कौन हैं भूमियाल देवता?

भूमियाल देवता

भूमियाल देवता

देवभूमि उत्तराखंड में 33 कोटी देवी-देवताओं का निवास है। यहां वैदिक देवताओं से ज्यादा लोक देवता नजर आते हैं। आपको हर क्षेत्र और हर घर में अलग-अलग लोकदेवता नजर आ जाएंगे। लेकिन एक देवता हैं जो लगभग सभी जगह मौजूद रहते हैं। अलग-अलग परगनाओं में बसे लोकदेवताओं में एक देवता हैं जिन्हें हर क्षेत्र में पूजा जाता है। इन्हें भले ही क्षेत्रवार अलग-अलग नाम से जाना जाता है लेकिन इनका स्वरूप एक ही होता है। इनके मंदिरों में कोई मूर्ति नहीं होती। सिर्फ छोटे -छोटे पत्थर लिंग के स्वरूप में होते हैं। इन देवी और देवताओं का उत्तराखंड के जनमानस के साथ एक अलग और अटूट बंधन है। इतिहास से लेकर वर्तमान तक उत्तराखंड का परिवेश काफी बदला, दशक बदले, लेकिन नहीं बदला तो यहाँ के लोगों का अपने देवी-देवताओं के प्रति आस्था और अटूट प्रेम। उत्तराखंड के हर क्षेत्र में एक देवता सबसे आम होते हैं और वो हैं भूमियाल देवता।

कौन है भूमियाल?
भूमियाल का मतलब भूमि का देवता या वो देवता जो भूमि की रक्षा करता हैं। भूमियाल देवता को भूमिया, क्षेत्रपाल, खेतपाल, खेतरपाल और जिमदार के नाम से भी जाना जाता है। भूमियाल देवता या क्षेत्रपाल देवता कोई एक देवता नहीं हैं बल्कि ये हर क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग होते हैं। इसे ऐसे समझिए जैसे हर स्कूल का एक ही प्रिंसिपल होता है और उसके नियंत्रण में सिर्फ वो स्कूल और उस स्कूल का क्षेत्र होता है। वैसे ही हर क्षेत्र का एक क्षेत्रपाल या भूमियाल देवता होता है। उसके नियंत्रण में सिर्फ वो क्षेत्र होता है। क्षेत्र बदलते हैं तो क्षेत्रपाल देवता भी बदल जाते हैं। इसलिए पूरे उत्तराखंड में क्षेत्र बदलते ही आपको एक नया मंदिर देखने को मिल जाता है। ये देवता दोनों ही मण्डल गढ़वाल और कुमाऊँ दोनों ही जगहों के गांवों में पूजे जाते हैं।

उत्तराखंड में जितने भी भूमियाल देवता या क्षेत्रपाल देवता हैं, उन्हें भगवान शिव का गण माना जाता है। इसलिए अगर उत्तराखंड में इनके ज़्यादातर मंदिर देखेंगे तो आपको कोई मूर्ति नहीं बल्कि लिंग स्वरूप भूमियाल विराजमान दिखेंगे। भूमियाल देवता के बारे में माना जाता है कि ये अपने क्षेत्रवासियों की रक्षा हर अशुभ शक्ति से करते हैं। 

बद्री दत्त पांडे अपनी किताब कुमाऊं के इतिहास में भूमियाल देवता का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि भूमिया खेतों का, ग्राम सरहदों का छोटा देवता है। यह दयालु देवता है। यह किसी को सताता नहीं है। हर गांव में एक मंदिर होता है। जब अनाज बोया जाता है या अनाज उत्पन्न होता है तो उस समय इनकी पूजा होती है। इनसे यह कामना की जाती है कि प्राकृतिक व्याधियों और जंगली जानवरों से गांव की और ग्रामवासियों की फसलों की रक्षा करे। यह न्यायकारी देवता हैं। अच्छे व्यक्ति को पुरस्कार और धूर्त को दंड देते हैं। यह देवता गांव की भलाई चाहता है। ब्याह ,जन्म, उत्सव और फसल कटने पर इनकी पूजा होती है। इन्हें रोट और भेंट चढ़ाई जाती है। यह बहुत सीधे और शांत देवता होते हैं, ये फूल से भी खुश हो जाते हैं।  


उत्तराखंड और भूमियाल
उत्तराखंड में भूमियाल देवता को घर के एक बड़े सदस्य की तरह देखा जाता है। जब फसल का वक्त होता है तो भूमियाल देवता के मंदिर में बीज की बालियाँ चढ़ा कर अच्छी फसल होने के लिए आशीर्वाद लिया जाता है। इतना ही नहीं फसल काटने के बाद भी पहला भोग भूमियाल देवता को ही चढ़ाया जाता है। गांव में कोई भी त्योहार हो या शादी-ब्याह हो तो सबसे पहले इनका ही आशीर्वाद लिया जाता है। 

न्यूज18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक पहाड़ के हर गांव की रक्षा करने वाले भूमियाल देवता की पूजा सिर्फ पुरुष ही करते हैं। रिपोर्ट में नैनीताल के निवासी कैलाश के हवाले से बताया गया है कि हरेला जैसे पावन पर्व पर भी भूमि देवता की पूजा होती है और भंडारे का आयोजन किया जाता है। हालांकि इस पूजा में महिलाएं शामिल नहीं होतीं। पूजा से लेकर भंडारा आयोजित करने तक सारी जिम्मेदारी गांव के पुरुषों पर ही होती है। त्योहारों के अलावा भूमिया देवता को गीत और जागरों में भी पूजा जाता है। मांगल गीतों में भी इनका नाम लिया जाता है। 

लोकमान्यताएं हैं कि भूमिया देवता की आज्ञा के बिना कोई भी दैवीय या बाहरी शक्ति गांव में नहीं आ सकती। किसी कारण अगर गांव कहीं और बसाना पड़ता है तो सबसे पहले भूमियाल देवता को उस जगह बसाया जाता है, उसके बाद ही गाँव का विस्थापन वहां होता है। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों के अलावा तराई क्षेत्रों में भूमियाल देवता की पूजा की जाती है। तराई इलाकों में बसी थारु जनजाति भी भूमियाल देवता की पूजा करती है। यहां इन्हें भूमसेन के नाम से भी जाना जाता है। थारू जनजाति इनके मंदिर की स्थापना पीपल या नीम के पेड़ के तले पर ऊंचा चबूतरा बनाकर करती है। यहां भी इन्हें एक रक्षक देवता के तौर पर पूजा जाता है।

नेपाल से राजस्थान तक क्षेत्रपाल
ऐसा नहीं है कि भूमियाल देवता को सिर्फ उत्तराखंड में ही पूजा जाता है। इन्हें उत्तराखंड के साथ-साथ दक्षिण भारत, राजस्थान से लेकर नेपाल तक पूजा जाता है। जैसे उत्तराखंड की पहाड़ियों में भूमियाल देवता का स्वरूप होता है। तराई क्षेत्र पहुंचते-पहुंचते उसमें भी बदलाव देखने को मिल जाता है। राजस्थान के खड़गदा में क्षेत्रपाल देवता का एक बहुत बड़ा और प्रसिद्ध मंदिर है, लेकिन यहाँ उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों की तरह क्षेत्रपाल देवता लिंग स्वरूप में विराजित नहीं हैं बल्कि यहां पर उनकी बहुत बड़ी मूर्ति है। इस मंदिर में विराजित क्षेत्रपाल देवता की प्रतिमा 11वीं से 12वीं शताब्दी के बीच की होने का अनुमान है। राजस्थान के क्षेत्रपाल देवता को भी इस क्षेत्र की रक्षा करने के लिए जाना जाता है। वहीं दक्षिण भारत में भी एक देवता को पूजा जाता है जो खेतों की रक्षा करता है, इन्हें खेतपाल देवता कहा जाता है। वहीं अगर नेपाल की बात की जाए तो नेपाल में भी क्षेत्रपाल देवता लिंग स्वरूप में नहीं बल्कि मूर्ति स्वरूप में पूजे जाते हैं। यहां इन्हें भूमे देवता कहा जाता है। मास्तो गॉड: THE ANCESTRAL DEITY OF KSHATRIYAS में दिलशाही लिखते हैं कि भूमे धरती नहीं बल्कि धरती पर खेती करने वाले किसानों के देवता है, इनका विशेष नाम क्षेत्रपाल है। इनकी प्रतिमा भैरव देवता के समान लगती है और इन्हें भी क्षेत्र का रक्षक माना जाता है। देखा जाए तो क्षेत्रपाल देवता को सिर्फ उत्तराखंड में ही नहीं बल्कि पूरे भारत के साथ-साथ नेपाल में भी पूजा जाता है। बस जगह के हिसाब से इनके स्वरूप में बदलाव देखने को मिल जाते हैं। 

भूमियाल की उत्पत्ति
भूमियाल की उत्पति की बहुत सारी कहानी और मान्यताएं हैं। एक कहानी का जिक्र प्रोफेसर डी.डी शर्मा अपनी किताब उत्तराखंड ज्ञानकोश में करते हैं। इसके मुताबिक एक बार एक हुड़क्या यानि हुड़का बजाने वाला भीख मांगते हुए एक जिमदार यानी किसान के घर पहुंचा। उस समय जिमदार घर पर नहीं था। उसकी बूढ़ी माता जो नेत्रहीन थीं, घर पर थीं। उन्होंने भूलवश हुड़क्या को अन्न के धोखे में एक सूप काली मिर्च दे दी। यही हुड़क्या जब भीख माँगता हुआ राजा के महल में पहुंचा तो राजा की दी हुई भीख से संतुष्ट नहीं हुआ। उसने राजा को ताना मारते हुए कहा कि एक जिमदार के यहां मुझे काली मिर्च तो मिली और तूने उसके समान भी नहीं दिया। इससे राजा खीझ गया और वह अपनी सेना को लेकर जिमदार को सजा देने पहुंच गया। इस पर जिमदार घबरा गया और उसने अपने कुत्ते, बिल्ली समेत चौबीस प्राणियों के अपने कुनबे को घर में दरवाजा बंद कर के लखौर कर लिया। यानि कि वह आग लगाकर जलके मर गया। वही जिमदार बाद में ग्राम देवता बन कर पूजा जाने लगा। प्रोफेसर डीडी शर्मा ये भी लिखते हैं कि जिमदार अन्य देवी-देवताओं की तरह किसी व्यक्ति पर हमला नहीं करता बल्कि ये केवल खेती-पाती और जानवरों के माध्यम से उत्पात मचाकर अपना क्रोध प्रकट करता है। 

खैर, एक कहानी भूमियाल देवता की भगवान शिव से भी जुड़ती है। इसका जिक्र श्री लिंगपुराण में मिलता है। श्री लिंगपुराण अध्याय 106 के अनुसार दारुक नाम के असुर को ब्रह्माजी से वरदान मिला कि वह किसी पुरुष के हाथों नहीं मारा जा सकता बल्कि उसका वध सिर्फ एक स्त्री ही कर सकती है। ऐसे में दारुक का वध करने के लिए माता पार्वती उग्र रूप में प्रकट हुईं। राक्षस का वध करने के बाद भी काली बनी पार्वती का क्रोध शांत नहीं हुआ तब भगवान शिव ने मोर्चा संभाला। कालिका के क्रोध को शांत करने के लिए भगवान शिव स्वयं रुद्रभैरव के रूप में प्रकट हुए। कालिका ने क्रोध में आकर खड़ग से रुद्रभैरव के 52 टुकड़े कर दिए। हालांकि उन्हें पता नहीं था कि वह शिव का रूप हैं। इन 52 टुकड़ों से 52 भैरवों की उत्पत्ति हुई। इन 52 भैरवों ने स्तुति गाकर और नृत्य करके क्रोधित कालिका को शांत किया। इसके बाद अलग-अलग क्षेत्रों की रक्षा के लिए भैरवों को नियुक्त किया गया। इनमें से क्षेत्रपाल भैरव को भूमि और किसानों की रक्षा का कार्य सौंपा गया था। उसी समय से किसान क्षेत्रपाल को भूमे या भूमिया के रूप में पूजने लगे। 

एक और कहानी भूमिया देवता के बारे आती है कि 16वीं शताब्दी के आसपास जब पहाड़ों में तांत्रिकों का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ गया था तब मासी नदी के तट पर एक ज्योतिपुंज प्रकट हुआ। इसके बाद वहां पर एक मंदिर का निर्माण किया गया और उस स्थान पर भूमिया देवता की पूजा प्रारंभ हुई। मान्यता के अनुसार तब लोगों को तांत्रिकों के प्रभाव से मुक्त होने में मदद मिली। ये मंदिर कुमाऊं मण्डल में मासी नदी के पास स्थित है। 

पिशाच बना क्षेत्रपाल
न्यूज 18 ने पुराणों का हवाला देते हुए लिखा है कि घंटाकर्ण पिशाच योनि में जन्मा हुआ एक पिशाच था जो भगवान शिव का परम भक्त था। ये पिसाच भगवान शिव के प्रति अटूट भक्ति और भगवान विष्णु के प्रति घृणा रखता था। अगर कोई भी उसके आसपास नारायण का नाम लेता तो उसके मन में कुढ़न होती। उसे किसी भी स्थिति में भगवान विष्णु का नाम ना सुनाई दे, इससे बचने के लिए उसने अपने कानों में एक-एक घंटा लटका लिया। इससे जब भी कोई उसके आसपास भगवान विष्णु का नाम लेता तो घंटे की आवाज वह स्वर दबा देती। घंटाकर्ण पिसाच योनि से मुक्त होना चाहता था इसलिए वह दिन रात भगवान शिव की आराधना करता रहता था। उससे भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने घंटाकर्ण को मोक्ष प्राप्ति करने के लिए भगवान विष्णु की पूजा और तपस्या करने को कहा। मोक्ष प्राप्ति के लिए जिस नाम से घंटाकर्ण चिढ़ता था, उसे ही दिन रात लेने लगा। घंटाकर्ण ने बद्रीनाथ जाकर उस ही जगह तपस्या की जिस जगह पर भगवान विष्णु ने की थी। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण प्रकट हुए और कहा हे घंटाकर्ण, मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूं। आज से तुम इस बद्रीनाथ क्षेत्र के क्षेत्रपाल हो और जैसे ही इंद्र का यह काल पूर्ण होगा। मेरे पार्षद स्वयं तुम्हे बैकुंठ लेने के लिए आयेंगे। और ऐसे एक पिशाच बद्रीनाथ का क्षेत्रपाल बन गया। चमोली के विश्व प्रसिद्ध और यूनेस्को की विश्व धरोहर रम्माण में भी भूमियाल देवता नजर आते हैं।

भूमियाल देवता उत्तराखंड के ग्रामों और खेती-बाड़ी के देवता हैं। ये वह देवता हैं जो हर गांव के क्षेत्र की देखभाल करता है। और यहां के लोगों के सुख-दुख में उनके साथ रहता है। भूमियाल देवता का स्वरूप और इनसे जुड़ी कई कथा-कहानियां हैं।

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