यूपी के लक्ष्णी नारायण कैसे बने नीम करौली बाबा?

Neem Karoli baba

नीम करोली बाबा

नैनीलात की एक शाम। साल था 1942। शाम के पांच बजकर कुछ मिनट हो चुके थे। संपूर्णानंद तिवाड़ी दौड़े-दौड़े बस स्टैंड तक आए लेकिन बस निकल चुकी थी। एक मुकदमे के सिलसिले में नैनीताल आए संपूर्णानंद कैंची स्थित अपने घर जाने के लिए बस पकड़ना चाहते थे लेकिन अब उनके पास पैदल चलने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। वह गेठिया के रास्ते होते हुए उस घुप्प अंधेरे में अपने घर जा रहे थे। संपूर्णानंद को पूरे रास्ते की वैसे चिंता नहीं थी  लेकिन एक जगह थी जहां पर उनको क्या, सबको डर लगता था। यह जगह थी खुफिया डांठ। यह एक निर्जन इलाका था। यहां पर भूत-पिशाच का डर बहुत ज्यादा होता था। संपूर्णानंद पूरे रास्ते भर भगवान का नाम जपकर खुफिया डांठ पहुंच तो गए लेकिन यहां जैसे ही वह पहुंचे तो उन्होंने जो नजारा देखा, उससे वह बुरी तरह सिहर उठे। उन्हें खुफिया डांठ में निर्जन नाले के ऊपर एक इंसान की आकृति दिखी। भारी-भरकम शरीर और उस पर कंबल लिपटा हुआ।

Kainchi dham neem karoli baba
नीम करौली बाबा

संपूर्णानंद के डर से बुरे हाल हो गए। मन में सोचने लगे कि आज तो भूत से सामना हो ही गया। कुछ ही क्षणों में दूर दिख रही वह आकृति संपूर्णानंद के पास आई। उस इंसान ने ना सिर्फ संपूर्णानंद के बारे में बताया बल्कि यह भी बता दिया कि आखिर क्यों संपूर्णानंद उस रास्ते से पैदल चलने को मजबूर हुए। इतना सुनना था कि संपूर्णानंद डर और विस्मय से भर गए। संपूर्णानंद के मन में विचार चलने लगा कि यह व्यक्ति या तो कोई सिद्ध पुरुष या फिर कोई आत्मा। यह विचार चल ही रहा था कि उसने औपचारिकता के लिए उस अनजान इंसान के पैर छू दिए। संपूर्णानंद को आशिर्वाद देते हुए उस इंसान ने कहा, डर मत, थोड़े ही आगे तुझे ट्रक मिल जाएगा। उससे घर चले जाना।

संपूर्णानंद ने विदा लेने की औपचारिकता निभाते हुए पूछ लिया कि आप फिर कब मिलेंगे? इस पर जवाब मिला – 20 साल बाद। जवाब सुनकर संपूर्णानंद फिर अचंभित हुए लेकिन डर के मारे उन्होंने ज्यादा पूछने और सोचने की बजाय वहां से जल्द से जल्द निकलने में भलाई समझी। कुछ ही दूर पहुंचने पर संपूर्णानंद को ट्रक भी मिल गया और वह सुरक्षित अपने घर कैंची पहुंच गए। संपूर्णानंद के मन में कई सवाल थे लेकिन उन्हें कहां पता था कि ठीक 20 साल बाद उनके सभी सवालों का जवाब उन्हें मिल जाएगा। 

जब मिले 20 साल बाद
1962 का एक दिन था। कैंची में संपूर्णानंद के घर के नजदीक बंजर खेत में उनके बच्चे उमेश और गंगा खेल रहे थे। तभी रोड पर एक एंबेसडर कार आकर रुकी। गाड़ी से एक कंबल लपेटे शख्स उतरा और एक दूसरा व्यक्ति भी उनके साथ हो लिया। दोनों सीधे वहां मौजूद एक खंडहर में पहुंच गए। यह एक अधजला खंडहर था जिसमें एक तख्त और मिट्टी-पत्थर के अलावा कुछ भी नहीं था। कंबल वाला शख्स सीधे तख्त पर बैठ गया और उनके साथ आया दूसरा शख्स उन्हें गमछे से पंखा झलाने लगा। तभी उमेश और गंगा भी वहां पर पहुंच गए। उन्होंने दोनों अनजान शख्स से पूछताछ करनी शुरू कर दी। इस पर तख्त पर बैठे शख्स ने कहा कि जाओ, अपने पिता को बुला लाओ। हम उनसे मिलने आए हैं। बच्चे घर पहुंचे तो संपूर्णानंद खाना खा रहे थे और उन्होंने उमेश से कहा, कह देना कि अभी नहीं आ सकते। तबीयत खराब है। उमेश ने यही संदेश तख्त पर बैठे व्यक्ति तक पहुंचाया।

कंबल में लिपटे उस शख्स ने संपूर्णानंद का झूठ पकड़ लिया और अपने साथ आए सेवक से कहा कि जाओ, तुम बुला लाओ उसे। जब बच्चों ने संपूर्णानंद को बताया कि कंबल वाले उस शख्स ने उनका झूठ पकड़ लिया और वह यहीं आ रहे हैं तो वह समझ गए कि वह कोई ऐसा-वैसा शख्स नहीं है। संपूर्णानंद ने जैसे-तैसे हाथ धोए और खुद ही उन तक पहुंच गए। पूर्णानंद सामने खड़े थे। उन्होंने औपचारिकता निभाते हुए प्रणाम किया। कंबल में लिपटे शख्स ने पूछा- पहचाना? संपूर्णानंद के पास कोई जवाब नहीं था। तभी तख्त पर बैठे शख्स ने कहा, अब क्यों पहचानेगा? अल्मोड़ा के घर का मुकदमा जीत गया ना। चक्की का मुकदमा भी जीत गया। अब खूब चक्की पीस रहा है। याद कर जब खूफिया डांठ में मिला था। तब संपूर्णानंद को स्मरण हो आया। फिर उन बाबा ने कहा कि मैं तेरे कैंची में मंदिर बनाना चाहता हूं।

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नीम करौली बाबा

इस पर संपूर्णानंद ने वह जगह बता दी जहां पर सोमवारी बाबा समेत कई साधुओं ने तप किया था। संपूर्णानंद के घर से नदी पार की यह वही जगह है जहां पर आज कैंची धाम स्थित है और वह बाबा कोई ओर नहीं बल्कि खुद नीम करौली बाबा थे। नीम करौली बाबा जिन्हें दुनिया नीब करौरी समेत अन्य कई नामों से जानती है लेकिन नीम करौली बाबा एक सिद्ध पुरुष होने के अलावा एक कड़क पिता भी थे। एक ऐसे पिता जिनके अंदर एक चुलबुला बच्चा भी रहता था। नीम करौली बाबा की आज कई कहानियां दुनियाभर में सुनने को मिलती हैं लेकिन जब तक वह खुद जीवित रहे उन्होंने अपनी प्रशंसा में कोई किताब तो छोड़ो, कोई लेख तक छपने नहीं दिया। कुछ लोग नीम करौली बाबा को हनुमान जी का अवतार बताते हैं लेकिन क्या सच में वह यह थे? नीब करौरी और फिर नीम करौली कैसे हो गया? इन सभी सवालों का जवाब लेने के साथ ही हम बताएंगे आपको नीम करौली बाबा के वह आखिरी क्षण जब उन्होंने महीनों पहले ही अपने जाने के संकेत देने शुरू कर दिए थे।

बचपन से ही रामनाम में रमे

20वीं सदी की शुरुआत की बात है। साल 1900 का कोई दिन था। उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में आज खुशी का माहौल था। होता भी क्यों ना। गांव के जमींदार दुर्गा प्रसाद शर्मा और उनकी पत्नी कौशल्य देवी के घर पुत्र का जन्म हुआ था। 8 गांवों की जागीर संभालने वाले दुर्गा प्रसाद ने अपने पहले पुत्र का नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा रखा। लक्ष्मण का बचपन शुरू हुआ ही था कि उसकी माता का देहांत हो गया। पिता ने बच्चे की देखभाल करने के लिए फिर से विवाह रचाया लेकिन सौतेली मां को लक्ष्मण नारायण कतई पसंद नहीं था। वह उसे प्रताड़ित करती रहती लेकिन लक्ष्मण तो जैसे राम नाम में खो गया था।

लक्ष्मण बच्चों के साथ खेलता भी और राम-नाम में भी रमा रहता। पढ़ाई-लिखाई में उसका मन नहीं लगा। हिंदी के अक्षरों का उसे बहुत ज्यादा ज्ञान नहीं हो पाया। वह ब्रज लहजे में बोलता और हिंदी-उर्दू मिश्रित भाषा बोला करता। महज 11 साल की उम्र में आगरा के बादाम बांस गांव की 10 साल की रामबेटी से उनका विवाह कर दिया गया। लक्ष्मण नारायण इन परपंचों में नहीं पड़ना चाहते थे। इसीलिए वह एक दिन बिना किसी को कुछ बताए घर से भाग गए। परिवार को पता चला तो हड़कंप मच गया। यहां बेटे की तलाश हो रही थी तो दूसरी तरफ बेटा गुजरात पहुंच चुका था। गुजरात में शुरुआती दिनों में वह किसी वैष्णव संत के आश्रम में ठहरे। यहां उस संत ने उन्हें लछमन दास नाम दिया और साथ ही वैरागी वेश धारण करवाया। बाद में वह यहां के बबानियां गांव में श्री राम बाई के आश्रम में काफी वक्त तक रहे। बबानिया में लछमन दास तालाब में बैठकर ध्यान किया करते थे और यह देखकर लोगों ने उन्हें तलैय्या बाबा नाम दे दिया।

बाबा ने यहां पर एक छोटा सा हनुमान मंदिर स्थापित किया। करीब 7 साल बबानियां में रहने के बाद तलैय्या बाबा 1918 के आस-पास देश भ्रमण पर निकले। अपनी इस यात्रा में वह फर्रुखाबाद के गांव नीब करौरी पहुंचे। नीब करौरी में गांववालों ने जमीन के नीचे बाबा के लिए गुफा बना दी। वहां बैठकर बाबा दिनभर ध्यान करते और रात्रि में बाहर निकलते। गांववालों ने उन्हें लछमन दास बाबा कहकर पुकारना शुरू कर दिया। अपने यौवन में प्रवेश कर चुके लछ्मन दास की गुफा में कोई उनकी अनुमति के बिना प्रवेश नहीं कर सकता था। उन्होंने खुद के लिए दूध, फल और भोजन की आपूर्ति के लिए एक हरिजन युवक गोपाल बहेलिया को चुना था। उसी को अधिकार था कि वह बाबा की अनुमति के साथ भोजन गुफा में ले जा सकता था।

गांव वाले बाबा की लीलाओं को देखकर जब भी उन्हें ईश्वर रूप मानते तो दूसरे ही क्षण उनके जैसे ये भ्रम टूटने लगते। बाबा अक्सर एक चितकबरे कुत्ते गेंडुवा की पीठ पर सवार होकर गांव में घूम लिया करते थे। बच्चों के साथ गुल्ली-डंडा खेलना, कबड्डी और लुक्का-छिपी भी खेला करते। कई बार तो बच्चों के साथ शर्त लगा देते और एक ही बार में कई आम चूस जाते। जब ग्रामीण बाबा की ये हरकतें देखते तो मन ही मन पूछ बैठते- क्या यह सच में कोई बाबा हैं या आम इंसान? लेकिन उनकी लीलाओं की वजह से वह ग्रामीणों के लछमन दास बाबा ही बने रहे। बाबा से यह प्रेम इतना था कि जब उनकी पहली गुफा प्राकृतिक वजहों से नष्ट हो गई तो वहीं से 200 मीटर की दूरी पर एक ओर गुफा बनाई गई। यह गुफा आज भी यहां पर सुरक्षित है। इस गुफा के ऊपर भी बाबा ने हनुमान मंदिर बनवाया जो आज भी यहां पर है। एक तरफ यहां लछमन दास बाबा अपनी लीलाएं दिखा रहे थे तो दूसरी तरफ, अकबरपुर में उनकी खोज सालों से जारी थी। परिवार की यह खोज जल्द ही खत्म होने वाली थी।

गृहस्थ जीवन
लछमन दास बाबा नीब करौरी से अक्सर गंगा नहाने जाया करते थे। एक दिन उनके कुछ गांव वालों ने उन्हें गंगा घाट पर देख लिया। लंबी-लंबी जटाएं और बड़ी-बड़ी दाढ़ी रखे अपने लक्ष्मी नारायण को पहचानने में वह कामयाब हो गए तुरंत दुर्गा प्रसाद जी को सूचना दी गई। दुर्गा प्रसाद गंगा घाट पर पहुंचे और अपने पुत्र को लेकर अकबरपुर चले गए। घर छोड़कर जाने के लिए उन्हें पिता से तो डांट पड़नी ही थी। पत्नी रामबेटी से भी खूब डांट पड़ी। गवने से हाल ही में लौटी रामबेटी ने खूब सुनाया। लंबी-लंबी जटाएं देखकर कहा- यह क्या हाल बना रखा है? जब पत्नी का गुस्सा शांत नहीं हुआ तो लक्ष्मी नारायण जी ने उन्हें एक चमत्कार दिखाया। कहते हैं कि उस चमत्कार को देखने के बाद पत्नी शांत हुईं।

अब लछमन दास बाबा लक्ष्मी नारायण के तौर पर गृहस्थ में जुट गए। उन्होंने अपनी लंबी-लंबी जटाओं को त्याग दिया था। नीब करौरी में रहते ही उन्होंने एक धोती या कंबल धारण करना शुरू कर दिया था। इसे ही वह ओढ़ते और पहनते। वह एक बेटे, पति और एक पिता की भूमिका निभाने लगे। कुछ दिन परिवार के साथ रहते तो कभी अचानक ही गायब हो जाया करते थे। गृहस्थ जीवन निभाने के दौरान भी वह नीब करौरी आते-जाते रहे। लक्ष्मी नारायण गांव के प्रधान भी बने। इतने अच्छे प्रधान बने कि लगातार 8 बार वह गांव के प्रधान चुने गए।

लक्ष्मी नारायण और रामबेटी के दो पुत्र और एक पुत्री हुईं। सबसे बड़े बेटे का नाम अनेक सिंह शर्मा रखा। सिंह इसलिए जोड़ा क्योंकि परिवार के पास 8 गांवों की जागीर थी। दूसरे बेटे का नाम धर्म नारायण शर्मा तो बेटी का नाम गिरिजा देवी रखा। जब संतानें हुईं तब भी लक्ष्मी नारायण का घर से अचानक गायब होने का सिलसिला थमा ही नहीं। एक दिन पत्नी रामबेटी ने कहा- आप अचानक गायब हो जाया करते हैं। बच्चे कभी बीमार हो गए तो मैं क्या करूंगी? कैसे उनका इलाज करूंगी? इस पर लक्ष्मी नारायण ने जवाब दिया – तुम चिंता मत करो। अगर बच्चे रात को बीमार होंगे तो मैं सुबह आ जाऊंगा। सुबह बीमार हुए तो रात तक पहुंच जाऊंगा। पत्नी से किया यह वादा उन्होंने जीवनभर निभाया। हालांकि उन्होंने अपने परिवार के किसी भी सदस्य को कभी यह नहीं बताया कि वह कहां जाते हैं। परिवार को इसकी भनक तक भी नहीं थी कि उनके लक्ष्मी नारायण नीब करौरी के लछमन दास बाबा हैं।

कड़क पिता, चुलबुले बच्चे
लछमन दास बाबा जब अकबरपुर में अपने घर पर होते तो वह एक कड़क स्वभाव के पिता होते। परिवार में उनसे कोई जुबान नहीं लड़ा पाता था। यही वजह है कि किसी में इतनी हिम्मत भी नहीं थी कि कोई उनसे पूछ पाता कि वह कहां जाते हैं। कड़क स्वभाव का यह पिता बच्चों के बीच बच्चा बन जाया करता था। वह जब भी घर लौटते तो बच्चे उन्हें देखकर खूब खुश हो जाया करते। और होते भी क्यों ना क्योंकि पिताजी जब भी घर आते, वह उनके लिए ढेर सारी मिठाइयां लेकर आते। बेटे अनेका समेत तीनों बच्चों को वह उंगली पकड़कर घुमाया करते थे। उनके साथ खेलते। खूब हंसते और अगले ही दिन गायब हो जाते।

उनका परिवार आगरा शिफ्ट हो गया। लक्ष्मी नारायण पिता से दादा की भूमिका में आए और अब भी उनका स्वभाव वही रहा। नातियों के साथ वह खेला करते। उन्हें खूब घुमाया और खिलाया करते और अगले ही पल फिर गायब हो जाते। जब उनके नाती या बच्चे बीमार पड़ते तो वादेनुसार वह हाजिर हो जाया करते थे। जब घरवाले पूछते कि आपको कैसे मालूम पड़ा कि बच्चा बीमार है तो कह देते कि रास्ते में एक मौनी बाबा मिले थे। उन्होंने बोला कि जल्दी घर जाओ तुम्हारे घर में बच्चा बीमार है। कहते कि मौनी बाबा ने प्रसाद दिया है। यह खिला दो और बच्चा ठीक हो जाएगा। बच्चा उस प्रसाद को खाकर ठीक हो भी जाता।

घर आते तो घरवाले जाने नहीं देते लेकिन उन्हें तो जाना ही होता था। ऐसे में जब भी उन्हें घर से निकलना होता था तो वह किसी ना किसी बात पर बिगड़ जाते। इतना ज्यादा बिगड़ जाते कि उनके गुस्से को झेलना परिवार के लिए मुश्किल हो जाता। वह ऐसी स्थिति खड़ी कर देते कि परिवार खुद परेशान होकर बोल देता कि आप चले ही जाओ तो ही ठीक है। इस तरह वह चले जाते। कहां? परिवार में किसी को नहीं पता होता था। लेकिन उनकी जब परिवार को जरूरत रही, वह हमेशा हाजिर रहते। जब भक्तों को उनकी जरूरत रही तो वह वहां भी उपलब्ध थे। जीवन के आखिरी क्षण तक ना उन्होंने अपने परिवार को छोड़ा और ना ही अपने भक्तों को। परिवार को जरा सी भी भनक नहीं होने दी कि वह कोई सिद्ध पुरुष हैं जिन्हें लाखों लोग पूजते हैं। ना ही अपने भक्तों को भनक लगने दी कि उनका कोई परिवार है। उनके करीबी दो-चार लोगों को छोड़कर किसी को पता नहीं था कि उनका गृहस्थ जीवन भी कुछ है।

कैसे बने नीम करौली बाबा?

अकबरपुर वाले जब अपने गांव के प्रधान से मिलते तो उन्हें इसका जरा भी इल्म नहीं होता कि इनके हजारों-लाखों भक्त होंगे। अकबरपुर के लक्ष्मी नारायण लछमन दास के तौर पर नीब करौरी में बसे हुए थे। करीब 18 साल नीब करौरी में रहने के बाद लछमन दास बाबा 1935 के आसपास यहां से निकल गए। जब वह इस गांव से दूसरी जगह पहुंचे तो लोगों ने उन्हें नीब करौरी वाले बाबा कहना शुरू कर दिया। काफी हद तक खुद बाबा ने यह नाम स्वीकार कर लिया था।

नीब करौरी से निकलने के बाद उन्होंने कुछ वक्त फतेहगढ़ किलाघाट में गंगा किनारे बिताया। यहां उन्होंने गाय भी पालीं। धीरे-धीरे उनके भक्तों की तादाद बढ़ने लगी। वह लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, दिल्ली, शिमला और मद्रास में भी प्रतिष्ठित हो गए। नीब करौरी गांव वालों ने नीब करौरी वाले बाबा के बारे में सुना भी होगा तो भी उन्हें बाबा के जीवनपर्यंत तक यह पता नहीं लग पाया कि उनके लछमन दास बाबा ही नीब करौरी वाले बाबा हैं। अपनी लीलाओं से उन्होंने हर धर्म और हर जाति के व्यक्ति को भक्त बनाया बल्कि यह कहना सही होगा कि भक्त बनते गए। उन्होंने कभी कोई प्रवचन नहीं दिया। कोई सत्संग नहीं किया। वह बस बोल-चाल में ही आशिर्वाद दे देते और वह सच हो जाता। उत्तर प्रदेश में कई ठिकानों पर रहने के बाद वह पहाड़ों की ओर निकल पड़े।

Neem Karoli baba with his followers
भक्तों के साथ नीम करौली बाबा

जब पहाड़ को बनाया ठिकाना
1940 में उन्होंने नैनीताल के लिए प्रस्थान किया। नैनीताल से दो किलोमीटर दूर मनोरा पर्वत पर ही वह अधिकतर रहा करते थे। बाबा ने इसे आश्रम और मंदिरों के निर्माण के लिए चुना। बाबा ने इसका नाम हनुमान गढ़ रखा। उन्होंने 15 जुलाई, 1952 को यहां हनुमान जी की छोटी मूर्ति स्थापित करवाई। रामायण और हनुमान चालीसा के कई पाठ करवाए। बाद में 16 जून, 1953 को मंदिर में बड़ी मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करवाई गई। कुछ समय बाद हनुमान गढ़ को एक सरकारी ट्रस्ट को देकर उन्होंने इससे अपना संपर्क खत्म कर दिया।

बाबा की लीलाएं यहां भी चलती रहीं और उनके भक्त भी बनते रहे। लोग उन्हें हनुमान का अवतार मानने लगे थे। कई भक्त उन्हें हनुमान बुजु कहकर पुकारते। हनुमान गढ़ में रहते हुए बाबा भूमियाधार और गेठिया भी जाया करते थे। इसी बीच, 11 दिसंबर, 1961 को भूमियाधार के ठाकुर पद्मसिंह के पुत्र पूरन सिंह ने अपना मकान और उसके पास की सारी जमीन महाराज को अर्पित कर दी। यहां बाबा ने एक आश्रम और छोटी हनुमान जी की मूर्ति स्थापित की। बाबा जब कुमाऊं पहुंचे तो वह नीब करौरी बाबा नाम से जाने जाते थे लेकिन धीरे-धीरे यहां लोगों ने उन्हें नीब की जगह नीम करौली बाबा कहना शुरू कर दिया। बाबा जिन्हें पहाड़ में महाराज जी बुलाया जाता था, उन्होंने भी कभी इस पर आपत्ति नहीं जताई। इस तरह वह नीब करौरी से नीम करौली बाबा हो गए।

कैंचीधाम का निर्माण
भूमियाधार में रहते हुए ही बाबा ने कैंचीधाम का निर्माण करवाया। पूर्णानंद तिवाड़ी की तरफ से बताई गई जगह पर निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया। जगह का चयन करने के बाद महाराज जी वापस भूमियाधार लौट आए। दूसरे दिन उन्होंने सबसे पहले एक चबूतरा बनाने का निर्देश दिया। यह वही जगह है जहां पर हनुमान जी की मूर्ति स्थापित है। यूपी के तत्कालीन वन मंत्री चौधरी चरण सिंह ने बाबा को यह भूमि 1 रुपए सालाना की दर से लीज पर दे दी। कहते हैं कि जब बाबा को जमीन मिल गई तो उन्होंने चौधरी चरण सिंह को आशिर्वाद दिया- जा तू प्रधानमंत्री बनेगा। बाद में चौधरी चरण सिंह भारत के प्रधानमंत्री बने भी।

खैर, कैंची धाम के निर्माण का सिलसिला शुरू हो चुका था। धीरे-धीरे जंगल कटवाकर साफ किया गया। भूमि जहां समतल हो सकती थी, की गई और बिना किसी योजना के, बिना किसी डिजाइन के बाबा के निर्देश अनुसार कार्य होता रहा। राम कुटी, विष्णु कुटी, कृष्ण कुटी, राधा कुटी, कृष्ण बलराम कुटी और श्याम कुटी समेत अन्य इमारतों का निर्माण किया गया। कई भव्य मंदिर, एक धर्मशाला और महाराज की कुटिया भी यहां बनाई गई। यहां मौजूद हवन कुंड के ऊपर प्रथम हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना की गई।

दूसरे कक्ष में लक्ष्मी नारायण जी की और तीसरे कक्ष में शिवलिंग के साथ मां पार्वती, श्री गणेश, कार्तिकेय की मूर्ति लगाई गई। नैनीताल आने के बाद महराजा जी की ख्याति कनाडा, फ्रांस, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका समेत दुनिायभर में फैलने लगी थी। दुनियाभर से कैंची धाम में भक्त जुटते। बाबा जी गर्मियों का वक्त ज्यादातर कैंची धाम में बिताते और ठंडी के समय वृंदावन चले जाते।

ये तो बाबा हो ही नहीं सकता

नीम करौली महाराज के पास देश और दुनिया से भक्त आते। वह सबसे मिलते भी लेकिन अगर किसी भक्त ने उनके बारे में कहीं जाकर प्रशंसा कर ली तो वह उसे डांटने-फटकारने से भी पीछे नहीं हटते। उस भक्त के घर आना-जाना भी बंद कर देते थे। कोई व्यक्ति जब उनके बारे में सुनकर उनसे मिलने आता तो वह उस व्यक्ति के साथ ऐसा व्यवहार करते, जैसे भक्त ने जो भी सुना है, वह सब झूठ है।

बाबा कई बार बच्चों की तरह एक ही चीज की रट लगाते। अचानक वह कुमाउंनी भाषा के नान्, ठुल (छोटा, बड़ा) शब्दों की रट लगा दिया करते थे। और यह कई दिनों तक चलता रहता। बाबा जब क्रोधित होते थे तो वह बहुत ज्यादा क्रोधित होते। कई बार हाथ भी छोड़ देते और यह वाकिया सिर्फ उसको नहीं डराता जिससे वह क्रोधित हो रहे हैं बल्कि वहां आया हर व्यक्ति डर जाया करता था। इन हरकतों को देखकर नए लोगों की आंखों में उनकी महत्ता कम हो जाती। अक्सर लोग कहते- ये तो बाबा हो ही नहीं सकता। कई बार लोग उनके आश्रम में आकर उनसे ही पूछ बैठते कि बाबा कहां हैं तो वह कहते कि यहां कोई बाबा-वाबा नहीं हैं। जाओ हनुमान जी के दर्शन कर लो।

उन्हें खुद के प्रचार से कितनी नफरत थी वह इसी से समझ में आता है कि उन्होंने ऐसे किसी भी प्रयास को कड़ाई से खत्म कर दिया। एक बार हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन उप-राज्यपाल स्वर्गीय राजा भद्री ने बाबा की अनेक लीलाओं का संकलन किया लेकिन बाबा ने उन्हें इसे प्रकाशित करने की अनुमति नहीं दी। सिर्फ छापने से मना नहीं किया बल्कि अपने ही सामने उस पूरी प्रति को जलवा दिया। लेखक और विचारक के. एम. मुन्शी ने बाबा की अनुमति लिए बिना उनके बारे में लेख छाप दिए तो उन्हें बाद में बाबा के सामने खेद जताना पड़ा। जब तक बाबा जीवित रहे, तब तक उन्होंने अपने बारे में कोई भी किताब छापने नहीं दी और कोशिश की कि कोई उनके बारे में लेख भी ना लिखे। हालांकि उनके भक्त डॉ. रिचर्ड एल्पर्ट उर्फ राम दास ने पहली बार 1971 में बाबा को लेकर कुछ छापा।

बाद में उन्होंने 1979 में मिरेकल ऑफ लव नाम से बाबा पर एक और पुस्तक लिखी। वह हर कोशिश करते कि कोई उन्हें भगवान ना समझ ले। वह कभी रिक्शेवाले से किराया कम करने को लेकर भिड़ जाते तो कभी उन्हें अपनी तरफ से उपहार दे दिया करते। बाबा हर वह व्यवहार करते जो एक साधारण इंसान से हम उम्मीद करते हैं बल्कि कई बार तो वह एक गुस्सैल और खड़ूस इंसान दिखने में भी गुरेज नहीं करते थे। लेकिन इसके बावजूद कई लोग उन्हें हनुमान जी का अवतार मानते थे। ऐसा मानने की वजह भी थी। नीम करौली बाबा हमेशा राम-राम जपते रहते। सुंदरकांड और रामायण का पाठ उन्हें बहुत प्यारा था। वह राम के भजन सुनकर कभी इतने डूब जाते थे कि उनकी आंखों से आंसू बहने लगते। 

क्या हनुमान जी का रूप थे बाबा?

क्या नीम करौली बाबा हनुमान जी का अवतार थे? जवाब हां भी है और नहीं भी। बाबा के सबसे करीब रहने वाले दादा मुखर्जी अपनी किताब बाय हिज ग्रेस में लिखते हैं कि हर व्यक्ति उन्हें अपने तरीके से जानता और समझता था। हर कोई मानता है कि जिस महाराज जी को वह जानते हैं, वही सबसे सही है लेकिन नहीं। वह हम सबको बेवकूफ बना रहे हैं। यही नीम करौली बाबा का सच था। उन्होंने कभी खुद को भगवान नहीं माना। ना ही उन्होंने अपने प्रति भक्तों की आस्था को बदलने की ही कोशिश की। इसलिए जैसी भक्तों की आस्था ने उन्हें देखा, वह उनके लिए वही हो गए। वह एक गार्जियन जरूर थे अपने भक्तों के। वह अपने भक्त के परिवार को अपना परिवार मानते और वैसा व्यवहार भी करते।

वह जब चाहते, जिस भक्त के घर चाहते, चले जाते थे। हर भक्त के घर पर हक से अपने लिए और अपने साथ गए भक्तों के लिए भोजन की मांग करते। वह अपने भक्तों के साथ गुस्सा होते तो उनके साथ मजाक करते और कई बार उन्हें शर्मसार करने में भी गुरेज नहीं करते। दादा मुखर्जी अपनी किताब में एक ऐसा ही किस्सा शेयर करते हैं। वह बताते हैं कि बाबा कई बार बोलते-बोलते गालियों की झड़ी लगा देते थे। एक बार बाबा लगातार गालियां दिए जा रहे थे। रुक ही नहीं रहे थे। बीच-बीच में बोलने लगे- दादा एमए हैं। दादा एमए हैं।  इस पर मुझे भी गुस्सा आ गया और मैंने बोल दिया कि आप भी एमए हो। इस पर बाबा ने मजाकिया अंदाज में पूछ लिया- कैसे? कैसे? मैंने जवाब दिया- मैं मास्टर ऑफ आर्ट्स हूं और आप मास्टर ऑफ अब्यूजिंग हैं। इस पर बाबा जोर-जोर से हंसने लगे और कहने लगे- हां, मैं बहुत गालियां देता हूं। एक ऐसा ही किस्सा एक विदेशी कपल के बेटे का नाम रखने को लेकर दादा शेयर करते हैं।

वह बताते हैं कि ऑस्ट्रेलिया के कपल का बेटा हुआ और उन्होंने टेलीग्राम भेजा कि बाबा हमारे बेटे का नाम रखें। जब दादा ने यह बात बाबा से कही तो उन्होंने कहा अब मैं नाम कहां से लाऊं। चलो ठीक है, उसका नाम खुटका-बुटका रख दो। इस पर वहीं बैठीं सिद्धी दीदी और जीवंती नाराज हो गईं। उन्होंने बाबा से कहा, यह कोई नाम है। कुछ अच्छा नाम दीजिए उस बच्चे को। इस पर बाबा ने कहा- अरे मनहूस औरतों, अच्छे नाम तो सब तुमने ले लिए। चलो ठीक है, गणेश रख दो। हर भक्त के साथ नीम करौली महाराज का यही अपनापन था। उनके लिए कोई भक्त ना छोटा था, ना बड़ा। जिस घर में जो भोजन मिल गया, वह उसको ग्रहण कर लेते थे। अपने भक्तों के दुखों को मिटाने के लिए वह तत्पर रहते। इस तरह वह सबके गार्जियन बन जाया करते थे। अपनी इन लीलाओं को दिखाते-दिखाते 1973 में उन्होंने प्राण त्याग दिए और अपनी इस अंतिम यात्रा का उन्हें पहले ही भान हो आया था।

नीम करौली बाबा की अंतिम यात्रा

1973 का साल शुरू ही हुआ होगा कि नीम करौली बाबा ने अलग सा व्यवहार करना शुरू कर दिया था। वह अक्सर दिल की बीमारियों के बारे में पूछा करते। वह विचलित रहने लगे थे। भक्तों से मिलने का समय भी उन्होंने सीमित कर दिया था। स्थिति यह हो गई थी कि शौच और लघु शंका के लिए भी उन्हें याद दिलाना पड़ता। उन्हें अपने शरीर का भान भी नहीं रहता। किसी से कहा मेरी पेशी है। भक्तों के नीम करौली बाबा की जय कहने पर जोर से हंसकर कहते- बाबा नीम करौली तो मर चुके। अब इनकी आवाज को वहां तक पहुंचना पड़ेगा। 9 सितंबर, 1973 को महाराज जी ने दादा मुखर्जी और सिद्धी मां से कहा कि 3-4 दिन के लिए जा रहा हूं। लेकिन जब वह जा रहे थे तो बार-बार बोल रहे थे कि आज मुझे सेंट्रल जेल से मुक्ति मिल गई है। बाबा अपने स्थान से उठे और पहले हनुमान जी के सामने तीन-चार मिनट प्रणाम की मुद्रा में रहे और बोले- राम गए, कृष्ण गए। मैं भी जाऊंगा।

जब वह कार में बैठने को हुए तो उनका कंबल गिर गया। भक्तों ने उठाने की कोशिश की तो उन्होंने कहा कि हमें किसी चीज से भी जुड़ाव नहीं रखना चाहिए और पहनने से इनकार कर दिया। जब काठगोदाम से आगरा के लिए ट्रेन में बैठे तो उन्होंने कुछ भी खाने से इनकार कर दिया। आगरा में उनके छोटे सुपुत्र धर्म नारायण शर्मा पहुंच गए थे। जब आगरा से चले तो एकदम ठीक थे। आगरा और मथुरा के बीच हल्के-हल्के झटके आने लगे। जब उनसे पूछा गया कि महाराज जी क्या हुआ तो बोले कि वृंदावन ले चलो। बीच-बीच में उन्हें हल्की बेहोशी भी आ रही थी और होश में भी आ रहे थे। बार-बार पूछ रहे थे कि वृंदावन आया कि नहीं।

उन्हें वृंदावन में सीधे रामकृष्ण मिशन अस्पताल ले जाया गया। वहां पर जब वह होश में आए तो उन्होंने फिर पूछा वृंदावन आए कि नहीं और जब बताया गया अस्पताल में हैं तो बोले – अस्पताल लाने की जरूरत क्या थी? उसी समय उन्होंने अपने नाक पर लगाई ड्रिप हटाई और गंगा जल की मांग की लेकिन वहां गंगा जल नहीं था। इसके बाद उन्होंने जय जगदीश हरे का उच्चारण करना शुरू कर दिया। हर सांस के साथ उनका ये उच्चारण मंद पड़ता जाता और इस तरह 11 सितंबर की रात 1.15 मिनट पर उन्होंने अपनी देह त्याग दी। बाद में उन्हें वृंदावन आश्रम लाया गया। पागल बाबा के निर्देशानुसार यहीं पर उनकी समाधि बनाई गई। इस तरह एक सिद्ध पुरुष इंसान बनकर आया और अपनी सब लीलाएं करके चला गया। यह नीम करौली बाबा के देह छोड़ने के बाद ही था कि उनके गांव, उनकी ससुराल वालों और नीब करौरी गांव वालों को पता चला कि उनका लक्ष्मी नारायण कोई बड़ा सिद्ध पुरुष था।

सभी के अपने थे बाबा
नीम करौली बाबा ने कभी भाषण या प्रवचन नहीं दिए। उन्होंने अपनी कोई गद्दी नहीं बनाई। बाबा सिर्फ हिंदुओं के नहीं बल्कि सभी धर्मों के थे। वह मुस्लिमों से कुरान के मार्फत बात करते। ईसाइयों से बाइबिल के मार्फत। वह कहते- सभी धर्म मूलत: ईश्वर की ओर ले जाते हैं। सब मनुष्य समान हैं। वह खून सब में है जो हृदय से होकर शरीर में दौड़ता है। उन्होंने ना संतों की तरह कोई परिपाठी छोड़ी और ना ही उन्होंने महान बनने की कोशिश की। वह महाकुंभ में जाते लेकिन वहां स्नान करने के मुकाबले लोगों को खिलाने पर ध्यान केंद्रित करते। वह कभी भी अपने भक्तों से संसार से विमुक्त होने की बात नहीं करते बल्कि इसी संसार में रहकर जरूरतमंदों की सेवा करने की बात कहते।

उनके आश्रम जो कोई आता, कोई भूखा नहीं जाता। यही उनकी सिद्धी थी। जब उनके परिवार के कुछ सदस्यों को उनके सिद्ध होने का पता तो उन्होंने साफ किया कि उनके परिवार का कोई भी व्यक्ति उनके द्वारा बनाए मंदिरों का ट्रस्टी नहीं बनेगा। ऐसा ही हुआ है। आज भी नीम करौली बाबा का परिवार भोपाल में रहता है। नीम करौली धाम में हर 15 जून को कैंची धाम का स्थापना दिवस मनाया जाता है। बाबा ने जितने भी हनुमान मंदिर पूरे देश में मनाए इनमें से ज्यादातर का प्राण प्रतिष्ठा दिवस 15 जून ही है।

नीम करौली बाबा इस दुनिया में सेवा करने आए थे। उन्होंने सेवा की। उनमें कभी भी संत या भगवान बनने की लालसा नहीं रही बल्कि वह तो कहा करते थे कि अगर आदमी हमें जान जाएगा तो दुनिया हमारे रोम-रोम को नोच कर ताबीज बना लेगी। बाबा नीम करौली को लेकर कई कहानियां और बातें आपको सुनने को मिल जाएंगी लेकिन जैसे उनके परम भक्त राम दास ने कहा है – तथ्य चंद हैं। और कहानियां कई। और यही नीम करौली बाबा का सटीक परिचय है।

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