जब पाताल भुवनेश्वर 
पर एक फौजी ने कर दिया कब्जा, सत्य साईं से है कनेक्शन

पाताल भुवनेश्वर की कहानी

पाताल भुवनेश्वर की कहानी

अगर आप सत्य सांई बाबा के भक्त हैं तो आपको पता होगा कि कैसे सत्य सांई ने पाताल भुवनेश्वर को खोज निकाला। बल्कि आदिगुरु शंकराचार्य के बाद सत्य सांई ही वो शख्स थे जिनकी वजह से ये गुफा दुनिया की नजरों में आई। सत्य सांई बाबा ना होते तो शायद ये गुफा कभी दुनिया के सामने आती ही नहीं।

ये वो नैरेटिव है जो देश से लेकर विदेशों तक फैलाया गया। और आज भी फैलाया जाता है। क्यों? क्योंकि पाताल भुवनेश्वर को कब्जाने की कोशिश करने वाले एक शख्स के दावों को सही ठहराना था। वो शख्स जिसे सत्य सांई के कई भक्त गणेश भगवान का अवतार तक बता देते हैं। इस शख्स को पाताल भुवनेश्वर का खोजकर्ता बनाने के लिए स्कंदपुराण में दिए गए एक श्लोक का मतलब ही बदल दिया गया। ये वही अवतार है जिसने पाताल भुवनेश्वर पर एकछत्र कब्जा सा कर लिया था। इसके खिलाफ कोई भी आवाज उठाता तो उसे या तो गुंडों का सामना करना पड़ता या  लाचार होकर चुप हो जाना पड़ता। क्योंकि प्रशासन तक भी इसके खिलाफ जाने को तैयार नहीं था। इस शख्स ने पाताल भुवनेश्वर को एक टूरिस्ट स्पॉट बना दिया था जिसके अंदर जाकर विदेशी पर्यटक यहां की पवित्रता को भंग कर दिया करते थे।

इस रिपोर्ट में हम आपको बताने वाले हैं कि कैसे एक रिटायर्ड मेजर जनरल ने पाताल भुवनेश्वर को धार्मिक स्थल से बदलकर अपना व्यापार बना दिया था। ये कहानी है एक ऐसे मेजर जनरल की जिसे सत्य सांई बाबा के भक्त पाताल भुवनेश्वर का खोजकर्ता बताते हैंऔर पाताल भुवनेश्वर को दुनिया के सामने लाने का श्रेय सत्य सांई को देते हैं। लेकिन इन दोनों ही दावों में कितनी सच्चाई है? इस सवाल का जवाब लेते हैं और शुरुआत करते हैं इस पूरे खेल की जड़ तक पहुंचने की।

कहानी जो सत्य सांई  के भक्त सुनाते हैं?
साल 1975 भारतीय सेना की कुछ गाड़ियां हिमालयी क्षेत्र से गुजर रही थीं। इसी दौरान इन वाहनों में से एक गाड़ी का संतुलन बिगड़ा और वो खाई में जा गिरी। इस हादसे में गाड़ी को चलाने वाले ड्राइवर की मौत हो गई। लेकिन सेना के इस बेड़े की अगुवाई कर रहे जनरल उसकी मौत को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। इन जनरल का नाम थाक्रांति आत्माराम टेलर यानी के टेलर। जो आगे जाकर इस पूरे खेल की मुख्य कड़ी बनते हैं।

 टेलर ने एक तरफ मृत हो चुके ड्राइवर के शव को अस्पताल भिजवाया और दूसरी तरफ, उन्होंने उस बाबा का स्मरण किया जिनसे उनका परिचय हाल ही में हुआ था। मेजर जनरल ने उस बाबा यानी कि सत्य सांई बाबा का ध्यान करना शुरू किया और प्रार्थना की कि अगर वो सच्चे हैं तो उस ड्राइवर के प्राण बचा लें। कुछ दिन बाद जब मेजर जनरल अपने आवास पर थे तो उन्हें अस्पताल से टेलीफोन आया। टेलीफोन पर उन्हें बताया गया कि वो ड्राइवर जीवित और एकदम स्वस्थतंदुरस्त है। और इसके बाद मेजर जनरल की सत्य सांई में अटूट आस्था बन गई।

फिर आया 1986 का साल। के टेलर को प्रमोशन मिला और वह मेजर जनरल के पद पर नियुक्त हुए। नियुक्ति के बाद वह सत्य सांई से मिलने गए और इस मुलाकात में बाबा ने उनसे कहा कि आपके कंधों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी आने वाली है। फिर तीन साल बाद 1989 में एक रात को मेजर जनरल टेलर को एक सपना आया। इस सपने में उन्होंने देखा कि सत्य सांई बाबा उन्हें हिमालय में स्थित एक मंदिर में लेकर जाते हैं। बाबा उन्हें रास्ता दिखाते हुए कहते हैं कि तुम वहां जाओ। और सपना खत्म हो जाता है। टेलर बताते हैं कि उन्हें इस सपने से ऐसा लगा कि बाबा उनसे तपस्या करवाना चाहते हैं। हालांकि उन्होंने इस सपने को लेकर बहुत गंभीरता नहीं दिखाई।

बात आईगई हो गई और एक दिन पाताल भुवनेश्वर के आसपास वो अपने फंक्शन कमांडर के साथ थे। इसी दौरान उनके फंक्शन कमांडर ने कहा यहां आसपास एक गुफा है तुम्हें वहां जरूर जाना चाहिए। टेलर जब यहां अपनी पत्नी के साथ पहुंचे तो उन्हें याद हो आया कि ये वही जगह जिसकी तरफ सत्य सांई बाबा ने सपने में उन्हें भेजा था। और इस तरह फिर टेलर का यहां आनाजाना हो गया और उन्होंने इस गुफा का सुधार करना शुरू कर दिया। टेलर ने यहां पर लाइट की व्यवस्था की। सड़क पहुंचाई और भक्तों के रहने के लिए एक निवास स्थान भी बनवाया। और इस तरह टेलर पाताल भुवनेश्वर के खोजकर्ता बन गए। वो खोजकर्ता जिनका जिक्र स्कंदपुराण में भी है। और जिन्हें सत्य सांई के भक्त गणेश भगवान से कम नहीं समझते हैं।

इस कहानी का सहारा लेकर मेजर टेलर ने पाताल भुवनेश्वर में सत्य सांई की ब्रांडिंग करना शुरू दिया। सत्य सांई को मानने वाले विदेशियों को इसने यहां पर टूर देना शुरू किया और उन्हें यही कहानी सुनाकर खुद को पाताल भुवनेश्वर का स्वयंभू बताने लगा। 

कैसे रचा गया पूरा खेल?
अब टेलर के पास कहानी तो तैयार थी और वह खुद के मुख से पर्यटकों को ये बताबताकर प्रचारित कर भी रहा था  लेकिन टेलर चाहता था कि उसके पास एक पुख्ता और कोई लिखा हुआ प्रमाण भी हो। और यहीं पर एंट्री होती है गोपाल करनवर की। खुद को केरल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बताने वाले गोपाल 1989 के आसपास ही टेलर से मिलते हैं।

टेलर गोपाल को भी वही कहानी सुनाते हैं और बताते हैं कि स्कंदपुराण में जिनका जिक्र है, वो वही वत्खल है। इस कहानी को लेकर गोपाल 1994 में एक किताब लेकर आते हैं। भगवत सत्य सांई एंड पाताल भुवनेश्वर। इस किताब में स्कंदपुराण का हवाला देकर ये स्थापित कर दिया जाता है कि टेलर ही पाताल भुवनेश्वर के खोजकर्ता हैं और गुफा के अंदर सत्य सांई भी विराजमान हैं। इस किताब में स्कंदपुराण के मानसखंड के एक श्लोक का अनुवाद किया गया है।

वतकलाख्यौं महादेवम् प्रकाशयति भूतले।
नागभिष्यन्ति, मनुष्यजातावत् पाताल मण्डलाख्य: करिष्यति
तदा प्रभूति मत्यानां गुहा भविष्यति।।

इस श्लोक का जो हिंदी अनुवाद है उसके मुताबिक कभी वत्कल नाम का व्यक्ति भगवान को इस भूतल पर प्रकाशित करेगा। तब तक इस पाताल में मानव की गति नहीं होगी। वत्कल द्वारा सेवा किए जाने पर महादेव की इस गुफा में मानव प्रवेश आरंभ हो जाएगा।

किताब में बदल दिया गया अर्थ
 किताब में इसे थोड़ा सा ट्विस्ट करके पेश किया गया था। किताब में इस श्लोक का हवाला देते हुए कहा गया कि सतयुग में शेषनाग राजा ने ऋतुपर्ण को पाताल भुवनेश्वर की कहानी सुनाई। और कहा कि कभी वत्कल धारी यानी कि पेड़ की छाल से बना वस्त्र पहना अर्थात सैन्य वस्त्रधारी इस गुफा में आएगा और इसका उद्धार करेगा। आगे लिखा गया कि शेषनाग के इस वर्णन के बाद सतयुग, द्वापर, त्रेता युग बीत गए लेकिन इस नाम का कोई व्यक्ति गुफा तक नहीं पहुंचा। सत्य सांई की कृपा से 1989 में टेलर ही इस गुफा में पहुंचे। इसलिए बाकी दुनिया के लिए इस गुफा को प्रकाश में लाने वाले मानसखंड में वर्णित व्यक्ति वही हैं।

किताब में टेलर को भगवान साबित करने की भी कोशिश की गई है। किताब में यहां आए भक्तों के बयानों के आधार पर लिखा गया कि जब वह जनरल टेलर से पूजा करवा रहे थे तो वह भगवान गणेश के रूप में गए। कई भक्तों के हवाले से बताया गया कि जब वे गुफा में थे तो उन्हें वहां सत्य सांई के होने का एहसास भी हुआ। इस तरह की कई बड़बोली बातें इसमें शामिल की गई थीं। जिनका मकसद एक ही था कि टेलर को पाताल भुवनेश्वर का खोजकर्ता साबित किया जाए।  और सत्य सांई से इसे जोड़ दिया जाए। बाद में सत्य सांई ने भी इस पर्टिकुलर चैप्टर पर अपनी विभूति फैलाकर इस पूरे नैरेटिव को मान्यता दे दी। और तब से सत्य सांई के भक्तों के बीच ये बात सर्वमान्य है कि सत्य सांई बाबा की कृपा से ही टेलर पाताल भुवनेश्वर के खोजकर्ता बने।

टेलर का काला सच
अब जो मेजर जनरल सत्य सांई के भक्तों की नजरों में किसी भगवान से कम नहीं था, वही पिथौरागढ़ के स्थानीय लोगों की नजर में सबसे बड़ा विलन बन चुका था। पाताल भुवनेश्वर पर एकछत्र राज की शुरुआत टेलर ने लोगों के विश्वास को जीतने से की। तत्कालीन मंदिर कमिटी के अध्यक्ष दानसिंह भंडारी ने तब बताया था कि मेजर जनरल टेलर सेवा में रहते हुए यहां पर चारपांच बार आए थे। उन्होंने गुफा में बिजली पहुंचाने में भी बड़ा सहयोग दिया था। ऐसे में जब टेलर रिटायर हुए तो वह फिर स्थानीय लोगों के पास पहुंचे। टेलर ने कहा कि वह अब यहीं रहकर समाज सेवा करना चाहते हैं।

स्थानीय लोगों ने उनका सम्मान करते हुए उनकी इच्छा स्वीकार कर ली। टेलर यहां रहने लगे और शुरुआत में उनका व्यवहार सब लोगों के प्रति काफी प्रेम भरा था। बताया जाता है कि टेलर ने यहां पर झाड़ियों की साफसफाई कर एक रास्ता भी पाताल भुवनेश्वर तक बनवाया। साथ ही प्रशासन से बात करके रोड भी यहां तक पहुंचाई। इससे ना सिर्फ स्थानीय लोग बल्कि पाताल भुवेश्वर मंदिर कमिटी भी उनसे काफी प्रसन्न थी। क्षेत्र में टेलर की तरफ से किए गए काम की हर कोई तारीफ करता लेकिन किसी को पता नहीं था कि टेलर के मन में क्या चल रहा है। एक दिन टेलर ने मंदिर कमिटी से कहा कि यहां पर श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए कोई धर्मशाला या होटल नहीं है। उसने प्रस्ताव रखा कि अगर मंदिर कमिटी जमीन दे दे तो वह एक धर्मशाला बनवा सकता है। कमिटी ने भी खुशीखुशी जमीन दे दी। और यही सबसे बड़ी गलती साबित हुई।

धर्मशाला तैयार होने के बाद टेलर ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया। उसने एक दिन धर्मशाला के बाहर पाताल भुवनेश्वर चैरिटेबल ट्रस्ट, सत्य सांई आश्रम का बोर्ड लगा दिया। टेलर ऋषिकेश से यहां टूरिस्ट्स को लेकर आता। उनसे 9 हजार रुपए का चार्ज वसूलता। और उन्हें कथित धर्मशाला में ठहराता। टेलर यात्रियों को ना सिर्फ पाताल भुवनेश्वर का टूर करवाता बल्कि उनके मार्फत पूजापाठ भी करता। उसने कुछ स्थानीय लोगों को भी अपने साथ कर लिया था। टेलर की इन नापाक हरकतों की वजह से भुवनेश्वर में चायपानी और पूजा का सामान बेचने वालों के सामने आजीविका का संकट पैदा हो गया था। क्योंकि टेलर यात्रियों को कुछ भी इन लोगों से खरीदने नहीं देता था।

दूसरी तरफ, सदियों से पाताल भुवनेश्वर में पूजापाठ कर रहे भंडारी परिवार के सामने भी संकट खड़ा हो गया था। टेलर ये जरूर सुनिश्चित करता कि उसका नैरेटिव कहीं टूट ना जाए। इसी खतरे को देखते हुए वो पर्यटकों को नजदीकी स्थल गंगोलीहाट, बेरीनाग और अन्य जगहों पर जाने ही नहीं देता था। मंदिर कमिटी ने कई बार टेलर से ऐसा ना करने का आग्रह किया लेकिन वो नहीं माना। जब भंडारी परिवार का विरोध तेज होने लगा तो उसने गुंडों के बल पर उन्हें शांत करने का रास्ता अपनाया। तत्कालीन मंदिर कमिटी के अध्यक्ष दानसिंह भंडारी बताते हैं कि जनरल टेलर के कहने पर एक आदमी ने उनसे मारपीट भी की। पुलिस में शिकायत दर्ज की गई लेकिन कोई एक्शन नहीं हुआ। टेलर की इन मनमानियों के खिलाफ जिले से लेकर मंडल तक के अधिकारियों तक शिकायत दर्ज करवाई गई लेकिन टेलर की सबसे जानपहचान थी और इस वजह से किसी भी तरह की कार्रवाई नहीं की गई।

सत्य साईं का किया प्रचार
एक तरफ टेलर पाताल भुवनेश्वर को अपने व्यापार का अड्डा बना चुका था तो दूसरी तरफ वह यहां पर सत्य सांई के प्रचार में भी जुटा हुआ था। वो यहां आने वाले लोगों को सत्य सांई की विभूति बांटा करता। 1996 में एक बार टेलर ने प्रचार किया कि गंगोलीहाट में उसकी ट्रस्ट की तरफ से एक स्वास्थ्य शिविर लगाया जा रहा है। इस शिविर में इंग्लैंड से डॉक्टर रहे हैं। और जब लोग इस शिविर में पहुंचे तो उन्हें इंग्लैंड से आए डॉक्टर की दवाई नहीं बल्कि सत्य सांई की विभूति बांट दी गई। मंदिर कमिटी करीब दो साल तक प्रशासन का चक्कर काटती रही लेकिन टेलर के रसूख की वजह से उनकी कहीं सुनवाई नहीं हुई।

1997 में मंदिर कमिटी और स्थानीय युवाओं ने आंदोलन करने की धमकी भी दी थी। अब इस मामले में आगे क्या हुआ, इसको लेकर बहुत ज्यादा जानकारी आज के समय में नहीं मिलती है। लेकिन कहा जाता है कि बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया था। शायद यही वजह है कि आज भी यहां पर आपको कई जगहों पर सत्य सांई की तस्वीर नजर जाती है। खैर, इस तरह ये विवाद तो खत्म हुआ लेकिन सत्य सांई के भक्तों का खोजकर्ता वाला दावा आज भी बना हुआ है।

सत्य सांई के भक्तों का दावा कितना सही?
ये सच है कि मेजर टेलर ने पाताल भुवनेश्वर में बिजली की व्यवस्था की। यहां कुछ और सुविधाजनक इंतजामात भी किए लेकिन ये भी सच है कि यह सब स्थानीय लोगों के सहयोस से संभव हो सका। हालांकि सत्य सांई के भक्त स्थानीय लोगों के सहयोग की कभी बात नहीं करते। वो टेलर की तरफ से यहां की गई ज्यादतियों की भी बात नहीं करते। दूसरी तरफ, भक्तों को ये भी समझ नहीं आता कि टेलर कैसे इसके खोजकर्ता हो सकते हैं क्योंकि ये गुफा कभी खोई ही नहीं थी।

स्थानीय भंडारी परिवार सदियों से यहां पर पूजापाठ करता रहा है। सदियों से यहां पर कम ही सही लेकिन पर्यटक आया करते थे और उन्हीं की वजह से स्थानीय अर्थव्यवस्था चला करती थी। तो ऐसे में टेलर इसके खोजकर्ता कैसे हो सकते हैं? कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि सत्य सांई के भक्तों को ये नैरेटिव बारबार घोलकर पिलाया गया है। बल्कि इस नैरेटिव को सही साबित करने के लिए एक डॉक्युमेंट्री भी बनाई गई है जिसमें यही सब किरदार शामिल हैं जिनका जिक्र हमने ऊपर किया है। और इसी डॉक्युमेंट्र की हवाला देकर बारबार यही कहानी दोहराई जाती है।

लेकिन इस कहानी के दोहराने से सच नहीं बदल जाता और सच ये है कि पाताल भुवनेश्वर को आदि शंकराचार्य ने खोजा था और उसके बाद से लगातार यहां पर स्थानीय लोग पूजाअर्चना कर रहे हैं। और सत्य सांई के भक्तों के सारे दावे बेबुनियाद, झूठे और मनगढ़ंत हैं।

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