क्या आर्यन पहाड़ी थे?
भारत में आर्यन
साल 1935। हिटलर के सबसे भरोसेमंद हेनरिक हिमलर ने 5 सदस्यों की एक टीम बनाई। इसे नाम दिया गया- एने-नर्बे यानी कि पैतृक विरासत ब्यूरो। इस टीम को वो काम सौंपा गया जिसकी बिनाह पर हिटलर ने पूरे जर्मनी में नरसंहार किया। 1938 में इस टीम को हिमालय की तलहटियों में भेजा गया ताकि ये लोग उन लोगों को खोज सकें जिन्हें नाजी इंसानों की सबसे प्योर और सर्वश्रेष्ठ जाति यानी रेस मानते थे। हिमलर अपने नुमाइंदों के साथ भारत होते हुए तिब्बत पहुंचा। तिब्बत समेत दुनिया को ये बताया गया कि ये टीम यहां पर रिसर्च करने पहुंची है। हालांकि उनका असल मकसद इंसानों की सबसे महान नस्ल को खोजकर अपने किए को सही ठहराना था। एने-नर्बे का काम सही चल रहा था कि तभी 1939 में दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो गया। और ये मिशन रोक दिया गया। जब तक ये टीम तिब्बत से वापस जर्मनी लौटने को तैयार हुई, तब तक ये 376 तिब्बतियों के चेहरे, सिर और हाथों के नाप जमा कर चुके थे।

18000 मीटर लंबी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म और 40 हजार से ज्यादा फोटोग्राफ ले चुके थे। और ये सब कवायद इसलिए हो रही थी ताकि हिटलर सबसे प्योर रेस यानी आर्यनों की खोज कर सके। नाजियों की पूरी विचारधारा ही आर्यन सुपरमसी और रेसियल प्योरिटी पर आधारित थी। नाजियों का मानना था कि आर्यन ही इंसानों की सबसे ऊंची नस्ल है। इसलिए उसके पास अधिकार है कि वो दूसरी मानव जातियों पर राज कर सके। एक तरफ आर्यन सुपरमसी का ख्याल था तो दूसरी तरफ नाजी यहूदियों को इंसान मानते ही नहीं थे। उनके मुताबिक यहूदी इंसानों की शक्ल में खतरनाक पैरासाइट और राक्षस हैं। इसलिए इनका खात्मा जरूरी है। खैर, हिटलर के यहूदियों के नरसंहार को सही ठहराने के लिए ये जो एजेंडा चलाया गया, उस सोच के पीछे की कहानी दो से तीन सदी पहले तैयार की गई थी। हिटलर ने अपने राजनीतिक हितों के लिए ये एजेंडा चलाया…लेकिन यहां आपके मन में जरूर सवाल उठेगा कि हिटलर की आर्यन थ्योरी का सिरा हिमालय से कैसे जुड़ता है? सिर्फ हिटलर ही नहीं बल्कि कई इतिहासकार हैं जो ये मानते हैं कि आर्यन हिमालय से थे। कई लोग लद्दाख के द्रोकपा समुदाय को आज भी आखिरी आर्यन मानते हैं। सिर्फ यही नहीं, आर्यनों की उत्पत्ति और प्रवास को उत्तराखंड से भी जोड़ा जाता है।
क्या सच में आर्यन पहाड़ी थे? इस सवाल के जवाब तक पहुंचने के लिए जरूरी है कि हम पूरी आर्यन थ्योरी और इससे जुड़े हर पहलू पर चर्चा करें। तो इस एपिसोड में आप जानने वाले हैं आर्यन रेस के उदय से शुरू हुई और साइंटिफिक व जेनेटिक्स तक पहुंची पूरी बहस को। आर्यन थ्योरी आई कहां से? किसने सबसे पहले इस थ्योरी को जन्म दिया? जानेंगे कि क्या आर्यनों ने भारत में प्रवास किया, आक्रमण किया या फिर ये लोग यहीं से थे? कैसे आर्यनों का कनेक्शन उत्तराखंड से जुड़ता है? और क्यों हिटलर इन्हें खोजने हिमालय पहुंचा था?
आर्यनों को लेकर कई थ्योरीज दुनियाभर में मौजूद हैं। इन थ्योरीज को डिबंक या फिर कहें कि इनका सच खोजने से पहले जानते हैं कि ये आर्यन शब्द आया कहां से है और इसके मायने क्या हैं?
कौन हैं आर्यन?
आर्यनों से जुड़ी थ्योरी की पहली कड़ी को खोजने का श्रेय फ्रेंच इंडोलॉजिस्ट एब्राहम हायसिंथे एंक्वीटल डपरोन को दिया जाता है। डपरोन ने 1771 में पारसी धर्म के ग्रंथ अवेस्ता का ट्रांसलेशन किया। और इसी में उन्होंने पहली बार ‘आरेन्स (Aryens’) शब्द का इस्तेमाल किया। डपरोन ने इस दौरान ग्रीक शब्द ‘एरिओई (Arioi) और पारसी शब्द ‘ऐर्या (Airya)’ के बीच संबंध स्थापित किए। 16वीं सदी से यूरोपियों ने संस्कृत और ग्रीस जैसी यूरोपीय भाषाओं के बीच संबंध स्थापित करने शुरू कर दिए थे। इनका मानना था कि इन भाषाओं की समानता का कोई एक ही रूट रहा होगा। हालांकि वो भारत में रहा होगा, ये मानने के वो सख्त खिलाफ थे। दूसरी तरफ, एंक्वीटल की सोच इससे थोड़ी अलग नजर आती है। एंक्वीटल का मत था कि सभी यूरोपीय संस्कृतियों के उदय का स्रोत प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मिलता है। उनका कहना था कि उपनिषद, प्राचीन ग्रीक यानी यूनान और आधुनिक यूरोपीय विचाराधारा के बीच कई समानताएं नजर आती हैं।

एंक्वीटल ने थ्योरी दी कि ब्राह्मणों ने छठवीं और पांचवीं ईसा पूर्व मेडिटरेनियन यानी भूमध्यसागर की यात्रा की और यहां उन्होंने अपने ज्ञान का प्रसार किया। एंक्वीटल का मत था कि ईसा काल में उनकी टीचिंग्स गायब हो गई थीं लेकिन ये तब फिर वापस आ गए जब विद्वानों ने यूरोपीय परंपराओं में भारतीय बुद्धिमता को खोजना शुरू किया। लेकिन इसी बीच, अंग्रेजों ने एक और थ्योरी दी। भारत में ब्रिटिश जज और एशियटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के फाउंडर सर विलियम जोन्स ने आर्यन इन्वेजन थ्योरी का पहला ईंट रखा। द हॉर्स, द व्हील एंड द लैंग्वेजेस में डेविड एंथनी बताते हैं कि जोन्स ने थ्योरी दी कि संस्कृत और यूरोपीय सिविलाइजेशन की भाषा-ग्रीक और लैटिन का स्रोत एक ही है। इसके साथ ही पर्सियन, सेल्टिक और जर्मन भी समान स्रोत से ही है। इस थ्योरी के बाद पूरे यूरोप में इन भाषाओं के स्रोत और इन भाषाओं को बोलने वालों की तलाश जोरों-शोरों से शुरू हो गई। ये वो दौर था जब रोमांटिक्स मूवमेंट अपने चरम पर थी। जर्मनी में रोमांटिक्स कन्विक्शन का मानना था कि भाषाएं और लोक एकसमान होते हैं। और इस विचारधारा से जन्म हुआ प्रोटो-इंडो-यूरोपियन रहस्यमयी मातृभाषा का। माना गया कि सभी पश्चिमी सभ्यताओं की शुरुआत इसी से हुई। इस सोच को तब ओर बल मिला जब 1859 में चार्ल्स डारविन ने ऑरिजिन ऑफ स्पेसीज का सिद्धांत पेश किया।
डेविड बताते हैं कि राष्ट्रवादियों ने चार्ल्स की इस थ्योरी को अपने हिसाब से मोड़ लिया और इसके आधार पर ये कहना शुरू कर दिया कि एक रेस यानी जाति इंसानों की दूसरी जातियों से श्रेष्ठ है। निष्कर्ष निकाला गया कि जो श्रेष्ठ यानी ज्यादा फिट रेस है उसके पास कमजोर रेस यानी नस्लों पर राज करने का अधिकार है। साथ ही ये भी परिभाषा गढ़ी गई कि जो कमजोर नस्ल है, वे जेनेटिक वीकनेस की वजह हैं और श्रेष्ठ नस्ल को संक्रमित करने वाली हैं। और इस तरह स्यूडो साइंस और रोमांटिक्स ने एक नई थ्योरी को जन्म दिया जिसके मुताबिक नॉर्थ यूरोपियन्स सर्वश्रेष्ठ रेस के लोग थे। इस विचारधारा को यूरोप के राष्ट्रीय अखबारों से लेकर नेशनल स्कूल सिस्टम में खूब प्रचारित किया गया। और अब प्रोटो-इंडो-यूरोपियन्स की अवधारणा पेश की गई। सर विलियम जोन्स ने थ्योरी दी कि उत्तर भारत से संस्कृत का परिचय आक्रमणकारियों ने करवाया। ये आक्रमणकारी जो कि किसी किंगडम का हिस्सा थे और किसी प्राचीन समय में यहां आए थे। और इस तरह भारत में अंग्रेजों के उपनिवेशवाद को सही साबित करने के लिए गढ़ी गई थ्योरी की शुरुआत हुई।
आर्यनों के मूल स्थान को खोजने का अभियान तब तेज हुआ, जब ऋग्वेद के एक सूक्त का ये अर्थ निकाला गया कि वेदिक आर्यन आक्रामणकारी थे और ये पंजाब की तरफ से भारत आए थे। इसके बाद यूरोप के लगभग सभी देशों ने खुद को आर्यनों का जन्मस्थान बताने की जुगत शुरू कर दी। 1839 आते-आते इस थ्योरी को मानने वालों ने इन्हें आर्यन (जिसे एरियन उच्चारित किया जाता है) कहना शुरू कर दिया। फिर कई स्कॉलर्स ने प्रोटो-इंडो-यूरोपियन्स को आर्यन कहना शुरू किया। इस तरह एक लाइन में आर्यन का मतलब समेटें तो आर्यन यानी इंसानों की महान नस्ल। आर्यन सबसे बुद्धिमान और दूसरों से सर्वश्रेष्ठ हैं। और इसी से निकलती है आर्यन इन्वेजन थ्योरी।
आर्यन इन्वेजन थ्योरी
मानवता की सबसे श्रेष्ठ रेस का नाम आर्यन था, ये तय कर दिया जा चुका था। 1853 में Arthur de Gobineau ने Inequality of the Human Races में बताया कि गोरे ही आर्यन थे और यही सभ्य यानी सिविलाइज्ड लोग थे। उन्होंने थ्योरी दी कि उत्तरी यूरोप के लोग दुनिया के कई कोनों में गए और इन्होंने कई सभ्यताओं का निर्माण किया। लेकिन बाद में ये स्थानीय जातियों में मिक्स हो गए और इस तरह प्राचीन आर्यन सभ्यता खोनी शुरू हो गई। आर्यन थ्योरी का सबसे प्रोमिनेंट नमूना पेश किया गया 1861 में। जर्मन फिलोलॉजिस्ट और ऑरियंटलिस्ट मैक्स म्यूलर ने आर्यन इन्वेजन थ्योरी दी। द ऑरिजिन्स ऑफ द आर्यन्स किताब के मुताबिक मैक्स म्यूलर ने साइंस ऑफ लैंग्वेज के लेक्चर्स में सिर्फ आर्यन भाषाओं की बात करने की बजाय आर्यन रेस और आर्यन परिवार की बात की। म्यूलर ने थ्योरी पेश की कि एक वक्त था जब भारतीयों, पारसियों, यूनानियों, रोमन, सेल्ट्स और जर्मन के पूर्वज एक साथ रहा करते थे। शायद एक ही छत के नीचे।
म्यूलर ने मत पेश किया कि आर्यनों के ये समूह मध्य एशिया में काकेशस पर्वत शृंखला में एक साथ रहा करते थे जो प्रोटो-इंडो-यूरोपियन भाषा बोला करते थे। इनमें से कुछ लोगों ने यूरोप की तरफ माइग्रेशन किया और इस तरह उन्होंने यहां यूरोपीय भाषाओं को जन्म दिया। कुछ पर्सिया की तरफ गए तो उन्होंने पर्सियन और ईरानियन भाषाओं को तैयार किया। और कुछ लोग भारत की तरफ आए जिन्होंने संस्कृत और आधुनिक भारतीय भाषाओं को जन्म दिया। म्यूलर की इस थ्योरी को यूरोपीय स्कॉलर्स ने हाथोंहाथ लिया। ये सोच बना दी गई कि आर्यन मध्य एशिया में स्थित ऑक्सस नदी के पास कभी रहे होंगे। और यहीं से इन्होंने नॉर्थ-वेस्ट की तरफ यात्रा की। ये थ्योरी आगे कहती है कि कुछ आर्यन आक्रमणकारी सिंधु नदी के तट पर पहुंचे और यहां से ये लगातार दक्षिण और पूर्व की तरफ युद्ध करते हुए आगे बढ़ते रहे। इन आर्यनों ने यहां के मूल निवासियों के साथ युद्ध लड़ा और तब तक लड़ते रहे, जब तक इन्होंने इन मूल निवासियों को अपने में चौथी जाति – ब्लैक्स यानी शूद्र के तौर पर शामिल नहीं कर लिया।
इन लोगों ने मूल निवासियों पर अपनी भाषा और परंपराओं को लेकर असर छोड़ा। हालांकि बाद में ये स्थानीय लोगों के साथ मिक्स हो गए और प्योर आर्यन रेस खो गई। कई इतिहासकारों का मानना है कि इस थ्योरी को ब्रिटिशर्स ने बढ़ावा दिया। क्योंकि ब्रिटिशर्स को ये जताना था कि वे उच्च नस्ल के लोग हैं। ऐसे में अगर वह भारत पर राज करते हैं तो यहां के लोगों को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए क्योंकि वे भी आर्यन हैं। बाद में अंग्रेजों की इस थ्योरी को कई भारतीय विद्वानों ने भी बढ़ावा दिया। लेकिन कई थे जिन्होंने इसको नकारना भी शुरू कर दिया। और जवाब में एक नई थ्योरी पेश की गई जिसमें बताया गया कि आर्यन बाहर से नहीं बल्कि भारत से बाहर गए थे।
आउट ऑफ इंडिया थ्योरी
आर्यन भारत के मूल निवासी थे, इस विचार को सबसे पहले थियोसॉफिकल सोसायटी के फाउंडर कर्नल ऑलकॉट ने रखा। उन्होंने थ्योरी दी कि आर्यन ना सिर्फ भारत के मूल निवासी थे बल्कि ये यूरोपीय सभ्यताओं के पूर्वज भी हैं। थ्योरी में कहा गया कि आर्यनों की भाषा संस्कृत थी और आर्यन सभ्यता को पश्चिम में विस्तार देने का श्रेय इन्हें ही जाता है। इनके अलावा कई भारतीय स्कॉलर जैसे AC दास, संपूर्णानंद, गंगानाथ झा और एल. डी. कल्ला ने भी आर्यनों के भारतीय होने का दावा किया। इन इतिहासकारों ने मत दिया कि आर्यनों का ठिकाना सिंधु नदी और इसकी सहायक नदियों पर कहीं था। इन्होंने इसे पंजाब और कश्मीर बताया है। इन इतिहासकारों के मुताबिक आर्यन सप्त-सिंधु प्रदेश के निवासी थे जो कि जलवायु परिवर्तन होने की वजह से मध्य एशिया की तरफ चले गए। हालांकि जब कई सहस्राब्दियों यानी मिलेनियल के बाद सबकुछ ठीक हो गया, तब ये लोग लौट आए।
Archaeological Survey of India के पूर्व महानिदेशक बी बी लाल दावा करते हैं कि वैदिक आर्यों के उत्तर से पश्चिम की तरफ जाने के दावे के कई साहित्यिक और आर्कियोलॉजिकल प्रूफ मौजूद हैं। वह कहते हैं कि बौधायन श्रौतसूत्र में पुरुरवास और उर्वशी के बेटे अमावसु के पश्चिम की तरफ जाने का जिक्र मिलता है। और उसकी संतानें गांधार, फारसी और अर्रट्टास हैं। बी बी लाल बताते हैं कि तुर्की में मिले 1380 ईसा पूर्व के शिलालेख से भी इस बात की पुष्टी होती है। उनके मुताबिक ‘बोगाज Koi’ में मिले शिलालेख में हित्ती और मितानी राजाओं के बीच संधि के गवाह के तौर पर वेदिक भगवान इंद्र, वरुण, मित्र और नासत्य का जिक्र मिलता है। इसके अलावा एक होर्स ट्रेनर किकुल्ली का टैबलेट मिलता है जिसमें संस्कृत के शब्द जैसे एकवर्तन:, द्वीयवर्तनानंद और त्रिवर्तन: जैसे शब्द दिखते हैं। बी बी लाल इन सबूतों के आधार पर ये साबित करते हैं कि आर्यन भारतीय थे और ये यहीं से पश्चिम की ओर गए। स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक भी एक थ्योरी देते हैं। इनकी थ्योरी के मुताबिक ऋग्वेद 4500 ईसा पूर्व लिखा गया था। इस आधार पर उन्होंने बताया कि आर्यों का मूल निवास स्थान उत्तरी ध्रुव था। अपनी किताब द आर्कटिक होम इन द वेदास में तिलक लिखते हैं कि आर्य लगभग 8,000 ईसा पूर्व के पूर्व-हिमनद काल यानी प्री-आइस एज के दौरान उत्तरी ध्रुव में रहते थे। तिलक के मुताबिक, यहां हिम भूस्खलन आने की वजह से इन्हें नई बस्तियों की तलाश में निकलना पड़ा और इस तरह एक समूह यूरोप की तरफ निकला तो दूसरा समूह भारत की ओर आया। उन्होंने इस सिद्धांत को समर्थन देने के लिए कई वैदिक स्त्रोतों, कैलेंडर, और कालक्रमों का जिक्र किया है।
दूसरी तरफ, JNU की वाइस चांसलर शांतिश्री धुलीपुडी पंडित राखीगड़ी में हुई खुदाई के आधार पर लिखती हैं कि कार्बन डेटिंग से ये साबित हो चुका है कि हमारी सभ्यता 8 से 10 हजार साल पुरानी है। वह कहती हैं कि जब यूरोप और पश्चिमी देश पत्थर ही चुग रहे थे, तब हम एक सभ्यता के तौर पर विकसित हो चुके थे। खैर, इन दोनों थ्योरीज में कितनी सच्चाई है और इसमें कहां पर आर्यनों के पहाड़ी होने की बात आती है, उस पर भी चर्चा करेंगे लेकिन पहले आर्यनों से जुड़ी आखिरी थ्योरी पर भी बात कर लेते हैं जो कि है आर्यन माइग्रेशन थ्योरी।
आर्यन माइग्रेशन थ्योरी
इन्वेजन यानी आक्रमण और आउट ऑफ इंडिया के बाद आर्यन माइग्रेशन थ्योरी भी सामने आई। इतिहासकार रोमिला थापर ने 1991 में लिखा कि आर्यन्स की इन्वेजन की थ्योरी को अगर नकारा जाता है तो उनके भारत में माइग्रेट यानी निष्क्रमण करने की बात फोकस में आती है। वह लिखती हैं कि अगर ईरान और मध्य एशिया की संस्कृति के निशान देखे जाएं तो आर्यनों के भारत में छोटे स्तर पर माइग्रेशन करने की संभावना बनती है। उनके मुताबिक ये माइग्रेशन छोटे-छोटे समूहों में और सदियों में काफी लंबे समय तक होता रहा। वह अवेस्ता और ऋग्वेद का हवाला देते हुए कहती हैं कि माइग्रेशन करने वाले ये लोग पशुपालन से जुड़े हुए थे। वह संभावना जताती हैं कि इसी टुकड़ों-टुकड़ों में हुए माइग्रेशन से ही उत्तर-पश्चिमी भारत में आर्यन भाषाओं का प्रचार-प्रसार हुआ।
इसी थ्योरी को विस्तार देते हुए आर एस शर्मा लिखते हैं कि ये पशुपालक बैक्ट्रिया-मार्जियाना आर्कियोलॉजिकल कॉम्प्लेक्स यानी BMAC से भारत की तरफ आए होंगे। बता दें कि BMAC एक कांस्य युगीन सभ्यता है जो 2300 ईसापूर्व से लेकर 1700 ईसापूर्व तक मध्य एशिया में पनपी थी। खैर, ये वो तीन थ्योरीज हैं जिनको लेकर सबसे ज्यादा बहस होती है और पूरी दुनिया इन तीन थ्योरीज में बंटी हुई नजर आती है। लेकिन इन थ्योरीज के बाद आपके जेहन में एक सवाल जरूर कौंध रहा होगा कि आखिर आर्यन को लेकर सच क्या है? तो वो सच भी हम आपको बताएंगे लेकिन पहले आर्यनों के हिमालय से संबंधों को लेकर बात कर लेते हैं। जब आप आर्यनों की अलग-अलग थ्योरी की बात करते हैं तो उसमें हिमालय प्रमुख स्थान पाता है। और हिमालय में भी उत्तराखंड को विशेष स्थान दिया जाता है। तो इसी आधार पर अब ये पता करते हैं कि क्या आर्यन पहाड़ी थे या नहीं?
क्या आर्यन पहाड़ी थे?
आर्यनों के पहाड़ी होने के कई तर्क दिए जाते हैं। और इन तर्कों की शुरुआत भी 19वीं सदी से ही होती है। जब पहले-पहल आर्यनों के मूल की खोजबीन शुरू हुई तो कई जानकारों ने उनका मूल स्थान हिमालय बताया। पंडित गंगानाथ झा ने आर्यों को ब्रह्मर्षि देश का बताया तो LD कल्ला का मानना था कि आर्यों का मूल स्थान कश्मीर और हिमालय में कही हैं। कांति प्रसाद नौटियाल अपनी किताब आर्कियोलॉजी ऑफ कुमाऊं में बताते हैं कि प्रोफेसर बेनफे और वेबर ने तर्क दिया था कि आर्यनों का आव्रजन कुमाऊं यानी उत्तराखंड से हुआ था। हालांकि बाद में कई स्कॉलर्स ने इस थ्योरी को नकार दिया. मौजूदा वक्त की बात करें तो डॉ. यशवंत सिंह कठोच बताते हैं कि आर्यन ना सिर्फ हिमालय के थे बल्कि उनका नाता उत्तराखंड से भी है। कठोच अपनी किताब उत्तराखंड का नवीन इतिहास में इसके पक्ष में कई तर्क देते हैं। (Pg-66) कठोच ऋग्वेद का हवाला देते हुए लिखते हैं कि सप्तसिंधु प्रदेश में सरस्वती के कांठों में आर्यों की बस्तियां थीं।
कठोच लिखते हैं कि वैदिक और पौराणिक परंपराओं में आर्य राजवंशों की उत्पति मनु से मानी गई है। मनु वैवस्वत के वंशज ‘मानव’ एक लंबे समय तक मेरू के आसपास सरस्वती के तटों पर निवास करते रहे। ऋग्वेद में सरस्वती के अलावा गोमती, सरयू नदियों के नाम भी आते हैं। साथ ही आर्यों के एक कुल के पश्चिम अभियान का उल्लेख भी मिलता है। कठोच बताते हैं कि अपने पश्चिमी अभियान में जब ये आर्यन ईरान की ओर बढ़े तो इन्होंने यहां अपनी पवित्र नदियों की स्मृति छोड़ी। ऋग्वेदीय गोमती नदी ईरान में गोमल और सरयू हरिरूद हो गई। कठोच लिखते हैं कि जिम्मर समेत कई विद्वानों ने हरव्हैती नदी की समानता सरस्वती से की है। इन तर्कों के आधार पर कठोच निष्कर्ष निकालते हैं कि सरस्वती उत्तर-कुरु अर्थात मध्य हिमालय की वर्तमान सरस्वती है और सप्त सिंधु प्रदेश पूरा अलकनंदा प्रवाह क्षेत्र है। सरस्वती नदी को लेकर ये रिपोर्ट भी कुछ इसी तरह का दावा करती है। इस रिपोर्ट में एक्सपर्ट्स के हवाले से बताया गया है कि सरस्वती का उद्गम स्थल गढ़वाल में स्थित हर की दून से था। माना जाता है कि ये नदी 1500 किलोमीटर लंबी, 5 मीटर गहरी और 3 से 15 किलोमीटर चौड़ी थी। सरस्वती के 6 हजार से 4 हजार ईसवी पूर्व बहती। बाद में पृथ्वी में बदलाव की वजह से ये सूख गई।
यशवंत कठोच लिखते हैं कि ऋग्वेदिक आर्य भरत जन ही थे और इनके अलग-अलग समूह उत्तर कुरु से पश्चिम और दक्षिण की ओर गए। कठोच के मुताबिक ऋग्वेदिक काल में जिस सप्तसिन्धव: औऱ सरस्वती के कांठों में आर्यों और दासों का घोर युद्ध हुआ था। और जहां से भरतजनों का मध्य प्रदेश की ओर संक्रमण हुआ, वह प्रदेश हिमवंत अर्थात मध्य हिमालय था जो वर्तमान उत्तराखंड तथा उसका आस-पास पड़ोस ही है। उत्तराखंड ही उत्तर कुरु था, इसे साबित करने के लिए कठोच ऐतरेय ब्राह्मण में परेण हिमवंत: यानी हिमवंत के पार का जिक्र करते हैं। वह कहते हैं कि इसका मतलब यही समझा जाना चाहिए कि उत्तर कुरु हिमालय के उत्तर में फैला था। वैदिककाल और महाभारत काल से ईसवी पूर्व सातवीं-छठी शती तक उत्तर कुरु के जिस क्षेत्र को हिमवंत कहा जाता रहा, वही प्राचीनतम् आर्यों का मूल स्थान था यानी कि उत्तराखंड ही इनका मूलस्थान था। कठोच बताते हैं कि उत्तर वैदिककाल में जब आर्यों का प्रव्रजन हिमवंत क्षेत्र से दक्षिण में कुरुक्षेत्र के आसपास फैली भूमि में हुआ तब उन्होंने अपनी प्रिय ऋग्वेदीय सरस्वती को यहां भी लाया और इस भू-भाग को कुरु नाम दिया।
वह निष्कर्ष निकालते हैं कि आर्य स्वदेशी जन थे और भारत में आर्यों के आक्रमण की थ्योरी को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इतिहासकार अजय सिंह रावत अपनी किताब उत्तराखंड का समग्र राजनैतिक इतिहास में उत्तराखंड के मूल निवासी किरातों को भी आर्य जाति के ही मानते हैं। वह लिखते हैं कि अगर सप्तसिंधु को उत्तराखंड माना जाए तो किरात भी आर्य ही थे। वह लिखते हैं कि वैदिककाल में ही आर्य अपनी जन्मभूमि अर्थात उत्तराखंड से आर्य सभ्यता के प्रचार-प्रसार के लिए दुनिया के अलग-अलग कोनों में गए। रावत तर्क देते हैं कि यहां से सभी लोगों का जाना संभव नहीं था। ऐसे में जो लोग यहीं रहे, वही आगे जाकर किरात कहलाए। रावत बताते हैं कि महाभारत काल में हुए युद्ध ने कई बाहरी आक्रांताओं को भारत की ओर आने को आकर्षित किया। आक्रांताओं से बचने के लिए मैदान में बसे आर्यों ने शरणार्थी बनकर घर वापसी की। लेकिन जब ये लोग वापस अपने घर यानी उत्तराखंड आए तो इन्होंने बल प्रयोग कर यहां के मूल निवासियों को हरा दिया और उन्हें शूद्र, अर्द्धशूद्र की संज्ञा दे डाली। वर्तमान उत्तराखंड के शिल्पकार किरातों के ही वंशज हैं।
एक तरफ जहां कठोच और अजय सिंह रावत उत्तराखंड को आर्यनों का मूल स्थान बताते हैं। वहीं, दूसरी तरफ, उत्तराखंड के अलावा कश्मीर और नेपाल जैसे क्षेत्रों का कई इतिहासकारों ने निवास स्थान तो माना है लेकिन वह इसे इनका मूल स्थान नहीं मानते। हिमालय गजेटियर, ग्रंथ दो भाग एक में आर्यों के आगमन को मध्य एशिया से ही बताया गया है। लेकिन उत्तराखंड में इनके आवास को लेकर प्रोफेसर बेनफे के हवाले से जानकारी दी गई है। इसके मुताबिक बेनफे 1840 तक ये प्रबल संभावना जताते थे कि आर्य कुछ समय तक लघु तिब्बत में सिंधु नदी के उद्गम स्थल पास और वहां से कुमाऊं और गढ़वाल के दर्रों के रास्ते भारत में इंद्रप्रस्थ पहुंचे। हालांकि बाद में जब इन्होंने ऋग्वेद का अध्ययन किया तो कहा कि आर्यों के समूह बैक्ट्रिया से हिंदुकुश को पार करके सरस्वती की ओर बढ़े।
हिमालयन गजेटियर में ये भी बताया गया है कि महाभारतकाल में वह उत्तर कुरु में रहा करते थे। ऐसे में अगर सरस्वती और उत्तर कुरु को लेकर कठोच का निष्कर्ष माना जाए तो गजेटियर भी आर्यनों के उत्तराखंड में मौजूद होने की बात कहता है। हिमालयन गजेटियर के विचार को ही पंडित हरिकृष्ण रतूड़ी ‘गढ़वाल का इतिहास’ में जाहिर करते हैं। (pg- 134) रतूड़ी आर्यों को आक्रमणकारी बताते हुए लिखते हैं कि इन आक्रमणकारियों के दल उत्तर हिमालय के दर्रों को पार कर भारत में घुसे। रतूड़ी संभावना जताते हैं कि आर्यों से डरकर बहुत से लोग इन पर्वतीय देशों यानी उत्तराखंड समेत अन्य पहाड़ी राज्यों में आकर बस गए और यही बाद में यहां के आदिम निवासी बन गए। कई इतिहासकार ये भी मानते हैं कि उत्तराखंड की खस जाति भी आर्यों की ही एक शाखा है। इनके मुताबिक आर्य जब मध्य एशिया से निकले होंगे तो इनकी कुछ शाखाओं ने अलग रूट लिया और ये लोग हिमालय की तरफ आए। इस तरह, कई ऐसे तर्क विद्वानों की तरफ से दिए जाते हैं जिससे ये प्रतीत होता है कि आर्यन या तो पहाड़ी थे यानी कि हिमालयी क्षेत्र के मूल निवासी थे और या तो उनका यहां भी माइग्रेशन हुआ था।
वहीं, हिटलर के हिमालय में आर्यन रेस को ढूंढने की जो थ्योरी थी उसके मुताबिक एक शहर था अटलांटिस जो इंग्लैंड और पुर्तगाल के बीच था। यहां पर इंसानों की सबसे शुद्ध नस्ल रहा करती थी। हालांकि एक बार दैवीय बज्र पड़ने से ये शहर डूब गया और तब शुद्ध नस्ल के जो लोग बच पाए उन्होंने दूसरी जगह शरण ले ली। नाजियों के मुताबकि ये जगह हिमालय थी। खासकर तिब्बत थी। यही वजह है कि आर्यनों की शुद्ध नस्ल की खोज के लिए हिटलर ने पूरा एक अभियान चलाया है। खैर, विद्वानों की तरफ से जो भी तर्क दिए गए हैं, क्या उनके आधार पर हम ये कह सकते हैं कि आर्यन पहाड़ी थे? तो इसका जवाब आपको मिलेगा निष्कर्ष में। और निष्कर्ष की शुरुआत करते हैं आर्यन थ्योरी के सभी तर्कों में से सही तर्क को खोजने की कोशिश करते हुए।
निष्कर्ष
दुनिया के इतिहास में अगर किसी मुद्दे का सबसे ज्यादा राजनीतिकरण हुआ है तो वो है आर्यन थ्योरी। अलग-अलग वक्त पर पहले फ्रांसीसियों ने फिर अंग्रेजों ने, हिटलर ने और बाद में हिंदू राष्ट्रवादियों ने इसका इस्तेमाल अपने-अपने ढंग से करने की कोशिश की। लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या आर्यनों ने भारत पर आक्रमण किया था तो जवाब है नहीं। इतिहासकार राम पुनियानी समेत ज्यादातर एक्सपर्ट्स ये मानते हैं कि आर्यनों ने भारत पर कोई आक्रमण नहीं किया था। इस थ्योरी के कोई पुख्ता प्रूफ मिलते ही नहीं हैं। इस थ्योरी में ये भी कहा जाता है कि आर्यनों ने आक्रमण किया और उन्होंने हड़प्पा संस्कृति को समूल नष्ट करके अपना वर्चस्व जमाया।
1946 में मोरीटाइम व्हीलर ने इस थ्योरी को जन्म दिया। उसने इस थ्योरी को इस बिनाह पर जन्म दिया कि वेदों में इंद्र को पुरंदर यानी किलों का विनाशक बताया गया है। उसने निष्कर्ष निकाला कि इंद्र का प्रतिनिधित्व करने वाले आर्यनों ने हड़प्पा सभ्यता का विनाश किया था। हालांकि आर्कियोलॉजिकल स्टडी में इस बात के कोई प्रूफ नहीं मिलते हैं। रिसर्च बताती है कि हड़प्पा संस्कृति आर्यनों के आने से कई सौ साल पहले हो गई थी। बताया जाता है कि हड़प्पा संस्कृति का पतन जलवायु परिवर्तन की वजह से हुआ। कई मानते हैं कि यहां स्थित नदी के सूख जाने से इन लोगों को ये क्षेत्र भाग छोड़कर जाना पड़ा। इतना जरूर माना जाता है कि आर्यों का आगमन भारत में हड़प्पा सभ्यता के पतन के आखिरी वक्त में जरूर हुआ।
इतिहासकार राम पुनियानी कहते हैं कि अंग्रेजों ने इस थ्योरी को इसलिए बढ़ावा दिया क्योंकि उन्हें खुद को सुपीरियर साबित करना था और भारत पर अपने उपनिवेशवाद को सही ठहराना था। उत्तर भारतीयों और द्रविडियन्स के बीच फर्क दिखाने का काम भी इसीलिए किया गया। खैर, अंग्रेजों की इस थ्योरी के जवाब में हिंदू राष्ट्रवादियों ने आउट ऑफ इंडिया थ्योरी को बढ़ावा दिया… लेकिन ये थ्योरी भी साइंटिफिक स्टडी और आर्कियोलॉजिकल प्रूफ्स के आधार पर खरी नहीं उतरी है। टोनी जोसेफ अपनी किताब अर्ली इंडियन्स में लिखते हैं कि अगर भारत से पश्चिमी देशों की तरफ निष्क्रमण यानी माइग्रेशन हुआ होता तो हमें प्रथम भारतीयों के जेनेटिक सिग्नेचर का अच्छा ख़ासा छिड़काव मध्य एशिया से लेकर पश्चिमी यूरोप तक दिखने चाहिए थे लेकिन ऐसा कोई भी संकेत नजर नहीं आता है।
जोसेफ बताते हैं कि प्रथम भारतीयों के वंशजों के कोई क़रीबी रिश्तेदार दुनिया में कहीं भी नहीं हैं। इसलिए इस धारणा में कोई दम नहीं है कि हिन्दुस्तान से बाहर गए लोगों ने दुनिया में इंडो-यूरोपियन भाषाओं का प्रसार किया था। हालांकि इसके बावजूद कई आर्कियोलॉजिस्ट और इतिहासकार दावा करते हैं कि आर्यन भारतीय थे। इसके लिए सिनौली में मिले चैरियट्स और हथियारों का हवाला दिया जाता है। इसके अलावा रामायण, महाभारत और वेदों का हवाला भी इसके सपोर्ट में दिया जाता है। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के ज्वाइंट डायरेक्टर जनरल डॉ. संजय मंजुल दावा करते हैं कि हमें सरस्वती के किनारे-किनारे हड़प्पन सिविलाइजेशन की साइट्स मिलती हैं। हालांकि एकेडमिक्स में इस थ्योरी को बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं दी जाती है। और इसकी एक ही वजह है क्योंकि इसको लेकर कोई जेनेटिक सिग्नेचर या कोई पुख्ता प्रूफ अभी तक नहीं मिला है। और जो कुछ मिला भी है तो 2 परसेंट से भी कम है।
आखिर में बात आती है आर्यनों के माइग्रेशन की। 2018 में ‘द जीनोमिक फ़ॉर्मेशन ऑफ़ साउथ ऐंड सेंट्रल एशिया’ नाम से एक स्टडी छपी। इसमें पहली बार दक्षिण एशिया, कज़ाकिस्तान और पूर्वी ईरान के प्राचीन डीएनए का अध्ययन किया गया। ये स्टडी इस बात पर मुहर लगाती है कि आर्यनों का भारत में माइग्रेशन हुआ था। स्टडी के मुताबिक कज़ाक स्टेपी से दक्षिण की ओर कज़ाकों का एक निष्क्रमण हुआ था। पहले ईसापूर्व 2100 के बाद दक्षिण मध्य एशियाई क्षेत्रों की दिशा में, यानी आज के तुर्कमेनिस्तान, उज़्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान की ओर। फिर इसके बाद ईसापूर्व 2000 से ईसापूर्व 1000 के दौरान दक्षिण एशिया की दिशा में। ये जब निष्क्रमण कर रहे थे तो इन्होंने अपने रास्ते में BAMC पर गहरा प्रभाव डाला था। लेकिन इनसे आगे दक्षिण एशिया की ओर जाने के लिए इसके बाहर-बाहर से ये लोग निकल जाया करते थे।
यहाँ इस सभ्यता के लोग हड़प्पा सभ्यता के लोगों के साथ मिल गए और इस तरह उन्होंने आज के हिन्दुस्तान की आबादी के प्रमुख स्रोत एन्सेस्ट्रल नॉर्थ इण्डियन्स और एन्सेस्ट्रल साउथ इंडियन्स की रचना की। ये स्टडी ये भी बताती है कि आज यूरोप और एशिया के इंडो-यूरोपियन भाषाएँ बोलने वाले लोगों की बहुत बड़ी तादाद उस वंशावली से जुड़ती है जिसका संबंध यमनाया के नाम से ज्ञात स्टेपी के चरवाहों से है। स्टेपी घास और झाड़ियों के मैदानों का एक विशाल क्षेत्र है, जो मध्य यूरोप से चीन तक 8000 किलोमीटर से ज़्यादा के विस्तार में फैला हुआ है। 2019 में हुई एक ग्लोबल स्टडी जिसमें कई भारतीय स्कॉलर भी शामिल थे।
इस स्टडी के मुताबिक मॉडर इंडियन DNA तीन स्रोतों से आया DNA है। पहला DNA उन शिकारियों का है जो करीब 65 हजार साल पहले अफ्रीका से भारत आए थे। दूसरी वेव मिडिल ईस्टर्न प्री-फार्मर्स थे जो 6000 से 4 हजार BCE के बीच आए। और तीसरी वेव थी स्टेप हर्डर्स की जो आज के यूक्रेन और कजाकिस्तान से 1800 BCE में भारत आए। इस तरह पॉप्युलेशन जेनेटिक्स स्टडीज के आधार पर ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारत में जो लोग आए वो तीन माइग्रेशन में आए। 65 हजार साल पहले भारत के मूल निवासी आए। फिर 7 हजार साल पहले इरान से किसान लोग आए। ये वो लोग थे जो हड़प्पा, मोहेनजोदड़ो में बसे। और उसके बाद करीब 2 हजार साल पहले आर्य मध्य एशिया से आए थे। हड़प्पा सभ्यता आर्यों के आने से पहले ही काफी ज्यादा विकसित हो चुकी थी।
हालांकि जब आर्यों का यहां आगमन हुआ तब हड़प्पा-मोहनजोदड़ो सभ्यता डिक्लाइन हो रही थी। ’आर्य’ यहां अपने साथ एक चरवाहा जीवन-शैली, बलि के बड़े अनुष्ठानों जैसे नए धार्मिक रीति-रिवाज़, योद्धा परम्परा और घुड़सवारी लेकर पहुंचे। बाद में ये स्थानीय लोगों के साथ मिक्स हो गए और इस तरह इन्होंने एक ऐसे समुदाय का निर्माण किया जो इतना मजबूत था कि उसने पूरे उत्तर पर इंडो-यूरोपियन भाषाएं थोपीं और आगे जाकर ये भाषाएं स्थानीय भाषाओं के साथ मिक्स होकर आज के आधुनिक रूप में सामने आने लगीं। आखिर में उस सवाल का निष्कर्ष जो उत्तराखंड के लोग खासकर जानना चाहते हैं कि क्या आर्यन पहाड़ी थे? आर्यन थ्योरी का ओवरऑल निष्कर्ष देखकर आप समझ गए होंगे कि इसका जवाब ना में ही है। आर्यनों की पहाड़ों में मौजूदगी का जिक्र ज्यादातर वेद और पुराणों में ही मिलता है। अभी तक इसके कोई आर्कियोलॉजिकल और जेनेटिक साक्ष्य ना के बराबर मिले हैं।
खुद यशवंत सिंह कठोच लिखते हैं कि इस मोर्चे पर अभी काफी शोध की जरूरत है। अभी आर्यनों के पहाड़ी होने की थ्योरी सिर्फ कुछ संभावनाओँ और अनुमानों के आधार पर है। तो हम फिलहाल इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि आर्यनों का मूल पहाड़ी नहीं है लेकिन हां, इनका माइग्रेशन जरूर हिमालयी क्षेत्र में हुआ होगा।
