बाबा मोहन उत्तराखंडी… वो पागल जिसे हर उत्तराखंडी को जानना चाहिए
बाबा मोहन उत्तराखंडी
एक सज्जन ने कहा, “ कहां जा रहे हो उस पागल के घर…! राज्य आंदोलन …राज्य आंदोलन चिल्ला-चिल्लाकर घरवालों का तो छोड़ो हमारा भी जीना हराम कर दिया उसने। अब तो उसके रिश्तेदार तक उसके घर इस डर से नहीं आते कि पुलिस उन्हें ही पकड़कर पूछताछ के लिए ना बुला ले।”
वरिष्ठ पत्रकार मनोज इष्टवाल उस पागल से मिलने की बात याद करते हुए ये किस्सा शेयर करते हैं। वो पागल ही तो था जिसने पहले अलग उत्तराखंड राज्य के लिए सेना में अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़ दी। फिर गैरसैंण को राजधानी बनाने के लिए प्राण ही त्याग दिए। उत्तराखंड के लिए उसका पागलपन इतना ज्यादा था कि 1994 में हुए मुजफ्फरनगर कांड के बाद उसने प्रण लिया कि जब तक दोषियों को सजा नहीं मिल जाती, वो अपने बाल और दाढ़ी नहीं काटेगा। उस पागल का प्रण इतना मजबूत था कि मां की मृत्यु होने पर भी उसने बाल और दाढ़ी नहीं काटे। उसका पागलपन इतना ज्यादा था कि परिवार और बच्चों की परवरिश से ज्यादा उसे अलग उत्तराखंड का नशा था। वो पागल कोई और नहीं पौड़ी के बंठोली गांव का मोहन सिंह नेगी था जो उत्तराखंड की खातिर बाबा मोहन सिंह उत्तराखंडी बन गया।
आज जब विधायकों को गैरसैंण में एक विधानसभा सत्र करने में ठंड लग जाती है। अव्वल तो अब ऑक्सीजन की कमी भी हो जाती है तब बाबा मोहन उत्तराखंडी बरबस ही याद आ जाते हैं। बाबा मोहन ने पूरे 37 दिन तक आमरण अनशन किया और ये अनशन उनकी मौत के साथ ही खत्म हुआ। लेकिन आज ना बाबा मोहन और ना ही उनकी शहादत किसी को याद है। ये सरकारें तो बाबा मोहन को लेकर क्यों ही बात करेंगी लेकिन आम जन और दूसरे आंदोलनकारी, किसी को भी ना बाबा मोहन और ना ही उनका त्याग याद है।
कौन थे बाबा मोहन?
पौड़ी गढ़वाल के चौंदकोट का ग्राम बठोली। इस गांव में मनवर सिंह नेगी और कमला देवी के घर मोहन सिंह का जन्म हुआ। 3 भाइयों में मोहन सिंह मंझले थे। मोहन सिंह ने इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की। उन्होंने ITI की पढ़ाई भी की। इसके बाद वह भारतीय सेना के बंगाल इंजीनियरिंग ग्रुप में क्लर्क के तौर पर जुड़ गए। सेना में अच्छी-खासी नौकरी मिल चुकी थी लेकिन वह इस नौकरी में ज्यादा दिन नहीं रहे। अलग उत्तराखंड राज्य के लिए आंदोलन शुरू हो चुका था। इस आंदोलन में शामिल होने के लिए मोहन सिंह ने सेना की नौकरी छोड़ दी। 02 अक्टूबर, 1994 को मुजफरनगर कांड हुआ और मोहन सिंह ने प्रण ले लिया कि वह तब तक अपने बाल और दाढ़ी नहीं काटेंगे जब तक दोषियों को सजा नहीं हो जाती। उनका ये प्रण तब भी मजबूत रहा, जब उनकी मां की मृत्यु हुई। उन्होंने इस दौरान ये भी प्रण लिया कि वह गेहुआ वस्त्र धारण कर दिन में सिर्फ एक बार भोजन करेंगे। इसके बाद मोहन सिंह नेगी का नाम बाबा मोहन सिंह उत्तराखंडी पड़ गया।
उत्तराखंड के लिए छोड़ दिया परिवार
बाबा मोहन सिंह की शादी हो चुकी थी लेकिन अलग उत्तराखंड राज्य के लिए उनका समर्पण इतना ज्यादा था कि वह अपने घर में पत्नी और तीन बच्चों की चिंता से भी दूर हो चुके थे। बाबा मोहन उत्तराखंडी ने अलग राज्य उत्तराखंड और गैरसैंण राजधानी के लिए 13 बार आमरण अनशन किए। उन्होंने सबसे पहले 11 जनवरी, 1997 को लैंसडाउन के देवीधार में आमरण अनशन किया। इसके बाद ये सिलसिला चलता ही रहा। 9 नवंबर, 2000 को राज्य मिला तो उन्होंने अब गैरसैंण को राजधानी बनाए जाने के लिए आंदोलन शुरू किया। सबसे पहले वह 2001 में 9 फरवरी से 5 मार्च तक नंदाठौंक गैरसैंण में अनशन पर बैठे। फिर इसी साल 2 जुलाई से 4 अगस्त तक फिर उन्होंने अनशन किया। 31 अगस्त, 2001 को उन्होंने पौड़ी बचाओ आंदोलन के लिए अनशन किया। 2002 में फिर वह गैरसैंण को राजधानी बनाए जाने के लिए अनशन पर बैठे। 2003 और 2004 तक ये सिलसिला जारी रहा। जब इतने सारे अनशनों और आंदोलनों के बावजूद सरकार के कानों में जूं नहीं रेंगी तो वह फिर 2 जुलाई को बेनीताल में अनशन पर बैठे। उन्होंने जल-अन्न का पूरी तरह त्याग कर दिया था। वह सरकार के खोखले वादों से इस बार पिघलने वाले नहीं थे। लेकिन सरकार उनकी इस दृढ़ता को देखकर डर चुकी थी सरकार ने कई बार उनसे अपना अनशन खत्म करने की अपील की लेकिन वो डिगे नहीं। यही वजह है कि 38वें दिन 8 अगस्त को सरकार ने जबरदस्ती उन्हें बेनीताल से उठाया और उन्हें कर्णप्रयाग के अस्पताल लेकर चली गई। और आखिरकार 9 अगस्त, 2004 को बाबा मोहन सिंह की मौत हो गई। कुछ रिपोर्ट्स में बताया जाता है कि उनकी मौत रास्ते में ही हो गई थी। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया जाता है कि उनका निधन अस्पताल में इलाज के दौरान हुआ। यहां बाबा मोहन सिंह गए और दूसरी तरफ गैरसैंण का मुद्दा हमेशा के लिए लटक गया।
बाबा मोहन के बाद क्या हुआ?
बाबा मोहन सिंह के निधन के बाद पहाड़ में कुछ हद तक गुस्सा नजर आया। उत्तराखंड क्रांति दल समेत कई संस्थाओं ने छुटमुट आंदोलन किए। सरकार ने आंदोलनों को बढ़ते हुए देख आंदोलनकारियों की मांग पर विचार करने की बात कही। उत्तराखंड सरकारों का ये विचार आजतक भी चल ही रहा है।
मौत को लेकर भी उठे सवाल
बाबा मोहन सिंह की मौत को लेकर भी सवाल उठाए गए। तत्कालीन मुख्यमंत्री एन डी तिवारी ने 60 साल के बाबा मोहन सिंह की मौत की जांच के आदेश दिए। एन डी तिवारी ने इस दौरान बाबा के परिवार को 5 लाख की सहायता राशि देने का ऐलान किया। बाबा मोहन सिंह की शहादत के बाद एक बार वीरेंद्र दीक्षित कमिटी की रिपोर्ट जल्द सौंपने का दबाव सरकार पर बनाया गया। बता दें कि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून हो या गैरसैंण, इसके लिए दीक्षित आयोग बनाया गया था। लेकिन बाबा मोहन सिंह की शहादत और आंदोलनकारियों के बार-बार कहने पर भी दीक्षित आयोग ने रिपोर्ट पूरे तीन साल बाद 2008 में सौंपी और वो भी गैरसैंण के खिलाफ। कमिटी ने गैरसैंण को राजधानी के तौर पर सही नहीं माना। उसने यहां की भौगोलिक परिस्थितियों का हवाला देकर गैरसैंण को राजधानी बनाने से इनकार कर दिया। इस तरह बाबा मोहन सिंह की शहादत को भुला दिया गया। आज ना सरकारें और ना ही आम लोग, बाबा मोहन सिंह को याद करते हुए नजर आते हैं।
क्या है मौजूदा स्थिति?
बाबा मोहन सिंह को लेकर बात करें तो मौजूदा स्थिति ये है कि उनका एक बेटा जो फौज में था, उसका निधन हो चुका है। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक पौड़ी स्थित उनके घर की स्थिति काफी खराब हो चुकी है। सरकार की तरफ से बाबा मोहन सिंह की स्मृतियों को बचाने के किसी तरह के प्रयास नहीं किए जा रहे। इतना जरूर है कि हर साल अगस्त महीने में बाबा मोहन सिंह की याद में बेनीताल में मेला जरूर लगाया जाता है। बात करें गैरसैंण को राजधानी बनाए जाने को लेकर तो ये मुद्दा भी लटका हुआ ही है। त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने भले ही गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित तो कर दिया है लेकिन स्थाई राजधानी के सवाल पर सब मौन हैं। सिर्फ सरकारें ही नहीं बल्कि आंदोलनकारी भी अब गैरसैंण के नाम पर मौन दिखते हैं। गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने के लिए किसी भी तरह का बड़ा आंदोलन अब नहीं हो रहा या हो रहा है तो वो कहीं नजर नहीं आता।
बाबा मोहन सिंह की शहादत तब ही सार्थक होगी जब उत्तराखंड की राजधानी गैरसैंण होगी। तब तक के लिए बाबा मोहन सिंह को याद जरूर करें। उन्हें भूलें नहीं क्योंकि जिस उत्तराखंड में हम रहते हैं, उस उत्तराखंड को बनाने में उनका अमूल्य योगदान है। बाबा मोहन सिंह उत्तराखंडी को शत्-शत् नमन।
