तेजी से विकास कर रहे उत्तराखंड में पीछे छूटा ‘पहाड़’!

CM Pushkar Singh dhami

CM Pushkar Singh dhami

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपनी सरकार के चार साल पूरे होने का जश्न मना रही है। सरकार ने अपनी तरफ से किए गए कामों की जानकारी देने के लिए धामी की धमक बुकलेट भी छापी है। इसमें रिवर्स पलायन से लेकर अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर उत्तराखंड के आगे बढ़ने की बात कही गई है। यूनिफॉर्म सिविल कोड पर भी काफी चर्चा की गई है लेकिन जो धामी सरकार कह रही है, उसमें कितनी सच्चाई है?

आप जब आंकड़े देखते हैं तो उत्तराखंड तेजी से विकास करते हुए राज्य के तौर पर नजर आता है। हमारी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। रोजगार भी बढ़ रहे हैं। उद्योग धंधे भी लगातार लग रहे हैं। इन सबके बावजूद एक सच है जो धामी सरकार के चार साल के जश्न का हिस्सा नहीं है। वो सच जिसे हमारी सरकारें या तो देखना नहीं चाहतीं या फिर दिखाना नहीं चाहती हैं। इस विश्लेषण में हम उसी सच पर बात करने वाले हैं।


अर्थव्यवस्था को लगे पंख
 
धामी सरकार ने ‘मैक्रो-इकोनॉमिक’ यानि कि बड़े स्तर के आंकड़ों के मोर्चे पर शानदार काम किया है। सरकार का बजट 1.1 लाख करोड़ पार कर गया है। राज्य की GSDP (किसी राज्य की सीमाओं के भीतर उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य) अच्छी स्थिति में है। साल 2021-22 में जहां GSDP 2.54 लाख करोड़ थी। वित्त वर्ष 2024-25 में बढ़कर 3.81 लाख करोड़ हो गई है। मात्र 3-4 सालों में अर्थव्यवस्था का आकार लगभग डेढ़ गुना बढ़ा है। हमारी विकास दर भी 7.23% रही। हमारी प्रति व्यक्ति आय में भी जबरदस्त उछाल आया है। इस मामले में हमने देश के औसत को भी पीछे छोड़ दिया है।

 आर्थिक आंकड़ों की कहानी
इस बार सबसे ज्यादा चर्चा उत्तराखंड के रिकॉर्ड बजट को लेकर हुई। राज्य के इतिहास में पहली बार 1 लाख 10 हजार करोड़ से ज्यादा का बजट पेश किया गया। दूसरी तरफ, राज्य पर कर्ज भी लगातार इस आंकड़े के नजदीक पहुंच रहा है। राज्य पर 94 हजार करोड़ रुपए का कर्ज है। आशंका जताई जा रही है कि कर्ज का ये आंकड़ा कुछ ही समय में एक लाख करोड़ के पार हो सकता है। इस स्थिति में कर्ज को नियंत्रित करने में सरकार के पसीने छूट सकते हैं। ये चिंता इसलिए भी है क्योंकि राज्य सरकार की जो भी कमाई है, उसमें से एक बड़ा हिस्सा केंद्र से आने वाला अनुदान है।

केंद्र के अनुदान के सहारे उत्तराखंड
उत्तराखंड के इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक 2024-25 में राज्य सरकार की आय में दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार के अनुदान का रहा। केंद्र सरकार की तरफ से मिलने वाला वित्तीय अनुदान तब तक दिया जाता है, जब तक कोई राज्य आत्मनिर्भर नहीं हो जाता। लेकिन हम 25 साल में आत्मनिर्भर होना तो दूर केंद्रीय वित्तीय अनुदान के बिना कामकाज कर पाने में भी असमर्थ हैं। अब ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ उत्तराखंड को मिलता है। हिमाचल समेत कई और राज्य हैं जिन्हें वित्तीय अनुदान दिया जाता है लेकिन हमारी निर्भरता इस पर बहुत कम नहीं हो पाई है। सीएजी की रिपोर्ट भी इसको लेकर कुछ आंकड़े पेश करती है। रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा सरकार के कार्यकाल में ही वित्त वर्ष 2019-20 में केंद्र से 27.04% का अनुदान मिला था। ये 2023-24 में 28.30% हो गया है। वहीं, साल 2024-25 के लिए इकोनॉमिक सर्वे ने इसके 32.20% रहने की बात कही है।

केंद्र से उत्तराखंड को वित्तीय अनुदान (हल्के नीले कलर में)
केंद्र से उत्तराखंड को वित्तीय अनुदान (हल्के नीले कलर में। Economic Survey, 2024-2025)

सर्विस सेक्टर को बूस्ट, कृषि पीछे
बड़े स्तर पर ये जो विकास हमें नजर आ रहा है, वो दरअसल सर्विसेज यानी कि पर्यटन और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की वजह से है। इकोनॉमिक सर्वे बताता है कि उत्तराखंड की लगभग आधी कमाई टर्शियरी यानी सर्विसेज सेक्टर से आ रही है। सर्विस सेक्टर यानी पर्यटन और होटल, व्यापार इत्यादि। वहीं, दूसरे नंबर पर औद्योगिक क्षेत्र हैं। तीसरे नंबर पर है प्राइमरी सेक्टर यानी कृषि, पशुपालन इत्यादि। राज्य सरकार की कमाई में प्राइमरी सेक्टर का योगदान लगातार घट रहा है। 2011-12 में जो योगदान 14% था, वो अब घटकर महज 9.34 फीसदी रह गया है। यही वो कड़ी है जहां पर पहाड़ और मैदान के बीच विकास का अंतर दिखना शुरू हो जाता है। दरअसल पहाड़ की अधिकांश आबादी कृषि पर निर्भर है। ये चार्ट दिखाता है कि उत्तराखंड अब खेती-किसानी के राज्य से बदलकर एक सर्विस आधारित इकोनॉमी बन रहा है। अब पर्यटन और सेवाओं ने राज्य को अमीर तो बनाया है लेकिन प्राइमरी सेक्टर यानी खेती के पिछड़ने से पहाड़ के गांवों में आय का संकट पैदा हुआ है। ये पलायन की कई वजहों में से एक बन रहा है।

अर्थव्यवस्था में अलग-अलग सेक्टर का योगदान
अर्थव्यवस्था में अलग-अलग सेक्टर का योगदान

कैसे बचेगी खेती?
अब सरकार अपने बुकलेट में बताती है कि वह किसानों को पारंपरिक खेती से हटकर नकदी फसलों को अपनाने के लिए बढ़ावा दे रही है। बजट में भी इसके लिए प्रावधान किए गए हैं। सरकार के ये सारे प्रावधान सुनने में तो अच्छे लगते हैं लेकिन पहाड़ में इन्हें अपनाना आसान नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि पहाड़ की खेती की जो बुनियादी दिक्कते हैं, उन्हें सुलझाने के लिए कोई भी काम नहीं किया गया है। जैसे कि यहां पर बिखरी जोत हैं। जिस वजह से यहां खेती करना काफी संघर्षशील और कष्टमय हो जाता है। नतीजा लोग गांव में रहकर भी अब खेती से दूरी बना रहे हैं। समाधान- सालों से सरकारों को बताया जा रहा है कि चकबंदी की जाए लेकिन सरकारें सैकड़ों घोषणाएं करती हैं पर चकबंदी नहीं।

जंगली जानवर भी चुनौती
दूसरी तरफ, किसी ने अगर अपनी बिखरी जोत पर खेती करने की कोशिश भी की तो उसे बंदरों और जंगली जानवरों से अपनी फसल को बचाने की चुनौती से जूझना पड़ता है। तो ऐसे में सरकार चाहे जिन भी फसलों को बढ़ावा दे, पहाड़ में खेती तब तक नहीं सुधरेगी, जब तक यहां की खेती फायदे का सौदा नहीं बन जाती है।

मैदान तक ही सीमित औद्योगिक विकास
धामी सरकार जिस विकास के इंजन की बात कर रही है, उसके पहिए राज्य के तीन मैदानी जिलों से ऊपर नहीं चढ़ पाते। यहां का औद्योगिक विकास देहरादून, हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर पर ही टिका नजर आता है। धामी सरकार कहती है कि उसने वैश्विक निवेशक सम्मेलन करवाया और यहां हुए निवेश करार में से 1 लाख करोड़ निवेश धरातल पर उतर चुका है। लेकिन ये निवेश पहाड़ नहीं पहुंचा है। खुद सरकार बता रही है कि हरिद्वार, पंतनगर, सितारगंज, कोटद्वार में औद्योगिक क्षेत्र विकसित हो चुके हैं। इसमें पहाड़ी क्षेत्र का कहीं भी जिक्र नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि उद्योग धंधों को पहाड़ चढ़ाने के लिए भी हमारे पास कोई पुख्ता नीति नहीं है। यहां जितने भी सिडकुल हैं, वो सब मैदानी जिलों में ही हैं। राज्य की औद्योगिक और सर्विस सेक्टर की ज्यादातर गतिविधियां मैदानी जिलों में ही होती हैं। इस वजह से पहाड़ पिछड़ जाते हैं। पहाड़ों में MSME और होमस्टे के जरिए निवेश की कोशिश तो हुई है लेकिन वो भी धीमी नजर आ रही है। ये आपको पहाड़ के ऋण जमा अनुपात यानी कैश डिपोजिट रेश्यो से पता चल जाता है। 

पिछड़ रहे पर्वतीय क्षेत्र
राज्य के कई पर्वतीय जिलों का सीडी रेस्यो 40% से भी कम है। मतलब ये है कि लोग बैंकों में जो भी पैसा जमा कर रहे हैं, उसका बड़ा हिस्सा मैदानी जिलों के उद्योग एवं खेती में उपयोग किया जा रहा है। सीडी रेश्यो वो आंकड़ा होता है जो बताता है कि बैंक अपने कुल जमा धन का कितना हिस्सा कर्ज के रूप में बांट रहा है। इसका ज्यादा होना आर्थिक सक्रियता और निवेश के अच्छे संकेत माने जाते हैं। पहाड़ी जिलों में यह संकेत कमजोर हैं जिससे पता चलता है कि यहां पर आर्थिक गतिविधियां और निवेश के अवसर काफी सीमित हैं। दूसरी तरफ, मैदानी जिलों में निवेश को लगातार बढ़ावा मिल रहा है और ये सीडी रेश्यो से साफ नजर आता है।
जो फर्क आर्थिक गतिविधियों में नजर आ रहा है, वो यहां की प्रति व्यक्ति आय में भी साफ दिखता है। राज्य की प्रति व्यक्ति आय 2024-25 में बढ़कर 2 लाख 74 हजार हो गई है। यह राष्ट्र के 2.12 लाख के औसत से काफी अधिक है। बड़े स्तर पर देखें तो ये आंकड़ा काफी खुश करने वाला है लेकिन जब आप जिलेवार की तस्वीर देखते हैं तो पहाड़ और मैदान का फर्क साफ हो जाता है। उत्तराखंड सरकार की वेबसाइट पर मौजूद लेटेस्ट डाटा के मुताबिक हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर की प्रति व्यक्ति आय पहाड़ी जिलों की तुलना में लगभग 2.5 गुना ज्यादा है। जहां हरिद्वार 3.62 लाख प्रति व्यक्ति आय के साथ नंबर वन पर है तो वहीं, रुद्रप्रयाग 93,160 रुपए के साथ सबसे निचले स्थान पर है। आंकड़ों से साफ नजर आता है कि सबसे ज्यादा कमाई मैदानी जिले करते हैं और सबसे कम पहाड़ी क्षेत्र।

कनेक्टिविटी भी अधूरी
सरकार कह रही है कि उसने ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन और ऑल-वेदर रोड से पहाड़ों तक पहुंच आसान कर दी है। लेकिन वो ये भूल जाती है कि कनेक्टिविटी का लाभ तब तक नहीं मिलेगा जब तक ‘लास्ट माइल कनेक्टिविटी’ नहीं हो जाती है। हमें समझना होगा कि अभी पहाड़ केवल एक ‘कंज्यूमर मार्केट’ बनकर रह गया है। यहां सामान नीचे से ऊपर जा रहा है लेकिन ऊपर का उत्पाद नीचे नहीं आ पा रहा। इसके लिए यहां पर प्रोसेसिंग यूनिट्स लगाने की आवश्यकता है। इस मोर्चे पर भी हम लचर हैं।

स्वास्थ्य और शिक्षा भी बद्तर
स्वास्थ्य और शिक्षा के मोर्चे पर क्या हालात हैं, वो हम पिछले कुछ वक्त में देख रहे हैं। चोखुटिया से लोगों को एक अदद अस्पताल के लिए देहरादून तक पैदल मार्च करना पड़ा। टिहरी गढ़वाल के घनसाली में तीन लोगों की मौत के बाद स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग के लिए लोग सड़कों पर उतरे। उसके बाद जाकर कहीं सरकार ने यहां पर कुछ व्यवस्थाएं करने की बात कही। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पहाड़ी क्षेत्रों के अस्पतालों में बेसिक स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव को लेकर सरकार से जवाब तलब किया। ये बात किसी से छुपी नहीं है कि पहाड़ी अस्पताल सिर्फ रेफरल सेंटर बनकर रह गए हैं। आखिर में बीमार को देहरादून-हल्द्वानी ही भेज दिया जाएगा। पंचाचूली देश जैसे गीत गाने वाले गायक गणेश मर्तोलिया की नानी और बहन को मुनस्यारी से हल्दानी तक तीन अस्पतालों में पहुंचाने के बाद भी बचाया नहीं जा सका। अगर उन्हें मुनस्यारी के स्थानीय अस्पताल में ही इलाज मिल जाता तो शायद उनकी जान बच जाती लेकिन ऐसा हो नहीं पाया।

बेहाल शिक्षा
 शिक्षा की बात करें तो इसकी स्थिति भी 25 साल में बहुत ज्यादा नहीं बदली है। जर्जर भवनों में बच्चों के पढ़ने का हमारे यहां लंबा इतिहास रहा है। दूसरी तरफ, स्कूलों का बंद होने का सिलसिला भी लगातार जारी है। खुद शिक्षा मंत्री रहते हुए धन सिंह रावत ने सदन में बताया कि पिछले 5 साल में उत्तराखंड के 826 प्राइमरी स्कूल बंद हो गए। ये स्कूल इसलिए बंद किए गए क्योंकि इनमें पढ़ने के लिए बच्चे ही नहीं हैं। अब बच्चे कहां से होंगे, जब शिक्षक ही नहीं होंगे। पलायन आयोग की लेटेस्ट रिपोर्ट बताती है कि गढ़वाल मंडल में 6 से 10वीं कक्षा वाले 331 विद्यालयों में से सिर्फ दो में प्रिंसिपल और सिर्फ दो स्कूलों में प्रवक्ताओं की तैनाती हुई है। वहीं कुमाऊं में यह संख्या शून्य है। ऐसे कई आंकड़े हैं जो सरकारों के इस खोखले विकास की पोल खोलने के लिए काफी हैं। और इन सबकी वजह है पलायन। वो रोग जो 25 साल में भी खत्म नहीं हुआ है।

पलायन आयोग की लेटेस्ट रिपोर्ट
पलायन आयोग की लेटेस्ट रिपोर्ट

 

रिवर्स पलायन का पूरा सच
पलायन आयोग बताता है कि पिछले चार सालों में 6 हजार लोगों ने रिवर्स पलायन किया है। इसका श्रेय सरकार की होम स्टे और दूसरी योजनाओं को दिया जा रहा है। लेकिन सरकार ये नहीं बताती कि क्या ये रिवर्स पलायन पूरे परिवार का हुआ है या फिर सिर्फ व्यक्ति मात्र का? ये सवाल इसलिए क्योंकि उत्तराखंड में शिक्षा की बुरी स्थिति और स्वास्थ्य सुविधाओं का ना होना, पलायन के सबसे बड़े कारणों में से एक हैं। जिन लोगों को सरकार रिवर्स पलायन बता रही है, उनमें से कम ही लोग होंगे जो अपने पूरे परिवार को अपने गांव लेकर आए होंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि अपने बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य की चिंता उन्हें भी है।

क्यों हो रहा पलायन?
पलायन आयोग की रिपोर्ट खुद कहती है कि उत्तराखंड में पलायन की सबसे बड़ी वजह आजीविका और रोजगार है। उसके बाद शिक्षा और स्वास्थ्य आते हैं। अब जिन लोगों के पास आर्थिक बल है वो तो आपकी होम स्टे योजना में पैसे लगाकर यहां स्वरोजगार शुरू कर देंगे लेकिन जो पहाड़ के लोग सिर्फ कृषि पर आश्रित होकर अपना घर चला रहे थे, उनके बच्चे शहरों में नौकरी के लिए पलायन कर रहे हैं। जिन बच्चों के पास थोड़ा पैसा आ गया है तो वो शिक्षा और स्वास्थ्य की वजह से पलायन कर रहे हैं। और जो लोग गांव में थोड़े बहुत बचे हुए भी हैं, वो भालू और गुलदार के बढ़ते हमलों के डर से पलायन करने के लिए विचार करने पर मजबूर हैं।  खुद सरकार ने विधानसभा में बताया कि राज्य गठन के बाद से अब तक 1296 लोगों की वन्यजीव संघर्ष में मौत हो चुकी है। और 25 साल बाद भी यह सिलसिला लगातार बना हुआ है।

पहाड़ का विकास बनाम विनाश

नीति आयोग कह चुका है कि पहाड़ में पहाड़-विशिष्ट विकास मॉडल को अपनाया जाना चाहिए। आयोग सुझाव देता है कि पूरे राज्य में एक समान नीति लागू करने की बजाय उच्च पर्वत क्षेत्र, मध्यम ऊंचाई के पर्वतीय क्षेत्र व मैदानी भाग के लिए नीति का ढांचा अलग-अलग हो। डीपीआर तैयार करते हुए ये देखा जाए कि जहां पर भी प्रोजेक्ट लग रहा है, वहां की प्राकृतिक स्थिति क्या है। फिर उसी हिसाब से निर्माण किए जाएं। लेकिन क्या हमारी सरकार ये कर रही है? तो जवाब में चार धाम ऑल वेदर रोड और दूसरी योजनाओं में पर्यावरण की अनदेखी के कई उदाहरण आपके सामने हैं। 

उत्तराखंड के पूर्व पीसीएफ श्रीकांत चंदोला अतुल्य उत्तराखंड में लिखे अपने एक लेख में कहते हैं कि हम मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए निवेश करने को तैयार नहीं हैं। वह कहते हैं कि दरअसल इस संघर्ष में मरने वाला गरीब है इसलिए निवेश नहीं आता है। और आएगा भी कैसे?  हमारी सरकारों ने हमें धर्म का धतुरा पिला दिया है। कभी थूक जिहाद तो कभी लैंड जिहाद के नाम पर पहाड़ के मुद्दों से ध्यान भटकाया जाता है। लोग भी भूल जाते हैं कि जिस हिंदू धर्म की जड़ें दुनिया की कई सभ्यताओं से भी पुरानी है, उसे कैसे कोई खत्म कर सकता है? सोचिए जरा, जितने हिंदू धर्म को बचाने के लिए व्हाट्सऐप मैसेज आप फॉरवर्ड करते हैं, उस तरह कितनी बार आपने पहाड़ की तकलीफों के मुद्दे और सरकार से इस संबंध में सवाल फॉरवर्ड किए हैं?

सड़क पर उतरना ही किस्मत
पहाड़ियों की खुद पहाड़ से दूरी और पहाड़ की तकलीफों के मुद्दों की अनदेखी की वजह से ही हम 25 साल बाद भी उन्हीं चीजों पर बात कर रहे हैं, जिनके लिए ये अलग उत्तराखंड राज्य लिया था। इसका परिणाम ये रहा कि जब पूरा उत्तराखंड सख्त भू-कानून मांग रहा था, तब धामी सरकार ने हमें समान नागरिक संहिता दे दिया। इस कानून से एक आम पहाड़ी के जीवन में क्या क्रांतिकारी बदलाव हुए, ये तो सरकार ही बता सकती है। फिर भी देर से ही सही लेकिन धामी सरकार ने हमें भू-कानून भी दे दिया। एक ऐसा भू-कानून जिसमें इतने लूपहोल छोड़ दिए गए हैं कि पहाड़ की जमीन की लूट-खसोट करना आने वाले भविष्य में मुश्किल नहीं होगा। सरकार ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन और चार धाम रोड के लिए अपनी पीठ थपथपा तो सकती है लेकिन इनकी एवज में कत्ल किए गए पेड़ और प्रकृति के नाश का हिसाब नहीं देगी। उत्तराखंड सरकार ने लखपति दीदी योजना से महिलाओं का जीवन बदलने की सकारात्मक पहल की है लेकिन दूसरी तरफ अंकिता भंडारी मामले में VVIP की जांच को लेकर जो रवैया अपनाया जा रहा है, उससे ये भी सवाल उठता है कि ये सरकारें सड़क पर उतरे बिना कोई बात नहीं सुनती है।

कुल मिलाकर 25 साल पहले भी आप आंदोलन कर रहे थे। 25 साल बाद भी आप आंदोलन कर रहे हैं। कभी भू-कानून के लिए। कभी अपनी बेटी के लिए। कभी अस्पताल के लिए तो कभी परीक्षाएं बिना किसी नकल के करवाने के लिए। पहले भी पहाड़ की जवानी और पानी पहाड़ के काम नहीं आ रहा था, आज भी इसमें बहुत ज्यादा बदलाव आया नहीं है। आंदोलनों की धरती इस उत्तराखंड में 25 साल का संघर्ष 4 साल के जश्न पर भारी पड़ जाता है। बस फर्क है तो सिर्फ इतना कि ये जश्न मनते रहेंगे और ये संघर्ष भी अनवरत चलता रहेगा क्योंकि जब तक पहाड़ी ही पहाड़ की परेशानियों को नहीं समझेगा, तब तक कोई भी नहीं समझ सकता है।

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