, इस भारत में आपको भगवान श्रीकृष्ण एवं भगवान शिव से जुड़े कई ऐसे किस्से कहानियां मिल जाएंगी जो आपने कभी सुनी नहीं होंगी। सुनना तो दूर, पौराणिक ग्रंथों में भी इसका जिक्र नहीं मिलता। अब यह भारत क्या है और इसमें किस तरह महाभारत व अन्य देवताओं को पेश किया जाता है, उस पर बात करने से पहले यह जान लें कि भारत सिर्फ उत्तराखंड में नहीं गाई जाती है। देश के कई कोनों में आपको भारत सुनने को मिल जाती है। बस क्षेत्र के हिसाब से इसका स्वरूप भी बदल जाता है। छत्तीसगढ़, राजस्थान से लेकर गुजरात के भील समुदाय में भारत गाने का चलन है।
भारत गायन की परंपरा
जब आप उत्तराखंड में भारत गायन परंपरा के अंश खोजते हैं तो इसका प्रमुख डेरा कुमाऊं में मिलता है। या कहें कि यहां पर यह ज्यादा प्रचलित है। कुमाऊं के अलावा छत्तीसगढ़, राजस्थान और गुजरात में जो भारत गायन होता है, उसे गाने का तरीका और नाम काफी अलग है। तीनों ही राज्यों में भारत गायन को जो एक करता है, वो है इनके गायन का विषय। इन सबका मुख्य विषय होता है महाभारत। सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि नेपाल में भी भारत गायन होता है। हालांकि ये भारत में गाए जाने वाले भारत से थोड़ा अलग होता है।

भारत गायन क्या है?
कुमाऊं में जागरों के साथ भारत गायन किया जाता है। जब आप ‘भारत’ गाने की शैली को देखते हैं तो जागर और इसमें बहुत ज्यादा फर्क नजर नहीं आता। हालांकि जहां जागर देवी-देवताओं को जागृत करने के लिए लगाया जाता है वहीं, भारत आम तौर पर महाभारत के अलग-अलग किरदारों पर आधारित होता है। भारत गायन का मतलब महाभारत गायन से है।
त्रिलोचन पांडेय अपनी किताब कुमाऊंनी लोक साहित्य की पृष्ठभूमि में इसका एक और पक्ष रखते हैं। वह लिखते हैं कि भारत स्वतंत्र रूप से नहीं बल्कि जब भी कोई जागर या दूसरे अनुष्ठान होते हैं, तब लगाए जाते हैं। इसमें अभिमन्यु वध, भीम को विष देना, शिशुपाल प्रसंग, दुर्योधन-भीम के बीच का टकराव, कुंती का स्थान, अर्जुन वसुंधरा और भीम हिडिंबा का प्रेम-प्रसंग शामिल होता है। त्रिलोचन पांडेय बताते हैं कि भारत गायन दरअसल पौराणिक गाथाओं को दिया जाने वाला एक नाम है। वह लिखते हैं कि बाजगी यानी गायक भले ही बोलचाल में इसे महाभारत या भारत कहता है लेकिन ये सिर्फ महाभारत तक सीमित ना होकर राम, शिव और 24 अवतारों के बारे में भी होता है। भारत गायन में गायक अपनी कल्पना का भरपूर प्रयोग करता है। जॉन लिविएट हिमालयन जर्नल के अपने लेख में भारत को महाभारत का पहाड़ी वर्जन करार देते हैं। हिमालयन फोकलोर ऑफ कुमाऊं एंड वेस्ट नेपाल के इंट्रोडक्शन में मार्क गैब्रियु भारत को एक प्रेरणादायी कथा बताते हैं।

शहद के लिए हुई महाभारत
महाभारत की जो भी कहानियां आपने सुनी हैं, वो ज्यादातर संस्कृत में लिखे गए महाभारत से ही पता चलती हैं लेकिन जब आप कुमाऊं के भारत को सुनते हैं तो ये काफी अलग नजर आता है। यह सिर्फ कुमाऊं के भारत के साथ नहीं है बल्कि कुछ दूसरे राज्यों में गाए जाने वाले भारत के साथ भी है।
जहां आम धारणा ये है कि महाभारत का युद्ध कौरवों के अहंकार की वजह से हुआ है, वहीं, कुमाऊं की भारत में इसका एक अलग नजरिया है। त्रिलोचन पांडेय कुमाऊंनी लोक साहित्य की पृष्ठभूमि और तारादत्त गैरोला हिमालयन फोकलोर में इनका जिक्र करते हैं। त्रिलोचन पांडे अपने किताब में ऐसी ही एक कहानी का जिक्र करते हैं। इसके मुताबिक कौरव और पांडवों के राज्यों के बीच में एक पेड़ था जिस पर मधुमक्खियों का छत्ता लगा हुआ था। एक दिन भीम ने इस पेड़ पर चढ़ने के लिए सीढियां बनाईं और अर्जुन ने सीढ़ियों से चढ़कर शहद निकाल लाया। इसे देख 100 कौरव भाइयों ने अपनी सेना युद्ध के लिए सजा दी और इस तरह महाभारत का युद्ध हुआ।
बिल्ली ने करवा दिया महाभारत
दूसरी कहानी बताती है कि सैली-जैती नाम के स्थान पर कुंती अपने पांच पुत्रों यानी पांडवों के साथ रहती थी। पांड़वों की एक बिल्ली थी जिसका नाम लखिमा था। लखिमा कौरवों के हस्तिनापुर में आया जाया करती थी। एक दिन लखिमा की भिड़ंत कौरवों की मुर्गियों से हो गई। इस भिड़ंत में लखिमा घायल हो गई। वह जब घर लौटी तो उसे खून से लथपथ देखकर पांडवों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। इस तरह बिल्ली और मुर्गियों की लड़ाई की वजह से महाभारत युद्ध छिड़ गया। 
आम पहाड़ी हैं पांडव–कौरव
भारत गायन की एक खासियत यह है कि इसमें महाभारत के सभी किरदार पहाड़ के निवासी नजर आते हैं। द्रौपदी गाय और भैंसों को संभालती हैं। यहां बुग्यालों में चरते पांडव और कौरवों के पशुओं के झुण्ड हैं। जंगल में दोनों के पशु जब चरने जाते हैं तो अक्सर सांडों के बीच लड़ाई होने का जिक्र मिलता है। पांडवों और कौरवों के बीच कभी मछली पकड़ते हुए तो कभी पशुओं को लेकर झगड़े होते रहते हैं। भारत गायन में महाभारत पूरी पहाड़ी परिपेक्ष की हो जाती है। इस गायन में महाभारत का हर एक किस्सा कुमाऊं में घटित होते देखा जा सकता है।
महाभारत से परे है ‘भारत’
त्रिलोचन पांडेय अपनी किताब में बताते हैं कि महाभारत में पार्वती, गांधारी और कुंती, तीनों को हिमपुत्री बताया गया है। भारत गायन में श्रीकृष्ण भगवान और शिव को लेकर भी अलग-अलग कहानियां हैं। भगवान कृष्ण के जन्म और कंस के खात्मे को लेकर भी भारत लगाई जाती है। लेकिन क्या ये सब सच होती हैं? इसका जवाब देते हुए डॉ. त्रिलोचन पांडे लिखते हैं कि कई बार गायक अपनी कल्पना से भी भारत गायन में कहानी जोड़ देता है। एक जवाब ये भी हो सकता है कि क्योंकि ये एक मौखिक गायन परंपरा है जो पीढ़ी दर पीढ़ी ट्रांसफर हुई है। ट्रांसफर होने की प्रोसेस के दौरान बाजगियों ने अपने हिसाब से इसमें कई किस्से जोड़े। जॉन लेविएट कहते हैं कि महाभारत गायन कुमाऊं मंडल में एक अलिखित और मौखिक गायन परंपरा रही है। इस परंपरा को बाजगी समाज सदियों से मौखिक तौर पर गाता रहा है। ऐसे में ये तो नहीं कहा जा सकता कि भारत में पेश किया गया हर तथ्य सच होगा लेकिन इतना जरूर है कि इनका संबंध सत्य घटनाओं से किसी ना किसी रूप में जरूर रहता है।
नेपाल और दूसरे राज्यों में ‘भारत’
नेपाल में खासकर पश्चिमी भाग में भारत लगाई जाती है। यहां भारत महाभारत के किरदारों से जुड़ी ना होकर ऐतिहासिक हो जाती है। ऐसी ही एक भारत का जिक्र महेश्वर जोशी अपने रिसर्च पेपर The Bhārata/Jāgara of Maulā alias Jiyā Rānī as Narrated in Doti and Uttarakhand में बताते हैं। महेश्वर जोशी बताते हैं कि जहां उत्तराखंड में जिया रानी का जागर लगाया जाता है। वहीं, नेपाल में इसे भारत बुलाकर संबोधित किया जाता है। जोशी इस साझा विरासत का श्रेय कत्यूरी राजवंश को देते हैं। वह लिखते हैं कि जब हम चौथी शताब्दी के ताम्रपत्र और दूसरे सबूत देखते हैं तो पता चलता है कि कत्यूरी राजवंश में पश्चिमी नेपाल और उत्तराखंड एक ही राजवंश का हिस्सा थे। और ये हिस्सेदारी कई सदियों तक रही। यही वजह है कि आज भी इन क्षेत्रों की कई विरासतें साझा हैं। उन्हीं में से एक है जिया रानी का भारत।
नेपाल में लगने वाले भारत में वीर और वीरांगनाओं की गाथाएं पेश की जाती हैं। इन्हीं गाथाओं में से एक है जिया रानी यानी मौला की भारत। जहां नेपाल में मौला की भारत लगाई जाती है वहीं उत्तराखंड में जिया रानी का जागर लगता है। दोनों ही गाथाओं में जिया रानी को कत्यूरी राजवंश की रानी के तौर पर पेश किया गया है। दोनों में ही बताया गया है कि उसकी कोई संतान नहीं है और संतान प्राप्ति के लिए वह महल से दूर जप कर गर्भवती होने की कामना करती है।
जहां नेपाल के भारत में बताया जाता है कि बाणघाट में तपस्या करते वक्त उसका एक सुनहरा बाल पानी में बह गया और कुमाऊं के राजाओं के हाथ लग गया। वहीं, उत्तराखंड के जागर में जिक्र आता है कि जिया रानी ने चित्रशिला पहुंचकर भगवान शिव से प्रार्थना की कि वो गर्भवती हो जाए। उसने यहां पर गौला नदी पर स्नान किया। यहां से गुजर रहे 7 तुर्क भाइयों को जिया रानी के बाल दिखे तो उन्होंने उसे साथ ले जाने का निर्णय लिया। तब नौ लाख कत्यूरी आए और जिया रानी को सुरक्षित साथ ले गए।
छत्तीसगढ़ में भारत
उत्तराखंड की तरह ही छत्तीसगढ़ में भी भारत लगाई जाती है। यहां इसे भारत ना कहकर पंडवानी या पांडववाणी के नाम से जाना जाता है। पंडवानी एक लोक-गायन शैली है, जिसका अर्थ है पांडवकथा। उत्तराखंड की तरह ही यहां भी पांडववाणी में महाभारत के किरदार शामिल होते हैं। जिस तरह भारत में गायन के साथ संवाद शामिल होते हैं, उसी तरह पांडववाणी में भी संवाद बीच-बीच में कहे जाते हैं। भारत की तरह ही पांडववाणी में भी कलाकार अपनी कल्पनाओं का भरपूर इस्तेमाल करता है। पंडवानी गायक प्रभा यादव कहती हैं कि सभी पंडवानी गायक पंडवानी गाते हैं। इसकी मूल कथा एक ही होती है लेकिन उसकी प्रस्तुति सब अलग-अलग ढंग से करते हैं। इसमें कई बार गायक अपनी कल्पना से संवाद भी जोड़ देता है। प्रभा कहती हैं कि गायक अपनी-अपनी कल्पना से कथा दृश्य की रचना करते हैं।

राजस्थान में ‘भारत’
राजस्थान में भी भारत गायन की परंपरा है लेकिन अपने क्षेत्रीय रंग के साथ।राजस्थान में इस गायन शैली को ‘पंडून का कड़ा’ यानी पांडवों के दोहे बुलाया जाता है। इस लोक गायन शैली को भी गीत और संवाद की शैली में गाया जाता है। इसे यहां रहने वाले मुसलमान जिन्हें जोगी और मेऊ बुलाया जाता है, गाते हैं। पंडून का कड़ा में भी मुख्य किरदार पांडव ही हैं। जैसे उत्तराखंड की भारत में महाभारत होने की कई अलग-अलग वजहें गिनाई गई हैं। कुछ उसी तरह पंडून का कड़ा में भी है। 
पंडून का कड़ा के एक गायन के मुताबिक गांधारी और कुंती, दोनों ही सूर्य देव की पूजा करती थीं। एक दिन गांधारी ने दुर्योधन को मिट्टी की हाथी बनाने को कहा ताकि वह उस पर चढ़कर सूर्य की पूजा कर सके। दुर्योधन ने ऐसा ही किया। ये देखकर कुंती ने अर्जुन को ताने मारे कि तेरी मौसी यानी गांधारी ताने मार रही थी कि तेरे सभी बेटे नाकाबिल हैं। इस पर अर्जुन ने इंद्र से ऐरावत हाथी मंगाया और गांधारी उस पर बैठकर सूर्य देव को पूजने लगी। जब पूजा खत्म हो गई तो भीम ने ऐरावत हाथी की सवारी की और मिट्टी से बने हाथी को कुचल दिया। इस पर गांधारी दुर्योधन को बोलती है कि मिट्टी का हाथी भी तोड़ दिया। दुनिया हंसेगी अगर तुम ऐसे उत्पात मचाने वाले के भाई कहलाए। और तब से कौरव और पांड़वों के बीच टकराव शुरू हुआ।
गुजरात की ‘भारत’
गुजरात जाएंगे तो वहां भी उत्तराखंड के जैसे ही भारत सुनने को मिलेगी।यहां भील जाति के लोग भारत लगाते हैं। इसे भीलों का भारत कहकर पुकारा जाता है। गुजरात के साबरकांठा जिले में रहने वाली डंकगिरी जनजाति के ये लोकगीत हैं। भीलों के महाभारत में द्रौपदी को देवी के तौर पर पेश किया गया है। युधिष्ठिर उसके पैर छूकर पूजा करता है लेकिन भीम ऐसा नहीं करता। फिर द्रौपदी भीम को पश्चात्ताप करने के लिए कहती है।

अलग–अलग भारत में समानता
उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान और गुजरात में गाई जाने वाली भारत में कुछ चीजें बहुत समान हैं। एक तो इनमें भीम का नाम सबसे आगे है। दूसरा, सभी जगह की भारत में गायक अपनी कल्पनाओं से शब्द और संवाद जोड़ता है। तीसरा, इन्हें लंबी रातों में और घंटों-घंटों तक गाया जाता रहा है और काफी हद तक आज भी गाया जाता है। चौथा, जिस क्षेत्र में भारत गाई जा रही है, उसी क्षेत्र के स्थानों को गायन में जगह मिलती है। पांचवां, ये भारत हैं तो महाभारत से प्रेरित लेकिन इनमें महाभारत से जुड़े किस्से और कहानियां संस्कृत में लिखे गए महाभारत से काफी अलग मिलते हैं।
उत्तराखंड में गाई जाने वाला भारत देश के दूसरे राज्यों में गाए जाने वाली पांडव वार्ता से काफी मिलती-जुलती है। पांडव वार्ता को अलग-अलग समाजों ने अपने हिसाब से पेश किया है। यहां ये याद रखना जरूरी है कि महाभारत एक मौखिक परंपरा की गाथा है। इसे कागज पर तो बहुत बाद में उतारा गया। ऐसे में संभव है कि महाभारत को कुछ समाजों ने अपने-अपने नजरिए से देखा और पेश किया होगा। जैसे कि होता ही है, जब ये जनरेशन टू जनरेशन पास हुआ तो उसमें गाने वाले ने अपनी कल्पना और कथानक भी जोड़ दिया। इस तरह इस पांडव गाथा के कई वर्जन तैयार हो गए। इसके बावजूद इन्हें पूरी तरह से कोरी कल्पना कहना भी बेमानी होगा। ये भले ही कल्पनाओं से उपजे गीत होते हैं लेकिन सच्चाई से इनका वास्ता जरूर होता है।
उत्तराखंड में अब भारत ना के बराबर सुनाई देती है। राजस्थान और गुजरात की भील जाति के बीच भी ये गायन धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। इस मामले में छत्तीसगढ़ थोड़ा बेहतर स्थिति में है। यहां पंडवानी के कई फेमस गायक हैं। तीजनबाई को तो पद्मभूषण तक मिल चुका है। जरूरत है कि सरकारें इन लोकगाथाओं के संवर्धन और संरक्षण के लिए प्रयास करे। ये लोकगाथाएं बची रहेंगी तो हमारा लोक भी बचा रहेगा।
