नेपाल की ज़ेन ज़ी सरकार भारत के लिए साबित होगी सिरदर्द?
जून 2023 की बात है। काठमांडू के मेयर बालेन शाह ने अपने कार्यालय में एक तस्वीर लगाई थी। यह तस्वीर कुछ और नहीं बल्कि ग्रेटर नेपाल का नक्शा था। इस तस्वीर को अपने ऑफिस में लगाकर बालेन शाह ग्रेटर नेपाल की उस थ्योरी के लिए अपना समर्थन जाहिर कर रहे थे जिसे यहां की सरकार भी बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं देती है। विशाल नेपाल की यह अवधारणा भारत विरोध पर टिकी हुई है। इस अवधारणा के मुताबिक उत्तराखंड, सिक्किम समेत कई क्षेत्र हैं जो नेपाल के हैं और भारत ने इन पर कब्जा किया हुआ है। भारत विरोध की यह पहली गतिविधि नहीं थी जिसमें बालेन शाह खुलकर सामने आए हों।

आदिपुरुष पर भी किया था विवाद
2023 में ही जब आदिपुरुष फिल्म रिलीज हुई तो मेयर रहते हुए शाह ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया। उन्होंने इस फिल्म को काठमांडू में नहीं लगने दिया। उन्हें इस बात पर आपत्ति थी कि फिल्म में माता सीता को भारत का बताया गया था। बता दें कि यहां के लोग मानते हैं कि सीता भारत की नहीं बल्कि नेपाल की बेटी थी। खैर, भारत विरोध का झंडा बुलंद रखने वाले बालेन शाह नेपाल के प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। हाल ही में यहां हुए आम चुनावों में बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्रता पार्टी ने दमदार जीत प्राप्त की है। पार्टी को 125 सीटों पर जीत मिली है। इसी के साथ 2008 के बाद यह पहली बार है जब कोई अकेली पार्टी सरकार बनाएगी। 2008 के बाद से यहां की सत्ता में लगातार गठबंधन से सरकार बनी है। नेपाल में हुए जेन ज़ी आंदोलन ने यहां पर तख्तापलट किया था। अब उन्हीं जेन ज़ी ने युवाओं की सरकार को चुनकर लाया है। लेकिन क्या महज तीन साल पहले अस्तित्व में आई पार्टी नेपाल का नेतृत्व कर पाएगी? क्या बालेन शाह जिनके पास राजनीति का अनुभव ना के बराबर है, वह नेपाल का नेतृत्व कर पाएंगे? और सबसे बड़ा सवाल भारत के लोग पूछ रहे हैं। गाहे-बगाहे भारत विरोध का झंडा बुलंद करने वाले बालेन शाह के राज में भारत-नेपाल के संबंध मजबूत होंगे या फिर बिगड़ेंगे? इसी तरह के कई सवाल नेपाल की नई एवं युवा सरकार को लेकर पूछे जा रहे हैं।
युवाओं के हाथ नेपाल
मई-जून 2024 के मध्य नेपाल में जेन ज़ी आंदोलन हुआ। इस आंदोलन के माध्यम से युवाओं ने देश की पारंपरिक पार्टियों को नकार दिया और एक वैकल्पिक राजनीति का उदय करना था। इसी जेन ज़ी आंदोलन से बालेन शाह (तब काठमांडू के मेयर) और रवि लामिछाने की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) का उदय हुआ। इस आंदोलन ने इन दोनों ही किरदारों को लोकप्रियता दिलाई। अब 2026 में हुए आम चुनावों में यह दोनों ही किरदार सरकार बना रहे हैं और नेपाल में एक नया इतिहास लिख रहे हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री के प्रबल दावेदार माने जा रहे बालेन शाह ने झापा जिले के निर्वाचन क्षेत्र 5 से जीत प्राप्त की है। उनकी यह जीत इसलिए भी बड़ी हो जाती है क्योंकि उन्होंने इस सीट पर नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री और प्रमुख नेता केपी ओली को हराया है। शाह ने ओली को 50 हजार के वोटों के अंतर से मात दी है। अंतिम मत परिणामों के अनुसार जहां बालेन शाह को 63,348 वोट प्राप्त हुए तो वहीं, केपी ओली को सिर्फ 18 हजार वोटों पर संतुष्ट करना पड़ा। अंतिम परिणामों के अनुसार राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को सबसे ज्यादा सीटें प्राप्त हुई हैं। पार्टी ने 125 सीटों पर कब्जा किया है। दूसरी तरफ, नेपाल कांग्रेस को 18, सीपीएन-यूएमएल को नौ सीटें प्राप्त हुई हैं।

नेपाल में चुनाव प्रक्रिया
नेपाल में चुनावी प्रक्रिया मिश्रित होती है। यहां संसद के निचले सदन को प्रतिनिधि सभा कहा जाता है। यहां कुल 275 सीटें हैं। यहां चुनाव प्रक्रिया दो तरह से की जाती हैं। पहला होता है प्रत्यक्ष निर्वाचन। इसमें जनता की तरफ से उम्मीदवारों को वोट डाले जाते हैं। जैसे लगभग सभी जगह होता है कि जिसे अधिक वोट पड़ेंगे, वह चुनकर आता है। प्रत्यक्ष निर्वाचन के लिए 160 सीटें होती हैं। दूसरी प्रक्रिया होती है- समानुपातिक निर्वाचन (प्रपोर्शनल रिप्रजेंटेशन)।
इस प्रक्रिया से 110 सीटों पर चुनाव होते हैं। इस प्रक्रिया में लोग किसी उम्मीदवार को नहीं बल्कि राजनीतिक पार्टी को वोट देते हैं। इस प्रक्रिया के तहत पूरे देश को एक ही निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है। किसी पार्टी को कितने प्रतिशत वोट मिले हैं, उसी आधार पर जीती हुई सीटों का हिसाब लगाया जाता है। उदाहरण के लिए अगर किसी पार्टी को देश के कुल वोटों का 20 फीसदी मिलता है तो उसे 110 में से लगभग 22 सीटें मिलेंगी। अगर प्रोपोर्शनल रिप्रजेंटेशन के वोट और सीटों को जोड़ा जाए तो आरएसपी सीधे 185 सीट के आसपास सीट इस चुनाव में जीती है। यानि कि 275 सीटों वाले निचले सदन में यह दो तिहाई से बड़ा आंकड़ा है। सरकार बनाने के लिए 138 सीटों की आवश्यकता होगी।
नेपाल का ऐतिहासिक चुनाव
नेपाल में हुआ यह आम चुनाव कई मोर्चों पर ऐतिहासिक है। 2008 के बाद से नेपाल में कोई भी पार्टी अपने दम पर सरकार बनाने में सफल नहीं हो पाई थी। इस बार यह रिकॉर्ड टूटा है। इस बार बालेन शाह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी अकेले के दम पर सरकार बना रही है। नेपाल में 2015 में नया संविधान लागू हुआ था। इस संविधान के लागू होने के बाद यहां अवधारणा बन चुकी थी कि अब कोई भी पार्टी अकेले के दम पर सरकार नहीं बना पाएगी। जिस तरह की चुनाव प्रणाली यहां पर अपनाई गई है, उसके बनिस्बत कहा जाता रहा है कि किसी एक पार्टी के लिए स्पष्ट बहुमत प्राप्त करना मुश्किल है। लेकिन अब यह अवधारणा टूट रही है।
बालेन शाह अगर प्रधानमंत्री बनते हैं तो यह पहली बार होगा जब कोई मधेसी मूल का व्यक्ति नेपाल का प्रधानमंत्री बनेगा। भले ही बालेन शाह ने खुद को कभी एक मधेसी नेता के तौर पर पेश नहीं किया है लेकिन उनका नाता अवश्य इस जाति से है। दूसरी तरफ, यह पहली बार है जब नेपाल की पारंपरिक राजनीतिक पार्टियों को करारी हार मिली है। पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड को छोड़कर कोई भी दूसरा पूर्व पीएम संसद नहीं पहुंच सका है। दिलचस्प यह भी है कि आरएसपी सिर्फ तीन साल पहले बनी पार्टी है। इतने कम समय में इतनी बड़ी विजय प्राप्त करना भी अपने आप में अप्रत्याशित है। आरएसपी ने यह पूरा चुनाव बालेन शाह के चेहरे पर लड़ा।
रैपर से राजनेता बने बालेन शाह भी नेपाल की पारंपरिक राजनीति में नए हैं। वह यहां की राजनीति में बिलकुल नए चेहरे हैं। नेपाल में जिस तरह के नए समीकरण बन रहे हैं, उन नए समीकरणों में भारत और नेपाल के संबंध मजबूत होंगे या फिर उनमें दूरियां बढ़ेंगी?, इस पर सबसे ज्यादा नजर रहने वाली है।
भारत–नेपाल संबंध
भारत और नेपाल के संबंध सदियों पुराने हैं। दोनों ही देशों के बीच रोटी-बेटी का साथ है। यहां तक कि नेपाल के कई नेता और दिग्गजों ने भारत के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई की है। दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में भारत और नेपाल के बीच के रोटी-बेटी के संबंध काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। हिमालय की चोटियों से निकलने वाली नदियों और तराई के खुले मैदानों ने इन दोनों राष्ट्रों को एक अटूट सूत्र में बांधा है। दोनों देशों के बीच ना सिर्फ खुली सीमा है बल्कि नेपाल के नागरिकों को भारत में काम करने और संपत्ति रखने के समान अधिकार भी है।
पशुपतिनाथ से काशी विश्वनाथ और लुम्बिनी से बोधगया तक की आध्यात्मिक यात्रा इन संबंधों को राजनीतिक सीमाओं से ऊपर ले जाती है। भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। नेपाल की अधिकांश विदेशी वस्तुएं भारतीय बंदरगाहों और पारगमन मार्गों से होकर गुजरती हैं। वर्तमान में, भारत-नेपाल संबंधों का नया अध्याय ‘ऊर्जा कूटनीति‘ है। नेपाल से भारत को 10,000 मेगावाट बिजली निर्यात करने का दीर्घकालिक समझौता किया गया है। अब भारत-नेपाल के बीच के ये मजबूत संबंध बालेन शाह के नेतृत्व में क्या मोड़ लेंगे? वो बालेन शाह की नीतियों से ही साफ होगा।
बालेन शाह और नेपाल
बालेन शाह जिस तेजी से नेपाल की राजनीति में उभरे हैं, उसका सबसे बड़ा श्रेय उनकी राष्ट्रवादी विचारधारा को जाता है। बालेन ने मेयर रहते हुए उन मुद्दों को छूने की कोशिश की जो नेपाल के लोगों की भावनाओं से जुड़े हुए हैं। जैसे कि ग्रेटर नेपाल का मुद्दा या फिर माता सीता के जन्मस्थान की बात। बालेन शाह का उदय न केवल नेपाल की आंतरिक राजनीति बल्कि भारत के साथ उसके द्विपक्षीय संबंधों के लिए भी एक टर्निंग पॉइंट साबित होने वाला है।
ऊपरी तौर पर देखें तो बालेन शाह की छवि भारत विरोध की नजर आती है लेकिन जब आप इसे और अंदर जाकर देखते हैं तो यह भारत विरोध कम बल्कि नेपाल पहले की नीति समझ में आती है। यह वही राष्ट्रवादी विचारधारा की सोच है जो नेपाल के भावनात्मक मुद्दों को पहले रखने में विश्वास रखती है। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बालेन शाह एवं पार्टी के अध्यक्ष रवि लछिमाने से फोन पर बात की। पीएम मोदी ने उन्हें जीत की बधाई देने के साथ ही भारत-नेपाल के संबंधों को नई ऊंचाई पर ले जाने की प्रतिबद्धता भी जाहिर की। लेकिन क्या यह प्रतिबद्धता एक्शन में बदल पाएगी? इस सवाल के जवाब में ज्यादातर विशेषज्ञ कहते हैं कि अभी कुछ भी कहना मुश्किल है।
आड़े आएगी अनुभव की कमी?
बालेन शाह के पास अनुभव की कमी है। भारत-नेपाल के सदियों पुराने संबंधों को समझने के लिए उनके पास बहुत ज्यादा अनुभव नहीं है। भले ही वह काठमांडू के मेयर रह चुके हैं लेकिन एक मेयर के तौर पर काम करना और प्रधानमंत्री के रूप में काम करना, दोनों अलग चीजें हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अनुभव की कमी होने के बाद भी बालेन शाह का एक रुख साफ नजर आता है कि वह जेन ज़ी की आवाज को बुलंद करना चाहते हैं।
बालेन शाह एक इंजीनियर रहे हैं, इसलिए उनकी कूटनीति पुरानी विचारधाराओं (कम्युनिज्म या समाजवाद) के बजाय परिणामों पर आधारित होने की संभावना है। कुछ विशेषज्ञ संभावना जता रहे हैं कि बालेन शाह भारत के साथ कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स जैसे रेल लिंक एवं एक्सप्रेसवे पर काम कर सकते हैं। इसके अलावा वह डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि भारत के लिए यह एक अवसर है कि वह पुराने गार्ड्स के बजाय एक युवा और आधुनिक नेतृत्व के साथ सीधे संवाद साधे।
उठा सकते हैं सीमा विवाद
बालेन शाह की छवि प्रखर राष्ट्रवादी की रही है। ग्रेटर नेपाल जैसे मुद्दे को शाह ने हवा दी है। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि शाह के नेतृत्व में भारत के साथ नेपाल का सीमा विवाद फिर उठाया जा सकता है। वह कालापानी, लिपुलेख और सुस्ता जैसे सीमा विवादों पर मुखर हो सकते हैं। नेपाल की पिछली सरकारों को देखें तो अक्सर चीन कार्ड खेलकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की जाती है। हालांकि बालेन शाह के रुख में चीन के प्रति थोड़ी बेरुखी नजर आती है। बालेन शाह ने संकेत दिया है कि वह चीन के कर्ज-जाल के प्रति सतर्क हैं।
उन्होंने कहा कि वह अपने देश की संप्रभुता से समझौता नहीं करेंगे। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि अब बालेन सिर्फ भारत के पक्ष में ही खड़े रहेंगे। जवाब है नहीं। ऐसा होने की संभावना ना के बराबर है। एक समझदार नेता के तौर पर बालेन की कोशिश दोनों देशों के साथ ही संबंध मजबूत करने की होगी। वह नेपाल हित के मुद्दों पर दोनों देशों के साथ द्विपक्षीय संबंध मजबूत करने पर नहीं हिचकेंगे। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह नेपाल में अपनी परियोजनाओं की गति को चीनी परियोजनाओं से तेज रखे।
भारत के लिए भी नया अनुभव
बालेन शाह के नेतृत्व में नेपाल की नई सरकार भारत के लिए एक सकारात्मक अनिश्चितता लेकर आई है। जहां एक तरफ प्रखर राष्ट्रवाद की चुनौतियां हैं, वहीं दूसरी तरफ एक ऐसा नेतृत्व है जो प्रगतिशील है और जिसे जनता का भारी समर्थन प्राप्त है। भारत के लिए भी यह एक नया अनुभव होगा। हमारी सरकारों के पास नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों और नेपाली कांग्रेस के साथ काम करने का अनुभव है लेकिन युवाओं की तरफ से चुनी गई एक नई-नवेली पार्टी और उसके नेतृत्व के साथ काम करने का कोई अनुभव नहीं है। यानि कुल मिलाकर तय है कि नेपाल का युवा नेतृत्व पारंपरिक धड़े से हटकर कुछ नए फैसले ले सकता है। अब क्योंकि आरएसपी एक नई पार्टी है तो इसकी विचारधारा किस दिशा में जाएगी, उसको लेकर फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता है।
कुल मिलाकर नेपाल की नई सरकार भारत और चीन, दोनों के लिए नई है। एक ऐसी सरकार जिसकी नीतियों को लेकर अभी कुछ भी शत-प्रतिशत सुनिश्चित होकर नहीं कहा जा सकता। हां, इतना अवश्य है कि नेपाल की इस जेन ज़ी सरकार के नेतृत्व में कुछ ऐसे फैसले अवश्य होंगे जो पारंपरिक धड़े से अलग होंगे और इस तरह के फैसले भारत के लिए थोड़ी चिंता जरूर पेश कर सकते हैं।
