परिसीमन से डर कैसा?
Delimitation protest
साल 2026 में कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम लंबित हैं। इन्हीं लंबित योजनाओं में परिसीमन की प्रक्रिया की शुरुआत करना भी शामिल है। अभी परिसीमन की प्रक्रिया शुरू भी नहीं हुई है लेकिन इसको लेकर पहले ही विवाद शुरू हो गया है। 2025 की शुरुआत से ही परिसीमन के मुद्दे पर दक्षिण के कई राज्यों ने मोर्चा खोल दिया है। दूसरी तरफ, उत्तराखंड जैसे राज्य में भी इसकी सुगबुगाहट तेज होने लगी है। 2026 में तमिलनाडु में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी परिसीमन की आवाज सुनाई दे सकती है।
इसी साल की शुरुआत में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने विरोध स्वर में कहा था कि परिसीमन के रूप में दक्षिण के राज्यों के ऊपर तलवार लटक रही है। उन्होंने इस प्रक्रिया को राजनीतिक चाल बताया और आशंका जताई कि इससे संसद में दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व घट जाएगा। वहीं, दूसरी तरफ गृह मंत्री अमित शाह ने आश्वासन दिया कि परिसीमन की प्रक्रिया में दक्षिणी राज्यों की सीटें नहीं घटाई जाएंगी। लेकिन सवाल ये उठता है कि आखिर परिसीमन से दक्षिण भारत के राज्यों को इतना डर क्यों है? क्यों ये राज्य परिसीमन के विरोध में हैं? इसके साथ ही क्यों उत्तराखंड जैसे राज्य में भी परिसीमन की प्रक्रिया के खिलाफ आवाज उठने लगी है। अब परिसीमन का विरोध क्यों किया जा रहा है, उस पर बात करने से पहले जरूरी है कि परिसीमन को समझें।
क्या होता है परिसीमन?
परिसीमन का एक लाइन में अर्थ है, किसी देश या प्रांत में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमा तय करने की प्रक्रिया। यानि कि इसके जरिए लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं तय की जाती हैं। आसान शब्दों में परिसीमन की मदद से यह तय होता है कि किस क्षेत्र के लोग किस विधानसभा या लोकसभा के लिए वोट डालेंगे? यह प्रक्रिया इसलिए की जाती है ताकि लोकतंत्र में आबादी का सही प्रतिनिधित्व हो सके। एक उदाहरण से इसे समझिए। मान लीजिए कि क्षेत्र ए में साल 2001 में 1 लाख लोग रहते थे। तब तय किया गया कि इतनी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक लोकसभा सांसद काफी होगा। यानि कि इस क्षेत्र की लोकसभा में एक सीट होगी। कुछ इसी तरह विधानसभा में भी एक विधायक यानी एक सीट रख दी गई।
अब गुजरते वक्त के साथ इस क्षेत्र की जनसंख्या बढ़ती गई और कुछ सालों बाद यहां 10 लाख की आबादी हो गई। जाहिर सी बात है 1 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक लोकसभा सांसद और विधायक की इतनी बड़ी आबादी तक पहुंच आसान नहीं होगी। ऐसे में खतरा है कि लाखों लोगों की बात या परेशानी लोकसभा या विधानसभा में नहीं उठ पाएगी। इसी खतरे को कम करने के लिए यानी कि सभी लोगों को समान प्रतिनिधित्व देने के लिए यहां लोकसभा और विधानसभा की सीटें बढ़ा दी जाएंगी। और इन सीटों को बढ़ाने-घटाने की प्रक्रिया को ही परिसीमन नाम दिया गया है।
यही प्रक्रिया है जिसकी वजह से आप देखते हैं कि लोकसभा में जहां उत्तराखंड की 5 सीटें हैं तो वहीं, उत्तर प्रदेश की 80 सीटें हैं। कुछ इसी तरह की स्थिति दूसरे राज्यों की भी है। बात करें विधानसभा के स्तर पर तो यहां भी यही प्रक्रिया अपनाई जाती है। जिस क्षेत्र में ज्यादा जनसंख्या होगी, वहां ज्यादा विधानसभा सीटें होंगी। जहां कम जनसंख्या होगी, वहां वहां कम सीटें होंगी। और जनसंख्या के आधार पर होने वाली परिसीमन की यही वो प्रक्रिया है जिसका कई राज्य विरोध कर रहे हैं।
कैसे किया जाता है परिसीमन?
भारतीय संविधान के आर्टिकल 82 और 170 में परिसीमन की व्यवस्था की गई है। इसमें कहा गया है कि हर जनगणना के बाद लोकसभा, विधानसभा की सीटों को रीएडजस्ट यानी पुन: समायोजित किया जाए। सिर्फ सीटों का ही नहीं बल्कि इनके प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों का भी इस आधार पर समायोजन हो। प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र यानी राज्य में लोकसभा सीटों का भौगोलिक क्षेत्र। संविधान में दिए गए इस काम को ही परिसीमन कहा जाता है। इसे कैसे उपयोग किया जाए, इसका फैसला लेने का अधिकार संसद के पास है। इस प्रक्रिया को करने के लिए एक उच्चाधिकार निकाय का गठन किया जाता है। ऐसे निकाय को परिसीमन आयोग या सीमा आयोग भी कहा जाता है।
परिसीमन आयोग की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। इसमें सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त और राज्य चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं। आयोग निर्वाचन क्षेत्रों को फिर से तैयार करने या नए निर्वाचन क्षेत्र बनाने के लिए जनसंख्या में हुए बदलाव की जांच करता है। इसके बाद आयोग भारत के राजपत्र में अपनी ड्राफ्ट रिपोर्ट प्रकाशित करता है जो जनता के फीडबैक के लिए खुला रहता है। फीडबैक लेने के बाद आयोग अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रकाशित करता है। यह रिपोर्ट लोकसभा और संबंधित विधानसभा में रखी जाती हैं। हालांकि दोनों ही सदन इसमें कोई संशोधन नहीं कर सकते। फाइनल रिपोर्ट को राष्ट्रपति की तरफ से तय तारीख पर लागू किया जाता है। परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून की तरह ही जारी किया जाता है और इन आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
चार बार हो चुका है गठन
भारत में ऐसे परिसीमन आयोगों का गठन अब तक 4 बार किया गया है। 1952, 1962, 1972 और 2002 में। ये सब तब हुई जनगणनाओं के आधार पर किया गया। हालांकि 2002 में संविधान में एक संशोधन किया गया। इस संशोधन में तय किया गया कि 1971 की जनगणना के आधार पर जो लोकसभा सीटें तय की गई हैं, उनमें 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। कुछ इसी तरह की समान व्यवस्था विधानसभा सीटों के लिए भी की गई। उस वक्त ऐसा करने के पीछे सरकार का अनुमान था कि 2026 तक सभी राज्यों में जनसंख्या वृद्धि का औसत समान हो जाएगा। यही संशोधन वजह है कि 2026 में या उसके बाद परिसीमन होने के कयास लगाए जा रहे हैं।
परिसीमन का असर
आजादी के बाद भारत में लोकसभा सीटों का स्वरूप समय-समय पर परिसीमन के जरिए बदला गया है। पहली बार 1952 में हुए परिसीमन के दौरान लोकसभा की कुल सीटें 489 तय की गईं। इसके बाद 1963 में परिसीमन हुआ, जिससे सीटों की संख्या बढ़कर 522 हो गई। 1973 में हुए अगले परिसीमन में लोकसभा सीटों की संख्या 543 तक पहुंच गई। हालांकि जनसंख्या के आधार पर बार-बार बदलाव से राज्यों के बीच असंतुलन की आशंका को देखते हुए 1976 में इंदिरा गांधी सरकार ने 42वें संविधान संशोधन के जरिए परिसीमन प्रक्रिया पर 25 वर्षों की रोक लगा दी। बाद में 2001 की जनगणना के बाद 2002 में परिसीमन आयोग का गठन जरूर किया गया, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 84वें संविधान संशोधन के माध्यम से लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने पर फिर 25 साल की रोक लगा दी। इस संशोधन के तहत यह स्पष्ट किया गया कि देश में लोकसभा सीटों की संख्या में बढ़ोतरी 2026 के बाद ही की जा सकेगी।
परिसीमन का विरोध क्यों?
परिसीमन प्रक्रिया के विरोध की जड़ में है जनसंख्या। दक्षिणी राज्यों को डर है कि अगर जनसंख्या के आधार पर परिसीमन हुआ तो उनकी राजनीतिक शक्ति कम हो जाएगी। उनका कहना है कि जनसंख्या मानक होने की वजह से उनका लोकसभा में प्रतिनिधित्व घट सकता है। तमिलनाडु में सत्तारूढ़ डीएमके और मुख्यमंत्री एम के स्टालिन का कहना है कि जनसंख्या के आधार पर होने वाला परिसीमन दक्षिण भारत के राज्यों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। उनका तर्क है कि इससे संसद में उनकी सीटें घटने और उत्तर भारत के राज्यों की सीटें बढ़ने की आशंका है।
स्टालिन इसे विडंबना बताते हैं कि जिन राज्यों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार नियोजन जैसी प्रगतिशील नीतियों के जरिए जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया, वही राज्य परिसीमन के बाद दंडित हो सकते हैं। उन्होंने इसे अन्यायपूर्ण प्रक्रिया करार देते हुए लोगों से इसके खिलाफ खड़े होने की अपील की। उन्होंने यहां तक भी कहा था कि राज्य के हितों की रक्षा के लिए तमिलनाडु को अपनी जनसंख्या हिस्सेदारी बढ़ाने पर भी विचार करना चाहिए। वह यह भी बताते हैं कि मौजूदा 543 लोकसभा सीटों में तमिलनाडु की 39 सीटें हैं जो कुल प्रतिनिधित्व का लगभग 7.2 प्रतिशत है। वह कहते हैं कि यदि उत्तर भारत की सीटें बढ़ती हैं तो तमिलनाडु की सीटों में भी समानुपातिक बढ़ोतरी होनी चाहिए।
दक्षिण में परिसीमन का विरोध
परिसीमन को लेकर चिंता केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है। कर्नाटक, तेलंगाना, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे अन्य दक्षिणी राज्य भी इसके विरोध में बोल रहे हैं। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने गृह मंत्री अमित शाह के उस आश्वासन को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि दक्षिणी राज्यों को परिसीमन से नुकसान नहीं होगा। सिद्धारमैया ने इसे या तो तथ्यों की कमी का परिणाम बताया या फिर दक्षिणी राज्यों को कमजोर करने की मंशा करार दिया। वहीं कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने भी देशव्यापी स्तर पर परिसीमन के विरोध का ऐलान करते हुए आरोप लगाया कि केंद्र सरकार लोकसभा में दक्षिण भारत की आवाज को कमजोर करना चाहती है।
Stalin
क्या कहा था अमित शाह ने?
दक्षिण भारत के राज्यों की तरफ से उठे इस विवाद को गृह मंत्री अमित शाह ने शांत करने की कोशिश की। इसी साल 26 फरवरी को गृह मंत्री ने कोयंबटूर में एक कार्यक्रम के दौरान परिसीमन को लेकर बयान दिया। उन्होंने तमिलनाडु की स्टालिन सरकार और डीएमके द्वारा जताई जा रही आशंकाओं को खारिज करने का प्रयास किया। शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में होने वाली परिसीमन प्रक्रिया में दक्षिण भारत के राज्यों के हितों की पूरी तरह सुरक्षा की जाएगी। उन्होंने आगे कहा कि तमिलनाडु की एक भी लोकसभा सीट आनुपातिक रूप से कम नहीं होने दी जाएगी। उन्होंने भरोसा दिलाया कि यदि सीटों की संख्या बढ़ती है तो उसका न्यायसंगत लाभ दक्षिणी राज्यों को भी मिलेगा। इसलिए किसी तरह की आशंका की जरूरत नहीं है। गृह मंत्री ने आरोप लगाया कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री अक्सर यह दावा करते हैं कि मोदी सरकार ने राज्य के साथ अन्याय किया है। शाह ने कहा कि वह खुद मुख्यमंत्री से यह कहने आए हैं कि अगर उन्हें अपनी बात पर भरोसा है, तो वे उनके इस बयान का जवाब खुलकर तमिलनाडु की जनता के सामने दें।
उत्तराखंड में क्यों हो रहा विरोध?
उत्तर भारत के पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में भी परिसीमन के खिलाफ आवाज उठने लगी है। यहां के लोग सीधे परिसीमन के खिलाफ नहीं हैं। यह खिलाफ हैं इसे जनसंख्या के आधार पर करवाने के। यहां मांग उठाई जा रही है कि अब जब भी परिसीमन हो, वो जनसंख्या के आधार पर नहीं बल्कि क्षेत्रफल के आधार पर हो। सिर्फ विधानसभा सीटों के लिए नहीं बल्कि पंचायतों का परिसीमन भी इसी आधार पर करने की मांग उठाई जा रही है। लेकिन क्यों? क्षेत्रफल के आधार पर क्यों और जनसंख्या के आधार पर क्यों नहीं? इस सवाल का जवाब छुपा है उत्तराखंड के मौजूदा हालातों में। उत्तराखंड में पलायन अलार्मिंग लेवल पर पहुंच चुका है। यहां 1700 से ज्यादा गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं। खुद पलायन आयोग की रिपोर्ट तस्दीक करती है कि पहाड़ से रोजाना औसतन 246 लोग पलायन कर रहे हैं। पहाड़ को छोड़ने वालों की संख्या हर गुजरते दिन के साथ बढ़ती ही जा रही है। उत्तराखंड की जनसंख्या काफी ज्यादा बढ़ चुकी है। और ये अगली जनगणना में भी सामने आ जाएगा। जब जनसंख्या बढ़ेगी तो सीटें भी बढ़ सकती हैं। रिपोर्ट्स की मानें तो 2026 के परिसीमन के बाद उत्तराखंड में 2 संसदीय सीट बढ़ सकती हैं। अब एक तरह से देखा जाए तो ये अच्छी बात है। लेकिन जब आप इसे पहाड़ के परिपेक्ष में देखेंगे तो तस्वीर साफ हो जाती है।

पहाड़ की सीटें कम होने की आशंका
जनसंख्या के आधार पर अगर परिसीमन होता है तो जाहिर सी बात है कि पहाड़ की सीटें कम हो जाएंगी और मैदानी सीटें बढ़ जाएंगी। क्योंकि पहाड़ में रहने वाली जनसंख्या लगातार बढ़ने की बजाय घटी है। और जब तक अगली जनगणना होती है तो ये और भी कम हो जाएगी। ऐसे में परिसीमन आयोग भले ही पहाड़ को कितनी ही वरीयता दे और यहां के लिए जनसंख्या मानक कितना ही कम रखे तो भी ये तय है कि यहां से सीटें घट जाएंगी। इस बार जो सीटें घटेंगी वो आंकड़ा काफी बड़ा हो सकता है।
जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होने से पहाड़ों का प्रतिनिधित्व विधायिका में और ज्यादा कम हो जाएगा। प्रतिनिधित्व कम होने का मतलब है कि पहाड़ की दिक्कतों और समस्याओं को उठाने वाले बहुत कम लोग बचेंगे। जितना कम प्रतिनिधित्व होगा, उतनी ही कम सरकारों को इन क्षेत्रों की चिंता होगी। जनसंख्या के आधार पर परिसीमन से लगभग तय है कि पहाड़ का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा। यही वजह है कि उत्तराखंड में परिसीमन भौगोलिक आधार पर किए जाने की मांग उठाई जा रही है।
देश के लिए भी खतरा
जब बात उत्तराखंड जैसे सीमावर्ती राज्य की आती है तो यहां होने वाली हर गतिविधि का असर पूरे देश के लिए होता है। दरअसल उत्तराखंड एक पहाड़ी राज्य है। इसकी सीमाएं चीन और नेपाल से लगती हैं। अपने मूर्त रूप में उत्तराखंड एक पहाड़ी राज्य है लेकिन पलायन ने यहां के गांवों को खाली करके रख दिया है। अब अगर जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होता है तो इन गांवों में बचे-खुचे लोगों का प्रतिनिधित्व भी विधायिका में घट जाएगा और पलायन बढ़ सकता है। यह सूरत सिर्फ उत्तराखंड के लिए नहीं बल्कि देश के लिए भी सुरक्षित साबित नहीं होगी। क्योंकि ये राज्य देश की सुरक्षा के लिहाज से भी काफी महत्व रखता है। इन्हीं खतरों को देखते हुए ही क्षेत्रफल के आधार पर परिसीमन की बात कही जा रही है। क्योंकि अगर क्षेत्रफल के आधार पर परिसीमन होता है तो ये तय है कि पहाड़ का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा। इससे इस पहाड़ी राज्य को बचाने में मदद मिल सकती है।
भौगोलिक आधार पर परिसीमन
ऐसा भी नहीं है कि भौगोलिक आधार पर परिसीमन नहीं हो सकता। भारत में कई ऐसे क्षेत्र भी हैं जहां जनसंख्या के आधार पर नहीं बल्कि भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर परिसीमन हुआ है। खुद परिसीमन अधिनियम 2002 की धारा 9 और 10 में परिसीमन को भौगोलिक रूप से करने का उल्लेख है। इसमें भौगोलिक विशेषताओं, प्रशासनिक इकाइयों की विविधता, संचार सुविधाओं और सार्वजनिक सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए परिसीमन निर्धारित करने के लिए मानक निर्धारित किए गए हैं। लेकिन इस तरफ आयोग का ध्यान खींचने का काम सरकारों को करना होगा।
जम्मू सेंट्रल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर गोविंद सिंह कहते हैं कि सरकार का ध्यान गांवों से शहरों की ओर ट्रांसफर हो गया है। सरकार को लगता है कि कम आबादी वाले गांवों में विकास कठिन है। इसलिए वो शहरी क्षेत्रों में पलायन करने वालों को सेवाएं प्रदान कर सकती है। यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्रों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। ऐसे में क्या आने वाले वक्त में सरकार भौगोलिक क्षेत्र पर परिसीमन करने की योजना बनाती है या फिर जनसंख्या को ही आधार बनाया जाता है। तरीका जो भी हो लेकिन इतना तय है कि 2026 में इस मुद्दे पर राजनीति और तेज हो सकती है। सिर्फ तेज नहीं बल्कि तमिलनाडु में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी ये मुद्दा रैलियों और जनसभाओं में जरूर गूंजेगा
