सबसे पहले ऐपण किसने बनाया था? ऐपण का पूरा इतिहास

Aipan

ऐपण

ऐपण वो कला है जिसने आज दुनियाभर में उत्तराखंड का नाम रोशन किया है। कभी घरों की दीवारों एवं आंगन में सजने वाली ये कला अब संसद भवन तक पहुंच चुकी है। आज बर्तनों से लेकर सजावटी सामान तक, हर जगह ऐपण कला ने अपनी जगह बना ली है। भले ही ऐपण कला आज विश्व पटल पर पहुंची हो लेकिन पहाड़ के घरों में इसका चित्रकारी का उपयोग सदियों से होता आ रहा है। खास तौर पर कुमाऊं में। ऐपण कला ने पहाड़ में जन्म ही कुमाऊं में लिया है। यह वहां के संस्कारों की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी भी है। जीवन की शुरुआत से लेकर अंत तक, ऐपण कला का महत्व है। यह तो हम सब जानते हैं कि ऐपण कला आज देश और दुनियाभर में उत्तराखंड का नाम रोशन कर रही है लेकिन क्या आप इस कला को अच्छी तरह से जानते हैं? उत्तराखंड में कहां से आई ये कला? किसने की इसकी शुरुआत? क्यों इस कला का नाम ऐपण पड़ा? और इसमें क्या-क्या खास होता है? हर एक जानकारी हम आपको दे रहे हैं इस रिपोर्ट में।

कहां से आया ऐपण?
ऐपण को समझने की दिशा में सबसे पहले इस शब्द की उत्पत्ति के बारे में जान लेते हैं। ऐपण की उत्पत्ति संस्कृत शब्द अर्पण से हुई है। इसका मतलब होता है लिखना। कभी सभी कुमाऊं की परंपरा का हिस्सा बनी ये कला आज उत्तराखंड में कई लोगों की आजीविका का साधन बन चुकी है। यह कला उत्तराखंड की ही है, इस पर GI टैग भी लग चुका है। 2021 में ही ऐपण को GI टैग मिला था।

ऐपण की शुरुआत कैसे हुई?
उत्तराखंड में ऐपण की शुरुआत होने की जाननकारी चंद शासनकाल से मिलती है। भारती पांडे अपनी किताब ‘हमारी सांस्कृतिक विरासत ऐपण’ में लिखती हैं कि अल्पना या ऐपण और भित्ति चित्र अथवा दीवार पर चित्र बनाने की परंपरा का जिक्र चंद शासन में होने का पता चलता है। वह कहती हैं कि कत्यूरी राजवंश या उससे पहले ऐपण या भित्ति चित्र बनाए जाने की पहाड़ों में कोई जानकारी नहीं मिलती है। जब आप इतिहास की किताबों को खंगालते हैं तो ऐपण की शुरुआत कब और कहां से हुई?, इसकी पुख्ता जानकारी कहीं नहीं मिलती है। हालांकि लोक में यह बात प्रचलित है कि इसकी शुरुआत अल्मोड़ा के शाह परिवारों ने की थी।

भारतीय पांडे भी अपनी किताब में इस बात पर चर्चा करती हैं। वह राजा सोमचंद एवं उनके दस वंशजों के कालखंड का जिक्र करती हैं। वह बताती हैं कि इनका शासनकाल 975 ईसवी से 1178 ईसवी तक माना गया है। इसी कालखंड में एक घटना का पता चलता है जो कि ऐपण की शुरुआत होने से जुड़ती है। इस घटना के मुताबिक इंद्र चंद (अब यह राजा था या राजा का बेटा था, इसकी साफ जानकारी नहीं मिलती है।) का चीन के राजा की कन्या से विवाह हो रहा था। हालांकि स्थानीय जनता इस विवाह के समर्थन में नहीं थी। बताया जाता है कि विरोध करने वाले ये ज्यादातर वे लोग थे जो बाहर से आकर यहां बसे थे। इनमें से अधिकांश ब्राह्मण एवं क्षत्रिय थे। हालांकि इन्हें विरोध करना भारी पड़ा। चंद राजा ने इन्हें विरोध की सजा दी और ब्राह्मण एवं क्षत्रियों को कुमाऊं से बाहर कर दिया। माना जाता है की करीब 200 से 250 साल तक ये लोग कुमाऊं में वापस नहीं आ सके। इसके बावजूद उन्होंने इस कला को संजो कर रखा। किताब के मुताबिक 1365 में इनकी वापसी कुमाऊं में हुई।

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भारती पांडे अपनी किताब में कहती हैं कि ये कला कुमाऊं में बाहर से आई है। वह कहती हैं कि पहाड़ के राजपूत शासकों के दौर में ऐपण का जिक्र ना के बराबर मिलता है। ये कला केवल ब्राह्मणों और शाहों में प्रचलित रही है। इससे ये साफ है कि ऐपण बाहर से कुमाऊं में आई है। यही वजह है कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कार्यकलापों से जुड़ी इस कला में निखार बाहर से आया ही प्रतीत होता है। इससे एक बात तो साफ हो जाती है कि ये कला ब्राह्मणों और शाहों के साथ बाहर से आई है। बाद में इस कला को ठाकुर समाज ने भी देव पूजन व शुभ अवसरों पर अपनाना शुरू कर दिया। शाहों और ब्राह्मणों की ऐपण पद्धति में थोड़ी भिन्नता भी नजर आती है।

त्योहारों में ऐपण का महत्व
दिवाली के मौके पर महालक्ष्मी चौकी, पत्ता, लक्ष्मी पद्चिन्ह, लक्ष्मी यन्त्र ऐपण बनाई जाती हैं। वहीं, दशहरा और नवरात्री के मौके पर ‘नवदुर्गा पत्ता’ बनाया जाता है। शिवरात्री और पार्वती पूजन के दिन शिव पीठ और शिव चौकी बनाई जाती है। वहीं, जन्माष्ठमी के मौके पर जन्माष्ठमी पत्ता बनाया जाता है। त्योहारों के इतर अगर शुभ अवसरों की बात की जाए तो पूजा और हवन में आचार्य चौकी, उपासना चौकी और ज्यूंति पत्ता में ऐपण बनाया जाता है। नामकरण संस्कार पर सूर्य दर्शन चौकी, स्यो ऐपण और ज्यूंति पत्ता में ऐपण बनाया जाता है। वहीं जनेऊ संस्कार के अवसर पर जनेऊ ज्यूंति पत्ता और जनेऊ चौकी में ऐपण बनता है। वहीं, तेरहवीं के दिन पीपल पानी की रस्म में बिना बिंदु के ऐपण बनाई जाती हैं। 

ऐपण बनाने के तरीके
ऐपण के स्टाइल की बात करें तो ये आम तौर पर तीन मुख्य तरीकों से बनाई जाती हैं। और वो है सिद्ध, दैवीय, लौकिक। सिद्ध स्टाइल की ऐपण जमीन, चौकी, पत्ता, नाता, लक्ष्मी पद्चिन्हों और अलग-अलग चौकी में इस्तेमाल होती है। वहीं अगर बात की जाए दैवीय की तो इसे नवदुर्गा पत्ता, द्वार पत्ता में इस्तेमाल किया जाता है। लौकिक स्टाइल में लाइन और बिंदु का इस्तेमाल होता है जैसे कि स्वास्तिक। ऐपण कला में बिंदु और लकीरों का बहुत ही ज्यादा महत्व माना जाता है। ऐपण को घरों में बनाने के पीछे ये मान्यता है कि इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। ऐपण एक ऐसी कला है जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती है।
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घरों में ऐपण की विशेषता
घरों में बनने वाली ऐपण में ज़्यादातर तीन ही रंगों का इस्तेमाल होता है। लाल, मरून और सफेद। घरों में बनी ऐपण कला से आप ये भी पता कर सकतें हैं कि घर में कौन-सा त्योहार मनाया जा रहा है। ऐपण कला में हर एक बिंदु और डिजाइन का मतलब होता है। पूजा या त्योहारों के हिसाब से अलग-अलग पैटर्न बनाए जाते हैं। आज ऐपण कला को भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में प्रसिद्धि मिल रही है। कभी घरों तक सीमित रहने वाली ये अद्भुत कला आज अलग-अलग रूप में आपको बाजार में दिख जाती है। आज इस कला के बूते कई लोगों को रोजगार भी मिल रहा है। यही वजह है कि अब इस कला में नए प्रयोग भी किए जा रहे हैं। जैसे कि अलग-अलग रंगों का इस्तेमाल। पहले जहां ऐपण को सिर्फ 3 या 4 रंग से बनाया जाता था , अब कई लोग इसे कई तरह के रंगों में और तरीकों से बना रहे हैं।

देशभर मेंऐपण
देश के अलग-अलग कोने में ऐपण कला अलग-अलग रूप में नजर आती है। हालांकि जगह के हिसाब से इस कला का नाम और बनाने का ढंग भी कुछ हद तक बदल जाता है। जैसे बंगाल और आसाम में इसे अल्पना कहा जाता है। बिहार और उत्तर प्रदेश में अरिपन, राजस्थान और मध्य प्रदेश में मंदना, गुजरात और महाराष्ट्र में रंगोली, साउथ की तरफ जाते हैं तो वहां कॉलम, आंध्रा में मुग्गु और ओडिशा में अल्पना कहा जाता है। ऐपण के नाम भाषाई आधार पर भी अलग-अलग हो सकते हैं। इसमें अप्पन, ऐप्पन, आईप्पन भी शामिल है। अतीत में अल्पना यानी ऐपण जमीन पर ही उकेरी जाती थी किंतु अब ये लोगों के ड्राइंगरूम तक भी पहुंच गई है। इसे उकेरने के लिए अब सिर्फ दीवार या जमीन जरूरी नहीं है, अब इसे कांच, रैक्सीन, हार्डबोर्ड पर भी उकेरा जा रहा है। अवसर विशेष के स्टीकर, कैलेंडर भी मिलने लगे हैं। 


कैसे बनाया जाता है ऐपण?
जितना पेचीदा इस कला का इतिहास है, उतना इसे बनाना नहीं है। ऐपण बनाने के लिए आपको ज्यादा सामग्रियों की जरूरत भी नहीं पड़ती। गांव-घरों में ऐपण बनाने के लिए गेरू या लाल मिट्टी के साथ चावल को पीसकर एक घोल बनाया जाता है। इस घोल को स्थानीय भाषा में बिस्वार कहा जाता है। इन्हीं के इस्तेमाल से ऐपण बनाया जाता है। वैसे तो ऐपण को कई तरीकों से बनाया जा सकता है। बदलते वक्त के साथ इसमें अलग-अलग रंगों का भी इस्तेमाल होने लगा है। ऐपण जगह के हिसाब से अलग-अलग हो सकते हैं। यह जमीन पर, दीवार पर या किसी दूसरे स्थान विशेष पर बनाया जा सकता है।

जमीन पर बनाए जाने वाले ऐपण में घर की सीढ़ियों और पूजा स्थलों पर बनाया जाता है। इसके अलावा दीवारों पर बनाई जाने वाली ऐपण होती हैं। ये आम तौर पर दो तरीकों की दीवारों पर बनाई जाती हैं। एक पूजास्थल की दीवारों पर तो दूसरा रसोई घर में। गांवों में पहले घरों को साल में दो बार गाय के गोबर से लीपा जाता था। अभी भी कई गांवों में यह व्यवस्था कायम है। लीपने के बाद पूजास्थल की दीवारों पर नाता ऐपण बनाई जाती है। वहीं रसोई में लक्ष्मी नारायण ऐपण को बनाया जाता है। दीवार के साथ ही लकड़ियों की चौकी पर भी ऐपण बनाए जाते हैं। ये वो लकड़ियां होती हैं जो ज्यादातर पूजा और शादियों में इस्तेमाल की जाती हैं। इसमें कपड़ों पर बनाई जाने वाली ऐपण भी शामिल होती है। ये ऐपण आपको पिछौड़े में देखने को मिल जाती है। पिछौड़े पर खोदिया चौकी ऐपण बनाई जाती है। ये जगह के हिसाब से बनाई जाने वाली ऐपण के कुछ रूप थे।

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